चरी, परी और दादागिरी

lilanath gautam himaliniलीलानाथ गौतम:चर्चित डाँन दिनेश अधिकारी ‘चरी’ की मौत के कारण नेपाली राजनीति -विशेषतः नेकपा एमाले) और अपराध की दुनिया के लिए पिछला महीना चर्चित रहा । पुलिस इन्काउन्टर में चरी की मृत्यु में कितनी सत्यता है, यह कहना कठिन है । चरी की मृत्यु के बाद उसके परिवारजन अभी शोक में हैं । लेकिन र्सवसाधारण का कहना है- जो कुछ हुआ ठीक ही हुआ । क्योंकि चरी ऐसा ही पात्र था, जिस के अपराध से समाज आतंकित था । इसीलिए तो समाजिक सञ्जाल में बहुतों की टिप्पणी है- मृत्यु किसी के लिए भी प्रिय नहीं है, लेकिन किसी की मृत्यु पर कोई नहीं रोता । बल्की लोग अन्दर से खुश हीं होतें है । यह कथन चरी की मृत्यु के प्रति लक्षित है । chari1
लेकिन विडम्बना ! नेपाली राजनीति ने चरी तथा उनके जैसे चरित्र वालों को कभी भी अपराधी के रूप में नहीं लिया । इसलिए चरी जैसा व्यक्ति कानूनी पकडÞ से हमेशा बचता रहा । ऐसे लोग कभी-कभार पुलिस के हत्थे तो चढÞते हैं, लेकिन राजनीतिक दबाव से जल्दी ही बरी कर दिए जाते हैं । चरी ने नेकपा एमाले की पूँछ पकडÞी थी । इसलिए वर्षो तक उस पर कोई कानूनी कारवाही नहीं हो सकी । चरी ने एमाले पार्टर्ीीध्यक्ष केपी ओली का मन जीत लिया था । इसीलिए उस की गुण्डागर्दी को नेकपा एमाले ने हमेशा नजरअन्दाज करता आया और संरक्षण भी दिया ।
इसका अर्थ यह नहीं है कि गुण्डागर्दी तथा अपराधी संरक्षण में सिर्फनेकपा एमाले ही है । क्योंकि चरी के समान अन्य अपराधी विभिन्न राजनीति दल में सक्रिय हैं । प्रायः सभी दल चुनाव जीतने के लिए तथा अपना दबदबा कायम रखने के लिए ऐसे डाँन को संरक्षण प्रदान करते है । खैर, गत श्रावण २१ गते दिनेश अधिकारी उर्फ’चरी’ की पुलिस कारवाही में मृत्यु हो गई । उसके बाद राजनीतिक वृत्त, सुरक्षा निकाय, सञ्चार जगत में अनेक चर्चा-परिचर्चा जारी है । इस घटना में चरी के अलावा नेकपा एमाले के कुछ सभासद, चरी की प्रेमिका खुश्बू ओली, उसके पर्ूव प्रेमी तथा चरी के दोस्त अर्पण कोइराला, पुलिस अधिकारी कुमुद ढुंगेल प्रमुख पात्र के रूप में चर्चा में आए हैं । चरी का परिवार, खुश्बू ओली तथा नेकपा एमाले, चरी की मृत्यु को पुलिस द्वारा हुए नियोजित हत्या कह रहे हंै । लेकिन चरी की मृत्यु के पीछे उन के आपराधिक जीवन के साथ-साथ प्रेम जीवन भी एक प्रमुख कारण दिख रहा है ।
चरी की मृत्यु के बाद एमाले सभासद राजेन्द्र पाण्डे और गुरु बर्ुलाकोटी ने तो संसद अवरुद्ध करने की चेतावनी तक दी थी । सामाजिक सञ्जाल तथा नागरिक समाज द्वारा एमाले के इस रवैये का कडÞा विरोध होने पर संसद अवरुद्ध नहीं किया जा सका । लेकिन जब भाद्र ७ गते चरी का अन्तिम दाहसंस्कार हुआ तो नेकपा एमाले ने उसे पार्टर्ीीहीद का सम्मान देते हुए उसके शव पर पार्टर्ीीा झण्डा ओढÞाया था । पार्टर्ीीध्यक्ष केपी ओली का कहना है कि चरी का इतिहास अपराध से जुडÞा हो सकता है, लेकिन वर्तमान में वह अपराधी से दूर था । लेकिन जनसाधारण का कहना है कि चरी एक अपराधी ही था, जिस के शव पर झण्डा ओढÞा कर एमाले ने मदन भण्डारी का अपमान किया है । इससे स्पष्ट होता है कि चरी के अपराध का संरक्षण नेकपा एमाले कर रहा था । इस तरह राजनीतिक पार्टर्ीीे गुण्डा तथा अपराध का संरक्षण होता है तो र्सवसाधारण जनता ऐसे तत्वों से कैसे सुरक्षित रह सकती है –
विवादास्पद घटनास्थल
चरी की मृत्यु को लेकर अभी ‘न्यायिक’ और ‘गैर-न्यायिक’ हत्या कह कर बहस चल रही है । घटनास्थल में पुलिस द्वारा दिए गए विवरण और सामान्य अनुसन्धान से सामने आए तथ्य में भी अन्तर दिखाई देता है । इसीलिए चरी की मौत को हत्या कहने वालों के पक्ष में भी माहौल बन रहा है ।
चरी को सात गोली लगी है । लेकिन शव के आसपास कही भी खून के धब्बे नजर नहीं आते । इसीलिए चरी को अन्यत्र मार कर काठमांडू भीमढुंगा में लाया गया है, इस आशंका को नकारा नहीं जा सकता । इसी तरह बाइक में तीव्र गति से सवार कोई व्यक्ति कैसे पीछे मूडÞ कर पुलिस को गोली मार सकता है – इस प्रश्न का भी सहज उत्तर नहीं है । इसीलिए तो एमाले के नेता विशेषतः धादिङ के नेता तथा सभासद ने दावा किया है- ‘चरी की हत्या हर्ुइ है । इसी दावे के साथ उन लोगों ने सर्बोच्च में रिट भी दायर किया है । इधर पुलिस अधिकारी के कथन में भी तालमेल नहीं है । जिसके कारण घटना की गुत्थी और उलझती जा रही है ।
दाउद के साथ सम्बन्ध -!
दाउद इब्राहिम अपराध की दुनिया में एक बडÞा नाम है । विशेषतः भारत विरुद्ध के अपराध में उस का नाम अन्तर्रर्ाा्रीय रूप मेंं कुख्यात है । उसी दाउद इब्राहिम के साथ अर्पण कोइराला का भी सम्बन्ध है, ऐसा दावा कोइराला की पर्ूव प्रेमिका ने किया है । अर्पण, चरी का भी दोस्त था । चरी और अर्पण के बीच दुश्मनी तब शुरु हर्ुइ, जब दोनांे के बीच में माँडल गर्ल खुश्बू ओली का प्रवेश हुआ । एक पत्रकार सम्मेलन में खुश्बू ने इमेल स्क्यान दिखा कर कहा है- अर्पण ने दाउद को पत्र लिखा है, इसका प्रमाण मेरे पास है । अगर वह इमेल सच है तो उन लोगों का सम्बन्ध कुख्यात अन्डरवर्ल्ड डाँन दाउद के साथ भी हो सकता है । अभी चरी इस दुनिया में नहीं है । लेकिन यह विषय अब भी एक गम्भीर अनुसन्धान का विषय हो सकता है ।
प्रेम सम्बन्ध स्वीकार
दिनेश अधिकारी ‘चरी’ मरने के बाद उसकी प्रेमिका के रूप में एकाएक चर्चा में आई खुश्बू ओली शुरु में अर्पण कोइराला को सिर्फचरी हत्या कें बारे में जिम्मेदार मान  रही थी । वह कहती रही- उसका और मेरा सम्बन्ध सामान्य जान-पहचान का ही है । लेकिन धीरे-धीरे अर्पण और खुश्बू सिर्फप्रेमी-प्रेमिका नहीं थे, पति-पत्नी के रूप में एक साथ रहते थे, ऐसा समाचार भी मीडिया में आने लगा । यहाँ तक कि खुश्बू का परिवार अर्पण को दामाद सम्बोधन करता था तो अर्पण के परिवार खुश्बू को बहू कहता था । ऐसा समाचार र्सार्वजनिक होने के बाद खुश्बू ने बाध्य होकर अर्पण के साथ अपना प्रेम सम्बन्ध स्वीकार किया है । जानकारों का मानना है कि खुश्बू और अर्पण सात वर्षतक एक ही छत के नीचे पति-पत्नी की तरह रहे हैं । लेकिन औपचारिक शादी नहीं हर्ुइ थी । इसी क्रम में अर्पण तथा उसके परिवार ने खुश्बू के अध्ययन के लिए लगभग सात करोडÞ निवेश किया था । यद्यपि खुश्बू ने इस बात को अस्वीकार किया है ।
 किस को, किस का संरक्षण –
चरी एन्काउन्टर में मारे जाने के बाद काडमांडू के सभी डाँन भूमिगत हुए हैं, यह दावा पुलिस का है । लेकिन पुलिस के इस दावे में उतना दम नहीं है । र्सवसाधाण मानते हैं कि सब डाँन नेताओं के संरक्षण में हैं । लेकिन पुलिस का कहना है कि डान्सबार के बाउन्सर से लेकर चर्चित डाँन गणेश लामा, दीपक मनाङे सब भूमिगत हो चुके हैं ।
पुलिस जो भी दावा करे, दीपक मनाङ्गे, चक्रे मिलन, कुमार घैँटे, गणेश लामा, राजु गोर्खाली जैसे डाँन का संरक्षण कौन कर रहा है – यह ओपेन सेक्रेट है । ऐसे लोगों का कहना है कि अगर पुलिस नेताओं के घर में जाकर ऐसे गुण्डा को गिरफ्तार कर सकती हैं तो वह लोग जरूर पकडÞे जाते । उदाहरण के लिए चरी को ही ले सकते हैं । पुलिस जब चरी को ढूँढती थी, उस वक्त वह एमाले नेता केपीशर्मा ओली, महेश बस्नेत, राजेन्द्र पाण्डे जैसे नेताओं के घर में संरक्षित रहता था ।
चरी की तरह ही राजनीतिक संरक्षण प्राप्त दूसरा डाँन है, गणेश लामा । उसने ठेक्का-पट्टा के नाम से गुण्डागर्दी करके करोडÞो कमाया है, ऐसा जनविश्वास है । इसीलिए लामा की सम्पत्ति को लेकर अभी छानबीन भी हो रही है । हाल वह मधेसी जनअधिकार फोरम  -लोकतान्त्रिक) के केन्द्रीय सदस्य बन कर राजनीतिक संरक्षण पा रहा है । जब विजयकुमार गच्छदार गृहमन्त्री थे, उस समय पुलिस लामा को ढूँढ रही थी । लेकिन गिरफ्तार होने के बदले पुलिस के बडÞे-बडेÞ अफसर के साथ वह घूमता रहता था । लामा अपराध की दुनियाँ में काभ्रेली समूह के नायक के रूप मे माना जाता है । उपत्यका के रात्रिकालीन व्यवसाय, रक्तचन्दन तस्करी, ठेक्का-पट्टा आदि उसका कार्य क्षेत्र है । आपराधिक छवि होने का आरोप होते हुए भी गच्छेदार ने लामा को पार्टर्ीीें प्रवेश करवाया है । पुलिस के आन्तरिक अनुसन्धान के अनुसार लामा के पास ५० करोडÞ से ज्यादा की सम्पत्ति है, जो कानूनी अवैध है ।
इसी तरह दूसरा डाँन है, दीपक मनाङ्गे । वह संघीय लोकतान्त्रिक राष्ट्रीय मञ्च का उपाध्यक्ष भी हो चुका है । पहले वह राष्ट्रीय प्रजातन्त्र पार्टर्ीीे संरक्षण में अपना धन्धा चलाता था । यहाँ तक कहा जाता है कि राप्रपा के पार्टर्ीीध्यक्ष पशुपतिशमशेर राणा का वह दाहिना हाथ था ।
इसी तरह हथियार और लागूऔषध के कारोवारी के रूप में परिचित दूसरा डाँन है- चक्रे मिलन । वह नेकपा एमाले के नेता प्रदीप नेपाल का दाहिना हाथ माना जाता है । यहाँ तक कि चक्रे नेता नेपाल की पत्नी झुमा देवान से ‘भाई टीका’ भी ग्रहण करता है । चक्रे का सम्बन्ध एमाले महासचिवर् इश्वर पोखरेल के साथ भी अच्छा है । इसी तरह पर्ूवराजपरिवार के सदस्यों के साथ भी उसका सम्बन्ध घनिष्ठ है । डाँन के बीच अलग और चतुर डाँन के रूप मे चक्रे को जाना जाता है । वह सिर्फएमाले का डाँन ही नहीं, कांग्रेस, एमाओवादी जैसे अन्य पार्टर्ीीे आवद्ध डाँन को भी परिचालित करत है, ऐसी बात स्वयं डाँन वृत्त में चर्चित है । कारागार में रहते वक्त भी वह अपना समूह परिचालित कर आतंक मचाया करता है । इस बात की पुष्टि कई बार नेपाल पुलिस कर चुकी है । माना जाता है- कुछ पुलिस अधिकारी से भी उसकी मिलीभगत है ।
इसी तरह काठमांडू के दूसरे प्रभावशाली डाँन है- कुमार श्रेष्ठ । जिस को लोग ‘घैंटे’ के उपनाम से जानते हैं । वह नेपाली कांग्रेस के नेता अर्जुननरसिंह केसी और जगदीशनरसिंह केसी का खास आदमी माना जाता है । सूत्रों का कहना है कि जब पुलिस उसकी खोज शुरु करती है, तब वह केसी के गंगबु स्थित घर में जाकर छिपता है । अगर पुलिस घैंटे को गिरफ्तार करती है तो केसी द्वय में से कोई न कोई पुलिस उच्च अधिकारी के पास पहुँचता है या फोन वार्ता कर्ता है । और घैंटे सहज में छूट जाता है ।
इसी तरह डाँन के रूप में परिचित फिल्मकर्मी रोज राणा को कांग्रेस का ही संरक्षण प्राप्त है । वह कांग्रेस तरुण दल के सांस्कृतिक विभाग में केन्द्रीय सदस्य हैं । इसी तरह कांग्रेस के संरक्षण में रह कर काम करने वाले अन्य डाँन मे राजु गोर्खाली, सञ्जीव लामा ‘स्याल’ तर्ीथ लामा, पर्ूण्ा गुरुङ, मीनकृष्ण महर्जन, महेश श्रेष्ठ, दावा लामा आदि हैं ।
 वकील भी संरक्षक
गुण्डागर्दी में कुख्यात को सिर्फराजनीतिक दल संरक्षण करता है, यह झूठ है । पुलिस से लेकर कानून व्यवसायियों का संरक्षण भी उन लोगों को प्राप्त होता है । अन्याय में रहने वाले जनता को कानुनी तौर पर न्याय दिलाने की कसम खाने वाले वकील इस तरह गुण्डा तथा अपराधी का संरक्षण करते हैं तो आम जनता कैसे सुरक्षित हो सकती है – लेकिन वास्तविकता यही है । दुःख तो इस बात है कि चर्चित डाँन के लिए कानुनी रूप मेंं लडÞने वाले वकील भी कानुन की दुनिया में प्रतिष्ठित और चर्चित होते हैं । उदाहरण के लिए गुन्डागर्दी के ही आरोप मेंं मरने वाले गुण्डा नायक दिनेश अधिकारी ‘चरी’ के लिए कानूनी लडर्Þाई लडÞने वाले वकिलों में चर्चित अधिवक्ता द्वय शम्भु थापा और टीकाराम भट्टर्राई का नाम सबसे पहले आता है । हाँ, कटु सत्य ही है । इन दोनों वकिलों ने चरी के मरने के बाद उसके पक्ष में कडÞी टिप्पणी की थी ।
इसी तरह सम्पत्ति शुद्धिकरण अनुसन्धान के मुद्दा में रहे चर्चित ५ गुण्डा नायक के पक्ष में लडÞने वाले वकील भी चर्चित ही हैं । डाँन गणेश लामा की अवैध सम्पत्ति को लेकर जारी मुद्दा में लडÞने वाले वकील हंै- चर्चित अधिवक्ता शेरबहादुर केसी । केसी लामा का बचाव करते हुए अदालत में बहस करते हैं । इससे यह पुष्टि होती है कि राजनीतिक पार्टर्ीीे तरह ही वकील भी पैसा के लिए अपनी नैतिकता बेचते हैं । लामा का पक्ष लेकर बहस करने वाले अन्य वकिलों में योगेन्द्रबहादुर अधिकारी और नरबहादुर योगी भी हैं । इसी तरह दूसरा गुण्डा नायक अभिषेक गिरी के पक्ष में गणेश केसी, योगेन्द्रबहादुर अधिकारी और सुवास द्विवेदी आदि बहस करते हैं । इसी तरह एमाले के नेता तथा गुण्डा नायक के रूप में परिचित परशुराम बस्नेत के कानुनी सल्लाहकार नेपाल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष हरिकृष्ण कार्की हैं । बस्नेत के विरुद्ध भी अवैध सम्पत्ति जमा करने का आरोप है और इस में छानबीन हो रही है । बस्नेत के पक्ष में बहस करने वाले अन्य वकिलों में टीकाराम भट्टर्राई, हरिश्चन्द्र सुवेदी और नारायण देवकोटा हैं । गुण्डा नायक चक्रे मिलन के कानूनी सल्लाहकार में डेमोक्रेटिक लर्यस एसोसिएशन के अध्यक्ष गोपालकृष्ण श्रेष्ठ हैं । चक्रे के विरुद्ध हरेक मुद्दा में सामान्यतः श्रेष्ठ ही वकालत करते हैं । टीकाराम भट्टर्राई दूसरा गुण्डा नायक दीपक मनाङगे के पक्ष में बहस करने वाले वकील भी हैं । मनाङ्गे के पक्ष में श्रीराम दवाडी, गोलकुल भण्डारी, एकराज पोखरेलर्,र् इश्वर अधिकारी और सीताराम अधिकारी जैसे वकिल भी हैं ।

कौन है चरी –
दिनेश अधिकारी उर्फचरी धादिङ जिला का स्थायी वासी था । काठमांडू आने के बाद वि.सं. २०६० साल से उसने गुण्डागर्दी का धन्धा शुरु किया । लेकिन पुलिस रिकार्ड में उस का नाम २०६२ साल मंे दर्ज हुआ है । शुरु में चरी ने गुण्डा नायक ‘कुमार घैंटे’ के साथ मिलकर पेशे की शुरुवात की, कहा जाता है घैंटे नेपाली कांग्रेस के नेता अर्जुननरसिंह केसी के संरक्षण में है । लेकिन बाद में घैंटे के साथ चरी का मनमुटाव शुरु हो गया । उसके बाद चरी ने अपना ही एक अलग समूह बनाया और अपना धन्धा जारी रखा । सूत्रों का कहना है कि गुण्डागर्दी शुरु करने के बाद कुछ ही सालों में उसने ५-६ करोडÞ से ज्यादा की सम्पत्ति अर्जित की । वह धादिङ जिला में सञ्चालित छोटे से लेकर बडेÞ-बडÞे ठेक्कापट्टा में गुण्डागर्दी के माध्यम से ठेकेदारों से निश्चित प्रतिशत -५ प्रतिशत से ऊपर) रंगदारी वसूल करता था । इधर काठमांडू के नयाँबजार आसपास के रेस्टुरेन्ट, ढाबा, क्यासिनो आदि क्षेत्र में भी उसको हफ्ता मिलता था । यार्सर्ााम्बा -यौन शक्ति बढÞाने की जडिÞबुटी) लूटपाट में भी वह सक्रिय था । काठमांडू के क्यासिनो भेनस तथा धादिङ के एक हाइड्रो पावर में भी चरी ने अपनी पूँजी निवेश किया था । जानकारों का मानना है उसको सिर्फ एमाले का संरक्षण प्राप्त था, ऐसी बात नहीं है । कुछ पुलिस अधिकारी का भी वरदहस्त उसके ऊपर था । chari
शुरु में नेपाली कांग्रेस के निकट रह कर उसने अपना धन्दा चलाया । बाद में नेकपा एमाले में प्रवेश कर धादिङ जिला का उपाध्यक्ष भी बना । चरी पुलिस के द्वारा पकडेÞ जाने पर उसकी रिहाइ की मांग करते हुए एमाले कार्यकर्ता सडÞक अवरुद्ध करने के लिए उतर आए थे । एमाले के नेता केपीशर्मा ओली सहभागी प्रायः हर कार्यक्रम में ‘चरी’ अपने लडÞाकू दस्ते के मुस्तैद रहता था । इसीलिए ओली ने भी उस का खूब बचाव किया । इस बात को लेकर पार्टर्ीीे अन्दर से ही ओली की आलोचना भी खूब हर्ुइ । लेकिन एमाले के नवें महाधिवेशन में चरी ने ओली का साथ छोडÞ दिया । उसका एक ही कारण था- एमाले के नवें महाधिवेशन में धादिङ जिला के नेता राजेन्द्र पाण्डे का माधव नेपाल समूह से उपाध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवारी देना । जानकारों का मानना है कि उसके बाद चरी और ओली के सम्बन्ध में ठंडापन आता गया ।
ओली से दूर होने के कारण गृहमन्त्री वामदेव गौतम से लेकर ओली पक्ष के युवा संघ के अध्यक्ष महेश बस्नेत, ओली के स्वकीय सचिव जैसे बहुतों को चरी ने धमकी देना शुरु किया था । इस तरह चरी खूद को असुरक्षित महसूस कर रहा था । ऐसी ही अवस्था में चरी का इन्काउन्टर होना, इस बात का प्रमाण है कि चरी वास्तव में आन्तरिक राजनीति का शिकार हुआ है ।
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अर्पण का मीडियाबाजी सब झूठः खुश्बू ओली
मेरे और अर्पण कोइराला के सम्बन्ध में अर्पण ने जो भी मीडियाबाजी की है, वह सब बकवास है । वास्तविकता मैं बताती हूँ । अपर्ण्र्ााे पास काठमांडू में कहीं भी तीन घर नहीं था । बिजुलीबजार में रहे घर को बेच कर वह बालकोट में घर बनाना चाहता था । लेकिन घर बेच कर प्राप्त रकम उसने पोखरा के ग्राण्ड क्यासिनो में उडÞाया । बाद में मैंने ही पैसे देकर उसे छुडÞाया । मेरी पर्ढाई में उसने कुछ भी खर्च नहीं किया है । वह तो मेरे पापा की सम्पत्ति थी, जो जमीन बेच कर जमा की गई थी । उसी से मैंने सन् २००९ में बेलायत के अक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अपना अध्ययन पूरा किया ।
उसका और मेरा प्रेम सम्बन्ध तो था, जो सन् २०११ के बाद पर्ूण्ा रूप से अन्त हुआ । पूरी कोशिश के बाद भी मैं उसे सही राह पर नहीं ला सकी । यहाँ तक कि मैंने अर्पण को उसी के घर में अन्य चार युवती के साथ नग्न अवस्था में पकडÞा था । उसके बाद मैंने उससे कोई भी सम्बन्ध रखने के लिए इन्कार कर दिया । उसकी नशे की आदत छुडÞाने के लिए मैं ही उसे नई दिल्ली तक ले गई थी । वहाँ  के र्साईक्रयाटिक एण्ड रिहाविलिटेसन सेन्टर में उसका उपचार करवाया । फिर भी उस में कोई सुधार नहीं आया । नेपाल आने के बाद उसने फिर नशाखोरी शुरु कर दी ।
उसके बाद ही चरी के साथ मेरी जान-पहचान हर्ुइ । धीरे धीरे हमारी मुहब्बत परवान चढÞने लगी । आगामी दशहरा के अवसर में हमारा इन्गेजमेन्ट होने वाला था । लेकिन वह पुलिस के हाथों मारा गया । यह योजनावद्ध हत्या है । इसीलिए हम न्याय के लिए सर्वोच्च में आए हैं । मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि चरी हत्याकाण्ड में अर्पण कोइराला और पुलिस इन्सपेक्टर कुमुद ढुंगेल का हाथ हैं । ढुंगेल भी मुझे पसन्द करते थे । वे दोनों मेरा और दिनेश का प्रेम स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे । दोनों बराबर धमका रहे थे कि अगर हमारी शादी हर्ुइ तो वे हम लोगों को जान से मार देंगे । इसीलिए मेरा दावा है- चरी मुठभेडÞ नहीं मारा गया ।
चरी को मीडिया ने भी आवश्यकता से ज्यादा ही नकारात्मक रूप में चित्रण किया है । मेरे सर्म्पर्क में आने के बाद वह अपराध की दुनिया से धीरे-धीरे दूर जा रहा था । लेकिन विगत की कुछ घटनाओं के कारण वह बारबार चर्चा में आता था । दिनेश कि योजना थी कि अब राजनीति में आकर समाज सेवा में सक्रिय जीवन व्यतीत करुँगा । लेकिन काल की गति विचित्र होती है ।
-विभिन्न सञ्चार माध्यमों में आए ओली के कथन के अंश)

खुश्बू की हर आवश्यकता मैंने ही पूरी की थीः अर्पण कोइराला
दोस्त के फोन से मुझे पता चला कि चरी का खून हुआ है । लेकिन उस की हत्या में अर्पण का भी हाथ है, यह कह कर खुश्बू ने जो हंगामा किया, उस में कुछ भी सत्यता नहीं है । मेरे पास ऐसी खूबी और शक्ति कहा है, जो पुलिस को साथ लेकर मैं दिनेश का इन्काउन्टर कर सकूँ – यह तो सिर्फखुश्बू का आक्रोश हैं । खुश्बू मेरी निकटतम मित्र है । नेपाल और बेलायत में लगभग हम लोग ८ साल एक साथ रहे हैं । हम लोगों को जानने वाले हर व्यक्ति जानते हैं कि खुश्बू और अर्पण का सम्बन्ध क्या है – इस बारे में मुझे ज्यादा कहने की जरूरत नहीं है । ६ साल बेलायत में रहते वक्त हम लोग साथ-साथ रहते थे । लेकिन अभी आकर खुश्बू ने हमारे सम्बन्ध को लेकर जो कुछ बताया है, वह सरासर झूठ है ।
खुश्बू के दाबी के अनुसार मैं खुश्बू के घर में नहीं रहता था । लेकिन यह सत्य है कि हम दोनों एक ही घर में रहते थे । क्योंकि हम लोग एक दूसरे के बिना नहीं जी सकते थे । खुश्बू को बेलायत पहुँचाने वाला भी मैं ही हूँ । भीसा प्रोसेसिङ से लेकर सम्पर्ूण्ा कार्य मैंने ही किया था । बेलायत में मेरा अपार्न्टमेन्ट था, जहाँ हम लोग एक साथ रहते थे । अक्सफोर्ड यूनिभर्सिटी में खुश्बू का अध्ययन खर्च पूरा मैंने ही उठाया था । खुश्बू के परिवार ने अपना घर बेच कर डेढ करोड रूपयाँ इसके लिए खर्च किया था । मगर वास्तविक खर्च की तुलना में यह राशि बहुत कम थी ।
हमारा भविष्य अच्छा हो जाएगा, यही सोच कर मैंने अपने खुशी से खुश्बू की पढर्Þाई में खर्च किया था । लेकिन अभी आकर वह झूठ बोल रही है । मैंने कभी नहीं सोचा था कि वह ऐसा भी करेगी ।
एक बार मैं व्यापार के सिलसिले में भारत गया था । एक-दूसरे का फेशबुक आइडी और पार्सवर्ड हम जानते थे और सहमति में खोलकर देखते रहते थे । जब मैंने एक दिन खुश्बू का फेसबुक एकाउन्ट खखोल कर देखा तो उसने एक मित्र को मैसेज दिया था, जो देखकर मैं आर्श्चर्य चकित हो गया । लिखा था- ‘मैंने जीवन के आठ साल एक खराब व्यक्ति के साथ गुजार कर अपना समय बर्बाद किया । अभी मैं दिनेश अधिकारी उर्फ-चरी) के साथ ऐश कर रही हूँ । वह एकदम ही कूल है । हमारा प्यार हवा के रूप में आकाश में उडÞ रहा है ।’ इस मैसेज को लेकर मैंने खुश्बू को गाली दी । उसी समय दिनेश का भी फोन आया, उसको भी मैंने गाली दी । उसके बाद दिनेश मुझे मारने के लिए धमकी देने लगा । जिसके कारण खुश्बू के साथ मेरे सम्बन्ध में दरार आने लगी ।
जब खुश्बू को मैंने पहली बार देखा था, उससे पहले ही मैंने सभी प्रकार के लागू पदार्थ का सेवन छोडÞ दिया था । सन् २००५ से २००६ तक एक साल भूपू एसएसपी बसन्तराज कुंवर के नार्काेन नेपाल में रह कर मैं कुलत से मुक्त होकर ‘एण्टी ड्रग्स’ सम्बन्धी ट्रेनिङ दे रहा था । उसी क्रम में राष्ट्रीय सभागृह में ‘एण्टी ड्रग्स’ सम्बन्धी ट्रेनिङ चल रही थी । उसी कार्यक्रम में खुश्बू से मेरी पहली मुलाकात हर्ुइ थी । उस समय खुश्बू मिस टिन भी नहीं हो पाई थी । उसके बाद मैंने किसी भी लागू पदार्थ का सेवन नहीं किया है । इस बात की जानकारी बसन्त कंुवर को भी है । लेकिन खुश्बू ने अभी बाजार में जो हंगामा मचाया है, वह सब झूठ के सिवा और कुछ नहीं है ।
हाल खुश्बू द्वारा सञ्चालित सेल्टर नामक सामाजिक संस्था भी मेरे पिता द्वारा स्थापित की गई थी । जब मेरे पिता दर्ुघटनाग्रस्त हुए तो संस्था की अध्यक्षता मैंने की । समाज सेवा के प्रति खुश्बूका रुझान देख कर बाद में मैंने ही उस संस्था को खुश्बू के नाम कर दिया ।
-विभिन्न सञ्चार माध्यमों में र्सार्वजनिक कोइराला के कथन के अंश)

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