गुठी का कानून ही धर्म विरोधीः
महन्थ बैकुण्ठ दास

हिन्दुओं का चार धाममध्ये जनकपुर को एक धाम होना कोई संयोग का विषय नहीं रहता है, अपितुः जनकपुरधाम मिथिला नरेश महाराज शिरध्वज जनककी कर्मभूमि एवं राजधानी तथा माता सीता की क्रीडास्थली के रुप में त्रेतायुग से ही सुशोभित, मयर्दत एवं पावन भूमि के रुप में विश्व प्रख्यात है।
    महाराज जनकद्वारा मंचन किया गया शिव धनुष महायज्ञ का वर्ण्र्ाासुनकर और पढकर हिन्दू मात्र ही नहीं विश्व के अन्य धर्मावलम्बी लोग भी अभीतक मंत्रमुग्ध होते आ रहे है। मध्य प्रदेश की महारानी वृषभानु, कुँवरीद्वारा बनाया गया जानकी मन्दिर का सौर्न्दर्य और गरिमा हिन्दू धर्म का धरोहर है, यह मंदिर एवं आस्था को दर्शाते हुए बर्बस जनकपुर और अयोध्या के पवित्र रिश्तो को अभीतक अमर किया हुआ है। परन्तु जनकपुर और अयोध्या का स्थापित अमर सम्बन्ध पर कुछ लोगों की वक्रदृष्टि सभी को ममर्ाीहत कर रहा है।
अयोध्या और जनकपुर केे सम्बन्ध को और प्रगाढÞतर बनाने के लिए ही तत्कालीन भारतीय राष्ट्रपति निलम संजीवा रेड्डी और ज्ञानी जेल सिंह एवं पर्ूव प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी का जनकपुरधाम का भ्रमण सिर्फइतिहास के पन्ने में सुरक्षित रह जाएगा, ऐसा लगता है।
नेपाल के प्रादर्ुभाव से लकेर आजतक जितने भी तानाशाह वा लोकतांत्रिक सरकार क्यों न बना हो, वे सभी के सभी जकपुरधाम को धार्मिक एवं पर्यटकीय विकास के लिए अपनी अपवित्र जुवानसे अभिव्यक्ति के सिवाय, इस धार्मिक स्थल का दोहन एवं अमयर्ाीदत करना ही अपना परम धर्म और कर्तव्य के रुप में लेते आये हैं।
इन्ही समसामयिक विषयपर जनकपुरधाम स्थित रत्नसागर मन्दिर के युवा महन्थ श्री बैकुण्ठ दास वैष्णवजी से
दिनेश शर्मा की हर्इ बातचित का सार-संक्षेप प्रस्तुत हैः

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महन्थ जी, इस सागर का नाम “रत्नसागर” ही क्यों रखा गया –
–    तेत्रा युग में मिथिला की राजधानी जनकपुर होने के कारण महाराज जनक अपने कोष का भण्डारण यही करते थे, इसलिए उन्हों ने इस स्थाल का नाम रत्नसागर रखा गया।
असंख्य मठ-मन्दिर और सागर, सरोवर, कुण्ड होते हए भी इस स्थल का रोगग्रस्त होने का क्या करण हो सकता है –
–    ­पहले के जमीन्दार और सम्पन्न व्यक्तिलोग निजी मठ-मन्दिर और सागर का निर्माण धर्म के नामपर किये थे। पर अभी जमीन महंगा होने के कारण वे लोग अपाहिज कानून एवं मर्यादाहीन सरकार होने के कारण उन्हीं लोगों के इशारा एवं इनका संरक्षण पाकर मन्दिर को ध्वस्त करके व्यक्तिगत आलिशान महल बनाने के लिए अग्रसर है। इसलिए यह स्थल रोगग्रस्त होता जा रहा है ।
हिन्दू सम्राट एवं पंचायती व्यवस्था के पर््रवर्तक राजा महेन्द्र मन्दिर का बहुमूल्य जमीन अपने दमाद को क्यों दिया –
–    कहने के लिए वे अपने को विष्णु के अवतार एवं हिन्दू सम्राट कहलाते रहे लेकिन भीतर से वे निरंकुश एवं घोर तानाशाह थे। इसलिए वे रत्नसागर जैसे पवित्र एवं ऐतिहासिक मन्दिर का बहुमूल्य २४ विघा जमीन अपने दमाद खड्ग विक्रम साह को देकर अपने-आप को धर्म और कानून भी समाप्त कर लिये, इसी पदचिन्ह पर उनके उत्तराधिकारी सपुत्र वीरेन्द्र भी चला, जिसका वंश भी निर्मूल हो गया और राजवंश ही समाप्त हो गया। धर्म और मठ-मन्दिर के साथ खिलवाड करने वाले ऐसे ही समाप्त हो जाते है।
धेश आन्दोलन पश्चात देश गणतान्त्रिक हो गया है, क्या इससे हिन्दू धर्म पर कोई असर पर रहा है –
–    हमारे मित्र राष्ट्र भारत स्वतन्त्रता से पर्ूव और अभीतक गणतांत्रिक देश के रुप में ही विश्वजगत के हरेक क्षेत्र में अपना अभिनय कुशलतापर्ूवक संचालन कर रहा हैं। यहाँँ अभी तक ३ करोडÞ साधुसन्त और महन्थ तथा उन लोगों के द्वारा की जानीवाली सेवा विश्व में ही अद्धीतीय हैं। गोरखपुर के महन्थ आदित्यनाथ जी संसद सदस्य होते आये हैं और इससे हिन्दू धर्मावलम्बी काफी उत्साहित है। बल्कि नेपाल पर्ूव में हिन्दू होने के बावजूद भी वैसा बन नहीं सका है। यह दुःख की बात है।
क्या मटिहानी के मान महन्थ तथा जानकी मन्दिर के महन्थ के बीच मतभेद रहने के कारण से जनकपुर के विकास पर प्रतिकुल असर पर रहा है –
–    यह विल्कुल ही निराधार बात हैं। मटिहानी के मान महन्थजी श्री रामानन्द वैष्णव संघ के सम्मानित अध्यक्ष है और जानकी मन्दिर के महन्थजी संघ के उपाध्यक्ष है तथा मैं उस संघका महासचिव हूँ। हमलोग जनकपुरधाम कें धार्मिक गरिमा को सुरक्षित एवं संरक्षित करने के लिए सदैव एकजूट होकर सम्पर्ूण्ा साधुसन्तों के भावनाअनुसार ही कार्यरत रहते आए हैं। वैसे कुछ लोग अपनी निहित स्वार्थीसद्ध करने के लिए मतभेद की बातें उडाने से बाज नहीं आते हैं।
भारत के मठ-मन्दिर में साधुसन्तों की जैसी सेवा प्रदान की जाती है, वैसी सेवा यहा“ के मठ-मन्दिर में नहीं होने के कारण क्या संसाधन के अभाव को माना जाय –
–    भारत एक कानूनी गणतान्त्रिक महान देश है। वहाँ प्रत्येक व्यक्ति को कानून के परिधि में रहकर काम करने की पर्ूण्ा स्वतन्त्रता है, परतु यहाँ के मठ-मन्दिर के महन्थों की नियुक्ति एवं खारिजी गुठी संरक्षण समिति द्वारा की जाती है। आप को आर्श्चर्य होगा कि उस समिति में विभिन्न पाँच मन्त्रालय के सचिव होते हैं। इसके अलावा गुठी के अध्यक्ष और सरकार द्वारा मनोनित सदस्य एवं नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को मिलाकर ११ सदस्यीय समिति के चंगुल में भी मठ-मन्दिर तथा हिन्दुओं का धार्मिक भविष्य समाहित है। ऐसी परिस्थिति में मठ-मन्दिर के महन्थ कैसे काम करते होगें, वे आप लोग स्वयं सोच-विचार करके विश्लेषण करें।
क्या गुठी संरक्षण समिति सिर्फहिन्दुओं का मठ-मन्दिर को देखने के लिए बनायी गयी है –
–    हाँ, यह समिति मस्जिद और चर्च के आय श्रोतों एवं व्यवस्थापन तथा किसी तरह के गतिविधियों को नहीं देखता है।
अन्त्य में आप अपना कोई अन्य जिज्ञासा इस प्रतिष्ठित पत्रिका के मार्फ व्यक्त करना चाहेंगे –
–    हिमालिनी नेपाल से प्रकाशित एक मात्र लोकप्रिय पत्रिका है, जो सम्पर्ूण्ा हिन्दू और हिन्दी भाषाभाषियों के सपना को पूरा करने के लिए अपने लेख, रचना द्वारा कटिवद्ध प्रतीत होता है, इसलिए यह पत्रिका नेपाल देश को हिमालय जैसी उँचाई को प्राप्त कराने में सक्षम हो, यही मेरी कामना है।

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