घूँघट? पहचान कदापि नहीं, मधेशी महिलाओं के पिछड़ेपन का प्रतीक: श्वेता दीप्ति

ghughat
श्वेता दीप्ति, काठमांडू, २१ नवम्बर | क्या है घूँघट ? हमारी पहचान, हमारी संस्कृति, परम्परा या बाध्यता ? किसने क्या कहा मैं उस ओर नहीं जा रही । किसी ने अपनी पदीय गरिमा का मान नहीं रखा यह उनकी व्यक्तिगत सोच हो सकती है जिसकी भरपूर आलोचना की जा रही है ।
पर इस आलोचना से परे आज अवसर है कि एक बार हमें अपनी यानि मधेशी महिलाओं की स्थितियों की चीर फाड़ अवश्य करनी चाहिए । सम्मान देना वो हमारा संस्कार है, हम हाथ जोड़ते हैं, पैर छूते हैं और सम्मानवश अपने सरों को ढंकते हैं, यह हमारी परम्परा है जिसे जिन्दा रखना और अपनी आने वाली पीढि़यों तक पहुँचना हमारा कर्तव्य है । किन्तु आज जिस घूँघट को हमारी पहचान बताई जा रही है यहाँ मेरा विरोध है । यह हमारी पहचान तो कदापि नहीं है । घूँघट उन विकृतियों से बचने के लिए हम पर लादा गया | जहाँ यह डर था कि कहीं आपका चेहरा आपकी शोषण का कारण न बन जाय ।
बाहर से अधिक घर के पुरुषों से आपको बचाने की कोशिश की गई । क्योंकि अगर अतीत के पन्नों को पलटें तो कई घृणित और विकृति कहानियाँ हमें वहाँ मिल जाएगी । वो अपने ही घरों में शोषित होती थीं और मर्यादाओं के बन्धन में इस कदर जकड़ी होती थीं कि जुबान खोलने की हिम्मत नहीं होती थी । यह दौर वह था जब महिलाएँ घर की चारदीवारियों में होती थीं । बाहर की दुनिया से उनका वास्ता नहीं होता था । शिक्षा उनकी आवश्यकता नहीं थी, घर की जिम्मेदारियाँ उन पर थी और उनकी दुनिया उसके इर्दगिर्द हुआ करती थी । जो निम्न वर्गीय महिलाएँ थीं वो खेतों में काम करती थी जहाँ उन्हें अपने मालिकों से खुद को बचाना होता था जिसके लिए उन्हें घूँघट का सहारा लेना पड़ता था । वक्त बदला और बहुत हद तक सामाजिक व्यवस्था भी किन्तु परम्परा और संस्कृति के नाम पर कई चीजें अपनी जगह कायम हैं । परम्पराएँ और संस्कृति बुरी नहीं होती किन्तु उसमें तर्क के लिए जगह अवश्य रखें । वक्त के साथ परिवेश और व्यवस्था दोनों बदलते हैं । मानिए, कि सर ढंकना और चेहरा छुपाना दोनों दो चीजें हैं एक आपके व्यक्तित्व और शालीनता का प्रतीक है तो दूसरा आपको विभेद का शिकार बनाती है । मधेश की महिलाओं का प्रतीक मुट्ठी भर मधेशी महिलाएँ नहीं कर सकती । आज हमारी बेटियाँ पढ रही हैं किन्तु इमानदारी से सोचिए कि कितने अभिभावक ऐसे हैं जो यह सोचते हैं कि उनकी बेटी समाज सेवा करेगी या नेता बनेगी ? यह और बात है कि कल वो क्या करेंगी यह उनका अपना निर्णय होगा पर वो ऐसी सोच बनाएगी तो एक बार उसे विरोध का सामना करना ही पड़ेगा क्योंकि हमारी मानसिकता अपनी जगह कायम है ।
 आज भी हम कहते हैं कि इस देश की आधी आबादी मधेशियों की है तो उसमें स्वाभाविक है कि मधेशी महिलाएँ भी आती हैं । अब हम खुद क्यों ना आंकलन करें कि हम कहाँ हैं ? जिस मधेशी दलों को हम अपना मानते हैं उसमें ही अगर हम महिलाओं की स्थिति देखें तो एक कड़वा सच आपके सामने होगा । दस में दो महिलाओं का नाम आगे रखकर समावेशी का फोरम पूरा किया जाता है । क्या राजनीति में शामिल मधेशी महिलाएँ सक्षम नहीं हैं ? क्या वो अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं कर सकती हैं, और अगर कर सकती हैं तो कितनी महिलाओं को प्रमुख जिम्मेदारियाँ दी गई हैं ? आँकड़ा खुद सच बताएगा । मैं घूँघट को साड़ी के पल्लु से सिर्फ मुँह ढंकना नहीं मानती, मैं इसे मधेशी महिलाओं के पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में देख रही हूँ । आज भी यह वहीं कायम है जहाँ शिक्षा नहीं है । जो शिक्षित हैं, सम्भ्रान्त हैं वहाँ एक हाथ लम्बा घूँघट कोई नहीं लेती । वो सिर्फ पल्लु से अपने सरों को ढँकती हैं । कई घर ऐसे हैं जहाँ महिलाएँ आगे आना चाहती हैं, लिखना चाहती हैं कुछ करना चाहती हैं वहाँ आज भी उन पर बन्दिशें हैं । मेरी बात से आप सहमत हों ना हों पर यह सच्चाई है हमारे समाज की जहाँ आज भी हमारे निर्णय पुरुष वर्ग तय करते हैं और इतना ही नहीं पुरुषों से अधिक हमें महिला वर्गों से ही अधिक ताने मिलते हैं क्योंकि उनकी मानसिकता आज भी पुरुष वर्ग द्वारा बनाइ गइ सामाजिक व्यवस्था का पोषण करती है । यह पीढियों से चलता आया है । ऐसा नहीं है कि वक्त नहीं बदला पर इसकी गति बहुत धीमी है ।  घूँघट जहाँ अशिक्षा है वहीं यह देखने को मिलता है तो क्या इस सच से हम खुद को बचा सकते हैं कि यह हमारी वजह से है  ? एक बार इस प्रश्न से रुबरु होइए और सोचिए कि जिस समानता और समावेशिता की बातें हम और आप कर रहे हैं उसमें हमारी जिम्मेदारी क्या है, हम कितने सक्षम हैं, कितनें असक्षम हैं और कहाँ कहाँ हम खुद को छल रहे हैं ? देश के विभेद से हम लड़ रहे हैं, पर शुरुआत क्यों ना हम खुद से करें । मधेश की मिट्टी बाँझ नहीं है, परन्तु उसकी उर्वरा शक्ति को हम और आप  आँक नहीं पा रहे । दूसरों को दोष न देकर क्यों ना खुद को कटघरे में खड़ा करें हम ? समस्या हमारी है समाधान भी हमें ही तलाशना होगा । चेहरा छुपा कर नहीं सर उठा कर हम जी सकें ऐसे समाज की व्यवस्था हमें बनानी होगी इसके लिए हमें ही आगे आना होगा ।

 

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