गरीबी निवारणः राष्ट्र बैंक का मौनधारण

प्रदीपकुमार उपाध्याय सत्याल मूलतः अर्नवा, सिरहा के निवासी हैं। मगर फिलहाल बलम्बु-५ काठमांडू में निवास। सत्यालजी ने अर्थशास्त्र में एम.ए. किया है और कानून के स्नातक भी हैं। आर्थिक क्षेत्र में कार्यका लम्बा-चौडा अनुभव रखनेवाले सत्यालजी ने राष्ट्रीय वाणिज्य बैंकों में ३० वर्षों तक उच्च पदस्थ कर्मचारी -प्रबन्धक) के रूप में काम किया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने नेपाल विद्युत कर्पोरेशन, कृषि सामाग्री संस्थान, स्वावलम्बन लुघ वित्त विकास बैंक आदि विभिन्न वित्तीय संस्थानों में सेवा प्रदान की है। आईए, उनसे कुछ आर्थिक मसलों पर बातचीत करते हैं। हिमालिनी के कार्यकारी सम्पादक मुकुन्द आचार्य द्वारा उनसे ली गई अन्तर्वार्ता ः

Pradip-Kumar

प्रदीपकुमार उपाध्याय सत्याल मूलतः अर्नवा, सिरहा के निवासी हैं

० बैंकिङ कारोबार में लघुवित्त कार्यक्रम किस प्रकार का कार्यक्रम है –
– इस कार्यक्रम के अर्न्तर्गत समाज के विपन्न वगार्ंर्ेेो एक लाख से नीचे की रकम कर्ज में दी जाती है। ऐसा कर्ज देते समय किसी प्रकार की सम्पत्ति बैंक में गिरवी नहीं रखना पडÞता। कर्जे की इस रकम से ऋणी आयमूलक कोई काम करता है और समय-समय में कर्जे की रकम चुक्ता करते जाता है। ऐसे कर्ज में किसी को जमानी भी नहीं बैठना पडÞता।
इससे कर्जदार व्यक्ति में बचत करने की आदत पडÞती है, साथ-साथ बैंकिङ से भी वह परिचित होता है। आयमूलक काम करने को वह बाध्य होता है। सामाजिक चेतना की अभिवृद्धि भी विपन्न वर्गों में इससे होती है। लोगों का साक्षर बनने का क्रम तेजी से बढÞता है। और सबसे महत्त्वपर्ूण्ा बात यह है कि आयमूलक कार्यक्रम में विपन्न वर्ग को सरिक करने के लिए उनको छोटी-छोटी अवधि की तालीम भी दी जाती है। इस तरह विपन्न वगार्र्ंर्ेेका र्सवांगीण विकास संभव होता है।
० ऐसा लघुवित्त कार्यक्रम नेपाल में कब से प्रारम्भ हुआ –
– नेपाल में कृषि विकास बैंकों के द्वारा सम्भवतः वि.सं. २०३३ साल के आसपास ‘साना किसान विकास आयोजना’ का श्रीगणेश हुआ था। इसीको लघुवित्त कार्यक्रम का आगाज माना जा सकता है। सरकार की ओर से नेपाल बैंक लिमिटेड और राष्ट्रीय वाणिज्य बैंकों के माध्यम से ‘प्राथमिकता क्षेत्र कर्जा’ का नामाकरण करते हुए २५ से ३० हजार तक की रकम गरीबों को कर्जे में दी जाने लगी।
उसके बाद तो नेपाल राष्ट्र बैंक के निर्देशन में इस क्षेत्र का संचालन शुरु हुआ। तब से ऐसा माना जाने लगा कि अब इसे राज्य का र्समर्थन प्राप्त हुआ है। इसे सरकारी औपचारिकता मिली है।
० लघुवित्त कार्यक्रम की शुरुवात किस देश से और किस व्यक्ति से हर्ुइ थी – अर्थात् इसके जन्मदाता कौन थे –
– इस वित्तीय कार्यक्रम का जन्म बंगलादेश से हुआ, ऐसा माना जाता है। वहां के डा. मोहम्मद युनुस द्वारा लघुवित्त कार्यक्रम कम्पनी खडÞा कर इसका संचालन किए जाने पर इसकी लोकप्रियता और प्रभावकारिता दोनों के मद्देनजर नेपाल में भी इस कार्यक्रम को व्यापकता मिली। नेपाल राष्ट्र बैंक ने प्राथमिक अवस्था से ही इस कार्यक्रम को संचालन करने के लिए योजनावद्ध ढंग से सक्रियता दिखाई है।
इस कार्यक्रम के संचालन में स्रोत का अभाव न हो, ऐसा सोचकर सभी बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थाओं ने कूल कर्जे की निश्चित प्रतिशत रकम को इस कार्यक्रम में निवेश करने की अनिवार्यता अपनाई है। ऐसा करने में राष्ट्र बैंक का भरपूर सहयोग रहा । इसके चलते कुछ बैंकों ने खुद और कुछ ने लघुवित्त कार्यक्रम संचालन करने वाली कम्पनियों के माध्यम से स्रोत उपलब्ध कराने की अनिवार्यता कायम की गई है। इस कार्यक्रम को व्यवस्थित करने के लिए नेपाल राष्ट्र बैंक की अग्रसरता में देश के सभी विकास क्षेत्रों में ग्रामीण विकास बैंकों की स्थापना हर्ुइ है। इसे देशव्यापी बनाने का कार्यक्रम है।
० बंगलादेश में इस कार्यक्रम का क्या हाल है –
– इस कार्यक्रम का शुभारम्भ बंगलादेश से हुआ है और वहाँ यह आशातीत रूप में सफल रहा है। इसी सफलता की कदर करते हुए इसके प्रणेता डा. महम्मद युनुस को नोबेल प्राइज से भी नवाजा गया है। अन्य देशों में भी इस कार्यक्रम को सफलता मिल रही है। इसके प्रणेता को विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार नोबेल प्राइज मिलने का अर्थ ही है, इसे विश्व ने अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी है।
० नेपाल में कितनी संस्थाएं लघुवित्त सम्बन्धी कार्यक्रम संचालन कर रही हैं –
– नेपाल में लघुवित्त विकास बैंक की संख्या २८ है। इसके अलावा करीब करीब १३ हजार सहकारी बैंक, वित्तीय संस्था, एनजीओं आदि इस क्षेत्र में कार्यरत हैं। लेकिन संख्या यकीन के साथ बताना जरा मुश्किल है। रोना तो इस बात का है कि राष्ट्र बैंक के पास भी सही तथ्यांक नहीं है।
० इस कार्यक्रम में जनता कितनी संख्या में सहभागी हैं – अथवा लाभान्वित है –
– नेपाल राष्ट्र बैंक के अधिकारियों के अनुसार तकरीवन ३० लाख लोग सदस्य के रूप में इसमे आवद्ध हैं। लेकिन यह अनुमानित संख्या है। मगर इस कार्यक्रम की उपादेयता, जैसे- सामूहिकता की भावना, जनचेतना, साक्षरता, आय-उपार्जन करने का कौशल इत्यादि को देखते हुए दावे के साथ कहा जा सकता है कि पचासों लाख लोग लाभान्वित हैं।
दूसरी बात साधन स्रोतविहीन विपन्न लोगों को कर्जे के लिए दर-दर भटकना पडÞता था, और कर्जा मिल भी जाए तो सूद की मात्रा ज्यादा होने से बडÞी कठिनाई होती थी। इस कार्यक्रम ने बहुतों को राहत प्रदान की हैं। गरीब लोगों में स्वावलम्बी बनने का क्रम जोरों पर है। साक्षरता और सचेतना निश्चित रूप से बढÞी है।
० राज्य ने इस कार्यक्रम को कैसे लिया है – सरकार का रुख कैसा है –
– जहाँ तक गरीबी निवारण की बात है, सरकार ने इस कार्यक्रम को अत्यन्त प्रभावकारी साधन के रूप में स्वीकार किया है। इससे बेरोजगारी कम करने में, उत्पादन बढÞाने में और विपन्न वर्ग को गरीबी की रेखा से ऊपर लाने में भरपूर सहायता मिली है।
० इस कार्यक्रम को और ज्यादा लाभदायक-प्रभावकारी बनाने के लिए क्या-क्या किया जा सकता है –
– इस कार्यक्रम को और व्यापक प्रभाकारी बनाने के लिए इसके कार्य क्षेत्र को विस्तारित करना होगा। जैसे, ग्रामीण समाज को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना, ग्रामीण वातावरण को स्वच्छ बनाना, गर्भवती महिलाओं और शिशुओं के लिए स्वास्थ्योपचार सुलभ कराना, साक्षरता अभियान को एकीकृत रूप में आगे बढÞाना, स्वस्थ्य सवल नागरिक निर्माण करना आदि।
० इस कार्यक्रम को गरीबी निवारण के लिए उपयुक्त बतया जाता है। मगर सुनने में आता है- गरीबों का और ज्यादा शोषण भी होता है। सस्ते व्याज में स्रोत संकलन किया जाता है और कडÞे व्याज दर में गरीबों को कर्ज दिया जाता है। क्या वास्तव में ऐसा ही हो रहा है –
– जिस देश में विलासिता के सामानों में १०/१२ प्रतिशत व्याज पर कर्ज मिल जाता है। ऐसे देश में विपन्न वर्गाें को दिए जानेवाले कर्ज में ३० प्रतिशत तक व्याज लेना वास्तव में खुल्लम-खुल्ला शोषण है। सहूलियत दरों में सरकार से पैसा लेकर उस रकम को महंगे व्याज दर में गरीबों को देना वास्तव में शोषण ही है। इस मामले में नेपाल राष्ट्र बैंक को आगे आना चाहिए। राष्ट्र बैंक क्यों चुप्पी साधे बैठा है, अचरज की बात है। आर्थिक उदारीकरण के नाम में शायद नेपाल राष्ट्र बैंक मौन साधे हुए है। लेकिन वास्तव में यह विल्कुल गलत हो रहा है।
मैं मानता हूँ बैंकों के अपने खर्चे हैं, जिससे व्यय भार बढÞा है। उसकी पर्ूर्ती के लिए गरीबों को मारना तो उचित नहीं। आर्थिक उदारीकरण के नाम पर शोषण को बढÞावा देना गलत है।
लघुवित्त विकास बैंक के लाभांह वितरण में ‘सिलिङ’ लगाना जरुरी है। सफल समूह को प्रोत्साहित पुरस्कृत करना चाहिए। लेकिन साथ ही संचालन खर्च काट कर बाँकी रकम सदस्यों की सामूहिक भलाई के लिए खर्च करना होगा। वाध्यात्मक व्यवस्था राष्ट्र बैंक द्वारा लागू करवाना जरुरी दिखता है। लाभांश सिर्फलगानीकर्ता को देने के बजाय सदस्यों को भी वितरण करने से अच्छा होगा। लघु उद्यम अथवा लघु व्यवसायी को ही कर्ज देने का जो नियम है, उस में परिवर्तन करना होगा। मजदूरी करने वाले समूह को भी क्षमतावृद्धि करने के लिए इस कार्यक्रम में सहभागी करना होगा। इससे दैनिक मजदूरी करनेवाला वर्ग भी लाभान्वित होगा। इससे कार्यक्रम को व्यापकता और सफलता दोनों मिलेगी। उत्पादन वृद्धि और गरीबी निवारण में मदद मिलेगी।

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