चीन से मिली उर्जा क्या भारत के विरुद्ध काम कर रही है ?

डा. श्वेता दीप्ति :प्रधानमंत्री ओली पर फिलहाल चीन का नशा सर चढ़कर बोल रहा है । इस नशा का असर एमाले पोलिट ब्युरो की बैठक और प्रस्तावित प्रतिवेदन में भी देखने को मिला । भारत भ्रमण के दौरान जो नम्रता दिख रही थी वो एक बार फिर उग्र रूप में सामने आ रहा है । यह उर्जा शायद चीन यात्रा की देन है । परन्तु चीन यात्रा के पश्चात् जो मिला नेपाल को, उसमें ऐसा कुछ नहीं था जिसकी बदौलत नेपाल अपने सबसे करीबी राष्ट्र के विरुद्ध खड़ा हो जाय और कूटनीति तथा विदेश नीति की मर्यादा को भूलकर पड़ोसी राष्ट्र पर दोषारोपण की बौछार शुरु कर दे । किन्तु फिलहाल देश की आबोहवा में भारत विरोधी हवा पूरे जोर–शोर से चल रही है । वह भी देश के नेतृत्वकर्ता के ही द्वारा । नेपाल के नवनिर्मित संविधान के प्रति असंतुष्टि सिर्फ भारत की ही नहीं है, यह तो अब जाहिर हो चुका है किन्तु इस बात को मानने के लिए फिलहाल हमारी सरकार तैयार नहीं है उन्हें अगर इसमें कोई संलग्न दिख रहा है तो वह है भारत ।
पिछले दिनों का मधेश आन्दोलन, उस दौरान हुई दर्जनों हत्या इन सबको आज तक सत्ता गम्भीरता से नहीं ले रही है । किन्तु नाकाबन्दी का सारा दोष भारत पर दिया जा रहा है । यह सच है कि नाकाबन्दी की वजह से देश की आर्थिक अवस्था चरमरा गई है, किन्तु ताज्जुब इस बात की है कि यह बात आज हमारे प्रधानमंत्री को समझ में आ रही है । जिस वक्त देश की मिट्टी खून से रंगी जा रही थी, जनता बेहाल थी, कालाबाजारी को सत्तापक्ष की ओर से ही नहीं स्वयं प्रधानमंत्री जी को ओर से धन्यवाद दिया जा रहा था, उस समय यह बात क्यों नहीं समझ में आई थी ? उस समय राष्ट्रीयता के गीत जा रहे थे, मुहावरों और कहावतों से मनोरंजन किया जा रहा था । चेहरे पर शिकन नहीं थे तो आज क्यों रोना रोया जा रहा है ? नाकाबन्दी बेवजह तो हुई नहीं थी । नाकाबन्दी करने वाले इसी देश के नागरिक थे और तोहमत किसी और पर लगाया जा रहा है । आश्चर्य तो यह है कि राजनीति में सुर बदलते देर नहीं लगती ।
भारत भ्रमण के दौरान कुछ ऐसा लगा था कि प्रधानमंत्री की भारत यात्रा राजनीतिक यात्रा ना होकर विजय यात्रा है । इस यात्रा को नेपाल की जनता के सामने कुछ इसी तरह परोसा भी गया । किन्तु सच तो यह था कि झोली खाली की खाली ही थी ।
कुछ इसी अंदाज में प्रधानमंत्री ओली का चीन भ्रमण भी सम्पन्न हुआ । किला फतह करने के अंदाज में प्रधानमंत्री ओली का अवतरण चीन भ्रमण के पश्चात् नेपाल की धरती पर हुआ है । बड़ी–बड़ी बातें और बड़े–बड़े सपने, लुभावने तो हो सकते हैं किन्तु सच तो यह है कि यथार्थ से यह काफी दूर होता है । अपनी तथाकथित उपलब्धियों पर इतराना वैसे भी हमारे प्रधानमंत्री जी की आदतों में शुमार है । नेपाली मीडिया ने भी काफी उत्साहित होकर उनके चीन भ्रमण का प्रचार प्रसार जोर शोर से किया ।
वैसे उत्साहित होने का हक भी है, क्योंकि उत्साह ही उर्जा प्रदान करती है और नकारात्मकता में भी सकारात्मक सोच सामने आती है । जो हमें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है । यह दीगर है कि इन उपलब्धियों से भविष्य हमें क्या देने वाला है यह फिलहाल धुन्ध में है । परन्तु इस धुंध को हटाने की कोशिश तो की ही जानी चाहिए ।
प्रधानमंत्री ओली की चीन यात्रा को फिलहाल नेपाल की विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता मानी जा रही है और इसी तरह इसका पूरे जोर शोर से प्रचार प्रसार किया जा रहा है । मीडिया तो इस भ्रमण का ऐसे प्रचार कर रही है मानो उन्हें विशेष तौर पर राजनीतिक रूप से इसकी ट्रेनिंग दी गई हो । वैसे गौर किया जाय तो यह स्पष्ट तौर पर दो उद्देशयों से प्ेरित नजर आ रही है । पहली, इस नीति के तहत यह कोशिश की जा रही है कि राष्ट्रवादी विचारधारा वाले लोगों को विश्वास में लिया जाय और उनके निर्वाचन क्षेत्र में अपनी पकड़ कायम की जाय । दूसरी जो राजनीति को भँजाने की सबसे अहम और महत्वपूर्ण नीति रही है नेपाल की कि जब झोली खाली हो तो यह दिखाया जाय कि हम भारत के मुहताज नहीं हैं, हमें भारत की जरुरत नहीं है । या यूँ कहा जाय तो भारत को सीधे तौर पर धमकाया जाय ।
यह नीति हमेशा से उस समय लागू की जाती है जब नेपाल किसी आन्तरिक समस्या से जूझ रहा होता है । उस समय चाइना कार्ड नेपाल के लिए तुरुप का पत्ता होता है जिसे सत्ता उपयोग करती है । शाही शासन में भी यह होता आया है और लोकतंत्र में भी यह दिख ही रहा है । राजा महेन्द्र से लेकर राजा वीरेन्द्र और ज्ञानेन्द्र तक की शाही सत्ता इस कार्ड को आजमाने की कोशिश कर चुके हैं । राजा महेन्द्र ने प्रजातांत्रिक शक्ति को दबाने के लिए १९६० में भारत से सहयोग की अपेक्षा की थी और जब वहाँ से निराशा हाथ लगी तो हतोत्साहित होकर काठमान्डू और कोदारी के बीच सड़क का निर्माण करवा डाला जो १९५० की भारत नेपाल संधि का सीधा उल्लंघन था ।
उसके बाद राजा बीरेन्द्र और राजा ज्ञानेन्द्र ने भी १९८८–८९ और २००५–०६ के दौरान सत्तावादी शासन के खिलाफ जब उन्हें संघर्ष करना पड़ा तो उन्होंने भी इसी नीति को आजमाया । इन सभी चालों में जो भावना निहित थी वो भारत विरोधी राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए काफी थी । उसी इतिहास की पुनरावृत्ति कमोवेश आज भी हो रही है जिसे कार्यान्वयन यूएमएल शाही संरक्षण और राजनीतिक भावना के तहत फलपूmल रहे लोकतांत्रिक शासन के प्रमुख कर रहे हैं । इसमें कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है क्योंकि जब भी देश आन्तरिक समस्याओं में उलझा है तो कम्यूनिष्ट की शक्ति बढ़ी है । खैर ध्यान देने वाली बात चीन के साथ हुए समझौतों पर है ।
चीन के साथ जिन दस मुद्दों पर समझौते हुए हैं उससे एक राष्ट्रवादी भौतिक जमात ऐसी है जो इस समझौते से अति उत्साहित हैं और यह दावा कर रहे हैं कि नेपाल भारतवेष्टित से अब भूपरिवेष्टित हो रहा है । उन्हें लग रहा है कि ओली की निष्कर्षविहीन हुई भारत की यात्रा की क्षतिपूर्ति चीन यात्रा ने कर दी है । परन्तु देखा जाय तो चीन के साथ हुए समझौते में एक भी समझौता ऐसा नहीं है जो वर्तमान नेपाल की समस्याओं का तत्काल निदान कर सके । जो समझौते हुए हैं उनके कार्यान्वयन में और उसके परिणाम को आने में वर्षों लगेंगे किन्तु आज जिस दौर से आम जनता गुजर रही है या देश जिन समस्याओं से जूझ रहा है उसका क्या ? यह यक्ष प्रश्न ज्यों का त्यों है ।
चीन की इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री ने पारगमन और व्यापार, कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचा, उजाृ अन्वेषण और भंडारण, बैंकिंग, छात्रवृत्ति और प्रशिक्षण के क्षेत्र से जुड़े हुए समझौते किए हैं । इनमें जिन पर सबसे अधिक फोकस किया जा रहा है वह है काठमान्डू केरुंग रेल मार्ग तथा अन्य नाकाओं को खोलने की बात । परन्तु स्थलगत तौर पर अगर इस पर गौर किया जाय तो यह महज मृगतृष्णा ही साबित होगी । तातोपानी नाका को खुलवाने में असफल सरकार इन समझौतों पर कब कार्य करवा पाएगी यह इनकी नीति तय करेगी । फिलहाल इसका कोई सुखद परिणाम नेपाल के लिए सामने नहीं दिख रहा है । जब तक इस समझौते पर कार्य नहीं होगा तब तक पारवहन संधि के कार्यान्वयन होने का तो सवाल ही नहीं उठता । चीन अपना बंदरगाह तिआनजिन नेपाल को तीसरे देशों से आयातित करने के लिए उपयोग हेतु देने पर सहमति दे चुका है । यह एक अच्छी कोशिश है किन्तु जब वास्तविकता की ओर हम दृष्टिगत होते हैं तो यह बात भी सामने आती है कि समुद्री बन्दरगाह तियानजिन नेपाल से ३५ सौ किलोमीटर दूर है जबकि उससे आधी दूरी पर अवस्थित विशाखापत्तनम बन्दरगाह के प्रयोग में ही कठिनाई आ रही है । वर्तमान में नेपाल भारत का हल्दिया बंदरगाह जो नेपाल से महज १००० किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है ।
इन सबके बावजूद यह माना जा सकता है कि चीन नेपाल में जी खोलकर खर्च करने को तैयार हो सकता है क्योंकि वह नेपाल की धरती को भारत के लिए प्रयोग करना चाहता है । अपनी प्रसारवादी नीति के तहत चीन नेपाल के लिए खर्च करने से गुरेज नहीं कर सकता है । क्योंकि पूरे दक्षिण और दक्षिणपूर्वी एशिया को अपने प्रभाव में लाना चाहता है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है । यह अवस्था भारत के लिए चिंतनीय है किन्तु एक यह भी सवाल सामने आता है कि क्या चीन नेपाल पर आर्थिक आधिपत्य जमाकर भारत के विरुद्ध खुलकर सामने आना चाहेगा ? क्योंकि चीन भारत जैसे शक्तिशाली पड़ोसी को अपने विश्वास में ना लेकर क्या चीन विश्व के सबसे बड़े अर्थतन्त्र की दौड़ में शामिल हो पाएगा ? पिछले दिनों में चीन ने भारत के साथ जितने निवेश आर्थिक पूर्वाधार और प्रविधि में किया है क्या उसे वो दाँव पर लगाना चाहेगा ? खैर, भारत और चीन की विदेश नीति को अगर छोड़ दें तो भी यह तो स्पष्ट है कि नेपाल अपनी विदेश नीति में असक्षम साबित हो रहा है ।
चीन भ्रमण से पहले कई अहम विषयों का सूची से हटना, बिना किसी निश्चित ऐजेन्डे के भ्रमण करना और जो मिल जाय उसका ढिंढोरा पीटना हमारे राजनीतिज्ञो. की आदत सी हो गई है । फिलहाल तो यह तय है कि चीन से हुए समझौतों को लेकर चाहे कितनी भी दलीलें दे दी जायँ लेकिन एक को चिढ़ाकर दूसरे की ओर झुकना या फिर एक को धमका कर दूसरे से मदद की अपेक्षा करना एक कमजोर विदेश नीति ही साबित होगी और हो रही है जिसका खामियाजा देश बखूबी झेल रहा है ।
दुर्भाग्य तो यह है कि आज भी सत्ता पक्ष देश को हठ से ही चलाने की कोशिश कर रही हैं । मधेशी जनता या मधेशी मोर्चा से संवाद का कोई पहल नहीं किया जा रहा है । मधेश ही सिर्फ अनिश्चितता की दौर से नहीं गुजर रहा है बल्कि पूरे देश की जनता इस दौर से गुजर रही है । फिर से आन्दोलन का डर, नाकाबन्दी का डर आम जनता को परेशान कर रहा है । सम्भावित आन्दोलन के मद्देनजर राजधानी में सामानों की लुकाछिपी शुरु हो गई है । पेट्रोल पम्प बन्द होने लगे हैं । पेट्रोल और डीजल के लिए गाड़ियों की कतारें अब भी जारी हैं । अब तक सहजता मिली नहीं थी कि देश फिर से असहज होने की स्थिति में है । विश्व समुदाय का हस्तक्षेप मंजूर नहीं, मोर्चा की माँग को नाजायज करार देते हुए वार्ता की कोई सम्भावना नहीं दिख रही है । सीमांकन के मसले को देश विखण्डीकरण से जोड़ा जा रहा है ।
इस हालात में देश आखिर किस दिशा में जा रहा है यह चिन्तनीय है ।मधेश समस्या आन्तरिक समस्या है, किन्तु इस आन्तरिक समस्या को अपनों की तरह हल करने की कोशिश कहीं नहीं नजर आ रही । राज्य के व्यवहार में विभेद आज भी कायम ही है । प्रधानमंत्री देश के उस हिस्से को आज भी नकार ही रहे हैं । तारीफ उनकी हो रही है जिन्होंने मधेशी जनता का साथ नहीं दिया । नाकाबन्दी के समय नेपाली जनता के हौसले की प्रधानमंत्री जोश खरोश के साथ तारीफ कर रहे हैं, आज भी राष्ट्रीयता का पाठ ही जनता को याद दिलाया जा रहा है उनके हौसले को ऐतिहासिक बताया जा रहा है किन्तु कटु सत्य यह है कि जनता कल भी पीड़ित थी और आज भी पीड़ित है । नेपाल का वत्र्तमान और भविष्य फिलहाल दोनों अँधेरे में ही नजर आ रहा है, क्योंकि कहीं ना कहीं नेपाल विश्व नक्शे पर अकेला पड़ता जा रहा है ।

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