चीन रूस नेपाल के रास्ते भारत में सोना तस्करी:रामाशीष

Ramashis

रामाशीष

भारत के प्रति घृणा, चीन के प्रति वफादारी और ‘सोना के प्रति हार्दिक प्रेम’ के लिए कुख्यात नेपाल के गृह तथा उपप्रधानमंत्री वामदेव गौतम के गृह शासन में सोने की तस्कारी नहीं हो, ऐसा हो ही नहीं सकता । शायद यही कारण था कि गौतम के गृहमंत्री का पद सम्हालते ही बीबीसी नेपाली सेवा से लेकर राजधानी की पत्र–पत्रिकाएं, एफ.एम. रेडियो स्टेशनों और टी.वी. चैनेलों ने उनकी अच्छी भली खोज खबर ली थी । और, ‘सोना तस्करों से उनकी ‘तथाकथित मिलीभगत’ एवं इससे पहले बने गृहमंत्री कार्यकाल में उनके द्वारा बटोरी गई ‘भारी सम्पत्ति’ के बारे में प्रश्नों की झरी लगा दी थी । ऐसी स्थिति में वह चाहे बीबीसी स्टूडियों में या किसी टीवी चैनेल के कार्यक्रमों में क्यों न हों, पत्रकारों एवं एंकरों के तेज–तर्रार सवालों और गरमागरम नोक–झोंकों का उनका ‘एक ही ठगा सा जबाब’ हुआ करता था– ‘आपलोगों के द्वारा लगाए गए सभी आरोप गलत हैं, मैंने न तो अकूत सम्पत्ति जमा की है और न ही मेरी किसी सोना तस्कर से कभी कोई सम्बंध रहा है’’ । जबकि, प्रकाश टिबड़ेवाला और मोहन गोपाल खेतान जैसे कुख्यात सोना तस्कर एवं पाक–दोस्तों के साथ उनका संबंध जगजाहिर रहा है । एक क्षण के लिए मान भी लें कि सोना तस्करों से गृहमंत्री गौतम के पुराने रिश्ते अब ‘बीत गई – बात गई’ मान भी लें तो उनके ही सहकर्मी सांसद उन्हें अपराधमुक्त मानने को अब भी तैयार नहीं हैं । पिछले २८ दिसम्बर –पौष १३ गते) को सार्वजनिक लेखा समिति की बैठक में समिति के सांसद सदस्यों ने आखिर पूछ ही डाला कि ‘गृहमंत्री जी, आखिर क्यों, आपके ही कार्यकाल में सोना तस्करी को लेकर आप पर उंगलियां उठा करती हैं’ ? बात यहीं नहीं थमती है, खुद गृहमंत्री गौतम की पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) के तत्कालीन महासचिव माधव कुमार नेपाल ने राजधानी के खुला मंच–शहीद मंच से गौतम को कुख्यात तस्कर और अपराधकर्मी बताया था । फिर भी गुटबाजी के शिकंजे में फंसी पार्टी को बार–बार कुख्यात छवि के कॉमरेड गौतम को ही गृहमंत्री का कार्यभार सौंपने को बाध्य होना पड़ता है ।
नेपाल से भारत में सोना तस्करी की खबरें लिखते–लिखते नेपाल और भारत के पत्रकारों की उंगलियां अभी तक थकी नहीं हैं, क्योंकि नेपाली दैनिक एवं साप्ताहिक पत्र–पत्रिकाएं भी सोना तस्करी की खबरों की जानकारी नेपाल और भारत की जनता को देती रहती हंै । इसी सिलसिले में नेपाल के महोत्तरी जिले से लगे सुरसंड गांव में जाने का अवसर मिला जो मेरा जन्मस्थल भी है और जहां भारत सरकार ने कड़ी से कड़ी सीमा सुरक्षा की व्यवस्था की है क्योंकि चीन अधिकृत तिब्बत का सामरिक केन्द्र खासा से सुरसंड की टैंक–दूरी छह घंटे से भी कम है । सुरसंड गांव की उत्तरी सीमा महादेव स्थान के उस पार मरूआही गांव है और दोनों गांवों के बीच का दस गजा (नो मैन्स लैंड), का उपयोग श्मशान घाट के रूप में दोनों ही देशों के ग्रामवासियों के द्वारा किया जाता है । इसी सिलसिले में सुरसंड में तैनात सशस्त्र सीमा बल के कामकाज पर भी विभिन्न क्षेत्र के लोगों से चर्चा हुई । अधिकांश शिकायतें सीमा पार के नेपाली गांवों के लोगों की थी जिनका कहना था कि हमलोगों का परम्परागत बाजार सुरसंड है और यदि हम अपनी जरूरत की वस्तु खरीदकर लाते हैं तो एसएसबी (सशस्त्र सीमा बल) के जवानों द्वारा हमें परेशान किया जाता है । जबकि, एसएसबी के प्रवक्ता से जब इस संबंध में जानने की कोशिश की तो उनका कहना था ‘‘अपने घरेलू उपयोग के लिए थोड़ी–बहुत सामग्री या लत्ता–कपड़ा लोग ले जाते हैं तो उन्हें कभी भी रोक–छेक नहीं की जाती है । लेकिन, हां, यदि कोई दो क्विंटल चीनी ले जा रहा हो, ट्रकों में निर्यात निषेधित चावल आदि ले जा रहा हो तो उसे रोकना हमारा फर्ज है । सामान्यतया लोग बताते हैं कि ‘‘शादी–व्याह’’ के लिए चीनी चावल आदि सामग्री ले जा रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि चीनी–चावल की तस्करी की जा रही होती है । प्रवक्ता ने यह कहकर हंसा ही दिया कि अब तो तस्करी करनेवाले नेपाली साहू–महाजन, बेटे–बेटियों की शादी के फर्जी निमंत्रण कार्ड भी छपवा लेते हैं और उसके माध्यम से उपभोक्ता वस्तुओं की तस्करी किया करते हैं ।
बातचीत के दौरान प्रवक्ता के मुंह से एक बात तो निकल ही गयी । उन्होंने कहा यह सब तो छोटी–मोटी बातें हैं, समस्या तो यह उभरकर सामने आयी है कि ‘‘नेपाल से भारत में हो रही सोना की तस्करी को कैसे रोका जाए’ ? हमारा यह कैंप भी क्या कर सकता है ? यह ठीक है कि दसगजा सीमा के किनारे हमारीे चैकियों की संख्या पहले से बहुत अधिक बढ़ा दी गई हैं, सीमा पर गश्ती भी बढ़ा दी गई है, चैकसी बरती जा रही है, लेकिन सवाल यह है कि दो चौकियों के बीच की एक किलोमीटर की दूरी में यदि कोई तस्कर अपने घुसपैठियों द्वारा खेतों या बाग–बगीचे के रास्ते सोना पार करा दे तो उसे कैसे रोका जाए ?
प्रस्तुत है नेपाल से भारत में की जा रही सोना की तस्करी पर सनसनीखेज एवं खोजपूर्ण रिपोर्ट जिसमें न केवल सोना तस्करी में नेपाल, अपितु चीन और रूस की कितनी अधिक संलग्नता है, इसका पर्दाफाश किया गया है । मुझे विश्वास है कि यह खोजपूर्ण रिपोर्ट पाठकों के लिए जहां मनोज्ञ होगा, वहीं तस्करी रोकथाम में लगे हुए सुरक्षा तंत्र के लिए सहयोगी ।
ट्रान्जिट पॉइन्टः नेपाल
अन्तर्राष्ट्रीय सोना तस्करों द्वारा नेपाल को ‘पारगमन केन्द्र (ट्रान्जिट पोआइन्ट) बनाते हुए, चीन के रास्ते भारत में बड़े पैमाने पर सोना की तस्करी किए जाने की सनसनीखेज खबरें मिल रही है । ये तस्कर नेपाल की उत्तरी सीमा चीन अधिकृत ‘तिब्बत’ से नेपाल के विभिन्न जिले के रास्ते सोना लाया करते हैं और उसे नेपाल–भारत की खुली सीमा का लाभ उठाते हुए भारतीय बाजारों में घुसा देते हैं ।
स्वीट्जरलैंड और अफ्रीका से सीधा चीन आनेवाला, सोना रुस और नेपाल होते हुए अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में तस्करी होने की जानकारी सामने आयी है । भारत और चीन, पहले स्वीस बैंकों के मार्फत सोना आयात किया करता था जबकि हाल के दिनों में ये दक्षिण अफ्रीका से भी आयात करने लगे हैं ।
चीन अपने यहां आनेवाला सोना का कुछ भाग खुद उपयोग करता है जबकि बांकी बचे सोना का नेपाल और रूस में अवैध निर्यात कर दिया जाता है । ये तस्कर, चीन सरकार तथा उसकी विभिन्न इकाइयों के अलावा भी, एक अलग संयंत्र खड़ा कर, विभिन्न चैनेल मार्फत सोना की तस्करी कर रहे हैं । वैसे देखें तो नेपाल में चीन के रास्ते पहले से भी सोना की तस्करी होती आ रही है । ‘‘ल्हासामा सुन छ, कान मेरो बुच्चै’’ (अर्थात् पड़ोस के ल्हासा में चाहे जितना भी सोना क्यों न हो लेकिन मेरा कान तो खाली ही है)’’– इस नेपाली कहावत को याद करें तो नेपाल में चीन (तिब्बत) से सोना तस्करी का पुराना इतिहास है । खासकर सन् १९५९ में तिब्बत से दलाईलामा के पलायन के साथ ही उनके परिजन तथा समर्थक, चीन में बसे रहने की अवस्था नहीं रहने के कारण, अपनी सम्पत्ति, सोना के रूप में ही नेपाल तथा भारत ला पाए थे ।
पहले लिपुलेक, टिंकर, उराल भन्जांग, हियला, खप्तांग चैर, मुसीगांव, लोमानथांग, नारू (नार), लोर्के भन्जांग, रसुवागढ़ी और तातोपानी सहित १६ नाकाओं द्वारा नेपाल में सोना आया करता था । जबकि, हाल के दिनों में ये तस्कर, चीन के केरूंग, रसुवागढ़ी, खासा (झांगमल), सिन्धुपाल चैक जिले के तातोपानी, रोंगसार, ताप्लेजुंग जिले के ओलांगचुंग गोला, लोनाक, टिंगरी, सोलुखुम्बू जिले के नाप्चे चुले और दोलखा जिले के लाप्चेगांव के रास्ते को मुख्य तस्करी मार्ग बनाया है ।
स्मरणीय है कि सोना तस्करों को पकड़ने और छोड़ने की प्रक्रिया पहले से चलते रहने पर भी बड़े पैमाने के ३५ किलो सोना सहित चीनी मूल के नेपाली ग्यलजो लामा सहित भारतीय मूल के मोहन अग्रवाल को पकड़ा गया था । ‘सोना–डॉन’ के नाम से परिचित घनश्याम अग्रवाल का भाई मोहन अग्रवाल, पुनरावेदन अदालत से सामान्य जमानत पर रिहा किए जाने के बाद, फिर से सोना का कारोबार कर रहा है, जबकि तस्करी में उपयोग किया गया ड्राईवर अभी भी जेल में बन्द है ।
हाल ही में बालाजी ट्रेडर्स काठमांडू के संचालक इलाम का बालकृष्ण अग्रवाल, संगम ज्वेलर्स बांगेमुढ़ा के संचालक रमेश खड्का, द यूनाईटेड गोल्ड मार्ट के संचालक प्रबंधक आकाश कुमार बज्राचार्य, महाराष्ट्र के मूल निवासी तथा काठमांडू के न्यू रोड में सोना चांदी का व्यापार करते आ रहे वालु जगन्नाथ घाड्गे के यहां गत माघ २५ गते (८ फरबरी) को छापा मारा और घाड्गे को हिरासत में ले लिया था । भारतीय व्यापारी घाड्गे से २ किलो सोना के अलावा २ करोड़ नेपाली रूपया, के साथ ही ‘‘पांच सौ तथा हजार रूपये का भारतीय नोट’’ भी बरामद हुआ था । दधिकोट–४ भक्तपुर के रमेश खड्का से ८१ लाख ५१ हजार नगद तथा ३५ किलो चांदी बरामद किया गया था । आकाश कुमार बज्राचार्य की दुकान से तीन किलो निर्मित गहना सहित छ किलो चांदी के साथ ही नगद ३१ लाख रूपया, अपराध अनुसंधान शाखा हनुमान ढोका की टोली को मिला था । नेपाली पुलिस के आपरेशन ‘आक्टोपस’ के दौरान माघ २१ गते (४ फरबरी) को सुबह सवा नौ बजे से सांझ सवा चार बजे तक की गई गिरफ्तारी, नेपाल में जारी सोना की तस्करी का भयावह अवस्था चित्रित करता है ।
पुलिस ने ५८ दिनों के अनुसन्धान के दौरान १७ व्यक्तियों को सोना का अवैध धन्धा (ओसार–पसार) करने के आरोप में पकड़ा था । यद्यपि माघ २१ गते (४ फरबरी) को व्यापारिक स्थलों पर छापा मारकर सोना व्यापारियों को भले ही गिरफ्तार किया गया हो लेकिन फागुन २५ गते (९ मार्च) अर्थात् ३४ दिनों बाद ही पत्रकार सम्मेलन आयोजित कर पुलिस के द्वारा सर्वसाधारण को जानकारी दी गई थी । नेपाली पुलिस की सर्वाधिक खोज की सूची में पड़े हुए बालकृष्ण अग्रवाल के पार्टनर सावरमल जोधानी और कुलियों का सरगना (भरिया नाइके) श्रीराम चैधरी फरार है । उनमें से संगम ज्वेलर्स के संचालक रमेश खड्का राजस्व अनुसन्धान विभाग में जमानत राशि जमा करा –धरौटी), चुके हैं लेकिन सम्पत्ति शुद्धिकरण विभाग द्वारा अनुसन्धान जारी है । जबकि, सम्पत्ति शुद्धिकरण विभाग में जमानत राशि जमा करा चुकने के बाद भी आकाश बज्राचार्य को फिर से हनुमान ढोका पुलिस ने चालान कर दिया है और वह इस वक्त जेल में है ।
नेपाल में सोना तस्करी का मुख्य कारण है सोना के आयात में लगनेवाला कर और नेपाल के विभिन्न बैंकों द्वारा सोना की तस्करी में की जानेवाली बदमाशी । पहला कारण है नेपाल राष्ट्र बैंक ‘‘क’’ वर्ग के बैंकों को, प्रक्रिया पूरा कर, सोना आयात की अनुमति दे सकता है । लेकिन, इस प्रक्रिया में वैधानिक ढंग से सोना लाने के लिए प्रति तोला ४,८०० रु. आयात कर चुकाना पड़ता है । जबकि, तस्करी के सोना में प्रति किलो ४ लाख ११ हजार ३६० रूपया का मुनाफा है ।
दूसरा, यह कि नेपाल के बैंकों द्वारा आयात किए जानेवाले सोना में मात्र ९९.०५ प्रतिशत ही सोना हुआ करता है जबकि तस्करी के रास्ते आनेवाले सोना में ९९.९९ प्रतिशत सोना हुआ करता है । एक किलो सोना में डेढ़ तोला ताम्बा मिलाने के बाद ही वह ९९.०५ प्रतिशत के बैंक द्वारा बेचे जानेवाले स्तर के बराबर हो पाता है । इससे अवैध करोबारी ४ लाख ११ हजार ३६० रूपया ‘‘कर चोरी’’ करता है और डेढ़ तोला ताम्बा को सोना के मूल्य में, अर्थात् ७६ हजार रूपया में बेच पाता है । इस कारण भी सोना की तस्करी व्यापक और भारी पैमाने पर हुआ करता है ।
तीसरा कारण, चैंकानेवाला है – और वह है, नेपाल से भारत में बहुत बड़े पैमाने पर हो रही सोना की तस्करी । भारत में सोना की कीमत नेपाल की अपेक्षा प्रति तोला लगभग ४३७.५० रु. (७०० नेपाली रूपया) अधिक है । इस कारण नेपाल का व्यापारी सोना का गहना बनाकर उसे ‘‘वैधानिक रूप’’ में भारत भेज रहे हैं जो नेपाल के कानून के अनुसार वैध होने पर भी भारत में गैर कानूनी है । नेपाल से यदि कच्चा सोना ही भारत में तस्करी द्वारा जाता है तो ६० हजार नेपाली रूपये की आमदनी होती है । नेपाल से भारत जानेवाला व्यक्ति यदि छ तोला तैयार गहना भी ले जाता है तो मजदूरी के अलावा उसे एक बार में ४ हजार रूपये की आमदनी होती है ।
एक गोपनीय सर्वेक्षण के अनुसार नेपाल में दैनिक ५० से १०० किलो तक सोना आया करता है जो पूर्ण रूप में सेटिंग के अनुसार आता है । राजस्व अनुसन्धान विभाग और सम्पत्ति शुद्धिकरण विभाग के एक अद्र्धन्यायिक निकाय होने पर भी सोना की तस्करी रोकने का प्रयास विफल ही दिखता है ।
पर्यवेक्षकों का मानना है कि दो विशाल देशों के बीच स्थित नेपाल के मार्फत हो रही अन्तर्राष्ट्रीय तस्करी रोकने के लिए राजनीतिक नेतृत्व ने यदि ध्यान नहीें दिया तो अन्तर्राष्ट्रीय जगत में नेपाली की छवि धूमिल हो सकने का खतरा बढ़ेगा ऐसा दिखता है
(सौजन्यः आर्थिक) ।
सोना तस्करों पर संगठित अपराध का मुकदमा
सार्वजनिक लेखा समिति ने ‘बरामद सोना के कमीशन विवाद’, में गृहमंत्री से लेकर सचिव और पुलिस महानिरीक्षक तक पर, मिलीभगत का आरोप लगने के बाद, संलग्न पुलिसकर्मियों को और अधिक सजा दिलाने के लिए, ‘अपराध विरुद्ध कानून’ अन्तर्गत कार्रवाई करना शुरू कर दिया है ।
पुलिस ने तातोपानी नाका के रास्ते सोना तस्करी करनेवाले १४ तस्करों के गिरोह को पहिचानकर, उनलोगों के खिलाफ मुकदमा दायर किया है । इनमें से ९ व्यक्ति पकड़े गए हैं तथा बांकी फरार हैं । संगठित अपराध के मामले में अन्य कानूनों की अपेक्षा सजा डेढ़गुनी होती है । सोना की तस्करी में पांच वर्ष कैद की सजा का प्रावधान है । उसी में यदि संगठित अपराध का मुद्दा जुड़ा तो सजा साढ़े सात वर्ष की होती है ।
सार्वजनिक लेखा समिति के सदस्य सांसदों ने २८ दिसम्बर (पौष १३ गते) को हुई बैठक में गृहमंत्री वामदेव गौतम से पूछा – ‘‘गृहमंत्री जी, आपके ही कार्यकाल में सोना तस्करी का मामला क्यों उठा करता है’’ ? एक अन्य बैठक में तो खुद आई जी पी (पुलिस महानिरीक्षक) उपेन्द्रकान्त अर्याल को उपस्थित कराकर, उनसे पूछा गया था– सुनते हैं कि सोना तस्करी का कमीशन आइ जी पी तक पहुंचता है ।
उक्त बैठक में गृहसचिव सूर्य सिलवाल ने सभासदों से मर्यादा बनाए रखने का अनुरोध किया था । बैठक के बाद आई जी पी ने गंभीर तथा संगठित किस्म के मामले में अनुसंधान करने की जिम्मेदारी पाए हुए महानगरीय अपराध शाखा को, सोना तस्करी पर नियंत्रण करने का जिम्मा सौंपा । उक्त महाशाखा ने ऑपरेशन ऑक्टोपस नाम से अभियान चलाया । पुस २१ से टोली बनाकर बालाजी एण्ड सन्स, यूनाईटेड गोल्ड मार्ट, मामन स्टोर्स और संगम ज्वेलर्स पर छापा मारकर अवैध रूप में लाए गए छ किलो सोना और छट किलो चांदी बरामद किया था । कुरेदने पर १४ तस्करों के गिरोह का पता चला, ऐसा महाशाखा प्रमुख एस एस पी पुष्कर कार्की बताते हैं । उक्त ऑपेरेशन के अन्तर्गत हाल तक घघ किलो सोना बरामद किया जा चुका है ।
पुलिस ने वि.सं. २०७१–७२ में १५ की कार्रवाइयों में १३० किलो सोना बरामद किया था । जबकि, इससे पहले वि.सं. २०७०–७१ में २५ कार्रवाईयों में ९० किलो सोना पकड़ा गया था । इसी प्रकार २०६९–७० में १७ कार्रवाई में ८३ किलो सोना बरामद हुआ था । केवल काठमांडू में ही २०६९–७० में टड किलो, २०७०–७१ में ६६ किलो और २०७१–७२ में ७१ किलो सोना बरामद हुआ । फिर भी संगठित कानून लगाना आवश्यक नहीं समझा गया । इतना ही नहीं बरामद होने के बाद सोना सहित पकड़े जानेवलों के अलावा लोगों की खोज तलाश भी नहीं की गई जबकि सोना सहित पकड़े गए लोगों में गाड़ी के ड्राइवर या कुली ही हुआ करता था ।
पुलिस के केन्द्रीय अनुसन्धान ब्यूरो (सी आइ बी) ने गत वर्ष आषाढ़ महीने में तातोपानी से लाए जा रहे कन्टेनर से १५ किलो सोना बरामद किया था और ड्राइवार के बयान के आधार पर सोना के मालिक मोहन अग्रवाल और ग्याम्जो लामा को पकड़ा था । एस एस पी कार्की । बताते हैं इससे पहले केवल भरिया–कुली) ही पकड़े जाते थे जबकि इस बार अनुसन्धान के द्वारा सोना की तस्करी करानेवाले तक पहुंचा जा सका । इससे पहले राजस्व चोरी के मामले में कारवाई करने पर, पुलिस की भूमिका पकड़े गए व्यक्ति और बरामद सामान राजस्व से सम्बद्ध निकाय को सौंपने तक ही हुआ करता था । इसलिए माल के मालिक तक पहुंचने में कठिनाई होती थी । वह बताते हैं ‘हमलोगों द्वारा सुपुर्द कर दिए जाने के बाद और अधिक अनुसन्धान का काम राजस्व और कस्टम विभाग के जिम्मे हुआ करता था । संगठित अपराध कानून के अन्तर्गत अनुसन्धान करने पर लगानीकर्ता, मध्यस्थकर्ता और कैरियर की जिम्मेबारी का पता लगाने के बाद संगठित रूप में अपराध की जानकारी होने लगी है ।
द यूनाइटेड गोल्ड के संचालक आकाश कुमार बज्राचार्य और इलाम के बालकृष्ण अग्रवाल सोना तस्करी में सार्वजनिक अपराध का मुकदमा भोग रहा है । पांग्रेटा, सिन्धुपालचैक का देउता तिमिल्सिना, रौतहट सिमरा भगवतीपुर–३ का मोहन चौधरी, काभ्रे नयाबजार का मिलन तमांग और कैलाली मालती का जयराज भट्ट फरार है । पुलिस ने शुरू में पकड़े गए मोहन, रामराज, नारायण और किशोरी चैधरी को सार्वजनिक अपराध के अरोप में हिरासत लिया था उसके बाद ही और अधिक लोगों को पकड़ा था ।
वह बताते हैं ‘अब हमेशा पुलिस–तस्कर लुका–छिपी का खेल’ खेलने से काम नहीं चलेगा, यही मानकर नीति में बदलाव लाया है’ । इससे पुलिस के हमेशा सोना के पीछे लगने और बदनाम होने की अवस्था कायम नहीं रहेगी । कार्की बताते हैं – नागरिक सुरक्षा को पहली प्राथमिकता देनेवाली पुलिस को सोना तस्कर के पीछे लगे रहने और विवाद में घसीटे जाने की अवस्था का अन्त करने की इच्छा है । वह बताते हैं कि एक करोड़ रूपये से अधिक की जमानत राशि और ३ वर्ष की कैद की सजा वाले अपराध के मामले में संगठित अपराध कानून आकर्षित होने के कारण अब सोना की तस्करी का नियंत्रण आसान होगा ।
एक समय वैसा भी था जब राजनीति में सोना तस्करों का बोलबाला होने की चर्चा हुआ करती थी । वि.सं. २०५१ से २०५६ साल तक बार–बार सरकार बनाने और गिराने के खेल में उनकी निर्णायक भूमिका हुआ करती थी । उस समय ‘हलका’ और ‘भारी’ शब्द का प्रयोग किया जाता था । हलका शब्द से डॉलर का बाहर जाने और भारी शब्द से सोना आने का अर्थ लगाया जाता था । तब त्रिभुवन विमानस्थल पर पुलिस की तैनातगी तस्करों की इच्छा से की जाती थी । तस्करों की रुचि के पुलिसकर्मी बार–बार विमानस्थल पर तैनात किए जाते थे । विक्रम संवत २०५५ साल में सबसे अधिक वजन का सोना, अर्थात् ३३ टन सोना वैध रूप में ही नेपाल लाया गया था । सोना चांदी व्यावसायी महासंघ के निवर्तमान अध्यक्ष तेजरत्न शाक्य बताते हैं ‘वैध रूप में लाया गया सोना का तो क्या लेखा–जोखा करें, भारतीय दबाब के के कारण १० किलो तक सोना लाने की सुविधा बन्द की गई । उस समय यात्री ३ तोला २० लाल तक का सोना कस्टम छूट नियम के अनुसार ला सकते थे । २०६३ साल माघ १ को अध्यादेश मार्फत ओपेन जनरल लाईसेन्स –ओ जी एल) लागू किया गया । इसके तहत किसी को भी चाहे जितना भी सोना लाने की छूट मिली और कस्टम शुल्क चुकाकर, जो कोई भी चाहे जितना भी सोना लाने लगे । बाद में अधिक परिमाण में सोना आने के कारण जब सरकार ने राजस्व घाटा महसूस किया तो २०६६–६७ साल के अन्त में सोना आयात को नियंत्रित किया । भारत में सोना का कस्टम शुल्क दर नेपाल की अपेक्षा ३५० रूपया कम होने के कारण वैधानिक चैनेल द्वारा ही उक्त वर्ष ४१ अरब का सोना आयात हुआ था । जिस कारण देश को २० अरब का शोधनान्तर घाटा भोगना पड़ा (सौजन्यः का.पु.)

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