गणतंत्र या फिर नवराणातंत्र

सरिता गिरी :बारह सूत्रीय सहमति से लेकर संविधान सभा से संविधान बनाने का पहला मकसद देश में लोकतंत्र के साथ दीर्घकालिक शांति और स्थायित्व की स्थापना थी । ७ वर्षों की कठिन मशक्कत के बाद संविधान सभा से संविधान जारी तो हुआ ं लेकिन संविधान जारी होने के ठीक पहले और बाद में संविधान असंतुष्टि के कारण मधेश में हुए विरोध प्रदर्शनों में अभी तक ५० से ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं । तीन महीनों से देश अनिश्चितकालीन हड़ताल और नाकाबंदी के प्रभाव में झूल रहा है । यह निश्चित रूप से अपेक्षा और परिणाम के बीच की दूरी के कारण ही हुआ है । इस अवस्था के कारण और परिणामों को समझने के प्रयास में मैं पहले संविधान सभा के संवैधानिक समिति की

Sarita-Giri

सरिता गिरी

बैठकों को याद करती हूँ । स्मृति में मुझको ऐसा लगता है जैसे मैं उन दिनों हजारों वर्ष पहले के प्राचीन ग्रीक सीनेट में बैठी होती थी । हजारों वर्ष पहले का ग्रीक सीनेट अथवा सभा ही वैसी जगह थी जहाँ से उस राजनीति की शुरुआत हुई थी, जिसे हम जानते और समझते हैं और जिसकी निरन्तरता आज भी है । मेरी समझ में आज के युग में नेपाल की राजनीति और राजनीतिक पात्रों के प्रतिनिधित्व तथा उनके आधारभूत स्वभाव को समझने के लिए ग्रीक सभा से उपयुक्त कुछ और हो ही नहीं सकता है, क्योंकि वह शुरुआती युग था । नेपाल की राजनीति भी नये शुरुआती युग में ही है । संवैधानिक समिति की बैठक में सभी दलीय प्रतिनिधि अपनी–अपनी बातें रखते थे । यह संविधान सभा में ही अपनी बातों को रखने जैसा होता था, लेकिन वहाँ समय के बारे में उतनी सख्ती नहीं होती थी जितनी सविधान सभा में होती थी । पर माहौल कुछ अलग किस्म का होता था । धीरे–धीरे मुझे ऐसा लगने लगा था कि समिति, विचार विमर्श कर समझौतों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने वाली जगह है । सब कुछ कहीं और से नियन्त्रित लगता था । सब नाटक के पात्र लगते थे । सभासद बोलते रहते थे और बड़े दल के प्रतिनिधि सचिवालय के सहयोग से बैक रुम में आगे की अपनी योजनाएँ बनाते रहते थे । उनकी योजनाओं के अनुसार संविधान सभा नियमावली को धीरे–धीरे शक्तिहीन बना दिया गया और समिति के सभापति के सारे अधिकार एक तरफ सभाअध्यक्ष को सौंप दिये गये तो दूसरी तरफ क्रमिक रूप से समिति के लगभग ६१ सदस्यों का अधिकार छोटे से विवाद समाधान उपसमिति को दे दिया गया । इस समिति में गोप्य योजना अनुसार ही सभासदों का चयन किया गया था । कथित कउयष्भिचक को प्रमुख तीन दलों और विशेषकर कांग्रेस और एमाले की योजना अनुसार उस समिति से बाहर रखने की कोशिश की गयी थी । लेकिन फिर भी अंत में एक तरफ कांग्रेस एमाले और दूसरी तरफ माओवादी और मधेशी दल के बीच वह समिति भी ध्रुवीकृत होती गयी । अंततोगत्वा दो ध्रुवों के बीच सहमति नहीं होने के कारण उस समिति का प्रतिवेदन भी संवैधानिक समिति में नहीं आया और संविधान सभा भी नाटकीय रूप से विघटित हो गया । संविधान सभा की हत्या कांग्रेस एमाले के खेमे में रहे सभाध्यक्ष के हाथों करवा दी गयी क्योंकि उन्होंने संविधान सभा की पूर्व निर्धारित बैठक नहीं बुलवायी । संविधान सभा आयोग द्वारा प्रस्तुत १० प्रदेश के संघीय स्वरूप के पक्ष में संविधान सभा के दो तिहाई से भी ज्यादा सदस्यों के होने के कारण संविधान सभा की बैठक सभा अध्यक्ष ने नहीं बुलाई । सभासद बेचारे संविधान सभा में नारा जुलुस लगाते चक्कर काटते रहे लेकिन ब्रिटिश राजनीतिक कथा जैसा कोई एंटी हीरो या हिरोज वहाँ नहीं निकले जो सभाध्यक्ष को घसीट कर संविधान सभा की कुर्सी पर ला बिठाते । सभाध्यक्ष ने उस दिन संविधान सभा में ही नेताओं और सुरक्षाकर्मियों के बीच समय बिताया । सभामुख स्वयं भी हिम्मत के साथ आगे बढ़कर अपने स्वाभाविक धर्म और दायित्व का निर्वाह नहीं कर सके । जब संविधान सभा की बैठक नहीं होने की सम्भावना माओवादियों ने देखी तो माओवादी प्रधानमंत्री ने समय से पन्द्रह मिनट पहले दूसरे संविधान सभा के निर्वाचन की घोषणा कर दी । यह सब रोमांचकारी ग्रीक राजनीतिक नाटक से कम नहीं था । संविधान सभा विघटन में प्रमुख दल माओवादी को उस वक्त मधेशी मोर्चा ने बिना सोचे विचारे साथ दिया और उसका परिणाम उन्होने संविधान सभा २ के चुनाव में भोगा । माओवादी और मधेशवादी कमजोर होकर संविधान सभा में पहुँचे ।
अनुमान लगाया जा सकता है कि संविधान सभा २ का आंतरिक माहौल भी कमोवेश वैसा ही रहा होगा । वैसे संविधान सभा का नाटक अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँचा हुआ सारे संसार को तब दिखा, जब प्रमुख दल के नेताओं ने संविधान के विषय वस्तु पर प्रकाश डाला और मसौदा समिति के सभापति ने चंद मिनटों में पूरे संविधान सभा के समक्ष अपना जबाब भी प्रस्तुत कर दिया । उसके बाद यांत्रिक तरीके से सभाध्यक्ष ने संविधान की एक–एक धारा को पारित भी करा लिया । लेकिन मधेशी सभासद तबतक सड़कों और नाकाओं पर पहँच चुके थे । संविधान सभा २ में मधेशियों को दर किनार कर तीन प्रमुख दलों ने अपनी इच्छानुकूल का संविधान तो बनाया लिया लेकिन उनके अनुमान के विपरीत मधेश का अनिश्चित आंदोलन और नाकाबंदी उनके सिर आ पड़ा है । लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक युग में जब राजनीति अपारदर्शी और सहमतीय नियम और कानून के विपरीत होती है तो परिणाम भी अप्रत्याशित और नाटकीय ही होते हैं ।
संविधान सभा के सभाध्यक्ष आजकल ज्यादा सामने नहीं आ रहे हैं लेकिन उनके सचिवालय के कर्मचारी मष्कतष्लअतष्यल के आधार पर ही सभासदों से व्यवहार करते थे । योजना बनाने में भी उनकी भूमिका होती थी । मैने एक भी उच्च तह के मधेशी कर्मचारी को संविधान सभा सचिवालय में नहीं देखा । वे शायद प्रतिबंधित थे । मधेशी सभासद भी एक प्रकार से प्रतिबंधित ही थे । उनकी पहुँच कांगे्रस एमाले अथवा माओवादी के सम्बन्ध मार्फत ही होती थी । जिस अपमान और अवहेलना को उन्होंने जाने अन्जाने भोगा, आज उसका आक्रोश सड़कों पर और नाकाओं पर दिख रहा है ।
सड़क पर उनके उतरने की पृष्ठभूमि मधेश के युवाओं ने बना दी थी । मुद्दों को जिस प्रकार से पहले संविधान सभा में और बाहर स्थापित करा दिया गया था, यह तो होना ही था । नागरिकता, प्रतिनिधित्व और सीमांकन के विषयाें को लेकर मधेश आंदोलन होना ही था और जबरदस्त ढंग से हुआ भी । मधेश के असहयोग के परिणामस्वरूप यदि आज काठमांडौ की गति धीमी हो गयी है तो सुरक्षा तंत्र और कर्मचारीतंत्र के पीछे हट जाने से मधेश भी एक प्रकार से स्वतंत्र होने की अनुभूति कर रहा है । स्वतंत्रता का नशा बहुत ही खूबसूरत होता है । एक बार इस खूबसूरती का नशा चढ़ गया तो फिर उतरता नहीं है । अपना रंग छोड़कर ही जाता है । स्वतंत्रता का मतलब अलग देश ही नहीं होता है । पारस्परिक सम्बन्धों में स्वतंत्रता का मतलब बराबरी होता है । इसीलिए अब वैसा कोई भी समझौता कारगर नहीं होगा जो बराबरी का नहीं होगा ।
यह कटु यथार्थ है कि नेपाल का संविधान २०७२ जारी होने के बाद लगभग दो तिहाई जनता असमान नागरिक बन चुकी है । किसी भी गणतांत्रिक देश में इससे भद्दा मजाक कुछ हो ही नहीं सकता है । फे्रंच दार्शनिक मांटेस्को ने तीन प्रकार के शासन पद्धति के बारे में कहा है । पहला राजतंत्र दूसरा अधिनायकतंत्र (तथचबललथ) और तीसरा गणतंत्र । राजतंत्र की सत्ता परम्परा और इतिहास की स्वीकार्यता पर टिकी होती है । जिस दिन जनता उस इतिहास अथवा परम्परा को अस्वीकार कर देती है, या किसी कारणवश उसका अंत हो जाता है, उस दिन राजतंत्र की सत्ता चरमरा जाती है । नेपाल में राजा वीरेन्द्र की हत्या के दिन से ही राजतंत्र के अंत की गिनती शुरु हो गयी थी । राजतंत्र के अंत होने पर सिर्जित शून्यता में अराजकता तथा अधिनायकतंत्र के आने की सम्भावना होती है, लेकिन नेपाल में ऐसा नहीं होने दिया गया । कुछ काल के लिए राजतंत्र को फिर जीवित किया गया और बाद में संविधान सभा १ के द्वाारा गणतंत्र की स्थापना हुई ।
गणतंत्र का आधार समानता होती है । लेकिन संवैधानिक राजतंत्र तथा सीमित प्रजातंत्र के युग मे प्रशिक्षित नेतागण गणतंत्र के मूल्य मान्यता को स्वीकार नहीं कर पाये हैं । वे इस नयी शुरुआत में अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहे हैं । नेपाल का संविधान २०७२ नाम मात्र का गणतंत्रात्मक संविधान है । इसके अंदर के कानून असमान, विभेदकारी, बहिष्करणकारी और दमनकारी हैं । इसलिए इस सविधान को चोर तरीके से पारित करा कर बंदूक की नोक पर लागू किया गया है । यह अधिनायकतंत्र को जन्म देने के प्रयास का संकेत है । अधिनायक तंत्र पारस्परिक भय, बहिष्करण तथा दमन पर आधारित होता है । जन आंदोलन, मधेश आंदोलन आदिवासी तथा जनजाति आंदोलन के साथ हुए समझौतों एवं परिणामस्वरूप अंतरिम संविधान में उल्लेखित उच्चतम सामाजिक समझौतों का उल्लंघन करते हुए यह संविधान आया है । प्रदेश के नाम पर देश की भूमि का फिर से बिर्ताकरण हुआ है और गणतंत्र के आवरण मे यष्निबचअजष्अज राणातंत्र को जन्म देने का प्रयास किया गया है । गणतांत्रिक नेपाल में परम्परा के दृष्टिकोण से भी यह जनता को स्वीकार्य नहीं होगा । नेपाल में राणातंत्र को निरंकुशता (तथचबललथ)के पर्याय के रूप में ही लिया जाता है, लेकिन आज के नेतागणों के पास निरंकुश होने का भी सामथ्र्य नहीं है । इसीलिए तीन प्रमुख दलों ने यदि समय रहते ही इसमें सुधार नहीं किया तो देर सबेर इस संविधान का विफल होना निश्चित है ।

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