गालियों की संस्कृति –  डा.श्वेता दीप्ति

                                       तुम गालियाँ दो तबतक जबतक तुम्हारी जुबाँ थक न जाय  : डा.श्वेता दीप्ति       

तुम गालियाँ दो,

तब तक दो,8990_1जब तक

तुम्हारी जुबाँ थक ना जाय ।

मैं प्रतिउत्तर नहीं दूँगी,

क्योंकि मैं कीचड़ में

पत्थर नहीं मारना चाहती ।

तुम गालियाँ दो, जी भरकर दो

पर शायद तुम्हें पता नहीं

कि ये गाली तुम अपनी

संस्कार, परवरिश और

संस्कृति को दे रहे हो ।

तुम गालियाँ दो

मैं माफ कर दूँगी, क्योंकि,

तुम गलतफहमी में हो,

भूलो मत कि तुम्हारी

जड़ें कहीं और हैं ।

तुम सिर्फ तना हो,

जिनकी टहनियाँ,

यत्र–तत्र फैली हैं ।

तुम गालियाँ दो,

मैं प्रतिकार नहीं करुँगी

क्योंकि, ये मेरी कर्मभूमि है

और मैं इसकी ऋणी हूँ ।

तुम गालियाँ दो

क्योंकि मैंने माँगा है,

अपनी पहचान और जुबान

जिसे तुम्हारी संकीर्णता

स्वीकार नहीं कर पा रही ।

तुम गालियाँ दो,

मैं पलटवार नहीं करुँगी

क्योंकि मेरी नसों में

दौड़ रहा है, खून बन कर

बुद्ध के संस्कार, सीता का धैर्य,

तुम गालियाँ दो,

तब तक, जब तक तुम्हारी

जुबाँ थक ना जाय ।

 

प्रधानमंत्री ने हिन्दी में भाषण देकर बता दिया कि हिन्दी नेपाल की भाषा है : श्वेता दीप्ति

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1 Comment on "गालियों की संस्कृति –  डा.श्वेता दीप्ति"

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सुबोध
Guest

अति सुन्दर प्रस्तुति ।

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