Sun. Sep 23rd, 2018

गुमनामी के अंधेरे में एक देशभक्त विदुषी !

वक्त बहुत बलवान होता है। समय के थपेड लोगों की उठापटकी करते रहते हैं। इसका एक उदाहरण हिन्दी के रिटायर्ड प्रोफेसर उमा रानी सिंह हैं। नेपाल के जिला सप्तरी, ग्राम बभनगामा कट्टी निवासी नेपाली कांग्रेस के जानेमाने नेता इन्द्रदेव सिंह से उमा रानी की शादी सन् १९६० में सम्पन्न हर्ुइ थी। इस तरह भारत की सुपुत्री नेपाल की पत्रुवधू बन आईं। और अपने कर्मों से दोनों देशों का सिर उच्च रखा। सच ही कहा है- शिक्षित महिला दोनों परिवार को बनाती है, बचाती है।
श्रीमती उमा का जन्म सन् १९४२ में भारत, बिहार के मुजफ्फरपुर जिला, जारंग गो टोली ग्राम में हुआ था। बिहार विश्वविद्यालय से आइए एवं पटना विश्व विद्यालय से क्रमशः बीए, एमए -हिन्दी) में करनेवाली उमा रानी सिंह ने सन् १९७र्९र् इ. में ‘मैथिलीशरण गुप्त की काव्यकृतियों की काव्यशास्त्रीय मीमांसा’ विषय पर पि.एच.डी -विद्या वारिधि) की उपाधि बिहार विश्वविद्यालय से हासिल की थी। Umakanta-Sing
नेपाल की विदुषी पुत्रवधू श्रीमति सिंह ने बिहार दरभंगा स्थित एमआर महिला महाविद्यालय, मिथिला विश्व विद्यालय- हिन्दी विभाग में व्याख्याता के तौर पर अपनी शिक्षण यात्रा शुरु की थी। पिएचडी करने के बाद रिडर और यूनिवर्सिटी प्रोफेसर के पद पर क्रमशः इनकी पदोन्नति होती गई।
इधर नेपाल में प्रजातन्त्र की बहाली-पर्ुनर्वहाली के लिए सख्त जद्दो-दहद का सिलसिला चल रहा था। विदुषी प्राध्यापिका श्रीमती सिंह ने अपने पति इन्द्रदेव सिंह की राजनैतिक लडर्Þाई में कंधा से कंधा मिलाते हुए भरपूर मदद की और इस तरह एक आदर्श जीवन संगिनी और देशभक्त प्रजातन्त्र प्रेमी का आदर्श प्रस्तुत किया।
नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में इन्द्रदेव सिंह प्रजातान्त्रिक लर्डाई में कूद पडÞे। इस सिलसिले में उन्हें कई बार जेलयात्रा भी करनी पडÞी। तन, मन, धन से प्रजातान्त्रिक संर्घष्ा को सफल करने के लिए सिंह तो दिनरात लगे ही रहते थे, साथ ही उन्हें जीवन संगिनी उमारानी सिंह से भी इस में भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ।
वैसे राजनीति में चुनाव तो होते ही रहते हैं। देशभक्त प्रजातन्त्रप्रेमी सिंह दम्पत्ति को भी चुनाव में सहभागी होने का मौका तो मिला था, लेकिन दर्ुभाग्यावस पराजय का मुंह देखना पडÞा। हालांकि देशभक्ति और प्रजातन्त्र प्रेम के सामने चुनावी हारजीत का कोई खास मायने नहीं होता। देश प्रेम को दिल में संजोए एक प्रजातान्त्रवादी विदुषी फिलहाल गुमनामी के अंधेरे में जीने के लिए बाध्य हैं। सचमुच समय बडÞा बलवान होता है। फिर भी श्रीमती उमारानी सिंह को किसी से कोई गिला शिकवा नहीं। मगर हां, देश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति को देखने पर उन का दिल जरूर कचोटता है। ‘क्या ऐसे ही नेपाल की हमने कल्पना की थी -‘ ऐसा सवाल उनके जेहन में बार-बार सर उठाता है।
असमय में ही पति का साथ छूटा, जिस प्रजातन्त्र की स्थापना के लिए साथ-साथ लडेÞ थे, वह प्रजातन्त्र भी खतरे में दिखता है। अपनी पसंदीदा पार्टर्ीीेपाली कांग्रेस की हालत भी पतली दिखती है। लोगों में नफरत और स्वार्थ के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। ऐसे में बार बार शायर सागर खय्यामी के बोल याद आते हैं-
कुछ ऐसी चीज मिलाइये नफरत के तेल में
इनसान मुहब्बत करने लगे होलसेल में !

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