गोर्खा साम्राज्य और प्रलेस

गोपाल ठाकुर,काठमांडू,अप्रिल ७, २०१६|

मानव समाज अपने निर्माणकाल से लेकर आज तक अपनी समृद्धि की ओर बढ़ता आ रहा है । इस दौरान उसे अनेक लड़ाइयाँ लड़नी पड़ी । पहले तो उसने प्रकृति प्रदत्त हर ज्ञेय श्रोत को किसी न किसी अलौकिक शक्ति का वर्दान समझकर उन वर्दान दाताओं की स्तुति की परंपरा बनाई । किंतु वह वहीं बैठा नहीं रहा । जाने अनजाने उसने प्रकृति से संघर्ष भी शुरू किया । जब पारिवारिक बंधन मजबूत होता गया, जन और गण से जातियाँ बनती गईं, निजी संपत्ति संचय का दौर आया और राष्ट्र बनता गया; उसका संघर्ष विपन्नता और संपन्नता के बीच केंद्रित हुआ जिसके दौरान बहुत विशालकाय साम्राज्यों का गठन और विघटन का दौर भी आगे बढ़ा । पहले तो ये साम्राज्य सामंती विरासत में बनते बिगड़ते थे बाद में पुँजीवादी विरासत में भी बनना बिगड़ना शुरू हुआ जिस कलंक को हम अभी तक किसी न किसी रूप में ढो रहे हैं । इस कलंक को ढोने के लिए हम खुद के जिम्मेदार हैं, इसलिए कि अपनी विपन्नता के समय हम जिस प्रगति और प्रगतिशीलता या प्रगतिवाद की बात करते हैं, थोड़ी संपन्नता हासिल होने के बाद खूद पश्चगमन में फँस जाते हैं ।sm-2

हमारी पूर्वीय विरासत में भी इन कारणों पर चिंतन शुरू हुआ था । एक तरफ आध्यात्मिक शास्त्रीयता को कल्याणकारी बताया जा रहा था तो दूसरी ओर लोकायत दर्शन का भी प्रादुर्भाव हुआ । कुछ लोग दोनों के बीच समन्वय के प्रयास में भी लगे थे । यानी भौतिकता की बात करते हुए यांत्रिकता में पहुँचकर पुनः अध्यात्म में पहुँचना उनकी नियति होती थी । निश्चित रूप से जब से मार्क्स ने द्वंद्ववाद और भौतिकवाद का सही व्यवस्थापन कर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का प्रतिपादन किया और मानव इतिहास की विवेचना और बदलाव की दिशा में उसके प्रयोग को ऐतिहासिक भौतिकवाद की संज्ञा दी, इस दिशा में सांस्कृतिक रूपांतरण के लिए काम करनेवालों ने इसे प्रगतिवाद का नाम दिया ।

प्रगतिवाद के लिए पहले प्रगतिशीलता जरूरी होती है । यह वह चरण है जहाँ रूढ मान्यताओं की जड़ तक ना पहुँचते हुए सांदर्भिकता से दूर जा चुकी ऐसी मान्यताओं के खिलाफ लोग वैचारिक संघर्ष चलाना शुरू करते हैं । यह यात्रा अगर अवरुद्ध न हुई तो निश्चित रूप से द्वंद्वात्मक भौतिकवादियों के सान्निध्य में प्रगतिवाद को अख्तियार करती है और अंततः राज्यविहीन विश्व बनाने के लक्ष्य की ओर अग्रसर होती है ।

इसी मान्यता के अनुसार १९ वीं शदी से प्रगतिवादियों की अगुवाई में प्रगतिशील चिंतकों को इकट्ठा करने के लिए लेखक, चिंतक, स्रष्टा और द्रष्टाओं को सम्मिलित कर प्रगतिशील लेखक संघ बनाने की एक परंपरा चली थी । कहीं कहीं तो इसमें आम प्रगतिशील संस्कृतिकर्मी भी शामिल थे । किंतु जब विश्व की पहली समाजवादी सत्ता सोभियत संघ में ख्रुश्चोभ का उदय हुआ, इस आंदोलन को भी गहरा धक्का लगा । इसके बाद विश्वव्यापी रूप में साम्यवादियों में विखराव देखा गया जिसके परिणाम स्वरूप संस्कृतिकर्मियों का यह जत्था भी विभाजित होना शुरू हुआ ।

आइए, नेपाल के बारे में कुछ बात करें । १९५२ में प्रगतिवादी चिंतक श्यामप्रसाद शर्मा के नेतृत्व में वीरगंज में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई । इसकी अब तक की विशेषता यह रही कि विश्व साम्यवादी आंदोलन को भले टूट-फूट से लेकर बहुत जगहों पर अवसान भी झेलना पड़ा हो, नेपाल में प्रतिबंध को झेलते हुए अब तक इस संगठन को आम रूप से सभी प्रगतिशील चिंतकों का संगठन माना जाता रहा है । इसने अपने नौं राष्ट्रीय सम्मेलन कर चुका है और दसवाँ भी कल-पड़सों में होना तय है । फर्क अब ये है कि इसके बाद यह अपना सांझापन गँवाने जा रहा है । इसका कारण है इसके नेतृत्व में खस-गोर्खाली सामन्ती साम्राज्यवादी वर्चश्व ।

निश्चित रूप से बेलायती साम्राज्यवाद और गोर्खा राज्य विस्तार अभियान के बीच की टक्कर और भाइचारे में एक निश्चित भूगोल को नेपाल नाम दिया गया, हमारा इतिहास साक्षी है । यहाँ की राजशाही पूरे नेपाल को अपनी जागीर समझती थी और सभी विजित राष्ट्रीयताओं को विजेता गोर्खा राष्ट्र का दास मानती थी । खासकर मधेश की दशा तो इतनी दुर्दांत रही जिसके बारे में इस स्तंभकार ने पहले भी कुछ हद तक बता चुका है ।

यह सुखद अनुभव है कि हम आज संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र, नेपाल के नागरिक बताये जा रहे हैं । किंतु नेपाल में संघीयता की जननी मधेश है जिसे इसकी लड़ाई इसलिए लड़नी पड़ी थी कि यहाँ सिर्फ और सिर्फ गोर्खाली राष्ट्रीयता को ही नेपाली माना जाता था । इसकी वजह से हमारे पूर्वजों को अपने ही देश की राजधानी जाने के लिए भी कुछ दशक पहले तक राहदानी यानी पासपोर्ट लेना पड़ता था जिस पर भिमफेदी में भिसा लगाया जाता था । नेपाल और नेपालीत्व का सृजन भी आज से केवल ८२ वर्ष पूर्व हुआ है । इससे पहले तक तो नेपाल के आधिकारिक दस्तावेजों में इसे गोर्खा राज्य ही लिखा जाता था और राज्य का आधिकारिक कामकाज गोर्खा सरकार के नाम से ही होता था । निश्चित रूप से हम वर्गीय शोषण तो फेंकना ही चाहते थे जिसके लिए मधेश में पिछली शदी के उत्तरार्ध में भीषण किसान आंदोलन भी हुए । किंतु जब तक हम पर राष्ट्रीय उत्पीड़न बना रहेगा, हम वर्गीय शोषण से भी मुक्त नहीं हो सकते । इसके बावजूद मधेशी सहित कुछ जनजातियों को राजशाही ने तो नेपाली माना ही नहीं, यही बिमारी यहाँ की कथित राष्ट्रीय दलों में भी देखा गया । परिणामतः सभी का सांझा नेपाल बनाने के पुनित उद्देश्य से मधेश ने संघीयता के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष छेड़ा जिसके दौरान ४ दर्जन से अधिक लोग शहीद हुए । इस बलिदानी के बाद ही नेपाल को संवैधानिक रूप से संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र घोषित किया गया । किंतु इन गोर्खालियों ने बड़ी चतुराई से पहली संविधान सभा का विघटन कर दिया और दूसरी संविधान सभा में राज्यशक्ति की चरम दुरुपयोग के बल पर संघीयता विरोधियों का बहुमत हासिल किया ।

परिणाम हमारे सामने है, संविधान घोषणा के पहले से ही मधेश आंदोलन में है । सुशील कोइराला और केपी ओली यहाँ की सरकार का बागडोर संभालते हुए करीब ४ दर्जन से अधिक मधेशियों को फिर से ढेर कर चुके हैं । किंतु ऐसे भीषण मधेश आंदोलन के बावजूद अपने फर्जी बहुमत के बल पर गोर्खालियों ने नये संविधान जारी किए । ऐसे प्रतिगामी संविधान के खिलाफ कम से कम प्रगतिशील लेखक संघ को संघर्ष में आना चाहिए था लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत । जिस तरह यहाँ की राजशाही अंध भारत-विरोध को राष्ट्रवाद का जामा पहनाती थी, आज की सरकार में शामिल राजतंत्रवादी राप्रपा नेपाल और पुँजीवादी नेपाली काँग्रेस सहित खस-गोर्खाली नेतृत्व में दूसरी संविधान सभा/व्यवस्थापिका-संसद में पहुँची सभी कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी उसी भारत-विरोधी खस-गोर्खाली साम्राज्यवादी मानसिकता को राष्ट्रवाद की संज्ञा दी है और प्रलेस भी खूद इनका ही पल्लू पकड़े खड़ा है ।

सिर्फ इतना ही नहीं, खस-गोर्खाली वर्चश्व में अब तक कैद सभी सरकारी-गैरसरकारी प्राज्ञिक संस्थाओं की नेतृत्व मंडली ने भी प्रलेस के साथ अन्ध भारत विरोध को ही मधेश आंदोलन के दौरान राष्ट्रवाद मानते हुए केवल सड़क पर ही नहीं आए, काठमांडू स्थित भारतीय राजदूतावास में धर्ना भी दिए । इसके साथ साथ प्रधानमंत्री केपी ओली अभी प्रलेस के दसवें राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे । तो इस प्रलेस को मधेश सहित इस गोर्खा साम्राज्य की विजित राष्ट्रीयता का कोई भी नागरिक अपनी प्रगतिशील प्रतिनिधि संस्था कैसे मानेगा ? निश्चित रूप से प्रलेस के इस दुःखद अवसान से हम मर्माहत हैं किंतु अपने अस्तित्व से खिलवाड़ करनेवाला किसी भी झंडा या बैनर को कोई स्वीकार करेगा भी तो क्यों और कैसे ?

वाणस्थली, महादेवस्थान-७, काठमांडू ।

 

 

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