ग्रामीण आधी आबादी की तस्वीर : सीमा विश्वकर्मा

सीमा विश्वकर्मा
नेपाल गांवों का देश है जहां ग्रामीण आधी आबादी की दशा अत्यन्त शोचनीय है । ग्रामीण समाज में पुरुष की सत्ता सर्वोपरि होती है । पिछड़े और निम्न वर्ग की स्त्रियां अधिक स्वाधीन हैं । पारिवारिक मामलों में पुरुषों के समान उनके निर्णय मान्य होते हैं । इस पिछड़े और आर्थिक दृष्टि से निम्न वर्ग की स्त्रियां बच्चों की देखरेख तथा गृहकार्य के सञ्चालन के साथ–साथ आर्थिक जिम्मेदारियां भी वहन करती हैं । गांवों में पुरुष और स्त्री दोनों में ही शिक्षा का स्तर काफी नीचा है । पुरुषों के अनुपात में स्त्रियों की शिक्षा निम्नतम है । अशिक्षित होने के कारण ये निम्न वर्गीय ग्रामीण स्त्रियां परम्पराओं को चुनौती देने तथा अपने अधिकारों को प्रभावशाली ढंग से स्थापित कर पाने में अक्षम रहती हैं । स्त्रियों के लिए ऐसे अवसर बहुत ही कम होते हैं, जहां वे स्वतन्त्र और गैर पारम्परिक रूप से आर्थिक स्तर पर अपने पैरों पर खड़ी हो सकें ।
गांवों में महिलाओं को श्रम विभाजन की दृष्टि से निम्न मुख्य रूपों में रखा जा सकता है– कृषक महिलाएं, खेतीहर श्रमिक महिलाएं, दस्तकार महिलाएं आदि । कृषक महिलाओं को पशुओं को चारा ड़ालने के कार्य से लेकर खेतीबाड़ी का कार्य करना पड़ता है । वह सुबह उठ कर पशुओं को चारा डालती है, नाश्ता तैयार करती है और आवश्यकता पड़ने पर पति के साथ खेत में काम करने भी चल पड़ती है । खेतीहर महिलाएं अपने पतियों के साथ सबेरे से ही काम करने निकल जाती हैं । इनका जीवन निश्चय ही बड़ा कठोर होता है । इन्हें पौधे लगाने से लेकर खेत की कटाई तक करनी होती है । शायद कामकाजी महिलाओं में सर्वाधिक श्रम इसी वर्ग की महिलाओं को करना पड़ता है । इस वर्ग में गांवों की पिछड़ी जातियों की महिलाएं गैर कृषक परिवारों की महिलाएं आती हैं । इन्हें पुरुष की अपेक्षा मजदूरी भी कम मिलती है, जबकि काम की दृष्टि से वे पुरुषों से पीछे नहीं रहतीं ।
खेती के काम में जहां खेतीहर श्रमिकों का सहयोग आवश्यक है, वहां दस्तकार भी कुछ कम महत्वपूर्ण नहीं । बरही और लुहार के बिना आखिर हल कौन बना सकता है । हल ही तो किसान का सबसे बड़ा हथियार है । भले ही आज गांवों में टै«क्टर आ गये हों किन्तु हल का प्रयोग आज भी यत्र–तत्र प्रधान उपकरण के रूप में किया जाता है । बरही और लुहार के अतिरिक्त कुम्हार, सुनार आदि जातियों की महिलाएं दस्तकारी के कामों में हाथ बंटाती हैं । इसी प्रकार मुसहर, चमार, धोवी, बांतर, चाई आदि जातियों के लोग दूसरे वर्गों पर निर्भर रहते हैं । डोम व मेहत्तर जाति के लोग कृषक के रूप में काम नहीं करते हैं लेकिन वे दूसरे वर्गों पर निर्भर रहते हैं । डोम जाति की महिलाएं हस्तकला की धनी हैं । ऐसे उत्पादों की गांवों, कस्बों व बाजारों में अच्छी मांग भी है, पर सही मार्गदर्शन और बाजार के अभाव में वे आगे नहीं बढ़ पा रही है । उनका कहना है कि अगर उनके उत्पाद को बाजार मिले तो वे राज्य के विकास में अहम योगदान देने के साथ ही उनकी तस्वीर बदल सकती है ।
सुनसरी, सप्तरी, सिरहा व धनुषा की महिलाएं मुर्गी पालन, अगरवती, जूट के सामान, सतु बनाना, मिथिला पेंटिंग, अचार–पापड़ बनाने के काम में लगी हैं । इन महिलाओं के उत्पाद को मंच नहीं दिया जा रहा है । कभी–कभार छोटे–बड़े मेले का आयोजन होते हैं । बाकी दिनों में जीविका समूह की महिलाओं के उत्पाद का कोई खरीददार नहीं मिलता है । इसके कारण इनका पूर्ण रूप से आर्थिक सशक्तिकरण नहीं हो सका है । इनके साथ अभी बहुत सारी चुनौतियां हैं । वे हैं– बाजार का अभाव, बैंक से लोन मिलने में दिक्कतें, आधुनिक प्रशिक्षण का कोई केन्द्र न होना, सही काउंसिलिंग का अभाव आदि ।
आज शहरी सभ्यता की चकाचौंध से गांव भी नहीं बच सके । कस्बों के आसपास गांवों में महिलाओं की शिक्षा में प्रगति हुई है । फैशन बढ़ा है और साथ ही आय वृद्धि भी । किन्तु कुल मिलाकर स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं कही जा सकती । लोकतन्त्र प्राप्ति के बाद शिक्षा के प्रसार और सामान्य आर्थिक विकास से भी महिलाओं की दशा में कोई सुधार नहीं हो पाया है । थोड़ी आर्थिक समृद्धि आने के साथ ही सामाजिक आदर की मध्यवर्गीय धारणाएं गांवों में स्वीकार की जाने लगी हैं और ये मध्यवर्गीय आचार–विचार जिन सामाजिक मूल्यों की संरचना करते हैं, वे सामाजिक जीवन में महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत सीमित कर देते हैं । परिणामस्वरूप पारम्परिक समाजयवस्था में निम्नवर्गीय महिलाओं को प्राप्त पुरुषों के साथ सामाजिक–आर्थिक बराबरी की हैसियत भी मध्यवर्गीय जीवन दृष्टि के विस्तार के कारक संकुचित होने लगी है । इसलिए गांवों में तात्कालिक आवश्यकता समाजिक उत्तरदायित्व और नागरिक अधिकारों के प्रति सजगता की शिक्षा के प्रसार की है तभी ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक हैसियत में सुधार लाने की उम्मीद की जा सकती है ।
मेहनतकश महिलाओं की स्थिति के बारे में मैं अपने अध्ययन और अनुसन्धान के अनुभवों के आधार पर कह सकती हंूँ कि मेहनत और मजदूरी करनेवाली महिलाएं कायरताजनित मनोवैज्ञानिक कष्ट की शिकार नहीं है । उनकी समस्यायक्ति बनने की हवाई समस्या न होकर इन्सान के रूप में जीने की स्थूल समस्या है । उन्हें कानून का संरक्षण चाहिए । आर्थिक शोषण के साथ–साथ ठेकेदारों और जमींदारों द्वारा उनके शरीर के शोषण की रोकथाम के लिए संसद की बहसें बेकार हैं । महिला वर्ग के नाम पर गोष्ठियां और परिचर्चाएं ढोंग हैं और आदर्शों की दुहाई एक बहुत बड़ा भुलावा । जहां दिन दहाड़े महिलाओं का सामूहिक बलात्कार हो, अपहरण और क्रय–विक्रय हो, वहां महिला का राष्ट्रपति बनना, प्रधानन्यायाधीश और सभामुख बनना किसी सामाजिक क्रान्ति का परिणाम न होकर राजनीतिक परम्परा और समझौते के अतिरिक्त कुछ और नहीं है । जहां सड़क पर अधनंगी सोती और नहाती औरतों की संख्या हजारों में हो, वहां सीता का आदर्श अभिजात वर्ग का पाखंड और स्त्री की मर्यादा की बात एक बहुत बड़ी गाली है । या शायद ये सब बच्चे पैदा करने वाली और गेहूं काटने वाली मशीन हैं, स्त्रियां नहीं । तभी तो टेलीविजन पर इन्हें लेकर पेशेवर बुद्धिजीवी परिचर्चा नहीं करते या अखबारों में लंबे लेख नहीं लिखते । नौकरी पेशा मध्यम या उच्चवर्गीय महिलाओं को लेकर समाजशास्त्रीय अध्ययन होते हैं, शोधग्रंथ छापे जाते हैं पर मेहनतकश औरतों की स्थिति के आंकड़े किसी के पास नहीं । ये कुछ प्रश्न है, जिनकी ओर न केवल समाजशास्त्रियों का ध्यान देना अपेक्षित है अपितु समुचे राष्ट्र को इस दिशा में सोचना है ।
इसके अतिरिक्त समाज के हाशिये पर रहने वाले समूहों के मौलिक अधिकार और उनकी सांस्कृतिक एवं पारंपारिक जरूरतों का भी ध्यान रखे । सरकार की योजनाओं में यह बहुत महत्वपूर्ण बिन्दु होना चाहिए, जो पारंपरिक समूहों की जमीनी सच्चाई से भी जुड़ावे । सरकार उनके विकास की परिभाषा को उनके पारंपरिक सूक्ष्म आदर्श से अलग न करे । इन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए जरूरी है कि इनकी परंपरिक दुविधाओं को समझा जाये और उनका अध्ययन करके उन्हें विकास की डोर से जोड़ा जाये । महिलाओं के नाम से सम्पत्ति अगर होगी, तो महिलाओं की भूमिका प्रमुख दायरे में आएगी और परिवार एवं समाज में उनका आत्मसम्मान बढ़ जाएगा । साथ ही उनका आर्थिक सशक्तिकरण भी होगा । सरकार को अपनी सभी विकास योजनाओं में महिलाओं के सकारात्मक परिणामों को रखना होगा । अगर ये सभी योजनाएं समाज की पिछड़ी आधी आबादी तक पहुँचेगी, तभी समाज में सकारात्मक बदलाव आएगा और प्राकृतिक न्याय का रास्ता खुल पाएगा । तब हम समाज में सामाजिक भेदभाव की जंग की भी समाप्त होता जरूर देख पाएंगे ।

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