गृहमंत्री विमलेन्द्र निधि की भारत यात्रा एमाले के निशाने पर : श्वेता दीप्ति

आज प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गयी बैठक में एमाले का जो रूप प्रस्तुत हुआ है, वह तो होना ही था क्योंकि उनसे सद्भाव या सहमति की अपेक्षा तो नासमझी ही होगी । न तो पहले एमाले की मंशा मधेश के पक्ष में थी और न आज ही है ।


एमाले की ओर से सहभागी भीम रावल बैठक में उग्र रूप में प्रस्तुत हुए हैं और विरोध का माद्दा एक बार फिर भारत के परिप्रेक्ष्य में ही था । गृहमंत्री विमलेन्द्र निधि की भारत यात्रा उनके निशाने पर थी । उनका विरोध एक बार फिर राष्ट्रीयता के साए में ही था ।


एमाले जब सत्ता में थी तो विदेश मंत्री कमल थापा एक दो बार नहीं, चार बार इसी विषय पर भारत यात्रा कर चुके हैं और सुषमा स्वराज को रोडमैप भी दे चुके हैं ।


यह भी शायद एमाले भूल चुकी है कि संविधान जारी करने से दो दिन पहले एमाले नेता प्रदीप ज्ञवाली ने भी भारत की यात्रा तय की थी ।bimlendra-bim-rawal

श्वेता दीप्ति, काठमांडू ,३० अगस्त | संविधान संशोधन का दावा कहीं मृगतृष्णा तो साबित होने वाला नहीं है ? माओवादी के सत्ता में आने के बाद आज पहली बार प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने तीन दलों की बैठक बुलाई । मुख्य विषय था संविधान संशोधन पर चर्चा और उसके लिए पहल ।

देखा जाय तो संविधान संशोधन की बात कोई नया विषय नहीं है । जिस दिन से विश्व का सर्वोत्कृष्ट संविधान देश ने पाया है, उसी दिन से इसे विशिष्ट साबित करने की कोशिश और विशिष्ट संविधान के संशोधन की बात सामने आती रही है । जिस वातावरण में संविधान का मसौदा तय हुआ और इसे जारी किया गया, वह समय इतिहास में संविधान निर्माण होने की अपेक्षा, देश के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से में हुए रक्तपात के लिए ज्यादा याद किया जाएगा । सत्ता का मद, बहुमत का नशा सर चढ़कर बोल रहा था । मधेश की मिट्टी भूली नहीं है कि देश के एक हिस्से की उपस्थिति को कैसे वर्तमान सरकार ने बिल्कुल दरकिनार कर दिया था । अतीत में जो हुआ उसमें काँग्रेस की सरकार, एमाले की सरकार और अब माओवादी की सरकार ये तीनों कल भी शामिल थे और आज भी हैं सिर्फ भुमिकाएँ बदली हैं । आज भी मधेश की समस्या अपनी जगह कायम है । असमंजस का दौर आज भी अपनी जगह ही है । पहले भी यह कहा जा चुका है कि जिस संविधान संशोधन का आश्वासन मधेशी दलों को देकर, माओवादी सत्ता पर काबिज हुआ है वह इतना आसान नहीं है ।

आज प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गयी बैठक में एमाले का जो रूप प्रस्तुत हुआ है, वह तो होना ही था क्योंकि उनसे सद्भाव या सहमति की अपेक्षा तो नासमझी ही होगी । न तो पहले एमाले की मंशा मधेश के पक्ष में थी और न आज ही है । संघीयता का विरोध वो कर चुके हैं ऐसे में संविधान संशोधन की बात पर उनका सहर्षता से सहमत हो जाना सम्भव ही नहीं है । एमाले की ओर से सहभागी भीम रावल बैठक में उग्र रूप में प्रस्तुत हुए हैं और विरोध का माद्दा एक बार फिर भारत के परिप्रेक्ष्य में ही था । गृहमंत्री विमलेन्द्र निधि की भारत यात्रा उनके निशाने पर थी । उनका विरोध एक बार फिर राष्ट्रीयता के साए में ही था । उन्हें अब तक यह पता नहीं है कि संविधान संशोधन किस के लिए और क्यों किया जाना चाहिए ? कितनी अजीब बात है कि इन्हें आज भी देश का एक हिस्सा याद नहीं है । वैसे भी पूर्व प्रधानमंत्री की निगाह में वहाँ की जनता का कोई मोल नहीं है यह तो जाहिर बात थी । किन्तु आज भी एमाले की ओर से ऐसा वक्तव्य आना इनकी किस सोच को दर्शा रहा है । क्या इनकी राजनीत के पटल पर सिर्फ पहाड़ अंकित है और ये इसी के बल पर राजनीति करना चाह रहे हैं ? वैसे एमाले भी दो खेमें में बँट चुकी है । एक पक्ष है जो अपनी पूर्व सोच पर कायम रहना चाह रहा है और दूसरा पक्ष है जो समय की नजाकत को समझ कर लचीलापन अपनाना चाह रहा है और शायद एक राजनीतिज्ञ के रूप में उनकी यह सोच परिपक्वता की निशानी ही होगी । क्योंकि केन्द्रीय दल पर कायम रहना है तो देश के हर हिस्से के मर्म को समझना ही बुद्धिमानी होगी ।

आज की बैठक में गृहमंत्री की भारत यात्रा पर निशाना साधते हुए भीमरावल का कहना था कि माओवादी की सरकार आन्तरिक मामले में विदेशियों के साथ विचार विमर्श कर रही है । शायद उन्हें अंदेशा नहीं है कि जिस मसले को आन्तरिक मामला कहा जा रहा है, वो तो उस वक्त ही विश्वव्यापी हो गई थी, जिस दिन धड़ल्ले से मधेशियों का खून बहाया जा रहा था । खैर, ये तो अलग मसला है किन्तु, आज जो आरोप एमाले की ओर से पूर्व गृहमंत्री भीमरावल लगा रहे हैं, क्या सचमुच इसका कोई ठोस आधार है एमाले के पास ? क्या भीमरावल एमाले के कार्यकाल में हुई सभी यात्राओं को भूल गए हैं ? एमाले जब सत्ता में थी तो विदेश मंत्री कमल थापा एक दो बार नहीं, चार बार इसी विषय पर भारत यात्रा कर चुके हैं और सुषमा स्वराज को रोडमैप भी दे चुके हैं । स्वयं पूर्व प्रधानमंत्री ओली ने दिल्ली फोन कर के इसकी जानकारी दी थी और अपनी भारत यात्रा से पहले संविधान संशोधन का दिखावा भी किया और भ्रमण के दौरान इस विषय पर स्पष्टोक्ति भी दे चुके हैं । यह भी शायद एमाले भूल चुकी है कि संविधान जारी करने से दो दिन पहले एमाले नेता प्रदीप ज्ञवाली ने भी भारत की यात्रा तय की थी । राष्ट्रीयता का नारा देकर एमाले ने जिस तरह जनता को दिग्भ्रमित किया और अपने पक्ष में हवा चलाई यह तो सबने देखा, किन्तु उस हवा में भी उनकी सरकार द्वारा की गई भारत यात्रा को नजरअंदाज तो नहीं किया जा सकता है । फिर आज यह बवाल क्यों ? गृहमंत्री विमलेन्द्र निधि पर आरोप लगाने की क्या वजह हो सकती है ? सीधी तरह अगर देखा जाय तो यह भी उसी राष्ट्रीयता की नीति का ही हिस्सा है क्योंकि यही एक भावना है जिसे जिन्दा रखकर एमाले अपनी स्थिति को मजबूत रखना चाह रही है पर यह उनकी मृग मरीचिका ही साबित होगी क्योंकि इसमें स्थायित्तव तो बिल्कुल नहीं है ।

खैर, वर्तमान सरकार ने आज एक पहल तो अवश्य की किन्तु उनकी ओर से अब तक संविधान संशोधन का कोई स्पष्ट आधार सामने नहीं आ रहा है । किस मुद्दे को कैसे सुलझाया जाएगा इस पर कोई नीति नहीं बन पाई है । तो क्या संविधान कार्यान्वयन की बात अटकी रह जाएगी ? यह तो तय है कि माकूल संविधान संशोधन ही मधेश को सम्बोधित कर पाएगा, संविधान संशोधन का दिखावा नहीं । किन्तु आज जो रुख एमाले का सामने आया है यह संविधान संशोधन को सहज होने नही. देगा । ऐसे में सरकार की क्या नीति होगी ? फिलहाल यह अस्पष्ट है । वैसे प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने सद्भावना अध्यक्ष राजेन्द्र महतो को यह आश्वासन दिया है कि संविधान में अपेक्षित संशोधन होकर रहेगा । पर यक्ष प्रश्न यही है कि कैसे ? संविधान संशोधन नहीं होगा तो कार्यान्वयन का सवाल ही नहीं है और इस स्थिति में चुनाव की चर्चा तो बेमानी ही होगी ।

 

 

 

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