चीन–नेपाल–भारत सम्बन्ध ,उस पार न जाने क्या होगा ?

कुमार सच्चिदानन्द
नेपाल के लिए केपी शर्मा ओलीजी का प्रधानमंत्रीत्व का काल सपने देखने का काल है । क्योंकि हर खास–ओ–आम अवसर पर वे ऐसा बयान दे जाते हैं जिनकी चर्चा भी खूब होती है और आलोचना भी उतनी ही होती है । शब्दों का अनुशासन और विचारों की मर्यादा को तोड़कर लोग विभिन्न शब्दावली में उन्हें मानसिक संतुलन खोने तक की बात कह जाते हैं । लेकिन एक सच यह भी है कि उनके विचारों को शाबाशी देनेवाले लोगों की भी कमी नहीं हैं और उनके ऐसे विचारों को राष्ट्रवाद की कसौटी पर तौलने वालों की भी कमी नहीं है । कारण साफ है कि जितनी बातें वे कहते हैं उन बातों को तत्काल कार्यान्वित करने की योग्यता और क्षमता न तो उनके पास है और न ही देश के हालात ऐसी हैं कि लोग उन्हें विश्वसनीय मान ले । वैसे भी हवा में हाथ–पैर मारकर आकाश को छूने की चाहत करने वाले लोग आमतौर पर बहकी बहकी बातें ही कहे जाते हैं । इसे एक तरह से कुण्ठा का मनोविज्ञान भी कहा जा सकता है । वैसे भी सत्ता से मोह जब ज्यादा होता है और कुर्सी पर खतरे के बादल मँडराने लगते हैं तो किसी अतिवादी विचारधारा का दामन थामकर नेता मुख्य मुद्दे से जनता का ध्यान विकेन्द्रीकृत करने का प्रयास करते हैं । खासकर अल्पविकसित और अविकसित देशों में यह खेल ज्यादा होता है । इससे पहले की सरकारों ने भी ऐसा किया मगर उनके पास मुद्दे थे । जैसे भूकंप के नाम पर विभिन्न दलों में सहमति तलाशना और समूह बन जाने पर सारी शक्ति को संविधान जारी करने की दिशा में मोड़ देना, एक ऐसा ही कदम था । लेकिन आज ऐसे ज्वलन्त मुद्दे नहीं हैं । इसलिए हमारी सरकार के मुखिया कभी हवा से बिजली निकालने की बात करते हैं तो कभी समुद्र में जहाज चलाने की बात करते हैं । ऐसा नहीं है कि ये बातें औचित्यहीन हैं लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इस तरह की बातें करना एक तरह से स्वयं को हास्यास्पद स्थिति का प्रणेता सिद्ध करने की तरह है ।

एक बात तो तय है कि आज तक नेपाल का सम्बन्ध भारत के साथ गहरे रूप में जुड़ा रहा है । विभिन्न स्तरों पर साम्य और खुली सीमा के कारण सरोकार भी गहरे रहे हैं और इसके समानान्तर ही असंतोष के बादल भी यहाँ मँडराते रहे हैं जो कभी–कभी प्रचण्ड रूप में बरसे भी हैं और इसमें नहाने वाले सिर्फ आम जनता ही नहीं बल्कि शीर्षस्थ नेता भी रहे हैं । लेकिन सत्ता के बाहर के गलियारे में इसकी आवाजें और अधिक मुखर रही हैं । दल चाहे कोई भी हो मगर सत्ता में रहते हुए असंतोष की ये आवाज प्रायः दबी रही है । शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि सत्ता शीर्ष पर बैठे व्यक्ति ने भारत के विरुद्ध न केवल प्रखर आवाज उठायी वरन उसके तथाकथित अतिवादी कदमों को संतुलित करने के लिए उसके पारम्परिक राजनैतिक और कूटनैतिक स्तर पर विरोधी शक्ति से अपरम्परागत संधि और समझौते भी किए । इससे यह बात तय है कि नेपाल स्वतंत्र रूप से न केवल अपनी विदेशनीति को आकार देना चाहता है वरन विश्व मानचित्र पर अपनी अलग पहचान भी बनाना चाहता है । लेकिन इस दिशा में ओली सरकार के अब तक जो कदम बढ़े हैं उसे इसलिए संतुलित नहीं माना जा सकता है, क्योंकि भारत को नेपाल के सन्दर्भ में अपनी सीमाओं का ज्ञान कराने के लिए चीन और पाकिस्तान जैसी शक्तियों के साथ अगर उनका हेलमेल बढ़ता है तो भारत लाचार बनकर इनकी गतिविधियों को देखता नहीं रहेगा । वह भी विभिन्न रूपों में इसे घेरने का प्रयास कर सकता है । यद्यपि इस दिशा में भारत की गति अभी उतनी नहीं है जितनी गति नेपाल ने पकड़ रखी है । लेकिन यूरोपियन यूनियन के साथ सम्मेलन में नेपाल के नवसंविधान की असफलता पर प्रस्ताव पास कराने की घटना को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है ।

अगर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में नेपाल की स्थिति पर गौर करें तो कहा जा सकता है कि नेपाल की परम्परागत राजनीति में वैदेशिक सम्बन्धों के निर्धारण में तीन पत्ते से खेलने की परम्परा रही है । कभी भारत का कार्ड खेला जाता रहा, तो कभी चीन का कार्ड और कभी दोनों को हाशिये पर रखकर अमेरिका का कार्ड खेला जाता रहा है । मगर आज परिस्थितियाँ बदल गयी हैं । एकध्र्ुवीय विश्व की अवधारण समाप्त हो चुकी है और अर्थ तथा सामरिक हितों को ध्यान में रखकर अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध बनते और बिगड़ते हैं । इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत का चीन के प्रति सम्बन्ध को वर्तमान संदर्भों में बुरा नहीं कहा जा सकता लेकिन उसके प्रति भारत सदैव सशंकित रहता है । यही स्थिति अमेरिका और जापान आदि देशों की भी है जो सामरिक दृष्टि से चीन के प्रति सशंकित हैं । यही कारण है कि इन देशों का भारत के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण है और वे निरन्तर एक दूसरे के पास आ रहे हैं । इससे इनके आर्थिक हितों की संरक्षा भी होती नजर आती है और सामरिक हितों की भी । इसी तरह भारत को सामरिक स्तर पर कमजोर देखने और उस पर दबाब बनाए रखने के लिए चीन और पाकिस्तान एक दूसरे से निकटता प्रदर्शित कर रहे हैं । लेकिन चीन की ओर नेपाल की वर्तमान सरकार का झुकाव लगातार बढ़ता जा रहा है । इससे साफ है कि आर्थिक रूप से उसे क्या नाफा–नुकसान होगा यह तो समय ही बताएगा मगर सामरिक दृष्टि से वह क्षेत्रीय और वैश्विक महाशक्तियों के कूटनैतिक द्वंद्व में लगातार उलझता जा रहा है ।
भारत के साथ समस्या यह है कि नेपाल के साथ उसकी लगभग पूरी दक्षिणी सीमा खुली हुई है । सीमांचल के लोगों के सामाजिक, साँस्कृतिक, धार्मिक सरोकार इतने गहरे हैं कि वह न तो नेपाल के साथ बन्द सीमा की अवधारणा को स्वीकार कर सकते हैं और न ही नेपाल में बढ़ती चीनी और पाकिस्तानी गतिविधियों से अनजान रहकर अपने विरोधियों को खुलकर यहाँ खेलने की सहमति दे सकता है । यद्यपि भारतीय संसद में भी नेपाल के बढ़ते चीन और पाकिस्तान मोह के कारण नेपाल–भारत की सीमाओं को अन्य देशों की तरह तार काँटे से घेरने की बात उठी थी । नेपाल में भी कुछ लोग हैं जो इस बात की वकालत करते हैं । लेकिन इस तरह की बातों को व्यावहारिक नहीं माना जा सकता । क्योंकि नेपाल भारत की जो सीमा अभी खुली है उसे तार काँटों से घेरकर उसमें विरोधी मनोविज्ञान और गतिविधियों को पल्लवित होने का अवसर भारत की दृष्टि से नहीं दिया जा सकता और न ही इस तरह का कोई खतरा ही वह उठा सकता है । नेपाल की दृष्टि से कहा जा सकता है कि सीमा पर जो लोग निवास करते हैं उनके सामाजिक साँस्कृतिक सम्बन्धों के साथ–साथ जीवन की अनेक सामान्य गतिविधियों के लिए भी वे एक दूसरे पर निर्भर हैं । शादी–विवाह के रिश्ते तो अपनी जगह हैं ही । ऐसे अनेक असंगठित क्षेत्र हैं जिसकी आर्थिक गतिविधियाँ भी खुली सीमा पर आधारित हैं । ऐसे में बन्द सीमा का यथार्थ और इससे उत्पन्न समस्याएँ सीमांचल क्षेत्र में असंतोष के उस आग को हवा देगी जिसे नियंत्रित करने में चाहे सरकार किसी की भी हो मगर उन्हें कठिनाई होगी ।
यह सच है कि आज हमारी अर्थव्यवस्था का अधिकाँश हिस्सा भारत आधारित है और यह भी सच है कि आज सम्बन्धों में गहरे दरार भी आए हैं । इसके साथ एक यथार्थ यह भी है कि आज भारत के साथ राज्य के सम्बन्धों में जो दरार आयी हैं वह अतीत की अन्यान्य घटनाओं से अधिक गहरी है । इसके साथ यह भी सही है कि मार्ग की तलाश में उत्तरी शक्ति के प्रति जो साँठ–गाँठ बढ़ी है वह भी आशातीत है । भारत के साथ सम्बन्धों में तल्खी के कारण चीन के प्रति जो निकटता लगातार बढ़ रही है उसे नहले पर दहला का खेल ही कहा जा सकता है । लेकिन तस्वीर का दूसरा रूख यह है कि जिस अनुपात में चीन के प्रति नेपाल की आत्मीयता बढ़ती जाएगी उसी अनुपात में भारत के साथ उसके रिश्ते असहज होते जाएँगे । चीन के प्रति क्रमशः हमारी निकटता बढ़ती जाएगी और एक स्थिति ऐसी भी आ सकती है कि जिस तरह की निर्भरता अभी भारत के साथ है वैसी ही निर्भरता चीन के प्रति भी हमारी हो सकती है । यद्यपि इस समीकरण के पक्ष में भौगोलिक परिस्थितियाँ सहायक नहीं लेकिन चीन अगर चाह ले तो उसके पास इतनी क्षमता तो है कि वह विषम भौगोलिक परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करते हुए नेपाल की आपूर्ति व्यवस्था को सहज कर दे । लेकिन सवाल उठता है कि चीन इतना निवेश क्यों करेगा ? अगर वह ऐसा करता है ते निश्चित ही उसमें किसी न किसी रूप में नेपाल के उपयोग की भावना होगी और जिस दिन नेपाल भारतीय हितों के विरुद्ध प्रयोग होगा उस दिन स्थिति अत्यन्त गम्भीर होगी । क्योंकि चीन चाहे लाख विकास क्यों न कर ले लेकिन भारत की स्थिति भी अब सन् १९६२ वाली नहीं है ।
आज नेपाल की समस्या भारत या चीन के सम्बन्धों को लेकर नहीं । सम्प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र के रूप में वह अपना भला और बुरा तो सोच ही सकता है । लेकिन आज नेपाल की सबसे बड़ी समस्या उसकी आत्मनिर्भरता है । सही मायने में इसके प्रति किसी भी सरकार ने गंभरिता से नहीं सोचा है । प्रजातंत्र के नाम पर नेपाल में सत्ता का जो खेल प्रारम्भ हुआ उसमें अस्थिरता यहाँ की सरकारों की नियति बनी । इसलिए कर्मकाण्डी बजट साल दर साल आते रहे । जैसे तैसे देश चलता रहा, सरकारें बदलती रहीं, लूट–खसोट चलता रहा और सत्ता में टिके रहने के लिए हमारे नेताओं ने काम से अधिक नारों पर विश्वास किया । इन नारों के कारण जनता भी गुमराह हुई और आज भी उनका मनोविज्ञान यह है कि वे हवा की बातों में अधिक भरोसा करते हैं । आज ज्वलन्त सवाल यह है कि जलस्रोत में सम्पन्नता के बावजूद हम क्यों ऊर्जा की दृष्टि से आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं, पहाड़ों की दुर्गमता को देखते हुए अगर इसकी बात छोड़ भी दी जाए तो क्यों देश के समतल भूभाग में रेल और सड़कों का जाल नहीं बिछ पाया है, क्यों आज भी हम दुर्गम स्थानों में आवश्यक वस्तुओं की सहज आपूर्ति नहीं कर पा रहे, क्यों हमारी युवा पीढ़ी विदेशों की ओर भागने के लिए कमर कस कर तैयार है और हमें श्रम पलायन से प्रतिभा पलायन तक की अवस्था से गुजरना पड़ रहा है ? इन सबकी जड़ में है आत्मनिर्भरता और स्वतंत्र नीतियों का अभाव । एक बात तय है जब तक हम मजबूत नहीं होंगे और खैरात में मिली राशि के आधार पर हमारी अर्थव्यवस्था दौड़गी तब तक हम सम्मुनत राष्ट्र की परिकल्पना को साकार नहीं कर सकते । शक्ति राष्ट्रों की कठपुतली बन कर रहना हमारी मजबूरी होगी ।
आज भारत के साथ बिगड़ते रिश्तों का सबसे बड़ा कारण बना है मधेश आन्दोलन । मधेश आन्दोलन के क्रम में पारम्परिक रूप से चली आ रही नेपाल की आपूर्ति व्यवस्था बाधित हुई और इसका जिम्मेवार भारत को ठहराया गया । उसका दोष यह था कि सीमा पर उसने आन्दोलनकारियों को जबरन हटाया नहीं और नेपाल भारत के बीच का आपूर्ति की दृष्टि से मुख्य नाका लगभग पाँच महीने तक बाधित रहा । इसका जिम्मेवार सरकार ने भारत को ठहराया और अघोषित नाकाबंदी का आरोप भी लगाया । इसी अवसर को पाकर भारत विरोधी मनोवज्ञान के पौधे यहाँ खूब पनपे और बढ़े तथा मौजूदा प्रधानमंत्री तथा अन्य वाम दलों के कुछ आला राजनीतिज्ञों ने इसमें खाद पानी भी डाला । लेकिन इसके समानानतर एक और महत्वपूर्ण बात हुई कि मधेश में उसी अनुपात में भारत के समर्थन में आवाजें भी बुलंद हुईं । आज अवस्था यह है कि ओली के चीन के प्रति गर्मजोशी से आगे बढ़ने के कदम के समर्थक जितने हैं उतने ही उनके आलोचक भी है ं। कहने का मतलब यह कि पहाड़ और तराई का इस सम्बन्ध में यह एक विपरीत मनोविज्ञान है । सरकार चाहे किसी भी दल का क्यों न हो, इस मनोविज्ञान को समझना उसके लिए जरूरी है क्योंकि इसके बिना पड़ोसियों से सम्बन्ध के सन्दर्भ में कोई भी दिशा एकांगी ही मानी जाएगी ।
आज नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और उनकी सरकार का भारत के प्रति तल्खी का एक अन्य मुख्य कारण कि पिछले दिनों ओली सरकार के गिरने के कयास भी लग रहे थे । जो खबरें छनकर बाहर आईं उससे एक बात तो साफ–साफ समझी जाने लगी थी कि इस सरकार का पतन प्रायः निश्चित है । लेकिन राजनीति ने करवट पलटी और सरकार बच गई । इस उथल–पुथल के नायक बने थे नेकपा एमाओवादी के सुप्रिमो प्रचण्ड और सहायक बने थे नेपाली काँग्रेस के नेता शेरबहादुर देउवा । लेकिन सारे घटनाक्रम का असफल खलनायक बनाया गया भारतीय राजदूत और भारत सरकार को । नायक तो आज भी उनके प्रमुख सत्ता सहायक हैं । सच यह है कि अल्पमत की सरकार की कोई आयु निश्चित नहीं होती । नेपाल में तो पूर्ण बहुमत की सरकारें भी असमय गिरती–पड़ती रही हैं । इसलिए आज जो भी सत्ता में हैं उन्हें इस बात को तो पूरी तरह भूल जाना चाहिए कि वे संजीवनी पीकर आए हुए हैं । यही वह विन्दु है जहाँ से यह माना जा सकता है कि सम्बन्धों का यह आड़ा–तिरछा अभ्यास ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं ।
आज स्थिति यह है कि हमारे प्रधानमंत्री की आवाज में देश की जनता के एक वर्ग का स्वाभिमान बोल रहा है दूसरी ओर भारतीय प्रधानमंत्री की भी अवस्था प्रायः ऐसी ही है । अन्तर यह है कि एक की जमीन खोखली है जबकि दूसरा बहुत मजबूत नहीं तो आधारविहीन भी नहीं है । वैसे भी भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आक्रामक विदेशनीति के पोषक माने जा रहे हैं । यह सच है कि वे पड़ोसियों के साथ मित्रता की बात करते हैं लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर उनकी सरकार ने जो कदम उठाए हैं उससे उनकी नीतिगत आक्रामकता जगजाहिर है । इस बात का संदेश पाकिस्तान, चीन, वर्मा जैसे देशों के साथ हुई कुछ घटनाओं से भी मिलता है । अब देखना है कि नेपाल स्थिति को साम्य कैसे कर पाता है ? हालात अगर सँवर गए तब तो ठीक है, लेकिन अगर दो क्षेत्रीय महाशक्ति के बीच संघर्ष का यह कारण बना तो ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो सकती है जिसकी कल्पना करना भी हमारे लिए मुश्किल है ।

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