चीन की धमकी के बावजूद प्रचण्ड ने देउवा से हाथ मिलाया, मधेशी मोर्चा सावधान ! श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति , काठमांडू ,१२जुलाई |

“हम थे जिनके सहारे, वो हुए ना हमारे । डूबी जब दिल की नैया सामने थे किनारे ।”

दिल के खेल में तो शायद यह कभी कभार ही होता हो किन्तु राजनीति के मैदान में तो यह आम बात है । यहाँ न कोई दोस्त है और ना ही दुश्मन । अगर कुछ है, तो वह है अवसर । सभी इस अवसर की तलाश में होते हैं कि, कब कुर्सी हमारे हाथों में होगी । इस एक अवसर के लिए न तो गले मिलते देर लगती है और न ही गला काटने में देर लगती है । अंततोगत्वा माओवादी अध्यक्ष ने सरकार से बकायदा समर्थन वापस ले ही लिया । आज ओली सरकार अल्पमत में है । वैसे प्रधानमंत्री इतनी जल्दी हार मानने वालों में से तो बिल्कुल नहीं हैं, क्योंकि विगत के एक वर्षों में और अपने छः सात महीनों के कार्यकाल में उनकी अडिगता तो सामने आ ही गई है । ये और बात है कि यह अडिगता सही के लिए थी या सिर्फ अपनी जिद के लिए । प्रधानमंत्री के रूप में जनता जिस व्यवहारिक और आत्मीय छवि की तलाश करती है वो उन्हें नहीं मिली है । हाँ एक अच्छा काम उन्होंने अवश्य किया है कि आगामी दिनों के लिए जनता की आँखों में कई सपने जरुर दे डाले हैं भले ही आज की परिस्थितियों में वह यथार्थ से परे हो किन्तु देश को इस आत्मनिर्भरता की आवश्यकता तो अवश्य है । क्योंकि एक सक्षम और आत्मनिर्भर राष्ट्र ही विश्व समुदाय के सामने अपनी स्थिति को मजबूती के साथ रख सकता है । परनिर्भरता के साए में राष्ट्रवादिता मात खा जाती है । फिहाल उनके सपने ने राष्ट्रवादिता को ही सींचा है जिसके तहत वो सत्ता की लम्बी पारी खेलना चाहते थे । किन्तु पाशा पलट चुका है और प्रत्येक मोहरा अपनी चाल चलने के लिए तैयार है ।

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अन्ततः प्रचण्ड की प्रतीक्षा ने दम तोड़ ही दिया । बजट पेश होने से पहले की घटनाक्रम ने जो माहोल पैदा किया था उसकी दिशा एक ही रात में प्रचण्ड ने बदल दी थी । नौबुंदे सहमति और तीनबुन्दें भद्र सहमति की डोर थामकर उन्होंने अपना निर्णय बदल लिया था और काँग्रेस अध्यक्ष की रणनीति टाँय टाँय फिस्स हो गई थी । सत्ता परिवर्तन का दोष भारत पर लगाया गया जिसके कई परिणाम तत्काल दिखे और सत्ता बचाने का श्रेय चीन को मिला । किन्तु यह असर टिक नहीं पाया और आज इसकी परिणति समर्थन वापसी के साथ हुई । आज के माहोल में यह तो माना ही नहीं जा सकता कि चीन अपनी रणनीति से पीछे हट रहा होगा क्योंकि उसका पूरा समर्थन ओली सरकार के लिए है । किसी भी हाल में वो इस सरकार का स्थायित्व देखना चाहेगा क्योंकि यही वो वटवृक्ष है जिसके तहत उसकी मंशा पूरी हो सकती है । खेल शुरु हो चुका है । सरकार बचाने के लिए माओवादी को किस हथकण्डे के साथ कमजोर किया जाय यह भी कोशिश जारी होगी जो सम्भवतः फूट डालो की रणनीति के तहत प्रयास किया जा रहा होगा । अब देखना ये है कि माओवादी सांसद बिकते हैं या अपने अध्यक्ष का साथ देते हैं । वैसे चीन की कड़े रुख के बावजूद प्रचण्ड ने अपने राजनीतिक कैरियर को सामने रखते हुए ही यह निर्णय लिया है और एक बार फिर देउवा से सहमति हुई है । इस सहमति में मधेश का मुद्दा पहले नम्बर पर रखा गया है । इस बात से मधेशी मोर्चा अधिक उत्साहित नजर आ रहे हैं जो की मधेश के हित में नही है । गौर किया जाय तो मधेश की समस्या का हल बिना बहुमत के सम्भव नहीं है । जो अगर एमाले का साथ नहीं मिलता तो मुश्किल है । क्योंकि अभी तक जो माजरा दिखा है उसमें मधेश शब्द और मधेश समस्या इन दोनों से ही एमाले सरकार अपना पल्ला झाड़ती आई है और विषवाण चलाती आई है । क्योंकि मधेश मुद्दे की आड़ में ही तीखी राष्ट्रीयता की अमरबेलि फैलाई गई है जो इतनी जल्दी मुर्झाने वाली नहीं । हाँ यह हो सकता है कि सत्ताच्यूत होने के बाद भाषा और व्यवहार में थोड़ी नरमी आ जाय किन्तु इससे मधेश के हित में कोई महत्वपूर्ण फैसला आ जाएगा इसकी सम्भावना न्यून है । इसलिए मधेशी नेताओं को सावधान रहना बहुत जरूरी है |

 

वैसे दृष्टि अभी की हालात पर डालें तो सवाल यह उठता है कि इस संकटकाल से उबरने के लिए प्रधानमंत्री क्या कदम उठाएँगे ? नेपाल की जनता के लिए सत्ता परिवर्तन का खेल कोई नया नहीं है । १९९० से अबतक यानि २६ वर्षों में यहाँ की जनता ने २३ बार सरकार को गिरते देखा है । ऐसे में आज की परिस्थिति जनता के लिए कोई नई बात नहीं है । कोई भी आ जाय किसी क्रांतिकारी परिवर्तन की सम्भावना दूर दूर तक नजर नहीं आती सिवा इसके कि नाम बदल जाएँगे परन्तु राजनीति के चेहरे तो वही हैं । वैसे ओली अपनी सत्ता बचाने की पुरजोर कोशिश करेंगे । कई रास्ते हैं जिन्हें वो आजमाने की कोशिश करेंगे । वो अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना चाहेंगे या विश्वास मत प्राप्त करेंगे या फिर राजीनामा देंगे ? राष्ट्रपति का सहारा लेकर वो चुनाव की घोषणा भी कराने की सोच सकते हैं लेकिन ऐसा होने पर यह मामला अदालत में भी जा सकती है क्योंकि फिलहाल वो अल्पमत में हैं और यह कदम उनके लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकता है । अगर मिड टर्म पोल में भी जाते हैं तो कई समस्याओं का सीधे सामना करना पड़ सकता है । खैर नजरें टिकी हुई हैं कि क्या निष्कर्ष सामने आता है । फिलहाल ओलीजी को सत्ता बचाने के लिए ३४ मतों (सभासदों ) की आवश्यकता है | जो की मधेशी मोर्चा के पास है | अगर मधेशी मोर्चा का कोई भी सभासद पैसा का रात्री खेल में शामिल हुआ तो यह उसके लिए आत्मघाती होगा | और इससे ओलीजी को भी भावी राजनीति पर असर पर सकता है |

हाँ तक प्रचण्ड का सवाल है तो वो चीन की धमकी के बावजूद देउवा से हाथ मिला चुके हैं और सत्ता की समय सीमा भी इनके बीच तय हो चुकी है । सत्ता की गलियारों में जहाँ गर्मी आई है उसका परिणाम जल्द ही दिखेगा यह सम्भावना तो है किन्तु इस परिवर्तन से नेपाल की दशा और दिशा में कोई अहम परिवत्र्तन आएगा ऐसा कुछ नजर नहीं आता क्योंकि परिवर्तन को फलदायी होने के लिए स्थायित्व की आवश्यकता होती है जो यहाँ की राजनीति और राजनीतिज्ञों की नीति में नहीं है ।

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