गरीबो की जवानी और रइसजादो की हैवानी : प्रसङ्ग जे पी गुप्ता

कैलाश महतो,परासी, ५ फरवरी

एक बार जे पी गुप्ता ने एक प्रसङ्ग मे एक उदाहरण दिया था कि गरीबो की जवानी प्राय: रइसो की हैवानियत के लिए काम आती है । यह बात उन्होने तब बोला था जब वे मधेशी जन अधिकार फोरम के मूल धार मे ही सह-अध्यक्ष थे । उन्होने यह बात मधेशी पार्टियो के उपर चढे उन्माद को जवानी से तुलना की थी । उनका उदाहरण था, ” किसी एक गाव मे एक गरीब घर के लडकी जवान हुई थी । वह लडकी काफी सुन्दर दिख रही थी । अपने सुन्दरता पर उसे काफी नाज था । वो दिन मे बहुत बार आइने के सामने जाकर अपने रूपको निहारती थी । मटक मटक कर चलती थी । उसपे जवानी के साथ साथ उसके अपने यौवन पर घमण्ड भी सवार हो गया था । उसके इठलाती चाल को देख गाव की महिलाओ ने कह्ना शुरू किया कि वो चाहे जितना भी इठलाले, उसका सारा इठलापन का मजा उस गाव के मालिक ही पहले उतारेगा । वेचारी भोलीभाली थी । उन महिलाओ की बात को समझ नही पायी और एक दिन उस गाव के जमिन्दार साहब का नजर जब उसपर पडी तो उसे अपने महल मे बुलाकर उसकी अस्मिता को निचोर ही दी ।

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जे पी गुप्ता के उस बात को मै उस समय ठीक से नही समझा था, ना ही समझने की आवश्यकता ही समझा । क्यूकी उस समय मै भी उसी फोरम नेपाल के केन्द्रिय सदस्य था और अपने पार्टी तथा उसके नेतृत्व पर पूरा विश्वास था कि न हमारा पार्टी कभी ध्वस्त होगा न हमारे अध्यक्ष कभी वैसा होने देङ्गे । मगर मै भावना मे था । उत्तेजित था और मै गहिराई को नाप नही सका । मेरा वह औकात न तब था नापने के लिए और न आज है । जे पी जी को मै अनुभवी नेता मानने को आज बाध्य हो गया हू । न जाने देखते ही देखते जे पी जी और उनकी बात सत्तप्रतिशत सत्य हो निकली और आज तक वे सत्य ही होते जा रहे है ।

मधेश के राजनीतिक तथा अधिकारीय आन्दोलन मे जब जब जवानी आई, कभी उसकी जवानी को नेपाली शासक और जमिन्दारो ने खरीद ली, कभी जबर्जस्ती उसके साथ बद्दतमिजी हुई तो कभी इसकी दलाली हुई | और आज भी इसके साथ बदतमीजी करने का प्रयास हो रहा है , उस समय जबकि आन्दोलन चरम सीमा पर है | आन्दोलन का स्वरूप परिवर्तन करने के नाम पर अगर आँदोल को म्त्थर किया गया तो वह भी आन्दोलन के साथ बलत्कार ही माना जायेगा | इस समय जबकि जेपी गुप्ता स्वयं मोर्चा को महागठबंधन बनाने के लिए अग्रसर हैं तो उनसे उम्मीद की जा सकती है की वे मधेश आन्दोलन की स्मिता को बचाए रखने का प्रया श करें ?

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