गृहमंत्री के रूप में निधि की चुनौतियाँँ

कुमार सच्चिदानन्द
राजनैतिक रूप से नेपाल अभी भी संक्रमणकाल के दौर से गुजर रहा है । यह सच है कि सैद्धान्तिक रूप से यह एक प्रजातांत्रिक–संघीय–गणतंत्रात्मक राष्ट्र के रूप में स्थापित हो चुका है लेकिन अगर सूक्ष्म तौर पर देखा जाए तो मौजूदा समय नेपाली राजनीति के केंचुल फेरने का समय है । ऐसा इसलिए कि मधेश आन्दोलन से पूर्व एक अच्छा मंत्रालय मधेश का सपना हुआ करता था । यह सच है कि मधेश आन्दोलन के बाद मधेशी दलों के अस्तित्व में आने के बाद महत्वपूर्ण मंत्रालयों पर समय–समय पर मधेशी दलों के नेताओं का कब्जा रहा है और इस कड़ी में राष्ट्रीय दलों ने भी कभी–कभी मधेश के चेहरों को महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार दिया है । लेकिन मुख्यधारा के राजनैतिक दलों में इस दृष्टि से एक तरह की वर्जना की ही स्थिति रही है । शायद नेपाल के प्रजातांत्रिक इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि किसी राष्ट्रीय दल ने किसी मधेशपुत्र को गृहमंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण पद दिया । नेकपा माओवादी केन्द्र और नेपाली काँग्रेस के गठबंधन की मौजूदा प्रचण्ड सरकार में श्री विमलेन्द्र निधि देश के उपप्रधान और गृहमंत्री बने ।

इसे किसी दल या किसी नेता की कृपा मात्र नहीं माना जा सकता क्योंकि नेपाली काँग्रेस में श्री निधि के योगदान के सम्बन्ध में किसी को असहमति नहीं हो सकती । राजनीति की दृष्टि से समृद्ध पारिवारिक परम्परा भी उनके साथ है । लेकिन ऐसे समय में उन्हें यह दायित्व दिया गया है जब मधेश किसी भी क्षण सुलगने की अवस्था में है । इसलिए गृहमंत्री के रूप में उनकी सबसे बड़ी चुनौती है—मधेश की समस्याओं के सकारात्मक समाधान का प्रयास और इसके लिए निरन्तर क्रियाशीलता तथा समग्र रूप में स्थिति को ऐसी जगह पहुँचाना जहाँ से उनके व्यक्तित्व की भी रक्षा हो और मधेशी जनता की अपेक्षाओं पर भी वे खड़ा उतर सकें क्योंकि उनके राजनैतिक जीवन का आधार भी मधेश ही है और जनकपुर जैसी संवेदनशील जगह भी ।
यह सच है कि सरकार प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने सत्ता की बागडोर सँभालते ही अपने दोनो पड़ोसियों के साथ सम्बन्धों को महत्वपूर्ण मानते हुए उसे संतुलित रखने के निमित्त अपने दोनों पड़ोसियों–चीन और भारत में दो विशेष दूतों, क्रमशः कृष्ण बहादुर महरा और विमलेन्द्र निधि को भेजा । प्रधानमंत्री के विशेष दूत के रूप श्री निधि का भारत भेजा जाना एक तरह से उनके व्यक्तित्व की महत्ता को स्थापित करता है । लेकिन उन्हें इस बात के प्रति भी सावधान रहना होगा कि कहीं सरकार उनका उपयोग न कर ले । यह सच है कि भारत के साथ कूटनैतिक सम्बन्ध पिछली सरकार के समय इतना बिगड़ा कि नेपाल की ओर से एक पक्षीय रूप में वाक् आक्रमण चलता रहा । यह सच है कि भारत की सरकार या उसके निकायों ने नीतिगत रूप में जबाबी कार्रवाई तो नहीं की मगर इन शब्द वाणों से दोनों देशों के परम्परागत सम्बन्धों का हृदय तो किसी न किसी रूप में घायल हुआ ही । इसलिए इसे मरहम लगाने के लिए देश के अन्दर श्री निधि को ऐसी स्थिति उत्पन्न करनी होगी जिससे एक विश्वास का माहौल उत्पन्न हो और जिन कारणों से दोनों सरकारों के बीच सम्बन्ध तल्ख हुए हैं, उन घावों पर मरहम लग सके तथा सम्बन्ध सहजता के मार्ग पर अग्रसर हो ।
गृहमंत्री के रूप में आज नेपाल की सरकरार ने श्री निधि के प्रति जो विश्वास व्यक्त किया है उसमें सबसे महत्वपूर्ण है उनका नेपाली काँग्रेस का समर्पित कार्यकर्ता होना । अनेक चरणों में हुए मधेश आन्दोलन में मधेश के मुद्दों के प्रति उनकी तटस्थता और लगभग एक दशक के संघर्ष में इन मुद्दों पर उनकी बिल्कुल खामोशी । एक समय ऐसा भी आया था कि मधेश को जलता देखकर अनेक नेताओं ने या तो राष्ट्रीय दलों को छोड़कर मधेश के दलों में शामिल हुए या मधेश आधारित नया दल ही बनाया । लेकिन श्री निधि इन झंझावातों के प्रभाव से पूरी तरह निर्लिप्त रहे और पार्टी के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता के रूप में स्वयं को सिद्ध किया । आन्दोलन और संघर्ष की इस लम्बी यात्रा में ऐसे भी नेता रहे जो अपने–अपने दलों के अन्दर ही रहकर मधेश के मुद्दों के प्रति आवाज बुलन्द किया और उसे न्याय देने की बात कही ।

इसके कारण ऐसे लोग पार्टी तथा विभेद के पोषक विचारधारा के लोगों द्वारा आलोचित भी हुए । लेकिन निधि ने यहाँ भी स्वयं को बेदाग रखा । राष्ट्रीय दलों के कुछ ऐसे भी नेता हैं कि विगत संविधान को विभेदमूलक मानकर इस पर संविधानसभा के सदस्य के रूप में अपने हस्ताक्षर नहीं किए । लेकिन निधि यहाँ भी पाक–साफ रहे । इसे एक तरह से उनकी साधना ही मानी जा सकती है कि मधेश की धरती से जुड़े होने के बाजजूद इतने चढ़ाव–उतारों में भी वे स्वयं में विचलन नहीं आने दिया । इसलिए आज जो सम्मान और दायित्व उन्हें मिला है उसे इसी साधना का पुरस्कार माना जा सकता है । लेकिन इन सबके बावजूद परदे के पीछे का सच यह है कि वे मधेशी हैं और मधेश वर्तमान समय में देश की सबसे बड़ी राजनैतिक समस्या है । श्री निधि को गृहमंत्री के रूप में नियुक्त कर सरकार ने एक तरह से मधेश के प्रति विश्वास का वातावरण भी पैदा करने का प्रयास किया है ।
आज गृहमंत्री के रूप में श्री निधि के सामने सबसे बड़ी चुनौती देश के तथाकथित राष्ट्रवादी विचारधारा और मधेश की संवेदना के बीच संतुलन साधने की है । क्योंकि यह राष्ट्रवादी समाज कभी नहीं यह स्वीकार करना चाहता है कि मधेश के किसी भी नेता में राष्ट्रीयता का अंकुर भी बचा है । उनकी दृष्टि में आदर्श मधेशी वह है जा मधेशी होकर भी मधेश की संवेदनाओं के विपरीत बात करता है । समय गुजर चुका है और सबने देखा है कि राष्ट्रपति बनने से पूर्व डॉ.रामवरण यादव मधेश विरोधी नेता के रूप में जाने जाते थे और राष्ट्रपति बनने के बाद भी उनके कार्यकाल की समाप्ति के कुछ दिनों पूर्व तक उनकी इस छवि में कोई खास सुधार नहीं हुआ था ।

लेकिन राष्ट्रवादी विचारधारा ने उनके राजनीतिक चिंतन को उच्च भावभूमि दी और उन्हें आदर्श मधेशी नेता माना । लेकिन वर्तमान संविधान के मसौदे में जब उन्होंने विभेद का उत्कर्ष देखा, खामियों की पराकाष्ठा देखी तो मुखर हुए और इतना मुखर हुए कि उनके प्रशंसक उनकी तीव्र आलोचना करने से भी नहीं चूके । वैसे, आलोचना और समालोचना तो राजनीति में होती ही रहती है । लेकिन तथ्य यह है कि महाभारत का युयुत्स धर्म का साथ देकर भी महाभारत का आदर्श पात्र नहीं बन सका क्योंकि उसने कुल का साथ नहीं दिया था । डॉ. यादव तो राष्ट्रपति बन चुके थे और राजनीति तथा अवसर के दरवाजे तो उनके लिए बन्द हो चुके थे । इसलिए उनकी तथाकथित उलटबयानी को अर्थहीन भी माना जा सकता है लेकिन श्री निधि सक्रिय राजनीति में हैं और उन्हें लम्बी यात्रा तय करनी है । इसलिए देखना है कि वे संतुलन कैसे कायम रख पाते हैं ।
नेपाल के राजनैतिक मनोविज्ञान को कुछ अजूबा इसलिए माना जा सकता है कि एक ही तरह के कामकाज को यहाँ दो रंगों के चश्मे से देखा जाता है । एक ही तरह का काम अगर दो राष्ट्रीय दल या नेता करते हैं तो दोनों के देखने का नजरिया अलग होता है ।

एक को राष्ट्रवाद के चश्मे से देखा जाता है और वही काम कोई अन्य दल या मधेशी नेताओं के द्वारा किया जाता है तो उसे राष्ट्रघात के मुद्दे से जोड़कर देखा जाता है । गौरतलब है कि विगत सरकार के साथ संविधान प्रति नैतिक समर्थन के मुद्दे पर भारत के साथ जो अन्तर्विरोध उत्पन्न हुआ उसके शमन के लिए प्रधानमंत्री के विशेष दूत के रूप में श्री प्रदीप ज्ञवाली ने जब भारत की यात्रा की और संविधान लागू होने के बाद लम्बी अवधि तक वीरगंज का नाका बन्द रहा तथा देश में उपभोक्ता वस्तुओं की भारी किल्लत रही तो इस समस्या के समाधान के लिए विदेशमंत्री के रूप में श्री कमल थापा ने अनेक बार भारत की यात्रा की तो इसका मूल्यांकन राष्ट्रवादी चश्मे से किया गया । लेकिन नई सरकार के गठन के बाद भारत–नेपाल सम्बन्धों को सही गति और दिशा देने के लिए प्रधानमंत्री के विशेषदूत के रूप में जब श्री निधि ने भारत की यात्रा की तो उसे राष्ट्रघाती चश्मे से देखा जा रहा है और उनपर विरोधियों का लगातार आक्रमण भी जारी है ।

जबकि यह भी सच है कि लगभग समान समय में समान एजेण्डे के साथ कृष्ण बहादुर महरा ने भी चीन की यात्रा की । लेकिन उनकी इस यात्रा के सम्बन्ध में समाचार के सिवा न तो कहीं चर्चा है और न कोई विवाद । बात साफ है कि नजरिया बीमार है और इसी का खामियाजा है कि देश लगातार राजनैतिक द्वन्द्व में फँसा हुआ है ।
आज संविधान के जो मुद्दे विवादास्पद हैं और जहाँ सुधार किया जाना अपेक्षित है, अगर इन सुधारों के प्रति वे सकारात्मक रूप से क्रियाशील होते हैं तो उनकी आलोचना होगी और अमर्यादित वचनों से भी संचार माध्यम तथा सामाजिक संजाल भरे जाएँगे लेकिन इन सबको झेलते हुए आगे बढ़ना उनकी सबसे बड़ी चुनौती होगी । हाल ही में भीम रावल और उनके बीच का जो विवाद समाचार जगत में सुर्खियाँ बटोरा उसका कारण और मनोविज्ञान यही है । इस देश में राजनीति करने वाले कुछ लोग तो निश्चय ही ऐसे हैं कि जो स्वयं को राष्ट्र और राष्ट्रीयता का जिन्दा मिसाल मानते हैं । उनकी नजर में हर वह चीज अराष्ट्रीय है जिनमें उनकी सहमति नहीं है ।

हर दल के कुछ नेता इस मानसिकता से पीड़ित है और यहाँ के संचार माध्यमों में यह रोग और भी गहरा है । लेकिन अच्छी बात यह है कि मौजूदा सरकार में सहभागिता दे रहे दोनों दल आज चाहे परिस्थिति जो भी हो इन मुद्दों पर थोड़ा उदार हुए हैं । हाँ, उनके अग्रगामी कदमों कदमों को मंजिल तक पहुँचने में सबसे बड़ा अवरोधक नेकपा एमाले और इसके कुछ अतिवादी नेता हैं । बात साफ है कि जिन मुद्दों पर विगत सरकार को मुँह की खानी पड़ी वे मुद्दे बाद की सरकार के द्वारा सबोधित हो, ऐसा वह कभी नहीं चाहेगा । ऐसी परिस्थिति में उनकी भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण है जब संविधान संशोधन के लिए आवश्यक आँकड़ा उनके बिना पूरा नहीं हो सकता । लेकिन यह भी सच है कि जिस संविधान को उन्होंने विश्व का सबसे अच्छा संविधान बताया उसका कार्यान्वयन उनकी हठधर्मिता के कारण संभव नहीं हो सकेगा । इसलिए इसे जीवन देने के लिए सरकार अगर कोई अतिवादी कदम उठाती है तो ऐसे में गृहमंत्री के रूप में श्री निधि की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाएगी । यही वह स्थल है जहाँ वे स्वयं को सिद्ध कर सकते हैं और राष्ट्र के समक्ष यह संदेश दे सकते हैं कि उनकी राजनीति का मुकाम महज गृहमंत्री बनकर रह जाना मात्र नहीं बल्कि इससे आगे भी कुछ है ।
इस बात के प्रति भी सचेत रहना आवश्यक है कि सरकारें अगर किसी आन्दोलन का दमन करना चाहती है तो समस्त दमनात्मक संयन्त्र का मुखिया उसी वर्ग के लोगों को बनाया जाता है जो वर्ग आन्दोलनरत होता है । उदाहरण के तौर पर भारत के पंजाब प्रान्त का उल्लेख किया जा सकता है, जहाँ खालिस्तान–आन्दोलन और आतंकवादी कार्रवाइयों को कुचलने के लिए वहाँ का पुलिस महानिरीक्षक सिक्ख को ही बनाया गया था और यह मिशन सफल भी हुआ था । लेकिन परिस्थिति में अन्तर यह है कि वह पूरी तरह अलगाववादी और आतंकवादी आन्दोलन था जिसमें निरीह जनता पिस रही थी । लेकिन मधेश की अवस्था अलग है । यहाँ की माँग पूरी तरह राजनैतिक है और यदा–कदा जो अलगाव के शब्द सुने जाते हैं वह अपनी उपेक्षा की एक प्रतिक्रिया मात्र है । लेकिन स्थानीय चुनावों का मामला एक टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है । क्योंकि संविधान की कुछ धाराओं का संशोधन और संघीयता का स्पष्ट खाका के बिना मधेश स्थानीय निकायों के चुनाव का औचित्य नहीं मानता और सरकार नवनिर्मित संविधान के कार्यान्वयन की दिशा में इसे पहला कदम मान रही है । टकराव की इस जमीन पर गृह मंत्रालय के मुखिया के रूप में श्री निधि का कामकाज उनके लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगी ।
एक बात तो निश्चित है कि राष्ट्रीय दलों से मंत्री बनने की संभावना मात्र से मधेश के नेताओं की भाषा और वेश–भूषा परिवर्तित होने लगती है । लेकिन विमलेन्दु निधि इस दृष्टिकोण से थोड़ा अलग हैं क्योंकि यह अवसर उनके लिए पहला नहीं है । दरअसल इस तरह का परिवर्तन एक तरह की समझौतापरस्ती है और वैचारिक गुलामी का प्रतीक भी । इस मानसिकता के द्वारा मौलिकता का संदेश नहीं ही दिया जा सकता । सच है कि गृह मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय उन्हें मिला है, लेकिन उनके भेष बदले नहीं हैं । इससे यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे संविधान के नीतिगत मुद्दों के संशोधन के साथ–साथ संघीयता और स्थानीय चुनावों के संदर्भ में सरकार और मधेश की संवेदना के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करेंगे । एक बात तय है नेपाली काँग्रेस जैसी पार्टी जिसका प्रमुख जनाधार कभी मधेश रहा है, अगर मधेश के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करती है तो राष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर उसका दबदबा बढ़ सकता है । उसकी इस यात्रा का नायक निश्चित ही विमलेन्दु निधि हो सकते हैं क्योंकि उनके पास अभी अवसर है । लेकिन इसके लिए उन्हें दल के भीतर और बाहर के उन अतिवादी विचारों से लड़ना होगा जिसकी तीव्र प्रतिक्रिया मधेश में होती है ।

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