चुनावी सरकार कितनी दमदार

प्रो. नवीन मिश्रा:आखिरकार प्रधान न्यायाधीश ने चुनावी सरकार के अध्यक्ष पद का शपथग्रहण कर अपनी मन्त्रिमपरिषद् का गठन कर लिया। इस घटना पर मिश्रति प्रतिक्रिया देखने को khilraj regmiमिली। एक ओर जहाँ पडÞोसी राष्ट्र भारत से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव मून ने इस कदम का स्वागत किया वहीं दूसरी ओर नेपाल बार एशोसिएशन ने इसे ‘काला दिवस’ के रुप में अंकित किया तथा वैद्य समूह के नेतृत्व में २२ राजनीतिक दलों ने काठमांडू बन्द कर विरोध और पर््रदर्शन के द्वारा अपना विरोध पर््रदर्शन किया। इस पर््रदर्शन में पर््रदर्शनकारियों के साथ पुलिस की झडÞप भी हर्ुइ और पुलिस ने हल्का बल प्रयोग करते हुए लाठी चार्ज भी किया। जो भी हो, इस सरकार की सफलता या विफलता का आकलन करना तो अभी जल्दबाजी होगी लेकिन इतना तो तय है कि इस घटना ने नेपाली राजनीतिक दलों की असफलता पर मुहर लगा दी है जबकि राजनीतिक शास्त्रियों ने राजनीतिक दलों को प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में व्यवस्था रुपी शरीर के हृदय की संज्ञा दी है। अब आप खुद ही कल्पना कर सकते हैं कि प्रजातान्त्र के लिए राजनीतिक दलों की भूमिका कितनी महत्वपर्ूण्ा होती है। अगर व्यक्ति का दिल ही बिमार हो जाए तो वह कैसे स्वस्थ रह सकता है। २२ विरोधी दलों का मानना है कि अन्तरिम संविधान के मर्म  के विपरीत एमाओवादी, कांग्रेस, एमाले तथा मधेशी मोर्चा ने प्रधानन्यायाधीश के नेतृत्व में चुनावी सरकार का गठन किया है, जिसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इनका मानना है कि देश में विद्यमान राजनीतिक तथा संवैधानिक संकट को दूर करने के लिए वर्तमान सरकार की जगह राष्ट्रिय संयुक्त सरकार का गठन करना अनिवार्य है। लेकिन सवाल है कि राष्ट्रिय संयुक्त सरकार पर सहमति नहीं बन पाने के कारण ही प्रधानन्यायाधीश के नेतृत्व में चुनावी सरकार गठन कर वर्तमान समस्या का हल खोजने का प्रयास किया गया है। यह बात अलग है कि यह सरकार भी कितनी सफल होगी यह कहना मुश्किल है। सहमति में शामिल प्रमुख चार दलों के नेताओं के वक्तव्य से भी यह स्पष्ट है कि वर्तमान चुनावी सरकार का गठन मजबूरी में लिया गया फैसला है। डा. बाबुराम भट्टर्राई के अनुसार अभी भी तालाचाभी राजनीतिक दलों के पास है जब कि माधवकुमार नेपाल का मानना है कि अध्यक्ष रेग्मी को प्रधानन्यायाधीश पद से इस्तिफा दे देना चाहिए। जब तक राजनीतिक दलों की सोंच, उनके विचार, उनके आचरण नहीं सुधरेंगे, तब तक अगर चुनाव हो भी गए तब भी बहुत अन्तर नहीं आनेवाला है। इतना तो तय है कि आगामी चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने वाला है और ऐसे में हमे अस्थिर राजनीतिक व्यवस्था का सामना लंबे समय तक करना पडÞ सकता है।
वास्तव में सबों ने यह स्वीकार किया है कि राजनीतिक दलों के बीच सहमति नहीं बन पाने की स्थिति में मजबूरी में ही प्रधानन्यायाधीश के नेतृत्व में सरकार गठन करना पडÞा है। यह कोई स्वाभाविक प्रक्रिया की उपज नहीं है। अब लोगों की अपेक्षा है कि न्यायिक प्रमुख के नेतृत्व में निष्पक्ष और समय पर चुनाव सम्पन्न हो सकेंगे। साथ ही कानूनविद् होने के कारण वे ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाएँगे, जिससे कि उनको विवाद में पडÞना पडÞे। प्रमुख दलों के द्वारा वर्तमान सरकार को निर्वाचन की जिम्मेदारी तो सौंप दी गई है लेकिन कुछ दल अभी भी इसका विरोध कर रहे हैं। वे लोग इस बात को लेकर आन्दोलित हैं कि दलीय प्रणाली अर्न्तर्गत दलों की सरकार का ही गठन होना चाहिए। विरोध के लिए इन्होंने न सिर्फप्रमुख दलों के बीच हुए समझौते को जलाया बल्कि बंद और पर््रदर्शन का भी सहारा लिया। इतना अवश्य है कि चुनाव की पर्ूण्ा सफलता के लिए इन विरोधी दलों को भी विश्वास में लेना जरुरी है। हालाँकि सरकार ने इसके लिए आवाहन तो किया है लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। मजबूरी में ही सही इतिहास ने वर्तमान सरकार के कंधे पर बहुत बडÞी जिम्मेदारी सौंप दी है। समय की मांग है कि हम विवादों में नहीं पडें ओर ऐसा करें कि संविधान निर्माण के लिए रास्ता निकले। तब ही हम आम जनता में व्याप्त निराशा का अन्त कर देश में लोकतन्त्र की संस्थापना को अन्जाम तक पहुँचा सकते हैं। अनिश्चितता से देश को मुक्ति दिलाने का यह अन्तिम प्रयास है। इसके लिए हर क्षेत्र और हर तबके से सहयोग अपेक्षित है। भूतपर्ूव प्रधानमन्त्री बाबुराम भट्टर्राई का मानना है कि वर्तमान सरकार का जन्म उन्ही की सरकार के गर्भ से हुआ है। जो भी हो इतना तो तय है कि वर्तमान सरकार को अपने उद्देश्य की प्राप्ति के मार्ग में अनेक चुनौतियाँ आएंगी, जिसका उन्हें डÞट कर मुकाबला करना होगा, तभी वह सफल हो पाएगी।
नेपाल की नियति देखिए, हम अब तक श्री ५ की सरकार से नेपाल सरकार और अब श्रीमान की सरकार तक का रास्ता तय करने में लगे हैं लेकिन अभी भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। जनता की इच्छा है कि जल्द ही इस देश को अनिश्चितता से छुटकारा मिले, जिससे बन्द, हडÞताल जैसी किल्लतों का अब सामना नहीं करना पडेÞ। बंद, हडÞताल की स्थिति से जनता का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। जेब में पैसा होने के बावजूद भी जरुरी सामानों की आपर्ूर्ति बाधित हो जाती है। मरीजों को समय से इलाज उपलब्ध नहीं हो पाता है जिसके कारण कितने तो अस्पताल के रास्ते में ही दम तोडÞ देते हैं। पर्यटक नेपाल आने से घबराते हैं। पता नहीं कब इन किल्लतों से देश निजात पा सकेगा। आम जनता आश्वासनों और भाषणों से अब ऊब चुकी है। उसे शान्तिपर्ूण्ा जीवन व्यतीत करने के लिए अनुकूल माहौल की जरुरत है। बस, और कुछ नहीं। यह सब तभी सम्भव है, जब देश में विधि के शासन, संविधानवाद, स्वतन्त्र न्यायापालिका तथा सामाजिक न्याय की स्थापना हो।
यथार्थ में नेपाल जैसे अपरिपक्व राजनीतिक व्यवस्था में स्थायित्व के लिए आवश्यक है कि संसदीय शासन प्रणाली की जगह अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली को अपनाया जाए। आप अगर गौर से देखें तो पता चलेगा कि वर्तमान सरकार अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली का ही दूसरा रुप है, जो इस बात का द्योतक है कि संसदीय शासन प्रणाली नेपाल में पर्ूण्ा रुप से विफल हो चुकी है। और अगर नहीं, तो संसदीय प्रणाली ही अपनानी है तो बहुदलीय व्यवस्था की जगह हमें यहाँ दो या तीन दलीय व्यवस्था को अपनाना होगा। साथ ही दल बदल पर पर्ूण्ा रुप से बन्देज लगाना होगा। भ्रष्टाचार और कदाचार पर नियन्त्रण करना होगा। जब तक हम इन चीजों को नहीं अपनाएँगे, तब तक यूँ ही थपेडÞे खाते रहेंगे।
दलीय शासन संसदीय शासन का मुख्य सिद्धान्त है। दल सिंहासन के पीछे की शक्ति है एवं राजनीति का केन्द्र है। दल ही राजा है। राजनीतिक दल गृहयुद्ध पर प्रतिबन्ध लगाने वाली सेना है। दलों द्वारा व्यक्ति में छिपे शेर को पालतू बनाया जाता है। वे बन्दूकों के संर्घष्ा के स्थान पर मतों के संर्घष्ा को जन्म देते हैं। हिंसात्मक क्रान्ति के स्थान पर वे शासन में शान्तिपर्ूण्ा परिवर्तन के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं। दल ही शासन को स्थायित्व एवं सुदृढÞता प्रदान करते हैं। इस प्रकार किसी भी प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था में राजनीतिक दलों की भूमिका बहुत ही अहम होती है। इन बातों का खयाल कर ही नेपाली राजनीतिक दलों को आचरण करना चाहिए, तभी देश का कल्याण सम्भव है।
जैसे-जैसे चुनाव का समय नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे समस्याएँ घटने के बजाए बढÞती नजर आ रही है। अभी हाल ही में भक्तपुर निर्वाचन कार्यालय में हर्ुइ तोडÞफोडÞ की घटना से संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि किस हद तक निर्वाचन सफलतापर्ूवक सम्पन्न हो सकेगा। जबकि विरोधी खेमा वैद्य के नेतृत्व में चुनाव बहिष्कार करने का निश्चय किया है और किसी भी प्रकार की वार्ता के पक्ष में नहीं है। तीसरी समस्या अध्यक्ष रेग्मी का न्यायाधीश के पद से पर्ूण्ा रुप में त्यागपत्र के लिए भी दबाव बढÞता नजर आ रहा है। संविधान सभा के गठन से देश में जो एक सकारात्मक आशा जागृत हर्ुइ थी, इसकी विफलता के बाद वह विखरता नजर आ रहा है। अब प्रश्न उठता है कि इस बिखराव और अविश्वास के वातावरण में क्या चुनाव सफलतापर्ूवक सम्पन्न हो पाएगा और अगर चुनाव की रीत किसी भी तरह पूरी कर भी ली जाती है तो क्या चुनाव से कोई सकारात्मक परिणाम निकाल पाएगा। समस्याएँ और भी हैं। समझौता में शामिल प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच भी अविश्वास की बात उजागर होकर सामने आ रही है। एक तरफ यह माना जा रहा है कि चुनावी घोषणा होने के बाद कर्मचारियों के हस्तांतरण पर रोक लग जाना चाहिए, जबकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामशरण महत का कहना है कि बाबुराम सरकार द्वारा जो कर्मचारियों का अपने मनोनुकूल जगहों पर नियुक्ति या हस्तान्तरण किया गया है, उस में फेर बदल किए बिना निष्पक्ष चुनाव की कल्पना नहीं की जा सकती है। मधेशी नेता उपेन्द्र यादव तो पहले ही चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठा चुके हैं। चुनाव के समय में तर्राई के भूमिगत दलों की सक्रियता बढÞना भी स्वाभाविक है। यह भी देखना होगा कि उनका रुख कैसा है – यह भी प्रश्न उठ रहा है कि वर्तमान सरकार के अध्यक्ष को पद से हटाने का कोई प्रावधान नहीं है तो क्या वे तब तक अपने पद पर आसीन रहेंगे, जब तक देश में चुनाव होकर नई सरकार का गठन न हो जाए। देखते ही देखते कुछ घंटों के भीतर ही भक्तपुर की घटना का प्रभाव स्याङ्जा, काभ्रे तथा देश के अन्य कई भागों में भी देखने को मिला, जिसके फलस्वरुप कहीं निर्वाचन आयोग के कार्यालय में ताला बन्द कर दिया गया तो कहीं निर्वाचन नामावली संकलन के कार्यको बाधित किया गया। नेपाली कांग्रेस के सुशील कोइराला चुनावी प्रक्रिया में सरकार को सहयोग करने के बदले बर्खास्त करने की धुडÞकी अभी से दिखा रहे हैं। कुछ लोगों को इस बात को लेकर भी आर्श्चर्य हो रहा है कि इतने कम समय में इतने सारे चुनावी कार्य सम्पन्न करने हैं और सरकार के अध्यक्ष होली खेलने में मगन हैं। कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि सरकार गठन सम्बन्धी समझौते में शामिल कुछ प्रमुख दलों को भी पहले से ही पता है कि विरोधी दलों को विश्वास में लिए बिना चुनाव कराना इतना आसान नहीं होगा लेकिन फिर भी उन्होंने इस हथकंडे को इसीलए अपनाया ताकि भट्टर्राई सरकार को हटाया जा सके। तो इससे राष्ट्रपति और सरकार के अध्यक्ष की छवि तो धूमिल होगी ही, और वैसी अवस्था में सैनिक शासन की सम्भावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है या फिर जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली परिस्थिति की सम्भावना को भी नकारा नहीं जा सकता है।
सैनिक शासन की चर्चा करना जोखिमपर्ूण्ा बात है, क्योंकि इससे लेखक को सामान्य रुप में तानाशाही व्यवस्था का र्समर्थक होने का कयास अनायास ही लगाया जाने लगता है। लेकिन नेपाल में यह सच है कि राजनीतिक व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए किए गए अब तक के सभी प्रयास विफल रहे हैं और अगर अब यह अन्तिम प्रयास भी विफल होता है तो इसके बाद क्या होगा – इसी कारण हमने कहा है कि इसकी सम्भावना सर्ेर् इन्कार नहीं किया जा सकता है चाहे आप इसे सैनिक शासन का नाम दें या फिर राष्ट्रपति शासन या आपतकालीन शासन का जामा पहनाएं, बात एक ही है। जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली व्यवस्था तो देश विगत में भोग चुकी है। उससे भी ज्यादा अराजकता फैलेगी, जिस पर नियन्त्रण करना मुश्किल हो जाएग्ाा। अब तो प्रमुख निर्वाचन आयुक्त ने भी कह दिया है कि आषाढÞ में चुनाव सम्भव नहीं है। दूसरी ओर बागी दलों का कहना है कि वार्ता सिर्फराष्ट्रपति के साथ सम्भव है, सरकार के साथ नहीं। अब आगे-आगे देखिए, होता है क्या !

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