गांधी जी की पुण्यतिथि के अवसर पर ‘रघुपति राघव राजा राम ‘

प्रकाशप्रसाद उपाध्याय :‘रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम, सब को सम मति दे भगवान ।’ भगवान श्री राम की स्तुति में गाए जाने वाले इस भजन को सुनते और गाते हुए मेरा बाल्यकाल बीता । किशोरावस्था में हाईस्कुल की शिक्षा के बाद जब भारत की राजधानी दिल्ली जाने और जीविका के सन्दर्भ में ऑल इण्डिया रेडियो में प्रवेश करने का अवसर मिला तो महात्मा गान्धी की पुण्य तिथि के अवसर पर बनाए जाने वाले विशेष रेडियो रुपक में इस भजन को समावेश होते हुए पाने पर यह जान सका कि यह भजन गान्धी जी के प्रिय भजनों में से एक था, जो उनकी प्रार्थना सभा में गाए और बजाए जाते थे । उनके अन्य प्रिय भजनों में एक दूसरा भजन था– ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिए, जो पीर पराई जाने रे ।’ यदि यह कहा जाय कि नरसिंह मेहता द्वारा रचित यह भजन हमारे इस महाद्वीप में आज भी प्रासंगिकता धारण किए हुए है, तो अत्युक्ति नहीं होगी, क्योंकि जिस प्रकार दूसरों की पीड़ा नही अपनों की पीड़ा को भी नजरअन्दाज किया जा रहा है और आम जन विभिन्न प्रकार की पीड़ा की आग से झुलसने को बाध्य किए जा रहे है, उसे देखते हुए कहा ही जा सकता है– ‘सब को सुमति दे भगवान ।’ या पराए की पीर को न जानने वाले बैष्णव नहीं हो सकते ।
गुजरात राज्य के काठियावाद जिले के पोरबन्दर में सन् १८६९ के २ अक्टुबर के दिन जन्मे बालक मोहनदास करमचन्द किस प्रकार ब्रिटिश भूमि में जाकर बैरिस्टर, उसके बाद महात्मा गान्धी और फिर राष्ट्रपिता एवं अंततः बापू बने, यह एक ऐसी लंबी गाथा है, जिसे इस लेख में समेटा नहीं जा सकता पर इतना तो निश्चित है कि इस वृतान्त को अधिकांश पाठक जानते ही होंगे और इसे कागज पर उतारना आवश्यक नहीं है । हाँ, महात्मा गान्धी सत्य और अहिंसा के अपने सिद्धान्त और उसूलों के कारण जिस प्रकार आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं, उसे दुहराने की आवश्यकता जरुरी है ।
भारत के विभाजन के बाद जब देश सांप्रदायिकता की आग में जल रहा था तो वह अल्पसंख्यक समुदाय के समर्थन और साम्प्रदायिक सद्भाव को बढ़ाने की नीयत से अनशन पर बैठ गए । लेकिन आज जब कि नेपाल की जनता विगत कई महीनों से सांप्रदायिक द्वेष की आग की ताप से झुलस रही है तो सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक प्रेम के बंधन को मजबूत करने में सहायक हो सकने वाले गान्धीजी जैसे व्यक्तित्व को नहीं पा रही है । इसके विपरित वह कुछ दलों और नेताओं के अडि़यल राजनीतिक दृष्टिकोणों के कारण विभिन्न समस्याओं का सामना करने के लिए बाध्य हो रही है । महात्मा गान्धी के देश की यात्रा में जाकर अपनी अभीष्ट पूरा कराने की चाह रखने वाले नेतागण अपने ही देश की गरीब और विपन्न जनता के ‘पीर’ को जानने या मिटाने के प्रति आँखे मूँदे बैठे है । गांधी जी की पुण्य तिथि के अवसर पर आयोजित सभाओं में जाने और गान्धी के सन्य और अहिंसा के सिद्धान्तों पर भाषण देने भर से क्या महात्मा गान्धी के प्रति सच्ची श्रद्धाञ्जली अर्पित हो पाएगी ?
गान्धी का काल द्वन्द, हिंसा और युद्ध से जर्जरित था । अतः वह इसके कारण सदैव चिंतित रहा करते थे और लोगों से अपनी चिंता व्यक्त करते हुए पूछा करते थे– क्या हमारी यह दुनियाँ हमेशा ऐसी ही हिंसक बनी रहेगी ? क्या सच्चे धर्म में हमारी मति नहीं होगी ? क्या दुनिया ईश्वर से विमुख हो जाएगी ?
इन प्रश्नों को जन–जन के समक्ष रखते हुए वह अपनी आशावादिता से सभाओं में उपस्थित लोागों को आश्वस्त करते और कहा करते– ‘आने वाली दुनियाँ में, निश्चित रूप से ऐसे समाज की रचना होगी, जो अहिंसा के नींव पर खड़ा होगा । यह समाज का पहला कारण होगा । इसके बाद और सारी अच्छाइयाँ एक के बाद एक इसमें जुड़ती चली जाएगी ।’ लेकिन अफसोस, गान्धी के सपने आज तक अधूरे ही दिखाई पड़ते हैं क्योंकि विश्व आज भी जर्जरित है मारकाट, हिंसा, द्वेष और भूख के फलस्वरूप ।
सन् १९४७ की बात है । इस समय तक मोहन दास करमचन्द महात्मा गान्धी बन चुके थे । लोग उन्हें सम्मान से ‘बापू’ के रूप में भी सम्बोधित किया करते । उन्हीं दिनों वह नोआखली जिले की यात्रा पर थे । वह अधिकांशतः पद यात्रा किया करते थे । एक दिन किसी गाँव की यात्रा के क्रम में एक ग्रामीण ने उन्हें एक पेड़ की ओर संकेत करते हुए कहा– ‘बापू जी, देखिए इस पेड़ की डालियों में दो तरह के पत्ते हैं । है न अचरज की बात ?’ इस पर गान्धी जी कहने लगे– ‘इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है । इस पेड़ में दो प्रकार के पत्तियों का होना वैसा ही है, जैसे एक ही धरती पर दो सन्तानें ये हिन्दू और मुसलमान हैं । यह तो देखो, एक ही पेड़ में ये दोनों तरह की पत्तियाँ किस कदर फल–फूल रही है । ये हमें इस बात की शिक्षा देती है कि हमें इस धरती पर भाई–भाई तरह रहना चाहिए ठीक उसी तरह जैसे ये पत्तियाँ एक ही पेड़ पर उग रही है ।’ आज के भी सन्दर्भ में कितनी प्रासंगिक लगती है बापू की यह उक्तियाँ । उनकी ऐसी ही सोच ने उन्हें महामानव बनाया और राष्ट्रपिता के रूप में देश में प्रतिष्ठित कराया ।
समस्त देश को सत्य और अहिंसा की मार्ग पर अग्रसर कराते हुए और साम्राज्यवादी शक्ति की जड़ को हिलाकर देश से उखाड़ फेकने की सामथ्र्य रखनेवाले महात्मा गान्धी विनोदप्रिय भी थे । उनके विनोदप्रिय स्वभाव से चार्ली चाप्लिन जैसे हॉलिवुड के प्रसिद्ध हास्य अभिनेता भी मन्त्रमुग्ध हो उठते । अपनी विनोद प्रियता के सम्बन्ध में वह कहा करते थे– ‘यदि मुझ में विनोद की आदत न होती तो मैं अब तक आत्महत्या कर चुका होता ।’ प्रारम्भिक जीवन में उन्हें प्राप्त असफलताएँ, अपमान और मारपीट के अतिरिक्त जेल यात्रा और रेल यात्रा काल में मिली यातना और प्रताड़ना पर यदि हम गौर से ध्यान दें तो यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि उनके विनोद प्रिय स्वभाव और गीता के सन्देश के प्रति की आस्था ने उन्हे देश को दिशा देने में सहायता पहुँचाई, क्योकि बापू वायसराय के बीच हो या बच्चों के बीच, जेल के अन्दर हो या आश्रम के लोगों के बीच, उनका विनोदी स्वभाव हर जगह प्रकट होता ।
दक्षिण अफ्रिका की रेल यात्रा काल में अपमानित किए जाने पर संघर्ष पथ पर उतरने वाले, ब्रिटेन की यात्रा काल में वहाँ के राजा और प्रधानमन्त्री से मिलने के लिए ‘अर्धनग्न फकीर’ की तरह जाने वाले महात्मा गान्धी एक योद्धा भी थे, ऐसे योद्धा जिसे संघर्ष नियति के रूप में मिली । इंगलैण्ड में वकालत की शिक्षा पूरी करने के सिलसिलें में ईसाई समाज के साथ का संपर्क, अंग्रेजों को शोषक प्रवृत्ति और आचार–विचार से पूर्णतः परिचित हो चुकने तथा दक्षिण अफ्रिका में गोरों के सम्पर्क में आने पर नाताल की राजधानी मेरिन्सवर्ग के रेलवे स्टेशन में प्राप्त कटु अनुभव ने उन्हें तपे हुए सोने के रूप में परिष्कृत किया जो भारत लौटने पर पहली बार कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन में पहुँचने के बाद स्वाधीनता आन्दोलन को नई दिशा देने, अंग्रेज शासकों के दिलो दिमाग को झकझोरने और ब्रिटिश साम्राज्य की जग को हिलाते हुए भारतीय उपमहाद्वीप से कभी न डूबने वाली ब्रिटिश साम्राज्य के सूर्य को रसातल में पहुँचाने में किए गए उल्लेखनीय कार्य उनके अथक योद्धा होने के ही तो प्रमाण है ।
इसके अतिरिक्त वह एक कर्मयोगी भी थे, ऐसे कर्मयोगी, जिन्हें हरिजन वस्ती में रहते हुए वहाँ के शौचालय को साफ करने में भी कोई संकोच नहीं होता । स्वच्छता उनके जीवन का अभिन्न अंग था तो गीता के श्लोकों का पाठ उनकी दिनचार्य का एक महत्वपूर्ण भाग । अपने जीवन के अन्तिम घड़ी में ही नहीं, इससे पहले भी वह ‘राम’ के नाम का उच्चारण करने से नहीं चुकते । लुई फिशर की पुस्तक ‘गान्धी की कहानी’ में जाहोन्सवर्ग में गान्धी के साथ घटी एक घटना का उल्लेख मिलता है, जो इस प्रकार है– ‘गान्धीजी कार्यविशेष से रजिष्ट्री के दफ्तर जा रहे थे । जब वह वहाँ पहुँचे तो पठानों के एक झुण्ड ने उनका पीछा किया । दफ्तर पहुँचने से पहले एक पठान ने उनसे आगे बढ़कर पूछा– ‘किधर जा रहे हो ?’ गांधी जी ने जवाब देते हुए कहा– ‘रजिस्ट्री की सार्टिफिकेट लेनी है ।’ बातें हो ही रही थी कि उनके ऊपर डण्डे से जोर का प्रहार हुआ । और वह ‘हे राम’ कहते हुए वहीं मुर्छित हो गए ।’
३० जनवरी सन् १९४८ के दिन मृत्यु के समय पर भी उनके मुँह से उच्चारित अन्तिम शब्द थे– ‘हे राम’ ।
दिल्ली स्थित राजघाट पर बनाई गई उनकी समाधि पर अंकित इन अनमोल शब्दों को देखते हुए गान्धीजी के जीवन पर राम के प्रभाव को देखकर नतमस्तक हुए बिना नहीं रहा जा सकता ।
सन्दर्भ सामग्री ः
१. ऐसे थे बापू– यू आर राव,। प्रकाशन विभाग, भारत सरकार,
२. महात्मा गान्धी की आत्म कथा ः प्रमथ भाष्य– धर्मेन्द्र गुप्त

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