गणेश चतुर्थी आस्था के रंग

विनोदकुमार विश्वकर्मा ‘विमल’

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भाद्र शुक्ल चतुर्थी को गणेश चौथ का त्योहार नेपाल, भारत, चीन, तुर्किस्तान, जावा, वाली (इंडोनेशिया), थाइलैंड, वर्मा, इन्डोचाइना, जापान आदि देशों में मनाया जाता है । नेपाल के तराई–मधेश और भारत के उत्तर बिहार में गणेश चतुर्थी को ‘चौरचन’, ‘चौठचंद’, ‘गणेश चौठ’, ‘चौरचंद’ ‘चौठीचान’ या ‘चौठीचांद’ भी कहा जाता है । नेपाली बृहत् शब्दकोष में ‘गणेश चतुर्थी’ का अर्थ ‘गणेश का व्रत के लिए उत्तम भाद्र शुक्ल पक्ष को और माघ कृष्ण पक्ष को चतुर्थी (भाद्र शुक्ल चौथी का दिन चन्द्रमा हेर्नु हुँदैन र देखियो भने अर्काको फलफूल बिमाख गरे दोषमुक्त होइन्छ भनेर चौथी हान्ने चलन छ)’ दिया गया है । पर्यायवाची के रूप में ‘गणश चतुर्थी’ का अर्थ ‘भाद्रपक्ष और माघ पक्ष की कृष्णा चतुर्थी जो व्रत का दिन है’ दिया गया है ।
हिन्दू धर्म में गणेशजी बहुत महत्वपूर्ण देवता है । किसी भी शुभकार्य को करते समय सर्वप्रथम गणेश का ध्यान पूजवन होता है अर्थात् किसी कार्य को प्रारम्भ करने के लिए बड़ी भाषाई कवायद करने के स्थान पर ‘श्रीगणेश’ शब्द मात्र से सम्बोधित किया जाता है । शादी का पहला निमन्त्रण गणेशजी को दिया जाता है । यथा– ‘वक्रतुण्ड महाकाव्य सूर्यकोटिसमप्रभ । निर्विध्नं कुरु मे देव, सर्वकार्येषु सर्वदा ।।’ (अर्थात् टेढ़ी सूढंड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ो सूर्य की सी कान्ति वाले हे देव ! मेरे सारे कार्यों में सदा ही विघ्नों को दूर करें ।) गणेशजी का नाम लेकर किया गया कार्य अवश्य सफल होता है ।
तराई–मधेश के शहरों एवं ग्रामीण इलाकों में गणेश चतुर्थी के व्रत में विधि विधान से उनकी मिट्टी से बनी मूर्ति की पूजा की जाती है । कहीं–कहीं तांवें या अन्य धातुओं से बनी मुर्ति की पूजा की जाती है । गणेशजी के नामों का स्मरण कीर्तन किया जाता है । रवीर, पूड़ी, दही, केला, लड्डू, पान, सुपाड़ी मिश्री आदि का भोग लगाया जाता है और खाए भी जाते हैं । गणेशजी क िपूजा में हरी दूब भी अवश्य रखी जाती है । गणेशजी के सम्बन्ध में अनेक कथाएं कही जाती हैं । हमारे यहाँ की प्रचलित कथा इस प्रकार है– एक बार इकठ्ठे हुए सारे देवताओं में यह बहस छिड़ गई कि सारे देवताओं में किस देवता की पूजा सबसे पहले होनी चाहिए ? यह तथ्य पाया गया कि पुरी पृथ्वी की परिक्रमा करके जो इसी जगह सबसे पहले पहुँचेगा, वही अग्रपुज्य होगा । सारे देवता अपने–अपने बाहनों पर परिक्रमा करने चल पड़े । गणेशजी ने सोचा कि अपने वाहन चूहे पर तो मैं परिक्रमा पूरी नहीं कर सकूंगा । अतः उन्होंने शिव–पार्वती का ऊंची शिला पर विठाया और जल्दी–जल्दी उनकी सात परिक्रमा कर डाली । धीरे–धीरे एक–एक करके सारे देवता लौट आए । लेकिन माता–पिता को ब्राह्माण्ड से बड़ा समझने के कारण गणेशजी को सबसे पहले पूज्य माना गया । वह दिन भादो सुदी चौथ था । इस दिन को गणेश चौथ नाम मिला ।
इस कथा से गणेशजी की उत्तम विचारशील बुद्धि का ज्ञान होता है । तभी से हर संस्कार, हर शुभकार्य, हर अनुष्ठान में सबसे पहले गणेश जी का स्मरण पूजन होता है ।
गणेशजी का स्वरूप सफलता का मार्ग
गणेशजी का स्वरुप कुछ ऐसा है कि मुनष्य अपने व्यक्तित्व में सुधार के लिए इनसे प्रेरणा ले सकता है । यथा– गणेशजी को शर्प–कर्ण कहा जाता है । गणेशजी के कान सूप जैसे हैं । सूप का कार्य सफर्प ठोस धान को रखना और भूसे को उड़ा देना, अर्थात् आधारहीन बातों को वन न देना । कान से सुनें सभी की, लेकिन उतारे अन्तर में सत्य को । गणेशजी की आंखें सूक्ष्म हैं, जो जीवन में सूक्ष्म दृष्टि रखने की प्रेरणा देती हैं । नाक लम्बी और बड़ी है, जो बताती है कि सूंघने की शक्ति– जिससे तात्पर्य परिस्थिति और समस्याओं से है– सशक्त होनी चाहिए । मनुष्य को सुक्ष्म प्रवृत्ति का होना चाहिए । गणेशजी के दो दांत है । एक अखंड और दूसरा खंडिता । अखंड दांत श्रद्धा का प्रतीक है यानी श्रद्धा हमेशा बनाए रखनी चाहिए । खंडिता दांत है बुद्धि का प्रतीक । इसका तात्पर्य है– एक बार बुद्धि भले ही भ्रमित हो, लेकिन श्रद्धा न डगमगाए । आजतक टी.वी. चैनल, १–०९–२०१६) ।
गणेशजी के आदि देव ब्राह्मास्वरुप होने के कारण और उनके समस्त अंग–प्रत्यंगों, आयुध, वाहन समस्त का वर्णन अवर्णनीय रुप से रहस्य का विषय होने के कारण गणेशोत्सव को वैविध्यस्वरुप में प्रकटत किया गया है । गणेशजी आदिदेव के रुप में सम्पूर्ण हिन्दू समाज में पूज्य हैं । पहले यह व्रत केवल महिलाऔं का था, परन्तु अब स्त्री–पुरुष, बालक, वृद्ध सभी इस उत्सव में सम्मिलित होते हैं । आज यह उत्सव इतनी व्यापकता और विस्तार पा चुका है कि तराई–मधेश के विभिन्न शहरों एवं ग्रामीण इलाकों में हजारों प्रतिमाएं बड़े–बड़े पण्डालों में स्थापित कर उत्सव के रूप में मनाया जाता है ।

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