चमन हमारा क्रांति का आशान्वित है

डा. मुकेश झा

रक्त से सिंचित और

पल्लवित चमन हमारा

क्रांति का आशान्वित है

हम देखेंगे समय

अमन और शांति का

बिना क्रन्ति की शांति

कहाँ दुनियाँ में किसने पाई है

जो भी है खुशहाल धरापर

मोल बहुत चुकाई है।

आओ हम भी गढ़े

सुगन्धित उपवन

एक सुहाना सा बने धरा पर सुन्दर

पावन साक्ष्य बने जमाना का।

मोल सुसाशन का रक्त ही

और वह रक्त जवानी का

जो यह मोल नही चुकाते

जीवन जीते गुलामी का

मातृभूमि हम जिसको माने

उसने ही गद्दारी की

सब कुछ हमसे छीन लूटकर

हमको बस बर्बादी दी

आज फैसला कर ही डालें

जीवन अब कैसा जीना

उनके संग अलग है रहना

जिसने छलनी की सीना।

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