चढने लगा है चुनावी रंग

कुमार सच्चिदानन्द:संविधान सभा के चुनाव की निश्चित तिथि की घोषणा अभी नहीं हर्ुइ मगर लोगों के मन में यह आशा पनपने लगी है कि चुनाव होगा। यद्यपि इस राह में अनेक अनिश्चितताएँ अभी बरकरार हैं इसके बावजूद चुनाव की सरगर्मी देश में बढ है। इसके साथ ही शुरू हुआ देश में राजनैतिक लप्फाजी का दौर, आधारहीन बयानबाजी का दौर। यह सच है कि देश में मुद्दे अनेक हैं। गरीबी, विकास, पिछडÞापन, कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार, संवैधानिक रिक्तता, राजनैतिक स्थिरता आदि अनेक मुद्दे हैं जो आगामी चुनाव में देश की दिशा तय कर सकते हैं। लेकिन हमारी राजनीति में इन प्रबल मुद्दांे को अपनाकर चुनाव के मैदान में नहीं उतर सकती क्योंकि सारे दल इन बिन्दुओं पर पंकिल हैं और उनके पास दूसरों पर कीचडÞ उछालने के सिवा दूसरा कोई मुद्दा नहीं है। सत्ता उनका लक्ष्य हैं और इसे प्राप्त करने के लिए वे आकर्ष नारों के साथ-साथ आधारहीन मुद्दों को आक्रामक ढंग से उठा सकते हैं। देश की आन्तरिक समस्याओं से आम लोगों का ध्यान विचलित करने के लिए अन्तर्रर्ाा्रीय मुद्दे उनके चुनाव में महत्त्व पा सकते हैं। कुछ दलों ने तो इस तरह के संकेत दे भी दिए हैं। इसका मतलब साफ है कि देश के अन्दर उन्हें मुद्दे नहीं मिल रहे हैं। गौरतलब है कि जो देश आत्मनिर्भर होता है और समृद्धि जिनके चरण छूती है, उनके लिए अन्तर्रर्ाा्रीय मुद्दे महत्त्वपर्ूण्ा होते हैं। लेकिन जो देश आन्तरिक रूप से कमजोर होता है वहाँ ऐसे मुद्दे लोगों को गुमराह करने के साधन मात्र होते हैं।

electon in nepal 2013

चढने लगा है चुनावी रंग

अब तक का जो राजनैतिक वातावरण हैं उससे प्रायः यहाँ के राजनैतिक दल भी आश्वस्त नहीं हैं कि मार्ग महीने में चुनाव होगा ही। क्योंकि निर्वाचन क्षेत्र के पुनर्निर्धारण के साथ-साथ नागरिकता प्रमाण-पत्र का वितरण और मतदाता नामावली को अद्यावधिक करने का जटिल काम अभी शेष है। इसके बावजूद प्रांयः सभी दलों की तन्द्रा भंग है और वे चुनाव का रणनीतिक ताना-बाना बुनने में व्यस्त हैं। एक बात तो निर्विवाद रूप से माना जा सकता है कि हमारे यहाँ सक्रिय अधिकांश राजनैतिक मुद्दा विहीन हैं और जिनके पास मुद्दे हैं वे दिशा विहीन हैं। इसलिए आगामी चुनाव में किसी र्सार्थक मुद्दे के उठने की आशा नहीं की जा सकती है। ये राजनैतिक दल बखूबी जानते हैं कि नेपाल की जनता भावनाओं में जीती है। उन्हें न तो मुद्दे चाहिए और न विकास चाहिए। उन्हें सिर्फआत्मसमर्थित दल या नेता चाहिए। इसलिए उन्हें आकषिर्त करने और अपने पक्ष में बाँध कर रखने के लिए जिस वाक्-चातर्ुय की आवश्यकता है, उसका अभ्यास राजनैतिक दलों द्वारा जारी है। इसलिए आज जो दल मुद्दा विहीन होकर भी चुनाव के मैदान में लम्बी-लम्बी बातें कर रहे हैं उन्हें उनकी औकात समझाने के लए प्रखर नागरिक संवेदनशीलता की जरूरत है।
आज हमारे राजनैतिक दल नई संविधानसभा के गठन और फिर संविधान निर्माण की बात करते हैं। उनसे पूछा जाना चाहिए कि विगत चार वर्षों की कालावधि में उन्होंने किया क्या और आगामी समय में चुनाव सपन्न होने के बावजूद वे अपने लक्ष्य पर पहुँचेंगे, इसकी क्या ग्यारेण्टी है – दूसरा सवाल यह है कि चूँकि आगामी चुनाव संविधान सभा का है, इसलिए संविधान बनाने का अगर वे दावा करते हैं तो यह बेकार की बातें हैं क्योंकि संविधान सभा का मुख्य काम भी यही है। इसलिए यह चुनाव का मुद्दा हो ही नहीं सकता। इतिहास के अध्ययन की र्सार्थकता इस बात में होती है कि इसके ज्ञान से हम भविष्य की नीति और दिशा तय करते हैं और अगर हम इससे पाठ नहीं लेते तो यह हमारी मूढÞता ही मानी जाएगी। आज हमारे राजनैतिक दल चुनाव के लिए कमर कस रहे हैं और कसना भी चाहिए क्योंकि इससे देश में ठहरी हर्ुइ लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रारम्भ होगी और इसी से इन राजनैतिक दलों का अस्तित्व भी है। लेकिन एक बार इन बातों पर विचार-मंथन तो होना ही चाहिए कि विगत संविधान सभा असफल क्यों हर्ुइ – इसकी असफलता के कारणों को ढँूढे बिना अगर पुराने लय और ताल पर हम आगे बढÞते हैं तो हमारी सफलता संदिग्ध ही मानी जाएगी।
आज संघीयता की बात हर दल द्वारा जोरों से उठायी जा रही है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि वर्त्तमान समय में देश का सबसे महत्वपर्ूण्ा मुद्दा यही है। लेकिन विगत संविधान सभा के परिणाम विहीन अवसान का कारण भी यही मुद्दा है। निश्चित है कि राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय अनेक दल ऐसे हैं, जो आन्तरिक स्तर पर संघीयता के विरोधी हैं। मगर इसके पक्ष में खडÞी जनाकांक्षा को देखते हुए वे मुखर रूप से इसका विरोध नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि संघ या राज्य की संख्या के मुद्दे पर महत्त्वपर्ूण्ा दलों में सहमति नहीं बन पायी। सच भी यही है कि सहमति नहीं होने का तो नाटक मात्र किया गया। आज ये दल जब जनता के बीच में हैं तो फिर से इस मुद्दे को उठा रहे हैं। इन दलों के आकाओं से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इसके सर्न्दर्भ में वे कौन सी नई अवधारणा लेकर आए हैं और जो कार्य योजना उनके मन में है उसकी विश्वसनीयता का आधार क्या है – क्योंकि अवसर को उन्होंने गुमाया है। एक बात तो आम लोगों को समझना चाहिए कि नेपाल क्षेत्रफल की दृष्टि से जितना बडÞा देश है, इसकी जो सामाजिक संरचना है और इसका जो आर्थिक आधार है उसमें संघीयता से अलग हटकर देश के राजनैतिक भविष्य की परिकल्पना नहीं की जा सकती। मगर यह भी कहा जा सकता है कि उदारता या नवीनता के नाम पर अधिक से अधिक राज्यों के निर्माण का दावा करने वाले दल वास्तव में संघीयता के विराधी हैं। सही मायने में ये दल समस्या का समाधान नहीं बल्कि समस्या को उलझाकर रखना चाहते हैं।
आज जब देश आम चुनाव के दरवाजे पर खडÞा है, सबसे महत्त्वपर्ूण्ा है चुनावी वातावरण का निर्माण और इसके अर्न्तर्गत सबसे आवश्यक है कि जनता में एक भयहीन वातावरण का संदेश कि चुनाव के दौरान वे निर्भय होकर मतदान कर सकते हैं। यद्यपि चुनाव इससे पर्ूव भी हुए हैं उससे सभी राजनैतिक दल निश्चित ही संतुष्ट नहीं रहे हैं। चुनाव के परिणामों पर धनबल और गनबल के प्रयोग का आरोप लगता रहा है।यह बात कुछ हद तक सच भी है। आमलोगों पर राजनैतिक दलों द्वारा मानसिक दबाब बनाने का भी आरोप लगता रहा है। सवाल है कि जैसे चुनाव इससे पहले हुए हैं, क्या हम वैसा ही चुनाव चाहते हैं – अगर नहीं तो इसमें हर आदमी के मताधिकार को सुरक्षित करने के लिए राजनैतिक दलों को वर्तमान सरकार के साथ विचार-विमर्श करना चाहिए और उन पर यह दबाब बनाना चाहिए कि नई कार्ययोजना के तहत एक भयमुक्त वातावरण बनाया जाना चाहिए और आमलोगों को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि वे निर्भय होकर मतदान कर सकते हैं। यह सच है कि हमारे पास शक्ति है, संयंत्र है(आवश्यकता है एक अग्रगामी सोच और एक निश्चित कार्य-योजना की।
समग्र रूप में राजनीति में ही अवसर को महत्त्वपर्ूण्ा माना जाता है। लेकिन नेपाली राजनीति की एक महत्त्वपर्ूण्ा विशेषता है कि यहाँ स्वार्थ और अवसर को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। आधार विहीन अवसर और सिद्धान्त विहीन समझौते का रंग यहाँ की राजनीति में अधिक प्रगाढÞ रूप में मिलता है। यही कारण है कि औसतन सालभर में यहाँ सरकारें बदल जाती है और लगभग एक दशक में जनता व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में सक्रिय हो जाती है तथा राजनैतिक दलों द्वारा दिखाए गए सब्जबाग में उलझकर व्यवस्था परिवर्तन की राह में चल पडÞती है। दशकों की साधना के बावजूद आज भी देश में राजनैतिक अनिश्चतता का आलम जारी है। आज जब देश चुनाव के दरवाजे पर खडÞा है तो दल परिवर्तन की एक हवा सी चल पडÞी है। कल के दुश्मन आज गले लग रहे हैं और कल के दोस्त बेगाने बन रहे हैं। यह अच्छी बात है। घनिष्ठता बढÞनी चाहिए। लेकिन राजनैतिक क्षेत्र में यह स्वस्थ संकेत नहीं माना जाता। वास्तव में दल परिवर्तन तो वे ही नेता कर रहे हैं जो किसी अन्य दल को उगता हुआ सूरज मान रहे हैं। कल तक वे जिस दल के प्रवक्ता थे और जिसका गुणगान कर रहे थे, आज उसके आलोचक हैं और नए के पैरवीकार। वास्तव में आम लोगों को ऐसे नेताओं और उनके वक्तव्यों के प्रति सावधान रहना चाहिए।
आगामी संभावित संविधानसभा के चुनाव से मधेश की अपनी अपेक्षाएँ हैंं। इसमें बेहतर सफलता के लिए जिस ठोस रणनीति की आवश्यकता है उसका प्रायः अभाव मधेश र्समर्थक दलों में देखा जा रहा है। ये दल अभी भी व्रि्रम में हैं और अपनी डफली और अपना राग अलाप रहे हैं। एक बात उन्हें भलीभाँति समझना चाहिए कि उनके लिए मौजूदा समय बहुत ही गंभीर है और इतराने का अवसर उनके पास नहीं है। विगत संविधानसभा के चुनाव में मधेश संवेदना की एक लहर विद्यमान थी जिसे समयक्रम में इन दलों ने गुमाया है। आज सामान्यतः न तो वैसी उबाल की स्थिति है और न ही दलों के प्रति सकारात्मक सोच है, क्योंकि विगत की कार्यावधि में वे जनविश्वास को समेटने में असक्षम रहे हैं और सत्ता की साधना में मुद्दों के प्रति न्याय नहीं करने का आरोप भी उन पर है। इसलिए एकताबद्ध होकर अगर वे आम लोगों के बीच जाते हैं और अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हैं तो थोडÞा सा विश्वास का वातावरण तो बन सकता है अन्यथा यह चुनाव भी पर्ूव की तरह व्यक्ति और जाति पर आधारित बनकर रह जाएगी। इसका दुष्परिणाम यह होगा कि राष्ट्रीय राजनीति में उनके प्रति गंभीरता में कमी आएगी।
आज मधेशवादी दलों के सामने एक और चुनौती है कि राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय पार्टियाँ तर्राई में सेंध लगाने की मनःस्थिति में हैं और सारे दल एक तरह से मधेश में बातों का लाँली पाँप बाँट रहे हैं। चुनावी दृष्टिकोण से वे मधेश के महत्त्व को जानते हैं, इसलिए मधेश में जाल फैलाने में तत्पर हैं। उनके साथ एक सकारात्मक पक्ष है कि मधेश में उनका संगठन है, कार्यकर्ता हैं और यहाँ के धरतीपुत्र ही उनके प्रवक्ता भी हैं। उनके पास बाँटने के लिए बातें और सपने हैं, वृहत्तर चिन्तन का दार्शनिक आधार है। इस रंग में रंगे होने के कारण उस समुदाय के प्रति उपेक्षा और तिरस्कार की बात वे भूल जाते हैं जिनके बीच से वे आते हैं। विगत संविधान सभा की कार्यावधि में यह देखा गया कि ऐसे नेता मधेश के मुद्दे के प्रति न तो अपने दल की सोच में कोई परिवर्त्तन ला सके और नहीं आम लोगों में यह संदेश प्रेषित कर सके कि वे मधेश के धरतीपुत्र हैं और नीतिगत रूप में वे मधेश के कल्याणार्थ कृतसंकल्प हैं।
कहा जा सकता है कि आज की परिस्थितियाँ उलझी हर्ुइ हैं। चुनाव की नीति और विधान पर दलों में ही मतैक्य की स्थिति नहीं है। अपने-अपने लाभ को आधार बनाकर चुनाव की नीतियाँ तय करने की रस्साकसी दलों में चल रही है। इसके बावजूद वे चुनाव क्षेत्र में सक्रिय हैं और विभिन्न तर्कों से जन समुदाय को अपने पक्ष में मोडÞने के लिए क्रियाशील हैं। लेकिन इस जमीन पर सबसे अधिक आवश्यक है जनता की संवेदनशीलता की। वे न केवल झूठे वादों और झूठे प्रलोभनों से बचें वरन अपने आस-पास को भी इसके प्रति सचेत करें। क्योंकि अधिकार और पहचान की प्रतिष्ठा के साथ-साथ राजनैतिक स्थिरता और संवैधानिक शून्यता से मुक्ति अधिक महत्वपर्ूण्ा है। इसके बिना विकास और प्रगति के सारे सपने अधूरे हैं। त्र

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