चुनावी चुंगुल में नेपाल -रणधीर चौधरी

जैसे मधेशी मोर्चा अभी घोषित चुनाव का विरोध करने में लगे हैं, यहाँ तक ठीक है । मोर्चा समर्थकों का भी मानना है कि यह चुनाव छली और छन्दी है । मधेशवादी दलों का एक प्रकार का जो अड़न है, उससे उनका जन–पकड़ बढ़ता अवश्य दिख रहा है मधेश में


आजकल मुझे वैसी राजनीति के बारे में ज्यादा टिप्पणी करने से डर भी लगने लगा है । वजह है कि मेरे कई ऐसे मित्र हैं, जो कथित बड़े दलों से ताल्लुकात रखते हैं । उनका मानना है कि मैं मधेशी मोर्चा के प्रवक्ता की तरह बात रखता हूं । परंतु मेरा मानना है कि अगर हम अपने आपको एक सचेत नागरिक समझते हैं, तो हमें सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत रखनी चाहिए ।vote_nepal

नेपाल एकबार फिर से चुनावी चुंगुल में फँस चुका है । एक तरफ नेपाली हुकुमत ने स्थानीय निकाय के चुनाव की तिथि घोषणा की है, तो दूसरी तरफ नेपाल का दक्षिणी भू–भाग आन्दोलित हो गया है । इस स्थिति में क्या यह घोषित चुनाव जायज है ? यह चुनाव करवाने के पीछे क्या–क्या रणनीतियां है ? और मधेश की राजनीति पर इसका कैसा असर पड़ सकता है ? इन्हीं सवालों की जवाब तलाशने का प्रयास किया गया है–
असंवैधानिक चुनाव
आम नेपालियों के दिमाग में स्थायी सत्ता के खिलाडि़यों ने चुनाव के बारे में एक गलत तर्क बैठा दिया है । चुनाव घोषणा से पूर्व नेपाली मीडिया में एक डिसकोर्स का आयोजना किया गया, जो स्थानीय चुनाव की अपरिहार्यता को एक ऐतिहासिक लेप लगाया । डिसकोर्स में कहा गया कि नेपाल में चुनाव पिछले १९ सालों से नहीं हुआ है । जब की यह तर्क बिल्कुल गलत है । १९ सालों से जिस देश में चुनाव नहीं हुआ, वह है– पुराना नेपाल । मतलब वह नेपाल, जिस देश में संघीयता नहीं थी । अब का जो नेपाल है, वही संघीय नेपाल है । तो कैसे इस चुनाव की अपरिहार्यता पुष्टि हो सकती है ?
गौरतलव यह है कि चुनाव की यह घोषणा भी गैर–संवैधानिक है । क्योंकि नेपाल के संविधान में यह नहीं कहा गया है कि कौन–सा चुनाव करवाया जाए । संविधान की धारा २३५ के उपधारा २ में साफ लिखा गया है कि स्थानीय तह अर्थात गाँवपालिका, नगरपालिका इन सभी हिस्सों में जो भी गतिविधियां होंगी, वे सभी प्रदेश सभा द्वारा की जाएगी । तो क्या चुनाव कराने की जिम्मेदारी प्रदेश सभा को नहीं देनी चाहिए ? स्थानीय चुनाव की घोषणा महज स्थाई सत्ता की निरन्तरता हेतु न होकर संघीयता को समाप्त करने की साजिश है, संघीयता विरोधी ताकतों का । इसीलिए यह चुनाव गैर संवैधानिक है ।
अब बात करें कि कैसे यह चुनाव की घोषणा संघीयता के खिलाप है ? अगर स्थानीय चुनाव सम्पन्न हो जाता है, तो उसके बाद संघीय संसद की निचली निकाय प्रतिनिधि सभा के चुनाव ही है । उसके बाद सरकार गठबन्धन के वातावरण निर्माण भी अवश्यमभावी है । अगर कानूनी बाधाएं आ गई तो स्थायी सत्ता के चतुर और माहिर खिलाडि़यो के द्वारा कोई न कोई व्यवस्था की जाएगी । पर इस परिस्थिति में संसद को पूर्णता नहीं मिल पाएगा । क्योंकि अगर मधेशी मोर्चा विरोध को निरन्तरता देते रह गए, तो प्रदेश सभा का चुनाव असम्भव हो जाएगा । प्रदेश का चुनाव न होने के बाद राष्ट्रीय सभा का गठन भी नहीं हो पाएगा । संसद का मतलब प्रतिनिधि सभा और राष्ट्रीय सभा का संगम है । राष्ट्रीय सभा गठन न होने पर भी देश चल ही जाएगा । और इसी तरह नवजात संघीयता की गर्दन मड़ोरा जा सकता है । यह मानना है कांग्रेस, एमाले, माओवादी और राप्रपा लगायत के संघीयता विरोधियों का ।
मोर्चा का हाल
हालांकि ऊपर जिक्र की गई बातों से मधेशी मोर्चा अवगत नहीं है । परंतु मधेश में अधिकतम जनता मधेशी मोर्चा द्वारा उठाए गए मांगों से सहमत रखते हैं और सभी का मानना है कि संविधान संसोधन बगैर चुनाव सम्भव नहीं है । परंतु क्या सिर्फ एक माहौल काफी होगा चुनाव को संबैधानिक बनाने के लिए ? बिल्कुल नहीं । काठमांडू में बैठ कर मीडिया में दो–चार बातें कह देने से कुछ नहीं हो पाएगा । मधेश में अभी बहुत तपके पर कांग्रेस, एमाले और माओवादियों का संगठन कमजोर नहीं हुआ है । कुछ ऐसे भी कार्यकर्ता हैं उन पार्टियों के, जो मधेश के मुद्दों को लेकर गलत अफवाहें उड़ाने में लगे रहते हैं । ऐसे में मधेशी मोर्चा के काठमांडू केन्द्रित मधेशी दल के अध्यक्षों को काठमांडू छोड़ कर मधेश में डेरा जमा बैठना लाजमी होगा । मधेश के कस्बों में रैलियां और सभा का आयोजन करके जनता को सूचित कराना होगा कि कैसे यह चुनाव गैर–संवैधानिक ही नहीं बल्कि संघीयता के अस्तित्व के लिए जहरीले भी हैं ।
आजकल मुझे वैसी राजनीति के बारे में ज्यादा टिप्पणी करने से डर भी लगने लगा है । वजह है कि मेरे कई ऐसे मित्र हैं, जो कथित बड़े दलों से ताल्लुकात रखते हैं । उनका मानना है कि मैं मधेशी मोर्चा के प्रवक्ता की तरह बात रखता हूं । परंतु मेरा मानना है कि अगर हम अपने आपको एक सचेत नागरिक समझते हैं, तो हमें सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत रखनी चाहिए ।
नेपाल के संविधान में सीमांतकृत वर्गों ने जब संविधान का विरोध जताया था, उस वक्त कांग्रेस और एमाले ने उस संविधान को दुनिया का सबसे अच्छा संविधान होने का ढिंढ़ोरा पिटने में लगा था और सिर्फ मधेशी मोर्चा ही था, जिसने इस संविधान के विरोध में निरन्तर बोलने का काम जारी रखा । आज फिर मधेशवादी दलों के कंधे पर जिम्मेदारी और जोखिम एक साथ आ गया है । नेपाल के सीमांतकृत वर्ग का बहुप्रतिक्षित संघीयता को जीवन्त रखना पड़ेगा, जिसके लिए संवैधानिक लड़ाई को पूर्ण कौशल के साथ आगे बढ़ाना पड़ेगा । साथ ही संविधान संशोधन के बाद मोर्चा पहले कौन–सा चुनाव में भाग लेगा, इस विषय में भी जनता को स्पष्ट करना जरूरी है । चूंकि स्थानीय निकाय का चुनाव संविधान विरोधी और संघीयता विरोधी है ।
मधेशी दल को अभी पार्टी एकीकरण पर भी ध्यान देना होगा । जनता में विश्वास दिलाना होगा कि वास्तव में सीमांतकृत वर्गों को उन का संवैधानिक हक सिर्फ और सिर्फ मधेशवादी दल ही दिला सकता है । कथित राष्ट्रीय दलों द्वारा अगर यह सम्भव होता, तो अब तक लोग नेपाल में अपने अधिकार के लिए लालायित नहीं होते ।
अन्त में, जैसे मधेशी मोर्चा अभी घोषित चुनाव का विरोध करने में लगे हैं, यहाँ तक ठीक है । मोर्चा समर्थकों का भी मानना है कि यह चुनाव छली और छन्दी है । मधेशवादी दलों का एक प्रकार का जो अड़न है, उससे उनका जन–पकड़ बढ़ता अवश्य दिख रहा है मधेश में । संविधान संशोधन में भी खासकर सीमांकन के मुद्दों को लेकर जनता में बेचैनी है । लोगों का मानना है कि जब तक सीमांकन के मुद्दों को हल कर समग्र मधेश दो प्रदेश की ग्यारंटी नहीं हो जाता, तब तक वे आन्दोलित ही रहेंगे । परंतु क्या मोर्चा अपने इस अड़न पर खरे उतर पाएँगे ? अगर खरा नहीं उतरा तो चुनाव में अकल्पनीय परिणाम के लिए उन्हें तैयार रहना होगा ।

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