गमला क्रान्ति

बिम्मी शर्मा
पिछले साल के धान दिवस में कृषिमंत्री ने “कमला” (महिला) पर अपना प्यार उढेÞला था । इस साल के धानदिवस में कृषिमन्त्री ने अपना प्यार “गमला” पर उढेÞला । खेत, खलिहान खाली रह गए और कृषिमंत्री हरिबोल गजुरेल जी अपना प्यार खेती प्रेम गमले पर धान को बो कर दर्शाते रहे । पिछले साल एक जीती जागती महिला और इस साल मिट्टी का माधो गमले के कारण कृषि मंत्री चर्चा मे आ गए । मंत्री जी काम ही कुछ करें न करें पर चर्चा में हमेशा बने रहे ।
इस देश में नएं युग का सूत्रपात मंत्री जी ने गमले मे धान का बिरवा लगा कर कर दिया है । इस का मतलब अब कोई भी जगह खाली नहीं छोड़ा जाएगा । अब गमला ही नहीं घर के बांकी वर्तन में भी धान की खेती कर के आयात को प्रतिष्थापन कर निर्यात को बढावा दिया जाएगा । इस साल के बजट में सरकार ने नियम भी बनाया है कि अगर कोई जमीन खाली छोड़ेगा तो उसे दण्डित किया जाएगा । इसकी शुरुआत कृषिमंत्री ने गमले में धान की बुआई करके कर दी है ।
अब हमें थाल, कटोरी, गिलास, चम्मच, पंरात, देगची, कडाही, तसला सहित सारे वर्तन में धान को बोने का काम शुरु कर देना चाहिए । जिस से देश में हरित क्रान्ति और अन्न क्रान्ति दोनों साथ, साथ होगा । अब तुलसी के मठ में भी धान लगा कर उसका धान मठ नामाकरण किया जाएगा । जो गंजे लोग अपने हरेभरे मैदान जैसा सर खाल बंजर जमीन बनने पर दुखी थे । अब उन्हे दुखी होने की कोई जरुरत नहीं है । अपने गंजे सिर पर आराम से धान उगाएं और मालामाल हो जाएं ।
हर साल दशहरा में काठमाडूं के भद्रकाली मंदिर मे छाती पर नौ दिनों तक जौ की जयंती (जमरा) उगा कर लोकप्रिय होते ही थे । इस साल छाती पर धान उगा कर भी देख लेगें मंत्रीजी कृपा से । अपने ही घर में धान उगाओ, काटो, फिर उसको चावल बना कर खाओ । है न कितना बेमिशाल आईडिया ? प्रदूषण और रासायनिक मल से परेशान लोगों को मंत्री जी का शुक्र गुजार होना चाहिए कि उन्होने रोग, व्याधि से हमें उबार दिया । अब सुबह धान उगाओ, रात को काटो और खाओ । रात को उगाओ और सुबह को काट कर चावल बना कर खालो ।
जब तक यहाँ से चावल निर्यात होता था । तब तक किसी को धानदिवस मनाने की सुध नहीं आई ? जब देश धान और चावल आयात करने लगा तब सरकार को होश आया धानदिवस मना कर कृषि क्रान्ति करने का । जिस देश में धान आयात किया जाता हैं वंही धान दिवस मनाया जाना अपने आप में किसानों के लिए एक व्यग्ंय है । किसानों को कृषिकर्म में कोई अनुदान नहीं और उसी किसान का उगाया हुआ अन्न खानें में कोई शर्म नहीं । हमारे दिए हुए वोट से बने और मंत्री पद में टिके नेताओं को तो बिना किसी परिश्रम के हम उन्हे अपना भाग्यविधाता मान लेते है । पर अपने परिश्रम से खेतों में हरियाली, रसोई में सुकून और लोगों के चेहरे पर परितृप्ति का भाव लाने वाला“अन्नदाता”किसान अवहेलित है । किसान को उस के परिश्रम का मूल्य नहीं मिलता न समाज में ही जितने सम्मान का वह हकदार है उतना मिल पाता है । किसानों के लिए यह धानदिवस एक बला ही है ।
अब तो जल्दी ही वह दिन भी आ जाएगा जब हम गमले मे धान को बो कर, चम्मच और कांटे से उस धान के बिरवा को खन जोत कर, मुँह के कुल्ले से सिंचित कर के उगाए हुए धान को चावल बना कर छोटी सी कटोरी में पका कर हथेली में रख कर तिनके से उस पके हुए चावल को पकड़ कर खाएँगें । कल्पना कर के ही मजा आ रहा है । हकीकत में और भी ज्यादा शानदार होगा गमला क्रान्ति । अब हर घर के छत पर गमले में फूल नहीं धान उगाए जाएँगें । दूर से ही गमला और छत में लहलहाते खेत और हरियाली । सच में जो उपलब्धि ईजरायल हासिल नहीं कर सका वह हम जल्दी ही कर लेगें ।
जब सारे खेत प्लटिगं कर के उस को घर बनाने के लिए बेच दोगे तो बचेगा तो वही बेचारा गमला । जिसमें फूल उगाओ या धान बात तो एक ही है । अब खेत मे घर उगने लगे है और गमले मे धान । कितना सुंदर दृश्य है ना यह ? बडेÞ–बडेÞ घर और छोटे–छोटे खेत । बड़े पेट और छोटा मुँह । मुँह छोटा भले ही हो पर उसमें अन्न तो उतना ही जाएगा जितना पेट माँगेगा खाने को । अब चीन की तरह हमारे देश में प्लास्टिक का कृत्रिम चावल तो उत्पादन होता नहीं कि उसी को खा कर हमलोग अपना पेट भर सकें । अब रोपनी, कठ्ठा और बीघा से सिमट कर खेत गमले में आ गया है ।
खेत पर जब लोगों नें घर बना कर हमला कर दिया तो खेत खलिहान भागते भागते गमलें मे आ कर छुप गए । अब धान और गेंहू जैसे महत्वपूर्ण अनाज कहीं लोप न हो जाए । इसी लिए सरकार गमला में ही धान बो कर कृषि क्रान्ति का राग अलाप रही है । हमे अन्न का मतलब ही चावल को समझते है । जो चावल न खा कर गेंहू, मकई, फाफर और मढवा से बने अन्न खा कर पेट भरता है उस को इंसान ही नहीं समझा जाता । धान से बने चावल और उसके प्रकार खाने वाले धनी और संपन्न । बांकी दूसरे अन्न खाने वाले गरीब और दरिद्र । लोगों के इसी सोच और मानसिकता के कारण देश में हर साल अर्बों रुपएं का धान आयात किया जाता है । और यहीं उत्पादन हुए अन्न आत्महत्या करने को विवश है । दिमाग और पेट बस चावल का ही सपना देखता है । इसी लिए इस देश में हर साल धूमधाम से “धानदिवस”मनाया जाता है ।
कृषिमंत्री ने धान दिवस के दिन गमले में धान बो कर सरकार की कृषि नीति कैसी है इस की झलक स्पष्ट रूप से दिखा दी है । गमले क ीही तरह सरकार की कृषि नीति छोटी और संकुचित है । इसी लिए तो इधर अन्न के व्यापारी और बिचौलिए मालामाल हो रहे हैं तो उधर अन्न दाता किसान की स्थिति ज्यों की त्यों है । सरकार की कृषि नीति के अनुसार ही कृषि मंत्री ने गमले मे धान बो कर क्या बुरा किया ? मंत्री ने तो सरकारी नीति का ही अनुसरण किया है तब उनको हम गाली क्यों दें ?
पिछले ७० साल में इस देश में पाँच बार से ज्यादा संविधान का उत्पादन हो चुका है । पर धान या अन्न उत्पादन की स्थिति ७० साल में और बद से बदतर होती गई है । यह देश धान या अन्न उत्पादन में तो नही पर संविधान के उत्पादन में आत्मनिर्भर बन गया है । पिछले कई सालों से जनता के बिश्वास के खेत में सरकार के ६०१ आलसी और भ्रष्ट किसानों ने धोखा और बेईमानी का हल चला कर देश के नागरिकों की रक्त, पसीना और आंसू को बोते आ रहे है ओर बोते ही रहेगें । जय हो इस गमला क्रान्ति की । यह क्रान्ति और ज्यादा फले फूले और पूरे देश को अपने चपेट में ले ले ।

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