चर्चा मे पाकिस्तान का बलुचिस्तान और भारत की हुंकार

वीरेन्द्र केएम
इन दिनों पाकिस्तान का बलुचिस्तान बड़ी चर्चा मे है, और यह चर्चा इसलिए जोरों पर है क्योंकि एक शक्तिशाली देश अर्थात भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय दिवस के मौके पर ही किसी दूसरे देश की चर्चा कर दी ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बलुचिस्तान पर बयान देने के बाद दुनिया का ध्यान बलुचिस्तान की तरफ गया है और बलुचिस्तान के राष्ट्रवादी नेताओं को दुनिया के सामने अपनी समस्याओं को रखने का मजबूत आधार मिला है । मोदी के बयान के बाद पाकिस्तान ने यह कहने में देर नहीं लगाई कि भारतीय प्रधानमंत्री का बयान बलुचिस्तान में भारत की भूमिका को साफ करता है । हालांकि सच्चाई यह है कि बलुचिस्तान मामले को पाकिस्तान बेहद तंग नजरिये से देखता है ।
इधर आये दिन हम मीडिया के कई रिपोर्ट्स देखते हैं कि किस तरह पाकिस्तान अपनी सेना के जोर और अत्याचार से बलुचिस्तान की जनता की आवाज दबाने की कोशिश कर रहा है और किस तरह बलुचिस्तान की जनता आये दिन पाकिस्तान विरोधी नारे एवं बलुचिस्तान की आजÞादी के नारे लगाते हैं । भारतीय मीडिया की माने तो पिछले दो हफ्तों में बलुचिस्तान में पाकिस्तान की फौज का जÞुल्म बढ़ गया है । पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस यानी १४ अगस्त को बलुचिस्तान के लोगों ने ब्लैक डे मनाने का फैसला किया था और तभी से पाकिस्तान की फौज निहत्थे बलोच लोगों के ऊपर हर उस हथियार का इस्तेमाल कर रही है, जिसका इस्तेमाल किसी दुश्मन के खिलाफ किया जाता है ।
बलोच नेताओं के दिए कई बयानों से यह भी स्पष्ट है कि वो अपनी इस आजÞादी की लड़ाई में भारत का समर्थन चाहते हैं, अलग बांग्लादेश की मांग के साथ जो एक और आजÞादी की मांग पाकिस्तान का सर दर्द बनी वो है अलग बलुचिस्तान देश की मांग ।
बलुचिस्तान और अकबर बुगती
आज से १० वर्ष पहले बलुचिस्तान की आजÞादी की लड़ाई के सबसे बड़े नेता नवाब अकबर खÞान बुगती की हत्या कर दी गई थी । बुगती की हत्या करवाने का आरोप पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति और तानाशाह जनरल परवेजÞ मुशर्रफ पर लगा था । बलुचिस्तान में इस समय जो कुछ हो रहा है उसके पीछे इस घटना की बहुत बड़ी भूमिका थी । इसलिए १० साल पहले हुई इस घटना के झलक से हम बलुचिस्तान की हालात का संपूर्ण विश्लेषण करेंगे । अकबर बुगती का जिक्र करना इसलिए भी जÞरूरी है क्योंकि वो पाकिस्तान के रक्षा मंत्री रह चुके थे । ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ जिसकी वजह से पाकिस्तान सरकार ने ही उन्हें मरवा दिया ? इसे समझने के लिए आपको अकबर बुगती के बारे में जानना होगा ।
आइए अकबर बुगती के बारे कुछ जानकारी लेते है । अकबर बुगती ने इहायचम विश्वबिद्यालय से अपनी पढ़ाई की थी और १९४७ में पाकिस्तान बनने के बाद वो भी राजनीति में आ गए । १९५८ में अकबर बुगती पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में चुने गए और उसी वर्ष उन्हें देश का रक्षा मंत्री बनाया गया । मार्च १९७३ में उन्हें बलुचिस्तान का गवर्नर भी बनाया गया । इसके बाद बुगती को लगा कि पाकिस्तान की सरकार बलुचिस्तान के लोगों के विकास के लिए कुछ काम नहीं कर रही है । सिस्टम को बदलने के लिए उन्होंने चुनाव लड़ा और १९८९ में बलुचिस्तान के मुख्यमंत्री भी बने ।
लेकिन २००१ में परवेजÞ मुशर्रफ के पाकिस्तान का राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी पाकिस्तान सरकार से ठन गई । अकबर बुगती बलुचिस्तान में पाकिस्तान सरकार के जुल्मों के खिलाफ लगातार आवाजÞ उठाते रहे । और फिर २६ अगस्त २००६ को यानी आज से १० वर्ष पहले नवाब अकबर खÞान बुगती पाकिस्तान सेना के हमले में मारे गए । अकबर बुगती के साथ उनके ३७ साथी भी मारे गए थे । बुगती की हत्या के आरोप में जनरल परवेजÞ मुशर्रफ पर मुकदमा भी चला लेकिन सबूतों के अभाव में इसी वर्ष जनवरी में पाकिस्तान की अदालत ने उन्हें बरी कर दिया ।
पीओके, कश्मीर और आतंकी बुरहान वानी
यँु कहे तो भारत पर सवाल उठाने वाले पाकिस्तान को अपने कब्जÞे वाले अवैध कश्मीर यानी पीओके के लोगों का दर्द नहीं दिखाई देता । पाकिस्तान को बलुचिस्तान के लोगों की चीखें भी सुनाई नहीं देतीं । इन दोनों जगहों पर हो रही मानव अधिकारों की हत्या पर पाकिस्तान ने कभी कोई चिंता नहीं जताई । इसलिए ये सवाल भी जरुरी है की पीओके और बलुचिस्तान पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाजÞ शरीफ खामोश क्यों हैं ? और ये भी विाल जरुर बनता है की कश्मीर के हालात इस समय कैसे हैं और वहां क्या चल रहा है ?
आतंकी बुरहान वानी की मौत कुछ दिन बाद भी कश्मीर घाटी में तनाव जारी है और हिंसा में मरने वालों की संख्या अब ३७ हो चुकी है । इस बीच कई जगहों से सुरक्षा बलों पर पथराव की खÞबरें भी आई हैं और दक्षिण कश्मीर और उत्तर कश्मीर के कई इलाकों में कर्फ्यू भी लगी और अभी फुकुवा करदि गई है । हालात को निपटाने के लिए भारत के गृहमन्त्री राजनाथ सिंह और जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती दिल्ली और कश्मीर के आवाजाही कर चुके है ।
मोदी की पालिसी से चीन भी चिंतित
चीन के एक प्रभावी थिंक टैंक ने कहा है कि अगर भारत के किसी ‘षड्यंत्र’ ने बलूचिस्तान में ४६ अरब डालर लागत की चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) परियोजना को बाधित किया तो फिर चीन को ‘मामले में दखल देना पड़ेगा ।’ चाइना इंस्टीट्यूट आफ कंटम्पररी इंटरनेशनल रिलेशन्स के इंस्टीट्यूट आफ साउथ एंड साउथ ईस्ट एशियन एंड ओसिनियन स्टडीज के निदेशक हू शीशेंग ने आईएएनएस से खास मुलाकात में कहा कि स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से दिए गए भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बलूचिस्तान का जिक्र, चीन और इसके विद्वानों की ‘ताजा चिंता’ है ।
पाकिस्तान की राजनीति
मीडिया रिर्पोट की माने तो नस्लीय विविधता और बहुलता अभी भी पाकिस्तान की राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरी है । नस्लीय विविधता को बढ़ावा देने की बजाए पाकिस्तान की रणनीति उसे कुचलने की रही है । बलुचिस्तान में चल रहे अलगाववादी आंदोलन से निपटने की पाकिस्तानी रणनीति यह साफ कर देती है कि वह बांग्लादेश के टूटकर अलग होने की ऐतिहासिक घटना से कोई सबक नहीं ले पाया है । बलोच मुद्दे पर पाकिस्तान का नजरिया बांग्लादेश की तरह ही तंग रहा है । पूर्वी बंगाल में चल रहे विद्रोह को भी पाकिस्तान ने इसी नजरिए से दबाने की कोशिश की थी ।
पाकिस्तान की सियासत में पंजाब का वर्चस्व रहा है और इसकी वजह से १९७१ में बांग्लादेश पाकिस्तान से टूटकर अलग हुआ । बलोच राष्ट्रवादियों की शिकायतें और उनके दमन का तरीका पूर्वी पाकिस्तान की पुनरावृत्ति है । पाकिस्तान सरकार की नस्लीय अलगाववाद की नीति किस कदर बलोच पहचान को मजबूत कर रही है, इसका अंदाजा दिल्ली पहुंचे २५ वर्षीय बलोच शरणार्थी मजदक दिलशाद बलोच के बयान से लगाया जा सकता है । मजदक के पास कनाडा का पासपोर्ट था लेकिन उसमें उनके जन्मस्थल के तौर पर क्वेटा का जिक्र था. इस वजह से वह अधिकारियों के संदेह के घेरे में आ गए । मजदक ने कहा, ‘मुझे आव्रजन अधिकारियों को यह बताते हुए तकलीफ हो रही थी कि मैं पाकिस्तानी नहीं हूं. आप मुझे कुत्ता कह लीजिए, लेकिन पाकिस्तानी मत बुलाइए. मैं एक बलोच हूं’ मजदक का यह बयान दिनों–दिन तेज हो रही बलोच अस्मिता की लड़ाई की एक तस्वीर हमारे सामने रखता है । १९४७ में भारत–पाकिस्तान की आजादी के बाद से बलोचिस्तान का इतिहास शोषण और उत्पीड़न से भरा रहा है जिसके चलते बलोच राष्ट्रवाद लगातार मजबूत हो रहा है. मूल बलोची अपने लिए अलग देश बलोचिस्तान की मांग कर रहे है ।
बलुचिस्तान का राजनीतिक अतीत
मीडिया रिर्पोट को माने तो पाकिस्तान के कब्जे को लेकर बलोच का लंबा संघर्ष रहा है । बलोच का इतिहास पाकिस्तान के निर्माण से पुराना है । बलुचिस्तान का इतिहास १२वीं सदी से शुरू होता है जब मीर जलाल खान ने करीब ४४ बलोच जनजातियों को पहली बार एकजुट किया था । अंग्रेजों के शासन के दौरान ब्रिटेन के कब्जे में इसका एक हिस्सा था लेकिन अंग्रेजों ने कभी बलोच मामलों में दखल नहीं दिया । इसकी वजह यह रही कि बलोच ने ब्रिटिश सेना को अफगानिस्तान में जाने के लिए रास्ता दिया ।
आजादी से पहले बलूचिस्तान चार रियासतों में बंटा था. कलात, लासबेला, खरान और मकरान. विभाजन से करीब तीन महीने पहले मोहम्मद अली जिन्ना ने कलात नाम से स्वतंत्र राज्य के दर्जे का वादा किया जो चारों रियासतों को मिलकर बनता. कलात बलूचिस्तान की सबसे बड़ी रियासत थी ।
११ अगस्त १९४७ में एक आदेश भी जारी किया गया जो कलात को एक संप्रभु और आजाद राज्य का दर्जा देता था. लेकिन अक्टूबर १९४७ तक जिन्ना ने अपना विचार बदल दिया और उन्होंने कलात को पाकिस्तान में शामिल किए जाने का विचार रखा ।
जिन्ना के प्रस्ताव का विरोध हुआ और फिर २६ अगस्त १९४८ को पाकिस्तान की सेना बलोचिस्तान में घुस गई. बलोच पहचान को दबाने की कोशिशों का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान के पहले दोनों संविधान में बलोच को एक अलग समूह के तौर पर मान्यता नहीं दी गई । बलोचों की आजादी की पहली लड़ाई इस कब्जे की प्रतिक्रिया में हुई. बलोचों ने पाकिस्तान की इस कोशिश को सैंडेमन सिस्टम (बलोच और ब्रिटिश समझौता, जिसके तहत सरदारों को स्वायत्ता दी जानी थी) का उल्लंघन माना गया ।
भारत उस वक्त कश्मीर में पाकिस्तान की तरफ से भेजे गए कबायली हमलावरों से जूझ रहा था. लेकिन पाकिस्तान ने भारत पर प्रिंस को भड़काने का आरोप लगाया । ‘पाकिस्तान की सियासत में पंजाब का वर्चस्व रहा है और इसकी वजह से १९७१ में बांग्लादेश पाकिस्तान से टूटकर अलग हुआ’ पाकिस्तान ने बलोच राष्ट्रवादियों को मास्को का एजेंट भी बताया । १९४८ में ही करीम अन्य बलोच राष्ट्रवादी और कुछ कम्युनिस्ट नेताओं के साथ अफगानिस्तान चले गए और वहां से बलोच र ाष्ट्रवाद को आगे बढ़ाने का काम करते रहे ।
पाकिस्तान की रीढ़ बना बलुचिस्तान
मीडिया रिर्पोट को माने तो बलुचिस्तान की सीमा पाकिस्तान, ईरान और अफगानिस्तान से लगती है । बलुचिस्तान का क्षेत्रफल पाकिस्तान के क्षेत्रफल का करीब ४३ फीसदी है और यहां पाकिस्तान की महज पांच फीसदी आबादी रहती है. गैस के अलावा यहां कोयला, तांबा, चांदी, प्लेटिनम, अल्युमिनियम, सोना और यूरेनियम का भंडार है । (तापी–तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान और पाकिस्तान) से होकर जाने वाली पाइपलाइन बलुचिस्तान से होकर गुजरने वाली है । पाकिस्तान बलुचिस्तान के जरिये ही समुद्र से जुड़ा हुआ है. पाकिस्तान के तटीय क्षेत्र की लंबाई करीब ७६५ किलोमीटर है और यह पूरा इलाका बलुचिस्तान प्रांत में ही आता है ।
पाकिस्तान के तीन अहम नौ सैनिक केंद्र इसी इलाके में आते हैं । निर्माणाधीन ग्वादर बंदरगाह इसी प्रांत में आता है जिसे सिंध के कराची के विकल्प के तौर पर विकसित किया जा रहा है । ग्वादर बंदरगाह को भारतीय नौसेना की सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील माना जाता रहा है । अफगानिस्तान में आतंक के खिलाफ चल रही लड़ाई में बलोचिस्तान के सैन्य केंद्रों की अहम भूमिका है । भू–स्थैतिक, आर्थिक और सामरिक कारणों से बलोचिस्तान पाकिस्तान की जीवन रेखा है । यही वजह है कि बलोच राष्ट्रवादियों की मांग को पाकिस्तान साजिश बताते हुए सैन्य और इस्लामीकरण के जरिये दबाता रहा है ।

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