चिन्ता सीमा सुरक्षा की

नेपाल-भारत की १७४७ किमी लम्बी खुली सीमा के बारे में बार-बार दोनों पक्षों के द्वारा कमजोरी के रुप में चित्रित किया जाता है। सन् १९५० की सन्धी के पश्चात राजनीतिक प्रणाली में समाहित होने के बाद दोनों देशों की सीमा पृथक हर्ुइ है। राजनीतिक रेखा के द्वारा दोनों देशों की सीमा को अलग करने के बावजूद सीमा के दोनों तरफ रहने वाले स्थानीय वासियों के सामाजिक अन्तर-सम्बन्ध को अलग नहीं किया जा सका है। हाँ, सुरक्षा के नाम पर जबरदस्ती लादे जाने वाली चुनौती से सीमा क्षेत्र के बासिन्दा रू-ब-रू होते रहते हैं। सीमा सुरक्षा से जुडेÞ सशस्त्र बल द्वारा दोनों तरफ के स्थानीय बासियों के सामाजिक, आर्थिक, गतिविधि में अवरोध पहुँचाया जाता रहा है, जिससे कई बार सीमा क्षेत्र में तनाव की अवस्था आ जाती है।
नेपाल और भारत के बीच सीमा क्षेंत्र में होने वाली आपराधिक घटना दोनों देशों की साझा समस्या है। एक ही सीमा क्षेत्र में होनेवाली घटना का असर दूसरे क्षेत्र में पडÞना स्वाभाविक है। सीमा में होने वाले सहज आवागमन और बिना पासपोर्ट वीजा के एक दूसरे की सीमा में घुस जाने की अवस्था मुख्य समस्या नहीं है। यदि दोनों ही सीमा पर तैनात सुरक्षाकर्मी के द्वारा आपराधिक गतिविधि की कडी जाँच कर इमानदारी के साथ पेश आएँ तो इस समस्या से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। लेकिन सीमा पर सुरक्षाबलों की संख्या जितनी ही बढर्Þाई जाती है, आपराधिक घटनाओं में कोई कमी आने का तथ्यांक नहीं है। सीमा क्षेत्र में होनेवाले ड्रग्स, हथियार, जाली नोट, मानव तस्करी की घटना बढÞती ही जा रही है। दोनों देशों के लिए यह गम्भीर समस्या है, जिस पर र्सतर्क होना ही पडेÞगा।
खुली सीमा का फायदा उठाकर आतंकी गतिविधि को प्रश्रय मिलने तथा इसे दोनों ही देशों की आन्तरिक सुरक्षा में चुनौती होने की बात दोनों देशों की तरफ से हर बार उर्ठाई जाती है। दिल्ली में दिसम्बर के पहले हफ्ते में हुए सीमा सुरक्षा सम्बन्धी एक बैठक में दोनों देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा में खलल पहुँचाने वाली  गतिविधि के प्रति चर्चा की गई। नेपाली पक्ष की तरफ से तर्राई में सशस्त्र गतिविधि करने वाले समूहों के द्वारा भारतीय भूमि का प्रयोग के बारे में ध्यानाकर्षा कराए जाने की जनकारी सशस्त्र प्रहरी के प्रमुख कोषराज पन्त ने जानकारी दी।
इसी तरह भारत की तरफ से नेपाल की सरजामं का दुरुपयोग, जाली नोटो की तस्करी, भारत विरोधी आतंकी संगठन के सदस्यों की गतिविधि को प्रमुखता से उठाए जाने की जानकारी मिली है। सुरक्षा सम्बन्धी ऐसी बैठकों में भारत हमेशा ही सुपर्ुदगी सन्धि का सवाल भी उठाते रहा है। वैसे तो नेपाल-भारत के बीच अप्रत्यक्ष रुप से सुपर्ुदगी की परम्परा चलती आ रही है। चाहे वह डा. अमृत कुमार का प्रत्यार्पण हो या मुर्म्बई बमकाण्ड के दो संदिग्ध अभियुक्तों को सौंपने की बात। सम्वेदनशील मामलों में आपसी सम्बन्ध को देखते हुए नियम से परे जाकर भी सुपर्ुदगी की घटना होती रहती है। उधर भारत ने भी कई बार अपनी भूमि पर रहे आपराधिक चरित्र के व्यक्तियों को नेपाली सुरक्षाकर्मियों के हवाले किया है। सीमापार बैठकर नेपाल में सशस्त्र गतिविध करते आ रहे कई नेताओं को गिरफ्तार कर नेपाल को सौपा जा चुका है। इतना ही नहीं भारतीय सुरक्षाकर्मी के सहयोग से भारतीय भूमि में ही जाकर नेपाल के सुरक्षाकर्मी अपराधियों की धडÞ-पकडÞ करते हैं। इन सबके बावजूद नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता के कारण सुपर्ुदगी सन्धि का कडÞा विरोध होता रहता है। लेकिन नेपाल और भारत के बीच व्यवहारतः सुपर्ुदगी के अनौपचारिक प्रयोग का इतिहास साक्षी है। सन्धी हो जाने पर सुपर्ुदगी सिर्फबाध्यात्मक बन जाएगा।
सुरक्षा सम्बन्धी बैठक के दौरान नेपाल और भारत दोनों की तरफ से सीमा क्षेत्र में गम्भीर आपराधिक गतिविधि रहने की बात चित्रण की जाती है। भारत की तरफ से नेपाल में चिनियाँ गतिविधि, मदरसे की संख्या में वेतहाशा वृद्धि, बंगलादेशी घुसपैठियों की बढÞती तादाद तथा उनके द्वारा धडÞल्ले से नेपाली नागरिकता लेने की घटना के प्रति चिन्ता जाहिर की गई।
दोनों देशों की सुरक्षा अंगों की नजर से देखा जाए तो सीमा क्षेत्र को अपराध क्षेत्र के रुप में देखा जाता है। सीमा पर बढÞती सुरक्षा फौज की तैनाती इसी बात को इंगित करती है। अपनी सुरक्षा को लेकर चिन्तित भारत ने सीमा पर लगातार सीमा सुरक्षा बल -एसएसबी) की संख्या और पोष्ट की संख्या बढÞा रहा है। नेपाल में भी सीमा सुरक्षा की जिम्मेवारी सशस्त्र प्रहरी बल को पूरी तरह सौंप दिया गया है। इसलिए भी इस बार सुरक्षा सम्बन्धी बैठक का नेतृत्व एपीएफ के द्वारा किया गया।
सुरक्षा बलों की संख्या बढÞाने के बावजूद दोनों ही तरफ से उनकी आलोचना भी बढÞ गई है। सबसे अधिक परेशानी सीमा क्षेत्र में रहनेवाले लोगों को होती है, जिन्हें अपनी रोजमर्रर्ााी जिन्दगी चलाने के लिए सीमा पार आना जाना पडÞता है। छोटे-छोटे व्यापारी, जिन्हें कानूनी रुप से भी सामान ले जाने पर एसएसबी और सशस्त्र प्रहरी बल के जवानों को रिश्वत देनी पडÞती है।
सच्चाई यह भी है कि सीमा सुरक्षा में तैनात सुरक्षाबलों की मिलीभगत के कारण ही तस्करी को प्रश्रय मिलता है। तस्करी करनेवालों से खुलेआम पैसे असूलने का दृश्य अब आम हो गया है। सीमा सुरक्षा की बैठक में वरिष्ठ अधिकारी चाहे जितना ही दलील दें लेकिन कटु सत्य यह है कि दोनों ही देशों के सुरक्षाबलों की मिलीभगत से ही छोटे हथियारों की तस्करी हो या फिर रक्तचन्दन की तस्करी धडÞल्ले से होती है।
सुरक्षा फौज बढÞाकर सीमा अपराध या आतंकी गतिविधि पर काबू पाए जाने की कल्पना करना समस्या के समाधान की सतही शैली है। निश्चित रुप से सीमा सुरक्षा की चिन्ता होनी चाहिए। सीमा सुरक्षा किसी भी देश के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडेÞ सवाल हैं। नेपाल-भारत की सीमा को कँटीले तार लगाकर या सुरक्षाबलों की तादाद बढÞाकर सुरक्षित नहीं किया जा सकता है। ऐसा करना दोनों ही सीमा क्षेत्रों के स्थानीय सामाजिक और आर्थिक अन्तरसम्बन्ध को चुनौती देना होगा। विशेषकर नेपाल के तर्राई और भारत के बिहार के उत्तरी और उत्तर प्रदेश के पर्ूर्वी क्षेत्र के लोगों की भौगोलिकता से लेकर सामाजिक समानता को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। सीमा के आरपार लोगों के रहन-सहन, खानपान, बोली, वेशभूषा सभी एक समान है। अन्तरसीमा विवाह सदियों से चली आ रही परम्परा है। तर्राई और गंगा के मैदान के बीच समानता के कारण ही दोनों देशों के बीच के सम्बन्ध को रोटी-बेटी का सम्बन्ध कहा जाता है। इसलिए सुरक्षा के नाम पर सीमा में कडर्Þाई करने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। बल्कि इससे प्रतिकूल असर पडÞता है। विशेष सुरक्षा योजना के नाम पर तर्राई में किए गए बल प्रयोग से तनत्कालिक सुरक्षा अवस्था में सुरक्षा आने के बावजूद इसका दूरगामी परिणाम काफी भयानक हो सकता है। सुरक्षा अधिकारियों के द्वारा बल प्रयोग करने से कई गैर न्यायिक हत्याएँ तो हर्ुइ ही साथ ही अनपराधिक घटनाओं में भी वृद्धि हर्ुइ।
नेपाल भारत के बीच खुली सीमा अपने आप में समस्या नहीं है। सीमा क्षेत्र के समाज को दोनों देशों की राजधानी के द्वारा देखनेवाले दृष्टिकोण में समस्या है। अत्यधिक आर्थिक गतिविधि होने के बाद भी सीमा क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश नागरिक गरीबी की समस्या से जूझ रहे हैं। रोजगार के अवसर न्यून होने के कारण युवाओं का सशस्त्र व आपराधिक समूहों में जाना मजबूरी बनता जा रहा है। सीमा पर रहनेवाले कई परिवार तो तस्करी से ही अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं। गाँजा, चरस, अफीम की खेती करते है। ड्रग्स से लेकर हथियारों तक की तस्करी में संलग्न हैं। यह सब एक गम्भीर चिन्ता का विषय है। उनके जीवनस्तर को उठाने के सवाल पर सरकारें मौन क्यों है – सिर्फएकतरफा बल प्रयोग करने और फौज तैनात कर देने की रट से समस्या ज्यों की त्यों बनी रहेगी। सीमा की दोनों तरफ रहने वाले लोगों का सामाजिक अन्तर सम्बन्ध को मनन कर उनके समग्र विकास की नीति को लागू किए जाने पर ही सिर्फसीमा क्षेत्र ही नहीं, दोनों देशों की सुरक्षा में अहम योगदान हो सकता है। िि
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