चलता है यार !:मुकुन्द आचार्य

कभी-कभी मुझ पर पागलपन सवार हो जाता है। ऐसी ही किसी मौके पर मैंने सम्बन्धित मन्त्रालय के एक अफसर से पूछा था- पेट्रोलियम पदार्थ का मूल्य हमेशा बढÞता रहता है। फिर भी आयल निगम हमेशा घाटे में रहती है। यह क्या मजाक है – इसकी जड में भ्रष्टाचार के दीमक तो नहीं लगे हैं –
प्रश्न सुनते ही अफसर ने कठोर नजरों से मुझे घूरा, फिर स्वयं को नियंन्त्रित करते हुए कहा, पेट्रोलियम पदार्थ की कीमत हम जब चाहें बढÞा सकते हैं, बढÞाते ही हैं और बढÞाते रहेंगे। आप को क्या प्रोब्लेम है – दो चार लीटर चाहिए हो तो आ जाइए, हमारे बंगले पर, मिल जाएगा। आप भी क्या याद रखिएगा कि किसी र्रइस से पाला पडÞा था। और हाँ जहाँ तक भ्रष्टाचार की बात है- यह तो विश्वव्यापी विमारी है। किस देश में भ्रष्टाचार नहीं होता – बडेÞ देशों में भ्रष्टाचार भी बडेÞ-बडेÞ होते है, हम गरीब देश के भ्रष्टाचारी छोटा-मोटा हेरफेर कर के सन्तोष कर लेते हैं। गुजारा चलाते हैं। वैसे हमने भी पूरे अफिस में जगह-जगह तख्ती लगवा दी है। जिस में सुन्दर अक्षरों में लिखा है- भ्रष्टाचार को कीडेÞ पडेÞं। भ्रष्टाचारी के लिए प्रवेश निषेध ! आदि इत्यादि। इससे ज्यादा हम कर भी क्या सकते हैं –
मैंने कहा- इतना सारा करने पर भी भ्रष्टाचार आनन्द से फलफूल रहा है। हाकिम ने फरमाया- चलता है यार !
संयोग की बात। पडÞोस के मुहल्ले में एक रिटायर्ड हाकिम रहते हैं। उनको पूछा, मैंने सुना है- भंसार, मालपोत, वन विभाग, राजस्व आदि के कर्मचारी छुट्टी के दिनों को दर्ुर्दिन समझते हैं ! मनाते हंै कि अफिस कभी बन्द न हो। बहती गंगा में डूबकी लगने को मिलता रहे। हाथ और पकेट गरम रहें।
सेवानिवृत्त अफसर ने कहा- सरकार महंगाई जिस अनुपात में बढÞाती है, वेतन उसी अनुपात में तो नहीं बढÞा सकती। कर्मचारी को मजबूरन भ्रष्टाचार करना पडÞता है। अपनी खुशी से कोई भ्रष्टाचार नहीं करता। साला पापी पेट जो न कराए। देश इसी तरह चलता है। चलता है यार !
अफसर ने फिर मुझे दबोचा, देखिए जनाब ! जहाँ तक छुट्टी की बात है, यह तो कर्मचारी की कर्तव्यनिष्ठा है, जो वे छुट्टी के रोज भी जनता की सेवा करना चाहते हैं। हर बात को आप लोग उल्टी नजर से क्यों देखते हैं – सच्चा देशभक्त कर्मचारी तो छुट्टी के रोज भी जनता जनार्दन की सेवा करना चाहता है। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर कोई सेवाग्राही कुछ ‘पत्रं पुष्पं जलं तोयं’ देता है तो इस में बुर्राई क्या है – जब काम करने और करानेवाले दोनों खुश है तो दूसरों को क्यों तकलीफ होती है, मीयाँ वीवी राजी तो क्या करेगा काजी ! दूसरे के मामले में टांग अडÞाना बहुत बुरी बात है। बेचारे कर्मचारी तो गीता में कथित सिद्धान्त के पालक हैं। कर्म करते हैं, फल की आशा नहीं रखते। स्वतः कुछ प्राप्त होता है तो उसी मे संतोष करते हैं। उन्हें घूसखोर कहना तो महापाप है। अच्छे लोग ऐसे पापों से जहाँ तक सम्भव हो खूद को बचाते हैं। ऐसे ही चलता है यार !
इतना सुनने पर मैं भी वहाँ से चल दिया। इतने में एक मोटी ताजी महिला प्रकट हर्ुइं। उमर के हिसाब से उनकी आँखों में सुन्दर सा चश्मा शोभायमान था। शरीर को स्थूलकाय कहा जा सकता है। वे किसी इंगलिश बोर्डिङ स्कूल की प्रिन्सिपल थीं। कुछ भव्य, कुछ भयावना व्यक्तित्व !
मैंने उनको कहा, आपकी तो चाँदी है। मनमाना स्कूल फी लेना है और प्लेग्रुप के बच्चों से भी कम्यूटर फी, स्वीमिङ, हर्स राइडिङ, लाइब्रेरी फी शान से लेती हैं। आप के तो दोनों हाथ में लड्डू और सर कडÞाही में है। छोटे-छोटे बच्चों को भी दस-बार्‍ह विषय की पुस्तकें लदवाती हैं। डे्रस और बुक्स से भी अच्छा कमीसन मिलता है। इस तरह खुल्लम खुल्ला लूटने पर भी सरकार को इनकम टैक्स देते समय नानी मरती है।
प्रिन्सिपल महोदया ने मेरे आक्षेपों का कुछ भी बुरा न माना। घाघ जो ठहरीं। सत्तर चूहे खाकर बिल्ली हज करने चली थी।  हँसते हुए उन्होंने कहा देखिए हम लोग स्तरीय शिक्षा देते हैं- तो जाहिर है कि हम फी भी स्तरीय ही लेंगे। जैसा माल, वैसा दाम ! इस में गलत क्या है – हमारे बच्चे कितनी फर्रर्ाादार र्इंगिलिश बोलते हैं। सुनकर पापा-ममी के रोम-रोम मुस्कराने लगते हैं। वे निहाल हो जाते हैं। अपने को धन्य-धन्य समझते हैं।
प्रिन्सिपल मैम फिर मिमियाने लगीं- खुद बच्चों के गार्जियन महंगे स्कूल-क्याम्पस में बच्चों को पढÞाना चाहते है तो इस में हमारा क्या कसूर है – हम तो स्तरीय शिक्षा देते हैं और बदले में स्तरीय शुल्क भी ऐंठते हैं। अच्छी सेवा की अच्छी कीमत असूलते हैं। और क्या – इस देश में यह सब चलता है !
इत्तफाक से एक व्यापारी बन्धु मिल गए। उनका कुशल मंगल पूछा तो लगे अपना दुखडÞा रोने- सरकार की गलत नीतियों के चलते व्यापार, उद्योग-धन्दा सब कुछ चौपट हो रहा है। हम लोग तो सिर्फसेवा कर रहे हैं। फायदा कुछ नहीं है। हर मोडÞ पर पुलिस का हाथ गरम करना पडÞता है। पार्टर्ीीलों को समय समय में चन्दा देना ही पडÞता है। सारा नाफा तो पार्टर्ीीले लोग उडÞा ले जाते हें। हमारा हाल तो होता है- कारवां गुजर गया, गुवार देखते रहे। झूठ सांच करके दो पैसे कमाओ, वह भी लूटेरे आकर लूट जाते हैं !
मैं द्विविधा में पडÞ गया, इस व्यपारी को मैं कैसे क्या समझाऊँ। वही फर्मूला अपनाया- चलता है यार ! इतना कहकर मैं खूद चलते बना ! िि
ि

Enhanced by Zemanta
Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz