Thu. Sep 20th, 2018

गांधी : उनकी सफलता का रहस्य : स्व. भद्रकाली मिश्र

स्व. भद्रकाली मिश्र
गांधी ने पूर्वीय समस्त इच्छाओं एवं महानता का यथार्थ प्रतिनिधित्व किया । उन्होंने भौतिक उत्कर्ष की चमक के कारण तथा वैभव, शक्ति एवं लालच की दौड़ के कारण मानव मूल्यों के प्रति समुचित ध्यान के सृजित अभाव को समग्र रुप में अस्वीकार किया । उच्च एवं शक्तिशालियों के विरोध में अपना सीना ताने खड़ा रहकर बुद्ध की भांति उनसे अपनी गलतियों को स्वीकार कराया । अपने देश वासियों के प्रति ही नहीं, बरन समस्त जीवित प्राणियों के प्रति उनका गहरा प्रेम ही उनकी सफलता एवं पीड़ा का रहस्य था । उनका प्रेम सत्य और ईश्वर का एकाकार रुप था । प्रेम से अभय प्राप्त होता है, जो गीता में वर्णित दैवी सम्पदों में प्रथम है । प्रेम कमजोरÞों को सहज साहस प्रदान करता है, जो एक गाय को अपने बछड़े पर शक्तिशाली बाघ के आक्रमण पर अपने सिगों से लड़ने के लिए उद्यत करता है । प्रेम वह है, जो अपने प्रेमी के शुभ एवं लाभ के लिए सहज रूप में अपनी प्रत्येक वस्तु को त्याग देने की शक्ति प्रदान करता है । वेद कहता है– ‘न तो धन से न सन्तती से, बल्कि त्याग (सन्यास) से अमरतत्व प्राप्त होता हैं ।’ इशा मसीह कहते हैं– ‘जो कुछ तुम्हारा है, उसे बेच डालों, गरीब को दे दो और मेरा अनुशरण करों ।’ प्रखर संवेदनशीलता, स्वच्छता तथा त्याग से विभुषित प्रेम ही गांधी के जीवन का प्रतीक और कार्यशैली है ।
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के साथ पटना बाँकीपुर जेल में १९४२ के ‘भारत छोड़ो’ संघर्ष के क्रम में मुझे रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था । उनके एक चिन्तनशील क्षणों में उन्होंने गांधी के प्रेरणात्मक शब्दों का वर्णन करते हुए उन्हें एक असल सुधारक तथा क्रान्तिकारी बताया था । गांधी के अनुसार पहली आवश्यकता दूसरों के प्रति सम्वेदनशीलता है । यह महसूस करना है कि उनमें कितना दुःख, हिंसा, शोषण, अन्धविश्वास एवं अज्ञानता है । जो पीडि़त है, उनके बन्धुगण है । जिनके नशें में दुःख तथा कष्ट है, वही सुधारक के शरीर के तन्तुओं एवं धमनीओं में दौड़ रहे है । यह असल सहानुभूति ही पहला कदम है । दूसरा है– उनका समाधान खोजना और अन्तिम कदम के रूप में सुधारक को अपने आप से यह प्रश्न करना है कि वह क्यों उस ओर बढ़ा है ? उसे निश्चित रूप में कभी भी स्वर्ण की प्राप्ति का लोभ, शक्ति एवं प्रशंसा प्राप्ति की तृष्णा से प्रेरित नहीं होना है । उसे यहाँ तक निश्चित होना है कि यदि सम्पूर्ण संसार उसे अपने पांवों से कुचलने की धमकी दे, उसे अपने जीवन के अन्तिम क्षणों तक सुरक्षित रखना है । राजेन्द्र बाबू ने कहा– ‘गांधी इस तरह के एक सुधारक थे, एक भिक्षुक थे, एक मालिक थे, मानव मात्र के लिए वरदान थे जबकि दूसरे अत्यन्त ही अधैर्य, अदूरदर्शी थे, जो शासन करना चाहते थे, परिणाम प्राप्त करना चाहते थे । ‘कर्मण्ये बाधक रस्ते मा फलेषु कदाचन (तुम्हे काम करने का अधिकार है, फल प्राप्ति नहीं) ही गांधी का मार्ग प्रदर्शक था । वे वास्तविक कर्मयोगी थे, जिसने सन्यास का प्रयोग सन्यास के लिए नहीं किया, बल्कि अधिक क्रियाशील एवं प्रभावकारी सेवा के लिए किया ।
गांधी की संवेदनशीलता, स्वच्छता तथा परित्याग (सन्यास) हिन्दूओं को त्रिमुर्ति के एकमुर्ति भगवान शिव का स्मरण कराता है, जिन्होंने देवासुर संग्राम के बीच समुद्र मन्थन से निकला भयंकर हलाहल को अपने जीवन दाव पर लगाकर पिया । एक ओर असुरगण सम्पूर्ण विश्व को जलाकर राख बना देना चाहते थे तो दूसरी ओर समुद्र मन्थन से निकला अमृत को पान करने में तथा श्रेष्ठ लक्ष्मी तथा कास्तुभ मणि लेकर देवता हर्षित हो रहे थे, जबकि उनका अस्तित्व खतरे में था । यह हिन्दू दन्त कथाओं में एक है, जो मानवीय कल्याणों को चुनौती एक कथा के रूप में देता है ।
यद्यपि विरले ही, परन्तु तथ्य कथा से अनोखा और अनुभव इतर होता है । हमारे जीवन काल के स्मरण में गांधी ने इस विश्व को अपने समर्पण एवं सर्वोच्च त्याग से यह दिखला दिया कि यहां एक ऐसा मानव जीवित था, जिसने विश्व के सम्पूर्ण ऐश्वर्य एवं प्रतिष्ठा को एक तिनके जैसा भी महत्व नहीं दिया । यथार्थतः यहाँ ऐसे लोग भी थे, जो जीवन के महत्वपूर्ण तथा प्रकाश की शक्ति थे । आजादी पश्चात का भारत का दृश्य ने ऐसा ही प्रभावकारी घटनाओं का साक्षात्कार किया । जब भारत के शीर्षस्थ नेतागण दिल्ली में शक्ति का लाभ ले रहे थे, गांधी नौवाखाली के काँटदार एवं सर्पेली मैदान में नंगे पाँव यात्रा कर रहे थे, जिसे उन्होंने अपनी प्रायश्चित यात्रा कहा था । जब सर्वनाशक जातीय आग सम्पूर्ण देश को अपनी लपटों में ले चुकी थी और भारत की नयी आजादी खतरे में थी, गांधी भारतीय स्वतन्त्रता और आनेवाली बर्बादी के बीच सीधे गोली खाने खड़े रहे । एक आधुनिक शिव की अमर प्रसिद्धि ! उनके सर्वोच्च बलिदान से अभिप्रेरित होकर अल्वर्ट आइन्सटीन ने इन शब्दों में श्रद्धाञ्जली दी थी– ‘आनेवाली पीढ़ी इसमें विश्वास नहीं करेगी कि गांधी जैसा मानव अपनेस्थुल शरीर में (मांस एवं रक्त से युक्त) इस पृथ्वी पर चला था ।’ पर्ल एस वक ने गांधी के बलिदान को ‘दूसरा सूली पर चढ़ने’ के रूप में वर्णन किया । इस अर्ध नग्न फकीर ने सूर्य कभी नहीं डूबने वाले साम्राज्य को झुका दिया । ऐसा चमत्कार कैसे हुआ ? यह न तो भौतिक शक्ति से न तो राजनैतिक अरोचक तथा निम्न चतुराई से ही, वरन् ईमानदारी एवं स्वार्थरहित सेवा से, मानवीय जन्मजात सद्गुणों में गहरे विश्वास और सत्य एवं अहिंसा में सम्र्पण से हुआ । उन्होंने पूर्वकाल से चल रहे इस कथन ‘साध्य साधन को उचित वा पवित्र बनाता है’, को उन्होंने अच्छे साध्य को अच्छे साधनों से प्राप्त करने की युक्ति में बदल दिया और एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में प्रयोग किया । गांधी की पद्धति की शुद्धता ने दक्षिण अफ्रिका में लार्ड स्मट, बिहार के ले गर्भनर सर एडवर्ड गेट जैसे विरोधियों को मुश्किल में रख दिया था ।

उन्हें सफलता उस समय नहीं मिली, जब उनके विरोधियों को शक्ति नहीं थी, बल्कि तब जब उनमें लड़ने का हौसला नहीं रहा । गांधी की प्रतिष्ठा का ताज राजकीय सरकार द्वारा १९४६ में भारत की आजादी की घोषणा नहीं हो ऐसा नहीं कि विलायती सरकार में लड़ने की क्षमता नहीं थी, बल्कि उनको अनुचित लड़ाई के लिए मनोबल नहीं था, वास्तव में यह आधुनिक काल की सबसे बड़ी नैतिक विजय थी । भारत की अजेयता और विलायती सरकार की शक्तिहीनता को और निःशस्त्र अहिंसक लोगों पर शासकों द्वारा किए गये कठोर यातना एवं निरंकुशता को प्रतिष्ठापूर्ण उल्लंघन तथा साहस से प्रदर्शित किया गया ।
गांधी ने अपने को उन अधिकांश जनता से आत्मसात किया था, जो अति गरीब, अज्ञानता, अंधाविश्वास, गन्दा, दर्दनाक एवं निराशापूर्ण जीवन जी रही थी । उनके लिए उनका हृदय द्रवित हुआ था, जिसके कारण उनके जीवन की अवस्था को सुधारने के लिए पूर्ण ईमानदारी साथ अपने को समर्पित करने की कसम खायी । यह सेवा की एक पूर्ण नयी राह थी । उन्होंने उनके लिए कुछ भी नहीं किया, उन्हें अपने लिए करने के लिए बाध्य किया । उनके परम्परागत विश्वास एवं उत्साह को उठाने के लिए उन्होंने ऐसी पद्धतियों की व्यवस्था की, जिससे उनकी शक्ति एवं क्षमता के अनुकुल थी तथा उनके आत्म विश्वास के प्रोत्साहन में मद्दद की । कायरता की तरह साहस भी संक्रामक होता है । जिस तरह एक को रोते देख दूसरे भी रोने लगते है । एक को हंसते देख दूसरे भी हसने लगते है तथा एक को भागते देख दूसरे भी भागने लगते है, उसीतरह एक को किसी तानाशाह के विरोध करने का साहस देख दूसरे भी तानाशाह के विरोध में हाथ उठाना शुरु कर देना भी एक उदाहरण है, जो स्मरणीय है । उन्होंने साहसी बनाया, उन्हे खोये हुए आत्म विश्वास को पुनः स्थापित किया । उनमें छिपे हुए आध्यात्मिक शक्ति जो भारतीय संस्कृति एवं परम्परात में संरक्षित तथा वेदों, उपनिषदों एवं गीता एवं अनुप्राणित अमर थी, उन्हे ऊपर लाने का लगभग असम्भव काम उन्होंने किया । यह उनके लिए बिल्कुल स्वाभाविक था क्योंकि उनके दृश्य में अक्षय अध्यात्मिक श्रोत था, जो स्वयं भगवान के रुप में सत्य एवं प्रेम प्रति उनके गहरा विश्वास था । सम्पूर्ण राष्ट्र को ही आलस्य एवं गतिहीनता से उठाना था, परम्परात की साधारण एवं विश्वासी जनता के सम्बन्ध में बोलते हुए वे कहते हैं– ‘चम्पारण से बाहर की दुनियां से अनभिज्ञ रहते हुए भी उन्होंने मुझे युग–पुराने मित्र के रूप में स्वीकारा । यह कहना अतिशयोक्ति नहीं बल्कि शाब्दिक सत्य है कि किसानों से मेरी भेंट में मैंने ईश्वर, अहिंसा एवं सत्य से साक्षात्कार किया ।’
इससे पूर्व दक्षिण अफ्रिका के अपने संघर्ष क्रम में भी गांधी ने अपने पड़ोस की सर्वसाधारण को भी अपनी अपूर्व आध्यात्मिक शक्तिनायक एवं शहीद में परिणत किया । गोखले, जिन्हे गांधी ने अपना गुरु कहा, उनसे इतने प्रभावित थे कि एक बार कहा कि गांधी की उपस्थिति में कोई भी ‘अनुपयुक्त कुछ भी करने में लज्जित होता है, वास्तव में कोई भी ‘ किसी भी अनुपयुक्त चिन्तन से ड़रता है ।’ वेदों की उस रहस्यमयी ‘होम’ पंक्षी की तरह गांधी ने अपना लक्ष्य इतना उच्च रखा कि शायद ही उन्हें मान्य नैतिक सीमाओं से नीचे गिरने खतरा का सामना हुआ हो । उन्होंने कभी भी सांसारिक सुखों, आराम, प्रशंसा एवं उत्थान की चिन्ता नहीं की । वे केवल उसी काम को करने में दृढ़ रहते थे, जिस में वह उचित विश्वास करते, उचित साधन से तथा कड़ी मेहनत से करते चाहे कितना भी बड़ा कष्ट तथा बलिदान करना पड़े । बलिदान का आदर्श एवं सरल उनके जीवन की तीव्र भावना थी । वे हमेशा कहा करते थे, ‘दूसरों से कराये जाने वाले काम को करने का मुझे एक ही रास्ता ज्ञात है । व्यक्तिगत उदाहरण प्रस्तुत करना ।’
एक तरफ गांधी दूरद्रष्टा एवं आदर्शवादी थे तो दूसरी ओर वे किसी भी प्रयोगात्मक व्यवहारवादी से कम नहीं थे, जो सारी विवरणों की योजना पहले बना कर कड़ी मेहनत एवं निपूणता के साथ काम सम्पन्न करता है । आधुनिक भारत का नागरिक असहयोग का प्रथम विजय चम्पारण का संघर्ष था, जो एक जीवित उदाहरण है । यह सामान्य रूप से विश्वास किया जाता है कि किसी संगठित राजनीतिक दल का आश्रय प्राप्त कर तथा वृहत् स्तर पर पत्र–पत्रिका के प्रचार से संघर्ष गतिशील बनता है और सफलता मिलती है । लोग इस संघर्ष में कांग्रेस पार्टी के सहकार्य की वकालत करते रहे पर गांधी दूसरी योजना में लगे क्योंकि वे लोगों से अधिक जानते थे । वे उसे अच्छी तरह से जान गये कि सरकार और उनके नियन्त्रक के लिये कांग्रेस नाम उन्हें चिढाने वाला शब्द था । जो उनकी अराजकता का द्योतक था । वे नाम नहीं काम चाहते थे, छाया नहीं । अतः अपने सहयोगियों की सलाह से यह निश्चय किया कि कांग्रेस के नाम से कुछ नहीं किया जाए । उन्होंने यह भी अनुभव किया कि चंपारण की अवस्था ऐसी नाजुक तथा कठिन थी कि अत्याधिक प्रचार–प्रसार एवं सरकार की अति आलोचना उनके प्रयास को हानि पहुँचा सकती थी । अतः गांधी ने प्रमुख समाचारपत्रों के संपादकों को लिख कर संयम बरतने को कहा और अपने सम्वाददाताओं को वहां नहीं भेजने का आग्रह किया । इसके बदले उन्होंने प्रकाशन हेतु आवश्यक समाचार भेज कर उन्हें विकसित अवस्थाओं की जानकारी जारी रखी । चम्पारण का संघर्ष एक वस्तुनिष्ठ पाठ था कि किसी भी क्षेत्र के लोगों की इमानदारी तथा निःस्वार्थ सेवा राष्ट्र को राजनैतिक रूप में मदद करती है ।
गांधी एक प्रकार के अराजकतावादी थे । वे अकसर कहते थे कि उन्हें भारत की विलायती गुलामी से मुक्ति में जितनी अभिरुचि नहीं है जितनी कि उसके अन्य किसी भी प्रकार की गुलामी से, वे स्वीकारते थे ‘स्वराज कुछ ही व्यक्तियों के शासन की प्राप्ति से नहीं आ सकता, बल्कि सबों की शासन प्राप्ति से जिससे शासन के गलत प्रयोग को विरोध की क्षमता हो’ वे यहां तक सावधान करते थे कि विलायतियों द्वारा भारत छोड़ने के बाद कुछ निर्वाचित भारतीय तानाशाह हो सकते हैं, अतः जनता को उनकी बुराई एवं विरोध करने को सिखाया जाए । उनकी पद्धति आम लोगों में घुलकर काम करने की थी, उन्हें ऊपर उठाना था । वे कभी कभी कांग्रेस की राजनैतिक नेतृत्व में अपने को घसीटने के काम प्रति दुःख व्यक्त करते थे । उन्हें इस बात का डर था कि शीघ्र ही कांग्रेस एक व्यक्ति की प्रदर्शनी तो बनकर नहीं रह जाएगी, ‘चाहे वह कितना ही अच्छा तथा महान व्यक्ति क्यों न हो, तथा कांग्रेस से निवृत होने को सोचना शुरु कर दिया था । इसके विरोध में उनके मित्रों की सलाह थी कि अलग होना उनके नैतिक अधिकार के लिए महंगा पड़ेगा ।’ उनका सशक्त उत्तर था– ‘नैतिक अधिकार किसी पर अपना अधिकार बनाए रखने के प्रयास से कायम नहीं रखा जा सकता है, यह बिना खोजे आता है और बिना प्रयास ही कायम रहता है ।’ स्वतन्त्रता के बाद उन्होंने स्पष्ट तथ्य, दृढ शब्दों में कांग्रेसियों को कांग्रेस को विघठित कर ‘लोक सेवक’ के रूप में काम करने की सलाह दी थी ।
नील्हा संघर्ष का अन्त होते ही अहमदावाद के कपड़ा उद्योग के मजदूरों की अशक्ति ने उन्हें वहां लौटने की आवश्यकता खड़ी कर दी । वहां पहुँच कर उन्होंने पाया कि उनके घनिष्ट मित्र अम्बालाल साराभाई के नेतृत्व में मिल मालिको के प्रति मिल के मजदूरों का अत्याधिक काम का बोझ तथा न्यून पारिश्रमिक एक सशक्त समस्या थी । समस्याओं के अध्ययन के बाद उन्होंने मिल मालिकों से झगड़ा को बातचीत से सुलझाने की सलाह दी । उनके द्वारा इसे अस्वीकार करने पर गांधी ने मजदूरों को हड़ताल करने की सलाह दी । हडताल उम्मीद से अधिक समय तक चला, जिससे मजदूरों का उत्साह घटने लगा और गांधी चिन्तित हुए कि मांग को पूरी नहीं होने तक काम पर नहीं लौटने का उनका निश्चय बदल सकता है और वे अपने काम पर लौटने के लिए बाध्य हो सकते है, जो उनके लिए विचार से बाहर की बाते थी । काफी समय मन को टटोलने पर उन्होंने आमरण अनशन करने का निश्चय किया । पहले भी उन्होंने व्यक्तिगत तथा धार्मिक कारणों से अनशन किया था पर इस बार सर्वसधारण के लिए शुरु किया यह अनशन मजदूरों के गिर रहे मनोबल को उठाने के लिए था, जिन्हें वे यथार्थ में प्रेम करते थे तथा सहानुभूति रखते थे और उनमें एक प्रतिष्ठित शान्तिपूर्ण विरोध को उठाने की इच्छा रखते थे । मिल मालिक झुके और बातचीत के लिए तैयार हुए क्योंकि वे गांधी से गहरा प्रेम करते थे, उनके स्वार्थरहित बलिदान देखकर अपने स्वार्थप्रति वे लज्जित हुए । व्यक्तिगत उपलब्धि के लिए किए अनसन से उच्च भावना जागृत नहीं हो सकता । गांधी ने अपने वैयक्तिक गुणों से सम्पूर्ण राष्ट्र के लाखों लोगौं को अन्याय प्रति भावनात्मक रूप जागृत किया और शीघ्रता से आगे बढ़ कर पर्याप्त उपलब्धि प्राप्त की ।
नवम्बर १९१८ ई. में द्वितीय विश्व युद्ध के विजयपूर्ण अन्त के साथ भारत की जनता को विलायती सरकार से उनकी स्वतन्त्रता की आकांक्षा प्रति उदार प्रतिक्रिया की आशा थी । इसके विपरीत मार्च १९१९ का रोल्ट एक्ट बनाकर जो कुछ भी नागरिक स्वतन्त्रता भारतीय उपभोग कर रहे थे, उससे उन्हें अलग कर दिया गया, जिससे सम्पूर्ण राष्ट्र में दुःख की लहर फैल गयी । उन लोगों ने प्रश्न किया कि क्या उनके द्वारा खुन बहाने का यही पारितोषिक था । मद्रास के प्रवास में जब चत्रवर्ती राजगोपालाशाही के साथ ठहरे हुए थे, एक दिन सुबह गांधी ने उनसे कहा कि गत रात उन्होंने एक सपना देखा है कि उन्हैं राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान करना चाहिए । हड़ताल भारत में विलायती सरकार के विरोध में गांधी का पहला राजनीतिक काम था । इस आह्वान ने सम्पूर्ण देश के बहुसंख्यक लोगों को साथ में मिलकर काम करने के लिए एकत्रित किया । इससे लोगों को अपनी शक्ति का एहसास हुआ, उनमें आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ, गांधी ने उनमें आत्मविश्वास जगाया और वे उनके नायक बन गये । इस नये प्राप्त आत्मविश्वास ने भारतीय राजनीति को क्रान्तिकारी बनाया और हड़ताल सत्याग्रह की एक भूमिका के रूप में जंगल की आग की तरह पूरे देश में फैल गयी, जिसकी परिणति जालियानावाला बाग के रक्त स्नान में हुआ, जिसने अन्ततः भारतीय राजनीति को गतिशीलता दी, गांधी को राजनीति के केन्द्र में सशक्त रूप में खींचा ।
संघर्ष के क्रम में गांधी ने प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया तथा आम जनता को जागृत बना कर उन्हें सामुहिक काम के लिए मिलाया । उनका प्रसिद्ध रचनात्मक कार्यक्रम उनके अनुभव का परिणाम था । उन्होंने अच्छी तरह से यह अनुभव किया कि बिना उचित ग्रामीण शिक्षा स्थायी रूप में कोई भी काम सम्भव नहीं है । यहां तक कि संघर्ष में भी उन्होंने गावों में प्राथमिक पाठशाला खोली । ग्रामीणों ने शिक्षकों को आवसीय व्यवस्था की । उन्होंने साहित्यिक योग्यता की जगह नैतिक गुणों के विकास पर बल दिया । सच्चाई तथा सदाचार की शिक्षा को व्याकरण एवं पढ़ना, लिखना तथा गणित की शिक्षा से अधिक महत्व दिया ।

सयाने (वैयष्क) लोगों को भी सफाई के पाठ की बरावर की आवश्यकता थी । स्वास्थ्य के सम्बन्ध में ग्रामीणो को अधिक शिक्षा की जरुरत थी, मलेरिया तथा चर्मरोग सर्वव्याप्त था । अतः चिकित्सा की आवश्यकता थी । संघर्ष के क्रम में भी उन्होंने इन भौतिक समस्याओं की अनदेखी नहीं की । इन दोनों के बीच संबंध ही उनकी बहुआयामी योग्यता थी । देश के विभिन्न भागोें से स्वयंसेवक के रूप में आए शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, सफाई इन्सपेक्टर तथा चिकित्सकों को उनके अपने विशेष कर्मों में केन्द्रीत रहने की कड़ी हिदायत थी । साथ ही राजनीति से दूर तथा कृषकों और उत्पादकों की शिकायतों से दूर रहने को कहा गया, ऐसी समस्याओं को केवल उनकी ओर प्रत्यक्ष रुप में निर्देशित करने को कहा गया । ऐसा निर्देशन पूर्ण आस्था के साथ कार्यान्वयन किया जाता था । और इस संबंध में कोई भी अनुशासनहीनता की घटना नही कही । सृजनात्मक कार्यक्रमों ने हजारों युवा तथा बुद्धिजीवियों को पद दलित देशवासियों की सेवा में सम्पूर्ण के लिए आकर्षित किया, जो बाद में गुलामी से मुक्ति का सशक्त आन्दोलन में विकसित हुआ, जिसमें संघर्ष के लिए आवश्यक रुचि, मानवीय शक्ति, बिना पारिश्रमिक काम करने निपुर्णसमर्पित देशभक्त थे, जो सेवा और बलिदान की कला में अनुशासित एवं निपुण थे । अपने ‘डण्डी यात्रा’ में भी गांधी ने बैठकों को सम्बोधन कर लोगों को खादी पहनने, शराब एवं अन्य नशीली पदार्थ सेवन न करने, बाल–विवाह और पर्दा प्रथा का विरोध, स्वच्छ तथा सादा जीवन, जातीय एकता, छुआछूत के विरोध में लड़ाई तथा संकेत मिलने पर नमक के कानून को तोड़ने को कहा ।
गांधी एक अथक योद्धा थे, जो अकसर कहा करते थे ‘आराम जंग लगना है ।’ करीब प्रत्येक १० साल के अन्तराल में विदेशी सरकार के विरोध में अपने को तथा देश को सक्रिय राजनीतिक संघर्ष में सौप देते थे । यद्यपि अधिक समय कारागार में रहने के कारण उनकी शारीरिक गतिशीलता तथा क्रियाशीलता सीमित थी, जिसे उन्होंने दो सघर्षों के बीच नेतृत्वहीनता की अवस्था में अपने निर्देशन में तीव्र सृजनात्मक काम का अविभारा सत्य, अहिंसा तथा सेवा प्रति समर्पित हजारों कार्यकर्ताओं को परिचालित किया । ये सृजनात्मक कार्य केन्द्र जिसे ‘आश्रम’ कहा जाता था जहाँ साहसी स्वतन्त्रता सेनानियों को उत्पादन किया ।
नेपाल और गांधी
नेपाल की वर्तमान अवस्था अराजकता के कगार पर है । हमारे देश के लोकतान्त्रिक समाज के विकास के सन्दर्भ में गांधी के जीवन तथा उनके काम हमारे लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हमें निपुण उत्प्रेरित, अनुशासित, कार्यकर्ताओं के समूहों की आवश्यकता है ।
गांधी का विशेष तथा अति आवश्यक सान्दर्भिकता नेपाल में हमारे लिए जातीय समस्या के सन्दर्भ में, विशेष रूप में, तराई के लोगों के जीवन तथा जीविका संबंधी अरसे से किए जा रहे भेदभाव के संबंध में जो मांग है, और उनकी आशाएँ तथा उम्मीदें जो लोकतन्त्र के प्रार्दुभाव तथा मानव अधिकार के लिए अधिक है और इनक लिए गांधी के साम्प्रदायिक (हारमोनी) मेलमिलाप, छुआछुत तथा अन्य सभी प्रकार के भेदभाव की समस्या के समाधान की पद्धति उपयोग्ी तथा आसान है । साथ ही साथ हमें सृजनात्मक कार्यकर्ताओं के समूहों का निर्माण करना होगा जो समस्या के समाधान की स्वीकृति को जन–जन तक पहुँचाए । सम्भावित खतरों के ज्वालामुखी को आन्तरिक या बाह्य उत्तेजनाओं से फुटने की अवस्था में हमें तत्काल की समस्या को सम्बोधन की अवाश्यकता है । ऐसे परिदृश्य है, जिसमें छोटी सी समस्याओं के कारण राष्ट्र टूट रहे हैं, या टूटने की कगार पर है यह हम याद नहीं कर रहे । अपने सर्वनाश की कीमत पर ही इस समस्या को हम महत्व नहीं दे रहे हैं ।
गांधी के विषय में लिखने, बोलने के क्रम में हमें समुद्र के किनारे बिखरे हुए कुछ टूटे सीप मिल सकते हैं । फिर भी हमें अपने जीवन एवं विचारों को समृद्ध बनाने में अनिर्णित नहीं रहना है । केवल बाल्मिकी या व्यास ही गांधी पर महाकाव्य लिखने का साहस दिखा सकते हैं । हम केवल उनके पदचिन्ह पर चलकर तथा अपने देशवासियों की सेवा में बिना किसी पारितोषिक के अपने जीवन को अर्थपूर्ण एवं अभिप्राय युक्त बना सकते हैं ।
–अनुवादकः वीरेन्द्र प्रसाद मिश्र

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