गालीशास्त्र – गाली देने में देश के प्रबुद्ध वर्ग सब से आगे हैं

बिम्मीशर्मा,काठमांडू , ४ अप्रिल |

इस देश में जब से गणतंत्र आया है तब से गालीतंत्र भी कंप्यूटर में भाइरस की तरह फ्री मे घुस आया है । जहां भी जाइए आपको गाली के सिवा कुछ नहीं मिलेगा । हर गली और चौराहे पर लोगों की भीड़ जमा है जो एक दूसरे को गाली दे कर ही अपना टाईम पास कर रहे हैं । लोग सुबह उठते ही दातून करने की बजाय गाली बकने लगते हैं । और गाली भी माशाल्लाहक् या खूब बकते है । अपने दुश्मन के सातो पीढी को गंगाजल से नहीं गाली से भरे वचनवाण से सीधे जहन्नुम पहुंचा देते हैं ।

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देश के किसी स्कुल कालेज में इतिहास, भूगोल, विज्ञान और राजनीतिशास्त्र की तरह गालीशास्त्र की पढ़ाई नहीं होती । यदि सच में गालीशास्त्र की पढाई त्रिभूवन विश्वविधालय या विश्वविधालय शुरु करता तो यकीन मानिए सब से ज्यादा विद्यार्थी इसी गालीशास्त्र के फैकल्टी मे भर्ती होने के लिए एड़ी चोटी का जोर जरुर लगाते । अफशोश अभी तक किसी विश्वविद्यालय ने गाली को भी एक “विधा” मान कर इस के अध्ययन के उपक्रम के विषय में गंभीरता से सोचा नहीं है ।

देश में बहुत दिनों से तेल, गैस और जरुरी वस्तुओं की किल्लत हो रही है । पर इस की तरफ कोई ध्यान नहीं देता । जिधर देखिए बस तेल और गैस से ज्यादा लंबी लाईन गाली देने वालों की है । कहीं भी सौ, पचास लोगों की भीड़ नजर आए और आप उस में किसी अजनवी की तरह घुस गए तो आपको वहां पर गाली और मारपीट के अलावा कुछ और नहीं दिखेगा । लोग गाली को ऐसे खा कर उगलते हैं जैसे पान खा कर उसके पीक को थूक रहे हों । इस देश में गाली देना जन्मसिद्ध अधिकार है और गाली सुनना हम सभी का कर्तव्य । जो जितना ज्यादा गाली सुनेगा उसकी चमड़ी उतनी मोटी होती जाएगी । और रोगप्रतिरोधक शक्ति और प्रदू षण सहने की क्षमता भी बढ़ती जाएगी ।

मधेशी समूदायाें में शादी के समय जब बाराती खाने बैठते हैं तब वधू पक्ष द्वारा वर और उस के परिवार को गाली देने की परंपरा है । जितना ज्यादा गाली दी जाएगा उतना ही शुभ और वर वधू का जीवन खुशहाल होगा ऐसा मानते हैं । और मधेश के गाँव, देहात में होली के त्यौहार में अभी भी गाली देने की प्रथा है । होली में रंग लगाना, गाली देना और बुरा न मानना भी एक परंपरा की तरह माना जाता है । पर हमारे देश में क्या शादी और क्या होली सभी १२ महीने ही गाली के रथ में सवार रहते हैं । यह गजब की बिमारी लगी है सबको एक दिन खाना खाए बिना रह लेगें पर गाली दिए बिना नहीं रह सकते । गाली में भी ऐसे शब्द और वाक्य चुन चुन कर बोलेगें कि आपको इस का अर्थ किसी डिक्शनरी में नही मिलेगा । सभी लोग घर में अपने बच्चे की तरह गाली भी खुद पैदा करते हैं ।

गाली न हो गया कोई मंत्र या जाप हो गया जिसे जपे या बोले बिना मुक्ति संभव नहीं । आपको अगर गाली बकनी नहीं आती है तो इसका मतलब आप के पास जितनी भी शैक्षिक डिग्री या योगयता हो बस सब बेकार हो जाती है । किसी सार्वजनिक जगहऔर भीड़ भाड़ वाले इलाके में आप नें किसी की छोटी सी गलती पर भी गाली नहीं दिया तो समझिए अपना लायक और अयोग्य है । गाली भी एक हथियार है जो एक निहत्था इंसान पर वरसाया जाता है । गाली से नहाया हुआ इंसान भीगी बिल्ली बन कर घर चला जाता है और चुपचाप आंसू बहाता है ।cartoon-nep.png-11

गाली देने के मामले में देश के प्रबुद्ध वर्ग सब से आगे हैं । यह वर्ग जितना पढ़ा लिखा है उतनी ही गाली के विषय में भी इसने अनौपचारिक शिक्षा हासिल कर ली है । बेचारे क्या करते आखिर में ? मन तो गालीशास्त्र मे पी एचडी करने का है पर कोई विश्वविधालय गालीशास्त्र को वैधानिकता दे कर इस के अध्ययन को शुरु करवाए तब न ? इसी लिए बेचारे यह प्रबुद्ध लोग मन मसोस कर रह जाते हैं । और अपने दिमाग और मन से एक से एक खुराफात और गाली का आविष्कार करते हैं ।

यदि सच में देश के स्कूल और कलेजों में गालीशास्त्र की पढ़ाई हो और यहां से गाली में शिक्षित और दीक्षित हो कर निकले लोग अपने समाज और देश का कायापलट ही कर देगें । वह ऐसे कि तब गालीशास्त्र में मास्टर्स और पीएचडी की डिग्री धारक अपने गाँव का नाम गाली सरायपुर, कस्बे का नाम गालीगंज, गालीपुर, गालीवांग, देश की राजधानी का नाम भी बदल कर गालीधानी या “गालीमाडुं ”रख देगेें । कोइ गाली साहित्य पर किताब लिखता और उसका नाम गाली नंबर ४२० रखता । कोई अपने आशिक से कहता प्यार से मैं तेरा गाली (आशिक) हुं । सिर्फ गाली पर ही सिनेमा बनाई जाती और उस सिनेमा का नाम होता “गाली और गोली” या “मैं आशिक हुं गालियों का” ।

तब कितना मजा आएगा जब गाली पर एक से एक कविता लिखी जाएगी और सबसे ज्यादा गाली वाचन करने वाले कवि को पुरस्कृत भी किया जाएगा । फूल और किताब महोत्सव की तरह गाली महोत्सव या सम्मेलन होगा और सभी गाली को देखने, सुनने और महसुस करने उसमे भाग लेने जाएगें । गाली विषय के परीक्षा के समय में परिक्षार्थी घर के छत और आंगन में घूमते हुए जोर, शोर से एक से एक गालियों को याद करते हुए पूरे मोहल्ले को तरसा कर रखेगें ।

सास बहू को गाली न दे और बहू इस के बदले में सास को आंख न दिखाए तो सूरज पूरब से उगना ही भूल जाएगा । शिक्षक अपने विद्यार्थीयों को बेंत से पीठ पर मारते हुए तीन पुश्तों की गाली न दे तो चन्द्रमा भी अपना रास्ता भूल जाएगा । एक दुश्मन दुश्मन को गोली दागने से पहले गाली से सरावोर कर के उस की शक्ति क्षीण कर लेता है । क्यों कि दुश्मन को भी पता है गाली में गोली से ज्यादा ताकत होती है । इसी लिए तो हिन्दी सिनेमा के नायक धर्मेन्द्र अपने दुश्मनको ललकारते हुए गाली देते है कि “कुत्ते कमीने मैं तेरा खून पी जाउँगा ।” (व्यग्ंय)

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