चश्मा ! ओली के सारे कार्यकर्ता टीन का चश्मा पहनते हैं जिसमें खूद के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता

बिम्मी शर्मा, काठमांडू ,५ सेप्टेम्बर |

चश्मा आँख खराब होने पर या कड़ी धूप से बचने के लिए आँख पर लगाया जाता है । पर कई लोग अपने मन की मलीनता और कुत्सित भावना छुपाने के लिए भी आँख में चश्मा लगाते हैं । क्योंकि आँख तो मन का दर्पण है । हृदय के हर भाव की चुगली कर देती है आँख इसीलिए छुपे रुस्तम लोग चश्मा पहन कर अपने दिल के दरवाजे पर ताला लगा देते हैं । पर जुबान पर ताला नहीं लगा पाने के कारण हृदय के से सारे राज बाहर आजाते है । और आँख शर्मिन्दा हो जाती है जुबान के कारण ।

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वो कहते है न कि सावन के अंधे को हर जगह हरा ही नजर आता है । जरुर यह कहावत बनाने वाले ने हरे रंग का चश्मा पहना होगा ? पर हमारे देश में एक ऐसी राजनीतिक पार्टी है जिसे अपने सिवा और सब सूखे और गंजे की टोली लगती है । वह पार्टी है नेकपा एमाले । इस पार्टी को लगता है कि वह जो भी बोलती या करती है सब ठीक और उचित । और बाकी सारे दल और उनके कार्य, व्यवहार बेठीक और अनुचित । इस पार्टी के लोग कहां का पिसा आटा खाते है पता नहीं ।

पिछले साल जब केपी शर्मा ओली प्रधानमंत्री बने थे तब परराष्ट्र मंत्री कमल थापा को विशेष दूत बना कर भारत की राजधानी नयीं दिल्ली भेजा गया था । एमाले के सत्तासीन हो कर थापा को दूत बना कर भेजना वाजिब था । पर कमरेड प्रचंड के प्रधानमंत्री बनने के बाद गृह मंत्री बिमलेन्द्र निधि को विशेष दूत बना कर भारत भेजना गलत है । वाह भई वाह एमाले गण खुद करे तो रामलीला और दूसरा कोई करे तो रास लीला ? देखा आप ने इन के आंख का चश्मा कार्ल मार्कस या लेनिन के जमाने का है । धूल से सने चश्मे से सभी को देखते है पर अपने अंदर झांक कर नहीं देखते ।

और इस से भी आश्चर्य कि बात यह है कि चीन और भारत दोनों देश में एक ही साथ कृष्ण बहादुर महरा और बिमलेन्द्र निधि विशेष दूत बन नेपाल सरकार के तरफ से पत्र ले कर गए थे । पर चीन को नेपाल से भेजा गया पत्र और उधर से आए प्रति उत्तर के बारे में कोई चर्चा या हल्ला नहीं । पर इधर से भारत भेजा गया पत्र और वहां से आए जवाब के प्रति एमाले जन की उत्सुकता देखते ही बनती है ? भारत के तरफ से भेजे गए उत्तर को सार्वजनिक करने के लिए एमाले जन कौवे की तरह कांव, कावं कर रहे हैं । चीन का सब गुनाह माफ और भारत गुनाह करे तो उस को साफ ही कर दो । यही एमाले की रणनीति है और उसने लोगों को इन्हीं भावनाओं को भड़का कर ९ महीने तक शासन किया । पर ९ महीने शासन की चाशनी में डूबने की मिठास से नहीं भरा है बेचारे एमाले गण का ।

नेकपा एमाले के सुप्रिमो और पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली सरकारी पैसे से उपचार के बहाने से परिवार सहित बैंकक जाते हंै । पर बैंकक में वह अपने शरीर का उपचार नहीं कराते बल्कि सत्ता का उपचार और उद्धार कर फिर से खुद ही प्रधानमंत्री बनने का दाँव खेलते हैं । बैंकक में अपनी पत्नी के साथ खूब मौज, मस्ती करते हैं और नाम देते हैं उपचार का । केपी ओली मुहावरे की चाशनी मे घोल कर राष्ट्रवाद की गोली दूसरों को खिलाने में सिद्धहस्त है । अपने सभी विपक्षी को राष्ट्रघाती और भारत परस्त का आरोप लगाने वाले ओली खुद ही भारतीय अधिकारी भेंट कर अपनी मनोवांक्षित पाने की कोशिश कर रहे है ? क्या बैंकक में उन्हे राष्ट्रवाद की टोपी पहने हुए देखा क्या ?

खुद जो भी करें अच्छा और बांकी सब का कच्चा । यही एमाले की राजनीति और ओली की रणनीति । ओली राष्ट्रवाद की टोपी किसी जादूगर की तरह अपने मन माफिक कर देश के नागरिकों को बेवकुफ बनाते आए हैं । ओली चीन में बने चश्मा आंख में और रुसी टोपी सिर में पहन कर बांकी दुनिया को देख रहे हैं । ओली अपने ९ महीने के शासनकाल में देश विकास और आश्वास की इतनी हवा फेंक चुके थे कि उन्हें इससे राष्ट्रवाद नाम का गैसट्रिक और बदहजमी हो गया था । इसी का इलाज कराने ओली बैंकक गए थे । एमाले और ओली के कुल देवता पहले तो कार्ल मार्कस्, लेनिन और चे ग्वाभेरा थे पर अब इस सूची में चीन के माओ भी जुड़ गए हैं ।

जिधर से माल मिले उधर की तरफ मुहँ कर के भजन किर्तन गाना ओली एंड कंपनी नेकपा एमाले कावि शेष शगल है । यह सब करने के लिए यान जो मिलता है इन्हें । याद है जब जेम्स एफ. मोरियार्टी अमेरिकी राजदूत बन कर नेपाल आए थे । तब जब वह एमाले के मुख्यालय गए थे तब मोरियार्टी को खुश करने के लिए सारे राष्ट्रिय और अंतराष्ट्रिय कम्युनिष्ट वहां की गैलरी से हटा दिए गए थे । अमेरिका ठहरा एक पुंजीवादी देश । उसे कम्यूनिष्ट फूटी आंख नहीं सुहाते । अब एमाले ठहरा जो बडा और शक्तिशाली है उसी का जी हजूरी करने वाली पार्टी । इसी लिए तो प्रसिद्ध उद्योग पति विनोद चौधरी को सभासद में मनोनित किया था एमाले ने । ताकि चौधरी से पार्टी को मालमिलता रहे ।

गत साल के भूकंप के बाद चिनीया बोर्डर तातोपानी नाका बंद है पर कोई बात नहीं । चीन और नेपाल का खाने वाला मुँह तो खुला ही है । पर मधेश आंदोलन के दौरान वीरगंज नाका कुछ महीना बंद रहा तो एमाले जन का खून खौल उठा । मधेश की जायज मांग पूरा करना तो दूर यह उल्टा भारतीय नाकाबंदी को राष्ट्रियता से जोड़ने में कामयाब हो गए । जिसने नाकाबंदी का विरोध किया वह सही और महान राष्ट्रवादी और जिसने नाकाबंदी नहीं है कहा वह गलत और देशद्रोही बन गया एमाले एंड कंपनी की नजर में । हाथी के दिखाने के दांत और खाने के दांत कुछ और होते हैं । एमाले का काम ही लिपापोती कर के घर की गंदगी को अंदर ही रहने देना ।

देश में जितने भी एनजिओ और आइएनजिओ है सब में एमाले गण ही काबिज है । अपने भातृ और भगिनी संगठन के दम पर चुनाव लड़ना और जड़ तक फैले कार्यकर्ताओं से अपनी जी हजूरी करवाना यही है नेकपा एमाले का असली जनवाद । अपने जनवाद का भद्धा प्रहसन कर के मजाक बन चुकी यह पार्टी कुछ गिने चुने नेताओं के कंधे पर टिकी है । अपनी पार्टी के मुखपत्र की तरह पत्रिका, एफएम रेडियो, टिभी और अनलाईन चला कर खुद का डंका पीटना इस पार्टी को बखुबी आता है ।

यह पार्टी अपने सारे कार्यकताओं को टीन का चश्मा पहनने के लिए देती है । जिस चश्मे से खूद के अलावा बाहर का कुछ नहीं दिखाई देता । जिस चश्मे मे साफ शब्दो में लिखा है मेड ईन राष्ट्रवाद । यह राष्ट्रवाद चीन का है या रुस का यह उन्हें भी पता नहीं होगा । एमाले गण इतने चतुर हैं कि डाक्टर या ईन्जिनियर एसोसिएसन के चुनाव में अपनी जीत के लिए नकली प्रमाण पत्र पेश करने में भी संकोच नहीं मानते । इसी लिए नेकपा एमाले को अगले चुनाव में अपना चुनावचिन्ह सूर्य को हटा कर चश्मा कर देना चाहिए । एमाले है ही एक ही चश्मे से सबको देखने और भेदभाव करने वाली पार्टी । एमाले को विरासत मे ही यही मिला है । कपडा भले पुंजीवादी हो पर चश्मा बिल्कुल साम्यवादी और टोपी राष्ट्रवादी होनी चाहिए । है न मजे की बात ? (व्यग्ंय)

 

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