चरित्र निर्माण मे स्वराजियों का दायित्व : विकास प्रसाद लोध

bibekanand

विकास प्रसाद लोध, लुम्बनी , ८ जनवरी | किसी ने कहा है “चरित्र निर्माण वच्चे के जन्म से नही वल्कि उसके जन्म के सौ साल पहले से सुरुवात होता है” मधेश और मधेशी अपने आपमें एक बृहत साँस्कृतिक और चरित्रवान रहे है। सिता,वुद्ध,सम्राट अशोक, चन्द्रगुप्त मौर्य जिसके गवाह रहे है। जहाँ रामराज्य का जन्म हुवा। जो समाजवाद का जन्मदाता रहा, जहाँ की  संस्कृति पुरे भारत वर्ष मे मिसाल हुवा करता था। प्राणीयो मे सद्भाव और विश्व कल्याण की सोच को जन्म देने वाले महार्षि जनक से प्रभावित मध्यदेश (मधेश) मे आज वह पुरानी सभ्यता, सोच, चरित्र, संस्कृति कहाँ लुप्त है ? और क्यों लुप्त है ? तो पश्चिमा साँस्कृती का प्रहार हो या माष्टोवादीयो का प्रहार दोनों ने कहीं न कहीं गुलाम वनाकर ही आपनी साँस्कृती और चरित्र को लादा है। जिस प्रकार भारत वर्ष पर उपनिवेश कायम कर पश्चिमो ने अपनी संस्कृति और चरित्र को स्थापित किया उसी प्रकार मष्टोवादि शासकों ने मधेश पर औपनिवेश कायम कर आपनी संस्कृति और चरित्र को स्थापित किया और कर रहा है।

मधेश मे माष्टोवादियो का प्रहार एक निश्चित उमेर पर विशेष रूप से हुवा है । वह उमेर है 45-50 (100%नही) साल से उपर का । चुकी 250 साल पुर्व जव मधेश पर इनका प्रभाव हुवा तो शासन के रूप मे हुवा। और वह क्रुरता पुर्वक किया गया, एक प्रकार से जवरजस्ति साँस्कृतीक, भाषिक, भुषिक, परिवर्तन किया गया। जिसके कारण चरित्र स्वयम परिवर्तन हो गया। 200 सालों तक आपने अनुसार शासन करते हुवे मष्टोवादियो ने मधेश तथा मधेशी के उपर मष्टो लाद दिया। जिसके कारण से मधेशी भी विवश होके अपने आपको नेपाली कहने लगे, नेपाली भाषा को मानने लगे, और धिरे धिरे आपना सवकुछ भुलकर उनमें हि खो गए । 200 सालों के वाद यानी 50-60 साल पहले जव अचानक मधेश मे अपना पन को वचाकर रखने वालों ने नेपाली संस्कृति भाषा भेष को वहिस्कार किया। मधेश तथा मधेशीयोकी संस्कृति भाषा भेष का पुन: जागरण किया, और उस वक्त मधेश दो धार पर हो गया। एक धार जो नेपालीयो के क्रुर शासन से डर कर मष्टो को आपना मानता और दुसरा धार मधेश को। लेकीन मधेश को अपना मानने वालों की संख्या तुलनात्मक रूप मे वहुत कम था। चुकि शासन मष्टोवादियो का था। उनके विपरीत जाने वालों पर राज्यद्रोह का मुद्दा लगाकर मृत्यु दण्ड़ दिया जाता। फिर भी तभी से मधेश का खोया हुवा संस्कृति पहिचान भाषा चरित्र का खोज होने लगा। और आज यह क्रम तिव्रता पर है। लेकिन जो उनके शासन काल मे वच्चे थे जिनपर विशेष रूप से उनका प्रभाव पड़ा, जो उनके शिक्षा पद्दति के शिकार हुवे, जिनके वचपन मे ही क्रुरता पुर्वक शासन कर उन्हें परिवर्तन किया गया है। वह आज भी आपने को मधेशी कहने से डरते है, वह आपने आपको मधेशी माननेको तैयार नही। नेपाली वनना ही उनका अन्तिम मक्सद लगता है। इनका यह प्रदर्शन देख कर अनुमान  करना एकदम आसान लगता है। कि कैसी क्रुरता से इनको परिवर्तन किया गया। जो आज भी वह दिन याद करके डर से आपने को भुलकर भी मधेशी नही कहते- वह भयानक डरावने और क्रुर शासन का प्रभाव मधेश मे आज भी जिवित है।

 आज के 50 साल के भितर मे मधेशी पन मिलता है वह मधेशी कहने मे ही गर्व करते है। चुकी अक्सर देखा जाता है, मधेशी, धोती कहने पर 50 साल से उपर के लोग चिढ जाते है,और नेपाली कह दो तो सिना फुल जाता है। वही 50 साल से निचे के लोग अपने आपको मधेशी धोती कहने मे गर्व करते है और नेपाली कहने पर चिढ जाते है। मतलव 50 के इधर और उधर मे विपरीत चरित्र है, यह प्रष्ट दिखाई देता है। लेकिन 50 के उपर भी अंश था तभी तो आज जिवित है। इस से यह सावित होता है की आज निर्माण किया गया चरित्र 50 सालके अन्दर ही अपना प्रभाव दिखाने लगता है। मेरा तात्पर्य  यह विल्कुल नही कि 50 से उपर के लोग मधेशी संस्कृति को छोड दिए है। वल्कि मै यह कहना चाह रहा हु “तुलानात्मक रूप से 50 से कम उम्र के लोगों मे मधेशी सँस्कृति की उदय वहोत खुवसुरती से हुवा है। जिसमे 50 के उपर के लोगो कि महत्वपुर्ण योग दान रही है” पुर्वजो कि संरक्षण से ही आज हमे अपना पहिचान खोज्ने मे आसानी हुवा और सफलता मिली। असान विल्कुल नही है चरीत्र निर्माण करना। लेकिन लोग संघर्ष से पथ्थरो को सुन्दर मुर्ती का रूप देते है। इस लिए असम्भव भी विल्कुल नही है।

आज लोकतन्त्र के धार पर यह प्रकृया और तिव्रता रूप मे करवट लेते दिख रही है। इस विच स्वराज का चरित्र निर्माण काफी तिव्रता पर है। स्वराजी आज गाँव गाँव मधेश जागरण करते दिख रहे हैं। जहाँ लोगों को मधेश की पुरानी इतिहास से रूवरू कराया जारहा है। लोकतन्त्र को अपना मेरूदण्ड मान कर धर्म, सम्प्रदाय, जात, लिंग, रंग के विभेदों को जड से उखाड फेकने कि संकल्प लेकर आगे बढ रहे स्वराजियो को कुछ तथ्यो पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। “स्वराज का चरित्र मधेश कल्याणकारी होने के साथ साथ आजादी पश्चात शान्तिमय वातावरण कायम करने तथा मधेश प्रति प्रेम का निर्माण हो, मधेश के लिए तन मन धन अर्पण करने का साहस का निर्माण हो” स्वराजि आज मधेश आजादि के मिसन पर है, केवल मधेश आजादी आन्दोलन पर्याप्त नही इसके साथ साथ मधेश तथा मधेशीयो का चरित्र निर्माण पर ध्यान देना वहोत आवश्यक है। “स्वराजियो के कार्य एवम लक्ष्य मधेश को पुर्ण रूप से संगठित करते हुवे सही दिशा प्रदान करना है। जिसके लिए लाखों समर्पित मधेशी योद्धावों कि जरूरत है”। क्योंकि 250 सालो से मधेश का जो चरित्र हरण हुवा है उसको वापस स्थापित करने का प्रमुख दायित्व स्वराजीयो को लेना होगा, स्वराजीयो को राष्ट्र निर्माण के साथ साथ चरित्र निर्माण पर विशेष ध्यान देने की अवश्यक्ता मधेश माँ महसुस कर रही है-

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