गणतन्त्र के गुलाम

वर्तमान ओली सरकार मधेशियों के आँखों में धूल झोंकने के लिए संविधान संशोधन लाने की तैयारी में है । लेकिन मधेशी समुदाय उसकी चाल समझ रही है और इस बार वह झाँसे में आने वाली नहीं है ।
प्रो. नवीन मिश्रा:इतिहास साक्षी है कि राणा शासन काल में मधेशियों को अपने ही देश की राजधानी काठमांडू जाने के लिए पासपोर्ट लेना पड़ता था । सदियों से त्रसित मधेशी समुदाय आज गणतान्त्रिक नेपाल में भी एक गुलाम की जिन्दगी बसर करने को बाध्य है । कहा जाता है कि अधिकार लड़ कर ही हासिल किया जा सकता है । लगभग पिछले पाँच महीनों से नेपाल के मधेशी समुदाय अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए ६० से भी अधिक मधेशियों का बलिदान दे चुका है । इतने से भी क्रुर शासकों के कानों पर जूँ नहीं रेंग रही है और अब तो राजेन्द्र महतो सरीखे शीर्ष मधेशी नेता का सिर फोड़ने से बाज नहीं आई । पिछले ढाई दशक में नेपाल में अनेकों परिवर्तन हुए हैं । ८० के दशक में यहाँ लोकतन्त्र बहाली के लिए आन्दोलन शुरु हुआ । पहली बार राजा वीरेन्द्र ने १९९० में बहुदलीय प्रजातन्त्र की घोषणा की । इसके पश्चात् लोकतान्त्रिक सरकार का गठन हुआ । लेकिन १९९६ में माओवादियों द्वारा हिंसक विद्रोह प्रारम्भ हुआ, जो लगभग एक दशक तक चलता रहा, जिस में लगभग १६ हजार जानें गई । २००१ में दरबार हत्याकाण्ड के बाद नाटकीय रूप में राजा बने ज्ञानेन्द्र ने २००५ में सत्ता पर कब्जा कर लिया । इस घटना के विरोध में सभी राजनीतिक दल

एकजुट हो गए । २००७ में भारत के प्रयास से माओवादी और अन्य राजनीतिक दलों के बीच शान्ति समझौता हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप हिंसक आन्दोलन का दौर खत्म हुआ । इसके अगले साल मधेशी आन्दोलन शुरु हुआ । इस आन्दोलन की समाप्ति एक समझौते के परिणामस्वरुप हुई । २००८ में पहली संविधान सभा का गठन हुआ, लेकिन २०१२ तक अर्थात् अपने पूर्ण कार्यकाल में भी यह संविधान बनाने में सफल नहीं हो सका । २०१३ में दूसरी संविधान सभा का गठन हुआ । इसने लगभग दो सालों में संविधान तो तैयार कर लिया लेकिन संविधान निर्माताओं के मधेश विरोधी तेवर के कारण मान्य नहीं हो सका क्योंकि इसमें कुछ ऐेसे मधेशी विरोधी प्रावधान हंै, जो मधेशी नागरिकों को अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक बनने के लिए मजबूर करती है । संविधान सभा के चार बड़ी पार्टियों ने बहुमत के आधार पर संविधान को पारित कर लिया । मधेशी और आदिवासी समुदाय ने संविधान के इस मसौदे का तीखा विरोध किया, लेकिन संविधान सभा में संख्या बल के आगे उनकी एक न चली । वर्तमान मधेश आन्दोलन इसी घटना का परिणाम है ।
वर्तमान ओली सरकार मधेशियों के आँखों में धूल झोंकने के लिए संविधान संशोधन लाने की तैयारी में है । लेकिन मधेशी समुदाय उसकी चाल समझ रही है और इस बार वह झाँसे में आने वाली नहीं है । संविधान मसौदा तैयार करने की पहल का इंतजार किए बिना ही आन्दोलन मधेशी दलों ने सरकार के इस फैसले को खारिज कर दिया । आन्दोलनरत मधेशी दलों का मानना है कि इस फैसले से संकट के समाधान की उम्मीद नहीं है । संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा की लड़ाई मुख्यतः राज्य के पुनर्गठन समेत लोकसभा वा राज्यसभा क्षेत्रों के निर्धारण, संवैधानिक संस्थाओं में समानुपातिक व्यवस्था और नागरिकता के मुद्दे पर है । इनकी मांग है कि २००८ में मधेशी पार्टियों और नेपाल सकार के बीच हुए समझौते पर अमल किया जाए । मधेशी पार्टियां प्रारम्भ में एक तराई प्रदेश की मांग पर अड़ी थी । लेकिन बाद में ये पूर्वी और पश्चिमी मधेशी राज्य पर सहमत हो गई है । लेकिन वर्तमान संविधान में सात जिलों का सिर्फ एक मधेश राज्य बनाने का प्रावधान है, संविधान में प्रस्तावित संशोधन में कहा गया है कि राज्यों के पुनर्गठन के लिए एक राजनीतिक समिति बनाई जाएगी । मधेशी दलों का एतराज इसी को लेकर है । उनका कहना है कि जब पूर्व में राज्य पुनर्गठन आयोग और संविधान सभा की एक समिति इस पर अपनी रिपोर्ट दे चुकी है तो फिर राजनीतिक समिति बनाने का क्या औचित्य है ? आयोग और समिति की रिपोर्ट के आधार पर संशोधन क्यों नही किया जा रहा है । उनको डर है कि राजनीतिक समिति अगर जरुरी नहीं, समझेगी तो राज्य के पुनर्गठन की मांग खटाई में पड़ जाएगी ।
इसी तरह प्रत्येक जिले में लोकसभा की एक सीट आरक्षित कर बाकी क्षेत्रों को जनसंख्या के आधार पर सृजित करने का फैसला भी संदेहास्पद है । इससे ७५ सीटें पहले आरक्षित हो जाएंगी । इसका परिणाम यह होगा कि आवादी के बावजूद मधेशी राजनीति के हासिए पर रहेंगे । इतना ही नहीं इनका विरोध राज्य सभा में सीटें आरक्षित करने पर भी है । संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा के अनुसार पहले तय हुआ था कि भौगोलिक आधार पर प्रत्येक राज्य में राज्यसभा की एक सीट आरक्षित होगी और बाँकी जनसंख्या के आधार पर प्रत्येक राज्य से सीटें तय होगी । लेकिन इसको भी दरकिनार कर दिया गया । ऐसे में प्रस्तावित संशोधन आन्दोलन को कमजोर बनाने की साजिश भर है ।
मधेश आन्दोलन का देश के जनजीवन पर गहरा असर पड़ा है । दरअसल मधेशी आन्दोलनकारियों की नाकेबन्दी के कारण भारत से रसद, इन्धन और आम उपभोग्य वस्तुएं नेपाल में नहीं पहुँच पा रही हैं । इनकी कीमतें केवल आसमान नहीं छू रही हैं, बल्कि खुले बाजार में उपलब्धता भी सीमित हो गई है । हालात इतने बदतर हो गए हैं कि अस्पतालों में ऑपरेशन तक नहीं हो पा रहा है । बिजली की संकट तक उत्पन्न हो गयी है । पर्यटकों की आवाजाही नगण्य हो गई है । ३३ सालों में पहली बार नेपाल नकारात्मक आर्थिक विकास दर की राह पर है । करीब ढाई हजार उद्योगों में ताले लग चुके हैं । पिछले साल आई भूकंप ने न केवल नौ हजार से अधिक जानें ली, बल्कि एक लाख से भी अधिक लोगों को आर्थिक तंगी के दलदल में धकेल दिया । अब सियासी संकट के कारण लोगों की आर्थिक हालत बिगड़ गई है । नेपाल राष्ट्र बैंक के ताजा अध्यनन के अनुसार करीब आठ लाख लोग आर्थिक तंगी के शिकार हो गए हैं । सरकार के पास कर्मचारियों को तलब देने के लिए पैसे नहीं है । नेपाल के ज्यादातर बाजारों में कारोबार ठप है । बेरोजगारी बढ रही है । बेहतर है कि ओली सरकार भारत को अपना दुश्मन बनाने के बजाए मधेशियों की भावनाओं का कदर करते हुए ठोस कदम उठाए, जिससे जल्द से जल्द वर्तमान समस्याओं की समाप्ति हो सके ।
मधेश आन्दोलन से बिगड़े नेपाल के हालात का फायदा तस्कर भी उठा रहे हैं । किल्लत के कारण बढ़ी जरुरी वस्तुओं की तस्करी रोकने में जहाँ नेपाल उदासीन हैं, वही संगठित तस्कर गिरोह नेपाल से मादक पदार्थों, सोने और नकली नोटों की तस्करी कर रहे हैं । सोनौली–बेलहिया नाके पर तीन किलो सोना पकड़े जाने की चर्चाएं गर्म रही तो रक्सौल–वीरग्रज में आईएसआई एजेंट पकड़े–जाने से जाली नोटों की सप्लाई का बड़ा मामला सामने आया । महेशपुर सीमा से भी महीने भर में एक करोड़ से ज्यादा का चरस पकड़ा गया ।
दिनोदिन तराई क्षेत्र में सरकार के खिलाफ नाराबाजी बढ़ती ही जा रही है और आन्दोलन के विभिन्न हिस्सों में पहुँचता हुआ दिख रहा है । वीरगंज और गैर में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प की कई घटनाएं घटी है, जिनमें दोनों पक्षों के कार्य लोग जख्मी भी हुए हैं । मधेशी पार्टियों और सरकार के बीच विवाद का असर विभिन्न सामाजिक समूहों पर भी पड़ने लगा है । जनकपुर के जानकी मन्दिर में राष्ट्रपति विद्या भण्डारी के आने के वक्त हुआ उपद्रव इस बात की एक बानगी है । मधेशी प्रदर्शनकारियों ने उनके दौरे में बाधा डालने की कोशिश की ओर उनके काफिले पर पत्थरबाजी भी की गई । बहरहाल, यह बहुत जरुरी है कि सामाजिक व राजनीतिक सम्बन्धों को और ज्यादा बिगड़ने से रोका जाए । सिर्फ इसी तरह से संकट दूर होगा, न कि बेमन से बातचीत की दुहाई देने से ।

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