गुल्जार–ए– अदब का गजल गोष्ठी

???????????????????????????????उमरे दराज गुजरेगी बस इन्तेजार में
    मुझसा न ढूढ पावोगें तुम इस दयार में
आते है, आ रहे है, अब आयेंगे वह जरुर
    ताकता रहा मैं राहों को फसले वहार में

नेपालगन्ज,(बाँके) पवन जायसवाल, अगस्त ।
बाँके जिला के उर्दू साहित्कारों ने महेन्द्र पुस्तकालय नेपालगन्ज में शनिवार को मासिक गजल गोष्ठी किया ।
बि.सं.२०३३ साल श्रावण १ गते स्थापना हुआ गुल्जार–ए– अदब ने नियमित मासिक गजल गोष्ठी का आयोजन करते आया है ।
मासिक गजल गोष्ठी कार्यक्रम में उर्दू साहित्यकार सिराज अहमद “राज” के प्रमुख आतिथ्य में, सैयद् असफाक रसूल हाशमी के अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ कार्यक्रम में अवधीे साँस्कृतिक विकास परिषद् बाँके के अध्यक्ष सच्चिदानन्द चौवे, अवधी साँस्कृतिक प्रतिष्ठान बाँके के अध्यक्ष बिष्णुलाल कुमाल, भेरी साहित्य समाज बाँके के अध्यक्ष हरि प्रसाद तिमिल्सेना, कविराज रेग्मी, प्रगतिशील लेखक संघ बा“के के अध्यक्ष इन्द्र बहादुर बस्नेत लगायत लोगों ने अपनी– अपनी लेख रचना वाचन किया ।
गजल गोष्ठी में उर्दू साहित्यकार अदब के सचिव मोहम्मद मुस्तफा अहसन कुरैशी, मोहम्मद यूसुफ आरफी कुरैशी, सøयद अशफाक रसूल हाशमी, जमील अहमद हाशमी, मौलाना नूर आलम मेकरानी , प्रम्ख अतिथि सिराज अहमद “राज” लगायत लोगों ने भी अपनी– अपनी शैर वाचन किया था ।
कार्यक्रम को सञ्चालन अदब के सचिव मोहम्मद मुस्तफा अहसन कुरैशीने  किया था ।

सैयद् असफाक रसूल हाशमी का शेर ः–
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उमरे दराज गुजरेगी बस इन्तेजार में
    मुझसा न ढूढ पावोगें तुम इस दयार में
आते है, आ रहे है, अब आयेंगे वह जरुर
    ताकता रहा मैं राहों को फसले वहार में
जुल्फों के पेचों खग को तेरे किस से क्या कहूँ
होती कहा यह वात है लैलो नहर में
साये से कया गरज है तेरी धूप चाहिये
काटूँगा उमर सारी इसी रेगजार में
रुसवाईयों के डर से मैं बचता रहा मगर
दामन को दागदार किया इशतिहार में
मरने के बाद रुह भी प्यासी मेरी रही
ऐ काश मौत आती मुझे कूवें यार में
शर्मिनदगी के किस्सों को सैयद् से पूछ मत
लाके खडा किया है उसे किस कतार में

अवधीे सा“स्कृतिक विकास परिषद् बा“केका अध्यक्ष सच्चिदानन्द चौवद्वारा प्रस्तुत शैर…………
मेरे यार लौट आवोगे तुम फिर से प्यार में
मुझसा न ढूढ पावोगे तुम इस दयार में
इन झील सी आँखोंमें, सूरत तेरी वसी
दिन रात कट रहे हैं तेरे इन्तजार में
काली घटाओं जैसे गेसू विखर रहे
ए नाग वनके डस रहे विष की फुहार में
वरसात की ए रात अव काटे नही कटती
कैसे सवर करुँ अवा पुरवा वयार में
यारी को मेरी लागी किस्की बुरी नजर
नफरत की आग भर दिया कोइ मेरें यार में
खाई थी कसमें हमने ना साथ छोडेगें
कयों छोडकर गए, हमें तुम वीच धार में
आखिर वखत में यारा आवोगे त्म नजर
अश्को के चार फूल चढाना मजार में
सोचा था हम रहेगें हिल मिलके साथ में
आनन्द सारा मिट गया आपसकीरार में

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