Thu. Sep 20th, 2018

चीन का बढता हस्तक्षेप

श्रीमन नारायण

दक्षिण एसिया मामलों के प्रभारी चीन के उपमन्त्री आई पिङ ने नेपाल के आन्तरिक मामलों में खुल कर हस्तक्षेप किया है । नेपाल इन दिनों राज्य पर्ुनर्संर चना के दौर से

nepal china relation
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गुजर रहा है । देश की २४४ वर्षपुरानी एकात्मक शासन प्रणालीका अन्त कर संघीय शासन प्रणाली लागू करने की बात पर सैद्धान्तिक सहमति बन चुकी है और इसे देश के संविधानका अंग भी मान लिया गया है । देश की दो बडी पार्टियां नेपाली काँग्रेस एवं एमाले खुलकर इसके विपक्ष में खडी होने के कारण देश की राजनीति स्पष्टतः दो भागों में विभाजित है । एक का नेतृतव सत्ताधारी एकीकृत माओवाी के अध्यक्ष पुष्प कमल दाहाल कर रहे हैं तो दूसरे का नेपाली काँग्रेस और प्रचण्ड के नेतृत्व  वाला संघीय लोकतान्त्रिक गणतान्त्रिक गठबन्धन में संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा सहित तकर ीबन दो दर्जन सियासी दल इस में शामिल हैं । वहीं नेपाली काँग्रेस के नेतृत्व में संघीय लोकतान्त्रिक मोर्चा बनाने की कवायद जारी है । प्रचण्ड के नेतृत्व वाले गठबन्धनको सत्ताधारी गठबन्धन भी कहा जा सकता है । इस में शामिल दल पहचानयुक्त संघीयता के पक्षधरहैं । चीन के विदेश उपमन्त्री ही नहीं काठमाण्डू स्थित चीनी दूतावास के र ाजदूत याङ होउलान भी इसी आशय की टिप्पणी करते रहे हैं । चीन के दक्षिण एसिया विज्ञ नेता ने भी भारत और नेपाल के तर्राई के जरिए चीन विरोधी पडयन्त्र होनेका आरोप लगाया है ।
सत्ताधारी एकीकृत माओवादी पार्टर्ीीें आए विखराव के वाद दूसर े धडे का नेतृत्व कर  र हे मोहन वैद्य “किर ण” को चीन ने एक माह के अन्दर  चीन में बुलाया था । काठमाण्डू के र ाजनीतिक हलकों में ये कयास लगाए जा र हे थे कि चीन के इसार े पर  हीं एमाओवादी पार्टर्ीीें विखर ाव आया है । यह कयास हकीकत में तब तब्दील हुआ जब नई पार्टर्ीीोलने के महज एक माह के अन्दर  चीन से वैद्य के लिए बुलावा आया । वुलावा आने पर  चीन नहीं जाने वाले कम्युनिष्ट कौन होंगे –  सो वैद्य ने अपने सहयोगी इन्द्रमोहन सिग्देल के साथ चीनका दौर ा किया ।
किर ण के चीन भ्रमण के दौर ान उन्हें काफी खातिर दार ी मिली और  एक गुरुमन्त्र भी दिया गया कि जातीय संघीयताको तिलान्जलि देकर  वर्ग संर्घष्ा पर  बल दिया जाए । काठमाण्डू वापस आकर  किर ण ने पत्रकार ों से मुखातिब होते हुए कहा कि चीन ने हमे संघीयता खास कर के जातीय संघीयता के विपक्ष में र हने को कहा है पर न्तु इसे चीनका हस् तक्षेप हम नहीं मानते । आई पीङ्ग नेपाल में आकर  बोले कि नेपाल के लिए जातीय संघीयता ठकि नहीं होगी । चीनी र ाजदूत ने भी यही कहा । चीन में जाने पर  किर ण से यही कहा गया फिर  भी नेपाल के कम्युनिष्ट, कुछ पत्रकार  एवं र ाजावादी यह मानने के लिए अब भी तैयार  नहीं हैं कि यह नेपाल के आन्तरि क मामलों में हस् तक्षेप है । जातीय संघीयता से विखण्डन आता है लिहाजा इससे बचना चाहिए, चीन ने यही गुरुमन्त्र एमाले के विक्षुब्ध नेता किशोर  कुमार  विश्वासको काठमाण्डू स् िथत अपने दूतावास में बुलाकर  दिया था । यह हस् तक्षेप नहीं है तो क्या है – नेपाल के कम्युनिष्टोंको स् पष्ट कर ना ही होगा ।
प्रधानमन्त्री डा.बाबूर ाम भट्टरर् ाई एवं सताधार ी दल के आला नेताओं में शुमार  होकर  हिसिला यमी ने भी आननफानन में चीनका भ्रमण किया । वे अपने साथ कुछ पत्रकार ों को भी ले गई थी उनसे भी यही कहा गया । दर असल डा.बाबूर ाम भट्टरर् ाई के प्रधानमन्त्री बनने के वाद से ही नेपाल के भार त विर ोधी पत्रकार  कम्युनिष्ट पार्टर्ीी एवं र ाजावादी चीन का कान भर ते र हे कि जे एन यू से पढेÞ डा.भट्टरर् ाई भार त के हिमायती हैं । चीन ने यह मान भी लिया तभी तो सत्ताधार ी दल में विभाजन कर वाया । हिसिला यमी चीन सफाई देने के लिए गयी थी कि जो कुछ उनके पति के वार े में कहा या सुना जा र हा है वही सत्य नहीं है तथा चीन के खिलाफ वे, उन के पति या उनकी पार्टर्ीीहीं है ।
सन् २००६ के मधेश आन्दोलन के दर म्यान भी चीन ने नेपाल सर कार  को यह विश्वास दिलाया था कि मधेश में जो कुछ हो र हा है वह विदेश से सञ्चालित है तथा जरुर त पडÞने पर  चीन नेपाल को किसी भी तर ह का सहयोग कर ने को तैयार  हैं । दर असल श्रीलंका में तमिल आन्दोलन को कुचल देने के बाद चीन को लगा कि मधेश आन्दालेन को भी उसी तर ह कुचला जा सकता है । चीनको इस बातका डर  सताए जा र हा है कि नेपाल के पहाडी या बफिर्ली जिलों में संघीयता आ जाने के बाद तिब्बत में एवं उइगर  मुसलमानों आवादी वाले शिवजियाङ्ग में भी स् वायतता, संघीयता या जातीयता की माँग जोड पकडने लगेगी । नेपाल में अमेरि की एवं पश्चिमी कुटनीतिज्ञों की उपस् िथति एव तिब्बतीयों के प्रति जो उनकी सहानुभूति है उससे चीन में किसी भी समय आन्दोलन भडक जाने का डर  चीन को है । चीनको यह भी लग र हा है कि संघीयता को माँग भार त के कहने पर  मधेशीयों ने किया है और  भार त ने नेपाल के बजाय तिब्बत एवं चीन को ध्यान में र खकर  यह विषय चर्चा में लाया है ।
सैद्धान्तिक रुप में नेपाल एक स् वतन्त्र देश है तथा यहाँ की शासन प्रणाली कैसी हो यह नेपाली जनताको हीं तय कर ना है । इस में न तो भार त और  ना ही चीन की दिलचस् पी होनी चाहिएं । एक पडोसी के नाते से दोनों देश हमार े शुभेच्छुक एवं सहयोगी है । पर न्तु किसी के द्वार ा भी हस् तक्षेप होना ठीक नहीं है ।
दर असल चीन नेपाल के जरि ए दक्षिण एशिया में अपना बर्चस् व बढÞाना चाहता है । अब तक भूटान उस की पकड से बाहर  था । अगस् त के तीसर े सप्ताह में काठमाण्डू आने से पर्ूव चीन के विदेश उपमन्त्री भूटान भी गए थे । फू यिंग अपने थिम्पु यात्रा के दौर ान वहां चीनी दूतावास खोलने पर  सहमति बनी । बहुत जल्द ही वहाँ चीनी दूतावास खुलने जा र हा है । चीन भूटान के साथ प्रत्यक्ष तौर  पर  व्यापार  संयन्त्र बनाना चाहता है । प्रत्यक्ष रुपमे विमान सेवा भी शुरु कर ना चाहना है । थिम्पु का नजरि या भी इस में सकार ात्मक है ।
चीन अब भूटान के सियासी एवं कुटनीतिक मामलों में दखलंदाजी बढा कर  वहाँ से भार त का प्रभाव समाप्त कर  खूद स् थापित होना चाहता है । पाकिस् तान, श्रीलंका, आफगानिस् तान और  नेपाल में भी चीन का वर्चस् व है ।  नेपाल के अधिकांश विकास परि योजाओं में चीन का दखल है । नेपाल में कुछ ऐसे भार त विर ोधी तत्व है, जो एक सुनियोजित षडयन्त्र के तहत भार त का विर ोध कर ते है तथा गोप्य रुप से परि योजना सञ्चालन की जिम्मेवार ी चीन को मिल जाती है । नेपाल के अधिकांश बडी परि योजनाओं का निर्माण चीन के द्धार ा हो र हा है । त्रिभुवन विमान स् थल का और  पोखर ा विमानस् थल का निर्माण चीन को दे दिया गया । एमआर पी में भी यही हुआ । चर्चा भार त की होता है, ओयोजना का जिम्मा चीनको मिलता है । शान्त कूटनीति के जरि ए लाभ लेना कोई चीन से सीखे ।
चीन दक्षिण एशिया में थल एवं हवाई मार्ग सर्म्पर्क बढाना चाहता है । नेपाल चीन पर ामर्श संयन्त्र के नौवें वैठक में चीन ने द्विपक्षीय संयुक्त प्रयास का प्रस् ताव भी किया है । चीन ने केरुङ्ग होते हुए लुम्बिनी तक र ेल पहुचानेका प्रंस् ताव भी किया है । पाकिस् तान में भी ऐसा ही कुछ हो र हा है । लुम्बिनी में भार त के विर ोध को देखते हुए नई दिल्ली से भी चीन सहयोग लेना चाहता है । दक्षिण एशिया में चीन की बढती सक्रियता से नेपाल को र्सतर्क र हना होगा । संघीयता के सवाल पर  चीन के र वैये से नेपाल की जनजातियों को भी वाकिफ होना होगा । संघीयता की जितनी आवश्यकता मधेशियों को है उससे कही अधिक जरुर ी पहाडी क्षेत्र के जनजाति को है । इस बार े में सभी को गम्भीर ता से सोचना जरुर ी है ।
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