Wed. Sep 19th, 2018

गुद्डी के लाल ! तूने कर दिया कमाल !!

कभी-कभार अपने नाम को र्सार्थक करने वाले लोग भी इस दुनिया में मिल जाते हैं। एक पत्रकार के नाते ऐसे मिलन को मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ। मेरी राय में जिन्दगी को नापने का पैमाना आदमी के कामों से होना चाहिए। सिर्फसांस लेकर लम्बी उमर तक जी लेने से कोई व्यक्ति दर्ीघजीवी तो कहला सकता है, लेकिन एक सफल आदमी के रूप में आप अपने मानस में उसे नहीं बिठा सकते। Binit-Thakur-1
अपने नाम को र्सार्थक करने वालों में एक सज्जन से हाल ही में मुलाकात हर्ुइ। इसे मैं अपनी खुशकिस्मती मानता हूँ। वे सज्जन हैं- धनुषा मिथिलेश्वर मौवाही-६ के विनीत ठाकुर। ये महोदय अपने नाम को पर्ूण्ा रूप से र्सार्थक करते हैं। विनीत का अर्थ होता है- पर्ूण्ा विनम्र। यह पर्ूण्ा विनम्रता विनीत जी के व्यक्तित्व में चार चांद लगाता है। वि.सं. २०३२ साल चैत्र १४ गते को इस दुनियाँ में पदार्पण करने वाले विनीत ठाकुर ने २०५१ साल में देश की राजधानी काठमांडू में प्रवेश किया। मगर यहाँ एक बात गौरतलब है, महज ३८ साल की उमर में विनीत जी ने गायन, लेखन तथा साहित्य और संस्कृति की सेवा में जितने काम किए हैं, वे सब के सब काबीलेतारीफ हैं। नतीजतन बरबस मेरे मुँह से निकाल पडÞा- गुदडÞी के लाल ! तूने कर दिया कमाल !!
अत्यन्त सरल स्वभाव के विनीत ठाकुर ने ‘सानो ठिमी क्याम्पस’ से बी.एड. किया था। उन्होंने कक्षा १० में पढÞते वक्त मैथिली में गीत लिखना शुरु किया था। हिन्दी में एक कहावत है- पालने में ही पूत के पाँव परख लिए जाते हैं। शायद इसी को अंग्रेजी में कहा जाता है- मर्निङ सोज द डे। छात्र जीवन की यह अच्छी सी आदत आज कालक्रम से विकसित होकर एक वट-वृक्ष के रूप में गीत रचना -संगीत) क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने में सफल हर्ुइ है। साधारण ग्रामीण परवेश से इस कंक्रीट के भयानक जंगल में -काठमांडू में) विनीत जी को भी भटकना तो खूब पडÞा। अक्सर शुरुवाती दौरे में हर संर्घष्ाशील व्यक्ति को मुसीबतों का सामना इसी तरह करना पडÞता है।
उन संर्घष्ा के दिनों में बहुत सारे गायक और संगीतकार के दरो-दरवाजे तक दौडÞते-दौडÞते विनीत जी की हालत पतली हो गई थी। रंग लाती है हीना पत्थर पे घिस जाने के बाद। और ऐसा ही हुआ विनीत ठाकुर के जीवन में। उन बीते दिनों की याद में वे स्मरण करते हैं- गुरुदेव कामत, रामा मण्डल, मित्र कमल मण्डल, हरिशंकर चौधरी एवं अन्य बहुत सारे संगीतकारों को। साहित्यकार और गीतकार दिनेश गुप्ता को भी वे बडÞे प्रेम से याद करते हैं। इन्हीं लोगों ने संर्घष्ा के दिनों में विनीत जी की हौसला अफजाई की थी। मदद के हाथ इन्ही लोगांे ने बढÞाए थे।
ढेÞर सार पापडÞ बेलने के बाद पहली बार मैथिली में ‘मेड इन मिथिला’ नामक कैसेट और सिडÞी बाजार में प्रस्तुत हो सका। इनके अन्य कैसेट, जैसे हुक्का लोली, मोवाइल वाली, मोहनी सुरतिया भी बाजार में धूम मचा रहे हैं। तो दूसरी ओर भोजपुरी गीतों को लिपिवद्ध, संगीतवद्ध करने/कराने में ये तन्मयता से लगे हुए हैं।
आज के समाज के सर पर फिल्मी भूत हमेशा सवार रहता है। फिल्मी गीतों की रचना में भी विनीत ठाकुर जी ने हाथ आजमाया। एक फिल्म का नाम है- ‘भाग्य के रेखा’। थारू, मैथिली और नेपाली भाषा में बनी इस फिल्म के लिए गीत रचे हैं, ठाकुर जी ने। उसी तरह ‘करम भाग्य’ ‘प्रीतक फूल’ और ‘आइ लभ जनकपुर’ आदि फिल्मों को इन्होंने अपने सुमधुर गीतों से संवारा है। अभी तक इनकी उर्वर लेखनी ने दो सौ से ज्यादा गीतों को जनम दिए हैं।
इस सरलता की मर्ूर्ति को बाज वक्त तो लोग पहचान भी नहीं पाते। कई बार ऐसा हुआ है- ये महोदय वही सामने विराजमान हैं और स्टुडियो वाले उन्हें बेसब्री से ढूंढÞ रहे हैं। गोद में बच्चा नजर में ढिंÞढÞोरा। ऐसी ही अवस्था में इनका नाम ‘विनीत’ शतप्रतिशत र्सार्थक होता है। तडÞक-भडÞक, तामझाम और प्रचारबाजी-लफ्फाजी जैसे महंगे शौक ये नहीं पालते। नतीजतन ये गुदडÞी में छुपे हुए लाल, कमाल कर दिखाते हैं।
शायद आपको मेरी बातों पर यकीन न आ रहा हो। ना भई, ना … मैं झूठ की खेती नहीं करता। झूठ तो मुझे र्सप की तरह डरावना लगता है। तो अब आप सावधान हो जाईए। मैं आपको एक ऐसी हकीकत से रू-ब-रू- करा रहा हूँ, जिसे जानने पर आप दाँतों तेल अंगुली दवाने को मजबूर हो जाएंगे। मैथिली गीति संग्रह ‘बाँकि अछि हमर दूधक कर्ज’ विनीत ठाकुर जी की ऐसी अनूठी ऐतिहासिक कृति है, जो इस शताब्दी की पहली, मिथिलाक्षर में छपी किताब है। है न पते की बात – अरे यार यह किताब बाजार में मिलती है।
‘सिम्पल लिभिंग एण्ड हाई थिंकिङ’ वाले फलसफे को गले लगाने वाले गीतकार ठाकुर जी से मैंने मजाक में पूछा- आजकल काठमांडू की सडÞकों में फैसनेबल नई पीढÞी प्रायः नग्न अवस्था में दिखाई देती है। इस नजारे को देखकर आप कैसा महसूस करते हैं – कहीं आपको ‘कुछ कुछ’ तो नहीं होता –
चेहरे पे मुस्कान बिखेरते हुए ठाकुर जी बोले- हमारी नई पीढÞी विदेशी संस्कृति की भोंडÞी नकल कर रही है। किसी दृष्टि से भी यह अच्छी बात नहीं है। उसी तरह आजकल कुछ गीतों में अश्लीलता को महत्त्वपर्ूण्ा जगह दी जा रही है, इसे भी रोकना होगा। किसी भी माध्यम फिल्म, गीत, पुस्तक में अश्लीलता को निषेधित करना होगा। आप अपनी माँ-बहन के साथ बैठकर वह फिल्म देख सकें, गीत सुन सकें ! तभी तो देखने-सुनने का खास मजा होता है।
विगत बीस वर्षों से प्रगति आदर्शर् इ. स्कूल, लगनखेल ललितपुर में कंप्युटर विज्ञान के शिक्षक के रूप में सेवारत विनीत जी का मैथिली जागरण गीत ‘उठु यौ मैथिल भेलै भोर’ से कार्यक्रम प्रारम्भ होता है हर सुबह, मिथिला प्रदेश के १६ एफएम रेडियो से। जिसके संगीतकार और गायक है, गुरु कामत।
मैथिली भाषा की पत्रिका ‘आंगन’ नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान से प्रकाशित होती है, इसके सम्पादक मण्डल के एक चमकते तारे के रूप में ठाकुरजी भी विराजमान हैं। ‘आंगन’ का भाग २, ३, ४, ५ प्रकाशित हो चुका है। प्रज्ञा के ही तत्त्वावधान में नेपाली से मैथिली-मैथिली से नेपाली, नेपाली से हिन्दी तथा अन्य अनेकों अनुसन्धानमूलक कामों को अंजाम देनेवाले ठाकुरजी को क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीयस्तर के अनेकों पुरस्कार से नवाजा गया है। सोसियल साइट के माध्यम से मिथिलाक्षर के प्रचार-प्रसार में सक्रिय रहना इनका शौक है। विजय सिंह मुनाल के संगीत में नेपाली भाषा में पहली बार छठ के गीत कान्तिपुर टेलिविजन से प्रसारित हुआ है। मैथिली से नेपाली में रूपान्तरण करनेवाले हमारे ठाकुर जी ही हैं। मिथिलाक्षर में ही इनकी किताब ‘बदलैत परिवेश’ निकट भविष्य में बाजार में आ रही है। नेपाली के युगकवि सिद्धचरण श्रेष्ठ की ५० कविताओं का हिन्दी रूपान्तरण प्रज्ञा प्रतिष्ठान की ओर से ‘विश्वसाहित्य तथा अनुवाद’ विभाग से सम्पन्न हो चुका है। अनुवादक की भूमिका इस मंे विनीतजी ने विर्वाह की थी। वैसे दुनियाँ यह भी तो कहती है, इंसान की पहचान उसके नाम से नहीं काम से होती है। चलो यह भी सही।
खालिस ग्रामीण परिवेश से राजधानी आए हुए एक विनम्र शख्सियत विनीत ठाकुर, साहित्य और संस्कृति के विकास में निरन्तर अथक रूप से संलग्न हैं। क्या यह सुखद आर्श्चर्य नहीं है – क्यू न हम कहें- गुदडÞी के लाल ! तूने कर दिया कमाल। याद रहे किसीकी शक्ल या पहनावा देखकर उस व्यक्ति के सम्बन्ध में गलत धारण नहीं बनानी चाहिए। अपना दिल भी तो कुछ-कुछ शायरना तबीयत का है। चलते-चलते जनाब विनीत ठाकुर की खिदमत में जफर इकबाल का एक शेर, अर्ज करूंः-
आज मैं मंजिल नहीं हूँ, राह का फैलाव हूँ
आज है मेरा सफर अंदर से बाहर की तरफ

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