चार दलों की साजिश, आन्दोलन की राह में मधेश

kailash das

कैलाश दास

देश जब महाभूकम्प की चोट से जूझ रहा था, हर ओर अफरातफरी का माहौल था, उस समय देश के दर्द से बेवास्ता होकर चार दलों के बीच अप्रत्याशित सहमति हुई, १६ बुन्दे सहमति । यह सहमति मधेश की चाहत और भावनाओं को नजरअंदाज कर के किया गया । २०६३÷०६४ का मधेश आन्दोलन संघीय संविधान और स्वायत मधेश प्रदेश के लिए किया गया था और सरकार और मधेशवादी दल बीच इन बुन्दो पर सहमति होने के पश्चात ही मधेश आन्दोलन स्थगित हुआ था ।

 

सुरेन्द्र महतो, वरिष्ठ अधिवक्ता

सुरेन्द्र महतो, वरिष्ठ अधिवक्ता

सर्वोच्च कीे अवहेलना कर बनाया गया संविधान पूर्णरूप से अवैधानिक कहलाएगा । फौजदारी अपराध मुद्दा के फैसला के बाद संविधान का कोई औचित्य नही रहेगा । यह फौजदारी अपराध मुद्दा चार दलों के अध्यक्ष, सभासद् मात्र नही संविधान सभा अध्यक्ष सुभाषचन्द्र नेवाङ्ग पर भी लगाया गया है । सर्वोच्च का फैसला आने के बाद ही संविधान सभा का औचित्य स्पष्ट होगा । –

वि.सं. २०६४ साल में संविधान सभा चुनाव हुआ और एमाओवादी—मधेशवादी दल बीच बहुमत की सरकार भी बनी थी । बिना किसी निष्कर्ष और प्राप्ति के वो चार वर्ष गुजर गए लेकिन संघीय संविधान और प्रदेश निर्माण में विवाद के कारण संविधान नही बन सका । तत्कालीन प्रमुख न्यायाधीश खिलराज रेग्मी ने संविधान निर्माण के लिए एक निश्चित समय सीमा निर्धारित किया और कहा कि  समय में संविधान नहीं बना तो उन्हे विघटन कर दिया जाएगा ।
वृषेशचन्द्र लाल, केन्द्रीय उपाध्यक्ष, तमलोपा

वृषेशचन्द्र लाल, केन्द्रीय उपाध्यक्ष, तमलोपा

चार दल ने मसौदा लाकर सर्वोच्च अदालत की अवहेलना की है । सर्वोच्च का फैसला नहीं मानना राज्य को कानूनविहीन बनाना जैसा है । कानून व्यवसायी ने सर्वोच्च के आदेश उल्लंघन विरुद्ध फौजदारी मुद्दा चलाया है इसे सर्वोच्च को गम्भीरतापूर्वक लेना होगा । दूसरी बात अभी यह भी हल्ला है कि मधेशवादी दल संविधान सभा परित्याग कर आन्दोलन करें यह अभी के समय में औचित्यहीन है । अभी सड़क से सदन तक अधिकार की लड़ाई लड़ने का समय है । यहाँ सब कुछ आन्दोलन से ही परिवर्तन हुआ है । इस आन्दोलन में सभी मधेशवादी पार्टी एक जुट होकर आगे बढ़ें यह आग्रह भी है । हाँ, चार दल संविधान लाने की बात कर रही है । अगर संविधान लाया भी तो दीर्घयामी संविधान नही बनेगा । जनता सभी नेता का पहचान कर रही है । जहाँ जनता सर्वोपरि वहाँ पर हठजोड़ नही चलेगा । –

रोशन जनकपुरी केन्द्रीय अध्यक्ष मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा नेपाल (क्रान्तिकारी)

रोशन जनकपुरी
केन्द्रीय अध्यक्ष
मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा नेपाल (क्रान्तिकारी)

दूसरी बात सर्वोच्च अदालत के आदेश के उल्लंघन के विरोध में सभी को आगे आने की आवश्यकता है चाहे मधेशवादी दल हो वा अन्य दल । आप मसौदा जलाए या फाड़ें इससे अगर सरकार को किसी प्रकार का फर्क नही पड़ता है तो जलाने वा फाड़ने से क्या फायदा ? संसद में आप मसौदा को फाड़ते हैं लेकिन सरकार किसी प्रकार का रिसपोन्स नहीं ले रही है तो वैसी स्थिति में संसद परित्याग कर सड़क आन्दोलन में आना चाहिए । जहाँ पर आपकी कदर एवं मर्यादा नही हो वहाँ पर रहकर अधिकार की बात करेंगे तो आपको अधिकार कभी नही मिलेगा । हाँ, जिस प्रकार से चार दल शक्ति के बल पर संविधान निर्माण में लगी है अगर इसके विरोध में आर—पार का आन्दोलन नही हुआ तो यह सब संविधान लाएगा इसमे कोई दो मत नहीं है । प्रथम चुनाव को विघटन करना, खिलराज रेग्मी प्रधानमन्त्री बनना तथा दूसरा चुनाव होना ही ग्रेन्डडिजाइन अन्तर्गत है जिसे मधेशवादी दल शायद समझ नही सका । सच में मधेशी के अधिकार, पहचान और संघीयता चाहिए तो कसकर आन्दोलन में आवें ।

लालकिशोर साह, केन्द्रीय सदस्य सद्भावना पार्टी

लालकिशोर साह, केन्द्रीय सदस्य
सद्भावना पार्टी

जहाँ तक संविधान की बात है जो कानून की हत्या कर सकता है वह फास्ट ट्रेक अन्तर्गत संविधान लाने की कोशिश भी करेगा । लेकिन यह संविधान चार पाँच वर्ष के लिए मात्र होगा, दीर्घयामी नही । सत्ता परिवर्तन के लिए यह सब चालबाज है । लेकिन मधेश में इससे पहले बहुत बड़ा आन्दोलन होगा । –

उस वक्त यह बात अन्तरिम संविधान में है कि नही, सर्वोच्च अदालत का यह निर्णय कितना न्यायपूर्ण है, उस पर अभियोग लगाया जाए की नही यह बहस का विषय नही बना था । जबकि सर्वोच्च के आदेशानुसार ही दूसरा संविधान सभा का चुनाव करना पड़ा ।
इस बार भी चार दल ने १६ बुँदे सहमति कर संविधान निर्माण के प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है, जिसमें संघीयता का सवाल, प्रदेश का सीमाकंन और नामांकन, भारतीय महिला के साथ विवाह करने पर नागरिकता सहित का विवाद देखा गया है । जबकि अन्तरिम संविधान के धारा १३८ ने मधेशी, जनजाति सहित पिछड़े  समुदाय की चाहना को आत्मसात् कर राज्य अग्रगामी पुनर्संरचना करना, प्रदेश का नामांकन, सीमांकन के साथ ही केन्द्र और प्रदेश की सूची भी संविधान सभा ही निर्धारण करेगी यह स्पष्ट उल्लेख था ।  जिसे अनदेखा कर १६ बुन्दे सहमति की गई । चार दल द्वारा किया गया १६ बुँदे सहमति विरुद्ध रिट पड़ने पर सर्वोच्च अदालत ने अन्तरिम आदेश मात्र नही, परमादेश भी जारी कर ‘डिस ब्रेक’ लगा दिया है । सर्वोच्च अदालत द्वारा १६ बुँदे सहमति पर लगाया गया डिस ब्रेक चार दलों के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन चुका है । अभी वही सर्वोच्च का फैसला टीका टिप्पणी ही नही फेर बदल करवाने के लिए शोषक प्रवृति के नेता, रिटायर न्यायाधीश, अधिवक्ता तथा कुछ सञ्चार गृह भी दवाव डाल रहे हैं । जबकि ७५ प्रतिशत राजनीति दल के नेता एवं जनता ने सर्वोच्च के ‘डिस ब्रेक’ का स्वागत किया है ।
ऐसा लगता है कि यह १६ बुँदे सहमति चार दल के खस शासक नेताओं का है, क्योकि एमाले, एमाओवादी, काँग्रेस सहित के मधेशी सभासद नेतागण भी इसका विरोध जता रहे हैं । नेपाली काँग्रेस के सभासद् अमरेश कुमार सिंह ने तो खुलकर विरोध किया है । जिस दिन १६ बुँदे सहमति हुई थी उसी दिन उन्होने फरक मत भी प्रस्तुत किया था । उतना ही नही सिंह ने चेतावनी भी दी कि अगर १६ बुँदे सहमति अनुसार ही मसौदा आया तो सबसे पहले मंै ही जलाउँगा । नेपाली काँग्रेस के नेता एवं यातायात तथा भौतिक पूर्वाधार मन्त्री विमलेन्द्र निधि ने भी सर्वोच्च अदालत के ‘डिस ब्रेक’ को स्वागत योग्य बतलाया है । एमाओवादी, फोरम लोकतान्त्रिक का सभासद एवं नेताओं ने खुलकर १६ बुँदे सहमति का विरोध किया  है ।
उसके बावजूद भी सर्वोच्च अदालत के परमादेश का उल्लंघन करते हुए चार दल ने हैकमवादी प्रवृति दिखाते हुए मसौदा तैयार किया और उसे पेश भी किया है । जिसके विरोध में मधेशवादी दल सहित अन्य दल के नेतागण हैं । मधेश नेतृत्व के चार बड़े दल फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव, सद्भावना के अध्यक्ष उपेन्द्र महतो, तमलोपा के अध्यक्ष महन्थ ठाकुर, संघीय समाज के अशोक राई सहित सड़क संघर्ष में उतर चुके हैं । सर्वोच्च अदालत के आदेश का उल्लंघन और जनता की भावना विपरित जिस प्रकार की संविधान निर्माण की तैयारी हो रही है, आने वाले कल में देश के लिए सबसे बड़ा घातक कदम साबित होगा । ऐसी स्थिति में चार दलों को एक बार फिर सोचना चाहिए और   सहमति के आधार में संविधान निर्माण की तैयारी करनी चाहिए । सर्वाेच्च के फैसले का उल्लंघन और मधेशवादी दल का विरोध एक बार फिर से नेपाल में नेपाली जनता के बीच द्वन्द को आमंत्रित कर रही है । इतना ही नहीं देश का  विकास फिर एक बार अवरुद्ध होने की पूरी सम्भावना दिख रही है ।
अभी जिस प्रकार से चार दलाें के नेताओं ने अपना राजनीतिक चेहरा दिखाया है इसका राजनीतिक दलों में ही नही जनता में भी कोई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा है ।  माओवादी का वैद्यपक्ष, विपल्व, मातृका यादव सहित के दल विरोध में है । ३० दलीय मोर्चा के अध्यक्ष प्रचण्ड केवल एक दल के अध्यक्ष में सीमित हो चुके हैं । फोरम लोकतान्त्रिक के अध्यक्ष विजय कुमार गच्छेदार ‘न घर के न घाट के’  हैं ऐसी दलों की बीच चर्चा है ।
संविधान निर्माण में चार दलों के चक्रव्यूह चाल के कारण ही आज नेपाल आन्दोलन की राह में है । एक तरफ सर्वोच्च अदालत के परमादेश का उल्लंघन कर चार दल संविधान का मसौदा लेकर आए हैं तो दूसरी ओर मधेशवादी, जनजातिवादी और राप्रपा उसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं और जगह जगह उसे जलाया जा रहा है । संविधान निर्माण के लिए १६ बुँदे सहमति केवल मधेश को ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण नेपाली नागरिक को द्वन्द्ध के राह पर भेजने की सहमति साबित हो रही है ।  संयुक्त राष्ट्र संघ, भारत आदि देश विवाद रहित सहमतीय संविधान निर्माण के लिए बार बार  ध्यानाकर्षण कराते आ रहे है । वहीं एमाले और नेपाली काँग्रेस की संयुक्त सरकार मधेशी दल के बीच कभी वाक युद्ध तो कभी विभेद नीति अपनाकर मधेशी दलों को आन्दोलन करने पर बाध्य कर रही है ।
आन्दोलन के बल पर ही राणा शासन, शाही शासन की समाप्ति हुई इसका इतिहास गवाह है । एक और इतिहास है कि नेपाल का हर निर्णय आधी रात में हुआ है यह परम्परा अब तक टूटी नहीं है । और यह भी एक सच है कि मध्य रात में हुआ निर्णय टिका नहीं है । इस बार भी चार दलों ने १६ बुँदे सहमति की है वह भी मध्य रात में ही । चार दलो की यह सहमति नेपाल के तीन भूभाग में आन्दोलन होने का संंकेत भी कर रही है ।
एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली ने सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश गिरिश चन्द्र लाल के ऊपर यह कहते हुए आरोप लगाया है कि चार दलो का १६ बुँदे सहमति राजनीतिक मसला है उस पर न्यायालय का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए । उन्होंने तो यह भी कह दिया कि संंविधान निर्माण के क्रम में अन्तरिम संविधान का कोई महत्व नही है । यह वक्तव्य नेपाली जनता के लिए एक जिम्मेदार व्यक्ति ने दिया है यह बहुत ही अफसोस की बात है । सरकार में रही पार्टी प्रमुख की ओर से न्यायपालिका के ऊपर आरोप लगाने से पहले उन्हे समझना चाहिए की सर्वोच्च कानूनी दायरा में रहकर ही किसी को फैसला या निर्देश देता है । सर्वोच्च ऊपर का हस्तक्षेप कानून विहीन राज्य की अवधारणा सावित होगी । ऐसे नेता से क्या उम्मीद की जा सकती  है वह तो अगामी दिन में जनता ही निर्णय लेगी ।
अगर मुल्क को द्वन्द्ध से बचाना है तो सहमति के आधार में संघीयता सहित का संविधान, प्रदेश का नामांकन और सीमांकन निर्धारण कर संविधान निर्माण प्रक्रिया को आगे बढाने में ही हितकर दिखाई देता है ।
एमाओवादी का मधेशी प्रति का चरित्र
वि.सं.२०७० मंसिर ४ गते दूसरा संविधान सभा चुनाव में एकीकृत नेकपा माओवादी का अध्यक्ष पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ जब पहाड़ी जिला से पराजित होकर मधेश के सिरहा से विजयी हुए थे, उस समय उन्होंने कहा
‘अब मधेश और मधेशी के साथ हमें ‘लभ’ हो गया है’ जब तक मधेश का अधिकार सुनिश्चित नही होगा । ‘संघीयता सहित के संविधान’ और ‘मधेश स्वायत प्रदेश’ सहित के माँग को सरकार सम्बोधन नहीं करेंगे, एमाओवादी मधेशवादी का साथ नही छोडेÞगा ऐसी वचनबद्धता व्यक्त की थी । उन्होंने यह भी कहा कि मधेशवादी दल हमें छोड़ सकते हैं लेकिन हम मधेशी जनता और मधेश का साथ कभी नही छोडेÞंगें । प्रचण्ड की यह चालबाजी १६ बुँदे सहमति में हस्ताक्षर कर जाहिर हो गयी है कि मधेशी के अधिकार के लिए मधेशी जनता और मधेशी दलों को ही लड़ना होगा ।
३० दलीय मोर्चा गठन में एमाओवादी का होना विवशता थी, क्योकि संविधान सभा के प्रथम चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी एमाओवादी ही रही । परन्तु एमाओवादी का मधेशी के प्रति अच्छा नजरिया नहीं होने के कारण दूसरे चुनाव में वह तीसरे स्थान में आ गई । सरकार विरुद्ध शक्ति प्रदर्शन मधेशवादी के बगैर सम्भव नही था  और इधर मधेशवादी भी प्रथम चुनाव से दूसरे चुनाव में बिलकुल कमजोर हो गए । और इस तरह अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए वो एक हो गए ।
मधेशवादी दल यह भी भूल गए कि एमाओवादी की सरकार ने उस समय भी मधेश की माँग के प्रति समर्थन नहीं दिया था । एमाओवादी के कारण ही मधेश के कुछ सपूत भूमिगत होकर अपनी जान गँवाई । एमाले—काँग्रेस विरुद्ध राजनीतिक लड़ाई चली थी । परन्तु एमाओवादी के साथ मधेश आन्दोलन में हर रास्ते पर झड़प की सम्भावना दिखती थी । उसके बावजूद मधेशवादी दलों ने आँखे बन्द कर ३० दलीय मोर्चा का अध्यक्ष बनाकर अपनी ताकत उनको सोंप दी जिसका परिणाम मधेशी, दलित, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, मुस्लिम, अल्पसंख्य को मिला । एमाओवादी सहित चार दलने जिस प्रकार १६ बुँदे सहमति कर संविधान बनाने जा रहे हैं उसके हरेक बुँदे में द्वन्द सृजित है ।
अगर सही मायने मे कहा जाए तो मधेशी दल को सबसे ज्यादा ‘धोखा’ एमाओवादी ने ही दिया है । एमाओवादी और मधेशवादी दल बार—बार एक हुए है और बार—बार धोखा खाकर गिर पडेÞ हैं । प्रथम संविधान सभा में भी एमाओवादी—मधेशवादी की संयुक्त सरकार बनी थी । लेकिन मधेश की उपलब्धि शून्य रही । मधेश से एमाले, काँग्रेस और एमाओवादी सबसे ज्यादा राजनीति करते हैं और मधेश को अधिकार देने के समय सबसे पीछे रहते हैं । जो उपेक्षित होते हैं वही द्वन्द्ध की राह चुनते हैं । विगत के इतिहास को देखा जाए तो मधेश को सभी ने उपेक्षित रखा और यही कारण है कि मधेश हमेशा द्वन्द्ध में घिरा रहा । देश निर्माण के लिए द्वन्द की स्थिति बने इस सम्भावना से बचना चाहिए और संविधान प्रक्रिया पर पुनः विचार करना चाहिए ।

अन्तरिम संविधान के धारा १३८ में राज्य विभाजन के क्रम में सीमाकंन और नामांकन बिना संविधान निर्माण नही करने का प्रावधान है । उसके बावजूद भी चार दल ने मसौदा लाकर सर्वोच्च का अपमान किया है, अवहेलना की है ।  उतना ही नहीं सार्वजनिक रूप में नही मानने का उद्घोष भी किया है । अगर सर्वोच्च के फैसला से वह सन्तुष्ट नही है तो बदर करने के लिए दरखास्त भी देने का प्रावधान है । परन्तु चार दल ने ऐसा नही कर अन्तरिम संविधान का उल्लंघन कर मसौदा पेश किया है । सर्वोच्च के लिए यह चुनौती है । चार दल ने अपने उपर फौजदारी अपराध लिया है और चार दल के उपर फौजदारी अपराध का मुद्दा चलाया जाएगा ऐसा मेरा विश्वास है ।

 

लोकतन्त्रवादी कहलाने वाली पार्टी द्वारा ही अलोकतान्त्रिक तरीके से सर्वोच्च अदालत का उल्लंघन हुआ है । जबकि अन्तरिम संविधान १३८ में उल्लेख है कि मधेशी, जनजाति, दलित की जनभावना अनुसार संविधान होनी चाहिए । कानून का उल्लंघन कर मसौदा लाना या संविधान निर्माण करना जनता के अधिकार से वञ्चित करना माना जाएगा है । यह संविधान विवादित होगा जो आनेवाला कल के दिन में फिर से द्वन्द्ध सृजना कर सकती है ।  अभी देश अन्तरिम संविधान पर चल रहा है और अन्तरिम संविधान का उल्लंघन कर संविधान निर्माण नहीं होना चाहिए ।जहाँ तक सर्वोच्च भी कुछ करेगा वह भी विश्वास नही है ।

एमाले—काँग्रेस सहित चार दल सर्वोच्च अदालत के परमादेश को उल्लंघन कर कानूनी राज्य का हत्या कर रही है यह अलोकतान्त्रिक प्रवृति की पहचान है । अन्तरिम संविधान के धारा १३८ में स्पष्ट उल्लेख है कि मधेशी, दलित, जनजाति, थारु के अधिकारसहित संघीय संविधान के आधार में राज्य को नामाकंन और सीमाकंन कर संविधान बननी चाहिए जो चार दल का १६ बुँदे सहमति में नही है । सर्वोच्च का परमादेश के विरोध में मसौदा लाकर चार दल ने हठवादी की है । चार दलों को यह समझना चाहिए कि संघीयता, प्रदेश तथा मौलिक अधिकार के लिए ही मधेश में सबसे बड़ा आन्दोलन हुआ था जिसे फिर से वाइलाइन कर दिया गया है । अब आन्दोलन नही होगा इस भूल भूलैया में न रहे । कानूनी राज्य का बात कर कानून को हत्या करना सबसे बड़ी अराजकता है । ऐसी स्थिति में सर्वोच्च को चाहिए की बिना भयत्रास में कानून की अवज्ञा के विरोध में मानहानि का मुद्दा चलावें ।
अगर जनता की भावना अनुसार संविधान नही बना तो मसौदा फाड़ना जलाना मौलिक अधिकार है । जिस के लिए आन्दोलन किया गया, सैकड़ों घायल हुए, कितने की मौत हुई, कितने अभी भी अपंग हैं वही चीज अगर संविधान में नही आएगा तो वैसा संविधान लेकर क्या होगा । देश अभी महाभूकम्प से स्तब्ध है और इसका फायदा एमाले—काँग्रेस सहित चार दल ले रहे हैं । देश को अभी पुनर्निर्माण में लगना चाहिए न कि संविधान के नाम पर द्वन्द्ध में फंसाना चाहिए । संविधान आवश्यक है परन्तु द्वन्द्धरहित संविधान ।
मधेश के लिए एमाओवादी और फोरम लोकतान्त्रिक प्रारम्भ से ही पक्षपात कर रही है । मधेशवादी दल ने ३० दलीय संगठन में रखकर सबसे बड़ी भूल की है । प्रथम संविधान में भी दोनों ने देश में ११ प्रदेश होना चाहिए यह माँग उठाई गई थी, जबकि मधेशवादी दल मधेश स्वायत प्रदेश की माँग कर रही थी । इस बार जिस प्रकार मधेश और मधेशी जनता के साथ प्रचण्ड और गच्छेदार ने गद्दारी की है मधेशी जनता कभी नही भुलेगी ऐसा विश्वास है ।

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