गलत सरकारी नीति से संस्थान बर्बादी की ओर

Jitendra-Singh

– जितेन्द्र सिंह, अध्यक्ष
खानेपानी संस्थान, केन्द्रीय कार्यालय

० देश की राजधानी में पानी का संकट दिन पर दिन गहराता जा रहा है। आप अभी जिस पद पर आसीन हैं, उस हैसियत से आप इस समस्या का खास कारण क्या समझते हैं –
– वैसे तो अन्य शहरों में भी पेय जल की समस्या बढÞती जा रही है, फिर भी तुलनात्मक रुप से काठमांडू में पानी की किल्लत दिनों दिन बढÞती जा रही है। इस बात को मैं स्वीकार करता हूँ। पानी का अभाव, यह जो समस्या है, इसके मूल में सरकार की गलत नीति काम कर रही है।
० वो कैसे – जरा स्पष्ट कीजिए।
– इसकी कहानी जरा लम्बी है, फिर भी मैं संक्षेप में आप को बताता हूँ। मैं अभी इस खानेपानी संस्थान की संचालक समिति का अध्यक्ष हूँ। नैतिकता के नाते पानी की समस्या के लिए मैं भी जिम्मेवार हूँ। मगर जरा समस्या की जडÞ में जाना होगा। वि.सं. २०४६ में खानेपानी संस्थान की स्थापना हर्ुइ। वि.सं. २०५६ साल में ‘ढल निकास’ विभाग भी इसमें जोडÞ दिया गया। उससे तो कोई खास र्फक नहीं पडÞता। मगर वि.सं. २०६३ साल में एक कानून बनाकर ‘काठमांडू उपत्यका खानेपानी लिमिटेड -केयुकेएल)’ नामक एक दूसरी संस्था खडÞी की गई। यहीं से असली समस्या शुरु होती है।
० वह कैसे –
– उपत्यका के तीनो जिला- काठमांडू, ललितपुर और भक्तपुर के लिए दूसरी संस्था ‘काठमांडू उपत्यका खाने पानी लिमिटेड’ बनाई गई तो हम लोगों का काम उपत्यका में कुछ भी नहीं रहा। उपत्यका से बाहर के शहरों में जैसे वीरगंज, विराटनगर, जनकपुर, पोखरा, हेटौडा, भरतपुर, कलैया, बुटवल, धरान, लाहान आदि जगहों में हम सीमित हो गए।
० आखिर सरकार की ओर से ऐसा क्यों किया गया –
– अब असली मुद्दे पर हम लोग पहुँचे हैं। राजधानी में पानी की समस्या को देखते हुए एनजीओ, आइएनजीओ और कुछ देशों ने भी समाधान के लिए सहयोग का हाथ बढÞाया। उस सहयोग राशि को हथियाने के लिए, हडÞपने के लिए पहले बनाया गया ‘काठमांडू उपत्यका खानेपानी लि.’ फिर बाद में जिन-जिन शहरों में संस्थान की शाखाएं मुनाफे में चल रही थीं, उन पर गिद्धेदृष्टि पडÞ गई। और धीरे-धीरे उन शाखाओं को मूल संस्था से अलग करते हुए एक नयाँ बोर्ड गठन करके संस्थान को पंगु बना दिया गया।
दूसरी बात, सरकार हमारे संस्थान को कोई आर्थिक मदद नहीं देती। कमाओ और अपना पेट पालो। इस तरह संस्थान के बुरे दिन शुरु हुए। वि.सं. २०६९ मार्गशर्ीष्ा महीने में सर्वोच्च अदालत के निर्ण्र्ााके अनुसार खानेपानी संस्थान को कानूनी तौर पर ‘अटोनोमस’ घोषित कर दिया गया है। इससे साफ जाहिर होता है कि यह संस्थान खुद अपनी कमाई से अपना खर्च बहन करे। सरकार एक रुपये की भी मदद नहीं देगी।
० अध्यक्ष जी, अपने कार्यकाल में आपने कौन सा उल्लेखनीय काम किया, कुछ बता सकते हैं –
– गत वर्षवैशाख में पोखरा की सेती नदी में जो अनपेक्षित और विनाशकारी बाढÞ आई थी, उसकी मार से पोखरावासी को बचानके लिए मैंने युद्धस्तर में कार्य किया। इसमें मुझे सफलता भी मिली। पुलिस, सशस्त्र पुलिस और सैनिक तीनो निकाय का सहयोग लिया गया। साथ ही स्थानीय लोगों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी सुरक्षा और राहत कार्य में बढÞ-चढÞ कर हिस्सा लिया। उस भीषण बाढÞ की चपेट से मैंने पोखरा को बचाया। मुझे आत्मसन्तुष्टि हर्ुइ।
० सिंह जी ! बारा जिला से हैं, मैं भी वहीं का हूँ। आपने बारा जिला और पडोसी पर्सर्ााजला के लिए कुछ किया –
– किया न। कलैया में जो पानी हम सप्लाई कर रहे हैं, वह जाँच करने पर पता चला है- वह पेय जल मिनरल वाटर के समान है। उसे फिल्टर करने की अथवा गरम करने की कोई जरुरत नहीं है। पानी की मांग जनसंख्या की बढÞोत्तरी के आधार पर स्वतः बढÞ रही है। लेकिन संस्थान इतना गरीब और लाचार हो चुका है कि वह पुराने पाइपों को नहीं बदल सकता। पुराने शहरों में अंडरग्राउंड पाइपों को बदलना जरूरी है। संस्थान अपने बलबूते पर वह काम नहीं कर सकता और सरकार अपना पल्ला झाडÞ रही है। जंग लगने से पुराने पाइप क्षत्रि्रस्त होते हैं। वहाँ से पानी लीकेज होता हैं और गन्दगी भी घुस जाती है। नतीजतन लोग गंदा पानी पीने के लिए बाध्य होते हैं। कलैया और वीरगंज में हम अपनी सेवा का विस्तार कर रहे हैं। र्सर्वे हो चुका है, जगह का चुनाव भी हो चुका है।
साथ ही पोखरा- वीरगंज और विराटनगर के बारे में जापान की संस्था जायका से बातचीत हर्ुइ है। कोरिया पोखरा में पेय जल के व्यवस्थापन के लिए ८१.५ करोडÞ की लागत में काम करने को तयार है। जायका ने १५० करोडÞ का डिपिआर बनाया है। हमें उमीद है, निकट भविष्य में हम इन योजनाओं में काम करने लगेंगे।
० अलग कम्पनी खोलने पर भी उपत्यका में पानी की समस्या विलकुल नहीं सुधरी है –
– सिर्फडाँलर के लालच में कम्पनी खोल लेने से कुछ नहीं होता। आप लोग देख ही रहे हैं, राजधानी में १० रोज १५ रोज में एक बार पानी सप्लाई हो रहा है। लोग जार का पानी, टैंकर का पानी खरीदने को विवश हैं। मुझे तो एक शक है !
० कैसा शक है –
– हो सकता है, सरकार इस मामले में भी विभेदकारी नीति का अवलंवन कर रही हो। मेरी तो राजनैतिक नियुक्ति है। मैं वहाँ की जनता के प्रति जवाबदेह हूँ। इसीलिए मुझे तो र्सतर्क रहना जरूरी है।
० सुना था, आप तो तत्कालीन प्रधानमन्त्री डा. बाबुराम भट्टर्राई से भी कानूनी लर्डाई लड चुके हैं –
– इस खानेपानी संस्थान -पेय जल संस्थान) का भी अपना कुछ नियम है, कानून है। उसके अन्दर रह कर मुझे काम करना चाहिए। अब कोई मन्त्री या खुद प्रधानमन्त्री भी कानून विपरीत कोई निर्ण्र्ाालेंगे तो मुझे संचालक समिति के अध्यक्ष के नाते उसका कानून सम्मत विरोध तो करना ही होगा न – इस बारे में मैं कोई सम्झौता नहीं कर सकता। मेरे स्वभाव को तो आप बहुत पहले से जानते हैं। देखें, आगे हम क्या कर सकते हैं। त्र

गलत सरकारी नीति से संस्थान बर्बादी की ओर
– जितेन्द्र सिंह, अध्यक्ष
खानेपानी संस्थान, केन्द्रीय कार्यालय

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