गुट का नहीं पार्टी नेता चाहिए:हरिभक्त क“डेल

विधि सभी के लिए होना चाहिए । मानने वालों के लिए विधि और ना मानने वालों के लिए सबकुछ करने की छुट नहीं होनी चाहिए । बाबूराम जी के अल्मपत में रहे कई घटनाएँ हर्इ । नेतृत्व द्वारा ध्यान नहीं दिया गया । हर बात का विधिसंगत तरीके से हल ढूँढा जाना चाहिए । अध्यक्ष कमरेड ने इन पर ध्यान नहीं दिया ऐसा प्रतीत होता है । अनुशासन का पालन सभी को करना चाहिए । बहुमत होने पर कुछ भी करने की छुट नहीं दी जा सकती है । अल्पमत द्वारा कुछ किया कि होहल्ला मचाकर बवाल करने की बात व्यावहारिक नहीं है । जब अपनी जरुरत है, तभी नीति को मानना नहीं तो नहीं मानना यह बात नहीं होनी चाहिए । मुख्य बात यह है कि पार्टर्ीीेतृत्व को ही विधिसंगत तरीके से चलना चाहिए ।
इस समय पार्टर्ीीे भीतर एकता अपरिहार्य है । इसके लिए कम से कम पालुंगटार बैठक के बाद जो भी घटनाक्रम हर्ुइ उसके लिए पार्टर्ीीर्ीष्ा नेताओं को आत्मालोचना करनी चाहिए । सबको अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए । नेतृत्व स्तर पर विश्वास का वातावरण बनाना जरुरी है । पार्टर्ीीे भीतर समान व्यवहार किया जाना चाहिए । निर्ण्र्ााएक और व्यवहार में कुछ और किया गया तो समस्या और बढÞ जाएगी । पार्टर्ीीे भीतर जो अल्पमत में है, उनकी बातों का भी संबोधन होना चाहिए । विश्वास नहीं तो आश्वासन दिया जाना चाहिए । पार्टर्ीीे भीतर रहे गलत प्रवृति व शैली के तत्वों पर कार्रवाही की जानी चाहिए । खुराफाती संर्घष्ा नहीं करनी चाहिए । पिछले कुछ समय से हमारी पार्टर्ीीे भीतर कुछ साथियों को खुराफात में ही अपना भविष्य दिख रहा है ।
होने के लिए मुख्य मुद्दा तो विचार का ही है । विचार अपने तरीका से नहीं किया  तो दूसरे तरीके से आता है । पार्टर्ीीो सभी का है फिर कहाँ से इसमें संस्थापन पक्ष और दूसरे पक्ष की बात होती है । यह सिर्फप्रचार ही नहीं किया गया बल्कि व्यवहार में महसूस भी किया जा रहा है । अपने पद, प्रतिष्ठा व राजनीतिक भविष्य सुनिश्चित करने के लिए संस्थापन पक्ष से ही जुडÞने की मानसिकता कार्यकर्ताओं में हावी हो रही है ।
अन्तरसंर्घष्ा की विधि का अपना महत्व है । यह विचारों के साथ जुडÞा होता है । जब नेतृत्व द्वारा ही विधि को तोडÞा जाता है तो समस्या आती है । सब काम खुद ही करने और दूसरों पर विश्वास नहीं करने से भी समस्या बढÞ रही है । अपने आपको संस्थापन पक्ष के रूप में प्रचारबाजी कराने की होडÞ नेताओं में रूकनी चाहिए । कम्यूनिष्ट पार्टर्ीीें सभी सदस्यों की हैसियत बराबर होती है ।
जो देशभर में बेठकों का दौर चला वो बाध्य होकर किया गया । हमपर आरोप लगाया जाता है लेकिन इस पर चर्चा करने का वातावरण पार्टर्ीीेन्द्रिय बैठकों में नहीं बनाया जाता है । ये तथाकथित संस्थापन पक्ष द्वारा तैयार की गई बाध्यात्मक परिस्थिति के कारण ही उपजा है । अध्यक्ष कमरेड में एकल सोच हावी है । उन्हें स्वयं की प्रशंसा प्यारी लगती है । अपने आपको ही श्रेष्ठ और ठीक समझने की उनकी प्रवृति गलत है और समस्याओं का जडÞ भी यही है । जरा सी आलोचना से किसी को देखने का दृष्टिकोण ही नकारात्मक बना लेता है । वो पूरे पार्टर्ीीे नेता है और उन्हें इसका ख्याल रखना ही होगा । पार्टर्ीीे भीतर सिर्फएक गुट का नेता बनते ही पार्टर्ीीें विभाजन की नींव रख देती है ।
-लेखक क“डेल माओवादी पोलिटब्यूरो सदस्य हैं ।)

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