“चीरई के जानजाई लैका के खिलौना” राक्षस वंसज ओली मधेश की जनता को चिड़िया समझ लिया है

बिम्मी शर्मा, काठमाण्डू, 26 जनवरी ।
गावं, देहात में आंगन में फुदक, फुदक कर दाना चूग रही छोटी सी चिड़ियाँ को बच्चे कभी उस की पँख पकड़ कर तो कभी उस को तिनका चूभो कर परेशान करते रहते हैं । शैतान बच्चे यह नहीं जानते कि उन के छेड़छाड़ से चिड़ियाँ  की जान भी जा सकती है । इसी को भोजपुरी मूहावरें में “चीरई के जान जाई लैका के खिलौना”कहते हैं । अभी मधेश और मधेशी का हाल भी उसी चिड़िया की तरह ही है जिसे शैतान नेता परेशान कर के उस की जान लेने पर तुले हुए हैं ।
FB_IMG_1453720185956
पहले हमारे राक्षस वंशज के पिएम केपी शर्मा ओली मधेश मे मधेशीयों पर गोली दागे जाने की घटना पर दो, चार आम पेड़ से गिर जाने से पेड खाली नहीं होता कहते थे । अब उन्होने मधेश की जनता को चिड़िया समझ लिया है । इसीलिए उनके पाले हुए कुत्ता जैसे नेपाली पुलिस इस चिड़ियाँ को दबोच कर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं । पिएम ओली और उनकी सरकार चाहती ही नहीं कि मधेश में शातिं हो । मधेश की समस्या समाधान होते ही उनको अपने सरकार का जान निकलने का डर जो है ।
जानबुझ कर बनी हुई बात को बिगाड़ना और असहमति पैदा करना ही बस इतना ओली ने जाना है । ओली नें मधेश को कभी गम्भीरता से लिया ही नही । वह भूल गए हैं कि उनका गृह जिला झापा भी मधेश में ही पड़ता है । ओली बस मधेश से खिलवाड़ कर रहे हैं जैसे बच्चे चिड़िया से खेलते हैं । आए दिन मधेश में नेपाल के सुरक्षाकर्मी वहां के निवासियों के साथ खून की होली खेल रहे हैं । इस हाड कंपाती ठंड में इंसानी लहू का धरती पर गिरना सच में अमानवीयता की पराकाष्ठा है यह ।
मोरगं के रंगेली में पुलिस की गोली का शिकार हुई ६२ वर्षीया द्रौपदी देवी का कसूर क्या था ? क्या वह भी भारत की थी या सीमा में आंदोलन का मोर्चा सम्ंहाले हुई थी ? क्या मधेश की जनता की जान चिड़ियाँ से भी सस्ती हो गई है ? जो गाहे, बगाहे गोली निर्दोषों पर गोली चलाने का आदेश दे कर गृह मंत्री शक्ति बस्नेत अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे है ? गृह मंत्र बस्नेत को अपनी शक्ति पर इतना ही गौरव है तो राजधानी काठमाडुं मे गोली चला कर दिखाएं ?
पर वह ऐसा करेगें नही, क्यों कि यहां पर उनका वश नहीं चलता इसीलिए आंदोलनरत मधेश और वहां के निवासियो पर अपनी शक्ति का आजमाईश कर रहे हैं । आखिर हैं तो वह माओवादी ही । बाघ जितना भी बूढा हो जाए घांस नहीं खाता । खून से नहा कर पैदा हुए बस्नेत को मधेश की जनता के खुन से भोग लगाना बहुत पंसद है । जिस ने १७हजार नेपाली जनता का भोग “नैवेध” के रुप मे अपने स्वार्थ के लिए भोग लगाया हो । उसे मधेश में हत्या, हिंसा का खेल “पंचामृत” से ज्यादा का नहीं लगा होगा । आखिर सरकार को खून का चश्का जो लग चूका है ।
जिसका नाम ही खड्ग है, वह तो देश और जनता को काट डालेगा ही । अभी पिएम खड्ग प्रसाद ओली वही कर रहे हैं । वह जिस तरह से देश में हवाई किले बनाने का भाषण दे रहे हैं और मधेशीयों को दरकिनार कर रहे हैं उस से साफ पता चलता है कि केपी ओली एंड कंपनी नही चाहता कि मधेश अब इस देश का हिस्सा रहें । जब कैलाली में आठ पुलिस कर्मी मारे गए तब देश और जनता का खून उबाल पर था, सभी की संवेदना और सहानुभूति पुलिसकर्मीयों के प्रति तीव्र थी जो मारे गए । पर उस के बाद मधेश में काफी मधेशी उन्हीं पुलिसकर्मीयों की गोली से मारे गए । पर देश और पहाडी अवाम की सहानुभूति उन मारे गए मधेशींयों के न के बराबर ही था । यह तथाकथित चेतनशील नेपाल की अवाम मारे गए उन मधेशींयो को नेपाली तक नहीं मानता ।
समाज की संवेदना रिस, रिस कर खत्म हो रही है । लोगों को मारना और मरना अब भाजी काट्ने के समान ही है । किसी को कोई फर्क नही पडता कि कोई मर रहा है कि जी रहा है । मधेश में चिडीया कि तरह बंदुक रुपी पुलिस की गुलेल से निर्दोष मधेशींयो को मारा जा रहा है । यह कोई नहीं देखता कि वह गुलेल अपने सर पर भी दागा जा सकता है ।




पिएम ओली को किडनी ट्रान्सप्लान्ट किया गया था । पर लगता है उनका ह्दय भी प्लास्टिक का बना हुआ है । इसीलिए मधेश का मसला उन्हे दिखता ही नहीं । मधेश को हाथ मे बैठी हुई चिडीया जैसा समझ कर वह कभी उस के परों को नोचते हैं तो कभी उस की आंख मे तिनका डाल कर फोड्ने लगते है । खुद के खिलाने के बाद वह मधेशरुपी चिड़िया को अपने मंत्रियों को खिलाने और खाने के लिए देते है । यह नादान नहीं शैतान और कपटी लोगों की मंत्री मंडल है । इसीलिए यह मधेश के साथ सौतेला व्यवहार कर रहे हैं । जब मधेश का मुद्धा हल होने जैसा होता है । समाधान के अन्तिम किनारे पर पहुंचने के बाद यह मधेशींयो के अधिकार पर तवज्जो नही देते ।
रंगेली में हुए पुलिस का दमन और तीन निर्दोष मधेशीयों मारना इसी का सबूत है कि सरकार मधेश में शान्ति नहीं चाहती इसी लिए वार्ता को ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा रही है । अभावों का पहाड सिर्जित कर पिएम ओली उस के पीछे दुबक कर मुहावरों की पिचकारी छोड़ कर अपने आसपास के लोगों को सरावोर करते हैं और मधेश को खून से । क्योंकि मधेश तो इन के लिए चिड़िया जैसा है । तितर, बटेर जैसी चिड़िया जिसे मार कर खा जाते है । बेचारा मधेश कब तक अपने सीने मे दागी हुई गोलियों को सहता रहेगा । कब तक अपने नौनिहालों को शहीद होता हुआ देखता रहेगा ? आखिर कब थमेगी यह नर संहार और ताडंव ? कितने और मधेशीयों को यह सरकार अपना भोजन बनाएगी ? आखिर कब पिजंड़े में बंद मधेश की चिड़िया स्वतन्त्र हो कर आकाश में उड़ान भरेगी ? (व्यंग्य)
loading...