चुनाव की अनिश्चितता गहराती

कुमार सच्चिदानन्द:संविधानसभा के निर्वाचन की निर्धारित तिथि ४ गते मार्गशर्ीष्ा है। चुनाव की सम्भावना अनिश्चित, राजनैतिक दलों में खींचातानी की प्रवृत्ति, सरकार खामोश और उच्च स्तरीय संयन्त्र में शामिल दल लगातार वार्ता और संवाद में व्यस्त रहने पर भी आजतक निष्कर्षअर्थहीन रहा। यही मौजूदा राजनीतिक अवस्था है और आम लोग किर्ंकर्तव्यविमूढÞ की मनस्थिति में हैं। सवाल है इसके लिए जिम्मेदार कौन – सरकार या उच्चस्तरीय राजनीतिक संयन्त्र, जो सरकार को दिशा देने का दावा करती है। दूसरे शब्दों में अभिभावकीय भूमिका निर्वाह करती है। चूँकी अभिभावकत्व उनका है, इसलिए इस अनिश्चितता की जिम्मेदारी भी उनकी बनती है। यह सच है कि इससे जुडÞे समस्त दल चुनाव के लिए रणनीतिक फैसलों में व्यस्त हैं और निरन्तर आगे बढÞ रहे हैं। लेकिन यह यात्रा एक तरह से लक्ष्यविहीन मानी जाएगी। क्योंकि न तो निर्धारित तिथि पर चुनाव के लिए आम सहमति बन पाई है और न ही सरकार उसके लिए प्रतिबद्ध नजर आती है। दूसरा यथार्थ यह है कि चुनावी आचारसंहिता का चाबुक देश पर चल रहा है और यह हालत बहुत दिनों तक देश के लिए हितकर नहीं है। सवाल यह है कि चुनाव की तिथि हम अग्रसारित करते रहे और आचार संहिता का चाबुक चलता रहे, आखिर यह परिस्थिति भी कब तक चलेगी – mohan-baidya-hindi-magazine
आज नेकपा-माओवादी नेतृत्व के ३३ दलीय मोर्चा चुनाव की तिथि आगे बढÞाने और सरकार परिवर्तन करने के मुद्दे पर अडिग रहने के कारण उच्च स्तरीय राजनीतिक समिति से उसकी वार्ता असफल हो चुकी है। इसलिए र्सवपक्षीय गोलमेच सम्मेलन में जाने की बात भी स्थगित कर दी गई है। पञ्चदलीय राजनीतिक समिति का स्पष्ट आरोप है कि चुनाव के प्रति मोर्चा सकारात्मक नहीं है, इसलिए गोलमेच की प्रक्रिया में जाने की बात भी स्थगित कर दी गई है। पञ्चदलीय राजनीतिक समिति का स्पष्ट आरोप है कि चुनाव के प्रति मोर्चा सकारात्मक नहीं है, इसलिए गोलमेच की प्रक्रिया में जाने का कोई औचित्य नहीं। दूसरी ओर मोर्चा का आरोप है कि बाहृय शक्ति के प्रभाव में वार्ता विफल हर्ुइ है। यथास्थिति में अगर चुनाव हुआ तो उसे असफल करने का उनका कार्यक्रम जारी रहेगा। ऐसी परिस्थिति में टकराव का खतरा बढÞ जाता है। इस टकराव का खामियाजा किसी न किसी रूप में राष्ट्र को भुगतना ही होगा। सवाल है कि इस देश में हमारे नेताओं के जो राजनीतिक संस्कार हैं, उसमें सहमति असम्भव नहीं तो सहज भी नहीं है। अतीत के अनेक घटनाक्रम इस बात का पोख्ता सबूत देते हैं। विगत संविधान सभा की असफलता और वर्तमान अनिश्चितता इसी का प्रमाण है और इस जमीन पर हम किस भविष्य को तलाश रहे हैं, यह एक महत्वपर्ूण्ा सवाल है।
आज जिस परिस्थिति में देश उलझा हुआ है, उसका सबसे बडÞा जिम्मेवार यहाँ के राष्ट्रीय दलों को माना जा सकता है। इनकी सबसे बडÞी विफलता तो यह थी कि विगत संविधान सभा के पर्ूण्ा कार्यकाल में संविधान राष्ट्र के समक्ष नहीं आया, दूसरी विफलता यह भी थी कि आपसी अविश्वास के कारण कामचलाऊ सरकार को अस्थिर करने का प्रयास किया गया और चुनाव कराने की जिम्मेदारी उसे नहीं दी गई। और यह तो एक तरह से राजनैतिक अपराध ही हुआ है कि हमारे देश की राजनैतिक शक्तियाँ सत्ता का सञ्चालन करने और चुनाव कराने में स्वयं को अर्समर्थ सिद्ध कर एक गैरराजनीतिक व्यक्तित्व के नेतृत्व में चुनावी सरकार का गठन करवाया गया। इसके बावजूद अपनी राजनीतिक श्रेष्ठता को साबित करने के लिए इस सरकार को दिशा निर्देश करने के नाम पर चार दलीय राजनैतिक संयन्त्र का निर्माण किया गया और अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को निर्देशित करने का काम प्रारम्भ हुआ। आज कोई भी दल या पार्टर्ीीगर चुनाव में सहभागी होना नहीं चाहती तो उससे बाचचीत का विकल्प हमारी राजनीति ने क्यों दी – यह सवाल उठाया जा सकता है। चुनाव कराना है तो चुनाव की बातें होनी है, उसे निष्पक्ष और प्रभावी बनाने की बात होनी चाहिए, वार्ता की आवश्यकता ही क्या – अगर वार्ता या समस्या के समाधान की दिशा में वे आगे बढÞ रहे हैं तो सरकार का औचित्य क्या –
मौजूदा सरकार के लिए भी वर्तमान राजनैनितक परिस्थिति आरामगाह की तरह है। उसकी असफलताओं की जिम्मेदारी लेने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यहाँ के राजनीतिक दल ही तैयार हैं। यह बात तो र्सवज्ञात है कि यह सरकार नौकर शाहों की है। इस में वे लोग शामिल हैं, जिन्होंने कभी सोचा भी न होगा कि वे सरकार में प्रधानमन्त्री या मन्त्री बनेंगे। लेकिन बिल्ली के भाग्य से सींका टूटने की कहावत चरितार्थ हर्ुइ। परिस्थितियों ने करवट बदली और उन्हें राजयोग मिला। अब वे भी जानते हैं कि चुनाव का निर्धारित समय पर सफलता पर्ूवक हो जाना भी एक तरह से उनकी आयु का समाप्त होना माना जाएगा। भला अपनी मृत्यु के दस्तावेज पर कौन हस्ताक्षर करना चोहगा – दूसरा यथार्थ यह है कि आगामी चुनाव के नाम पर देश में जो राजनैतिक परिस्थिति उभरी है, उस में सख्ती के सिवा उसे सफलतापर्ूवक सम्पन्न कराने के लिए दूसरा कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता। यद्यपि इसके दुष्परिणाम भी सामने आ जाते हैं। लेकिन सहमति की राजनैतिक कदमताल में ऐसा करने में भी वर्तमान सरकार सक्षम नहीं दिखलाई देती। अब रास्ता कैसा होगा, किसी को कुछ नहीं सूझ रहा।
यह बात तो तय है कि देश जिस राजनैतिक चक्रव्यूह में उलझा हुआ है, उससे निकलने का एक मात्र माध्यम निर्वाचन है। लोकतन्त्र का महापर्व भी यह है। इसलिए जो राजनैतिक शक्तियाँ निर्वाचन का विरोध कर रही हैं, वे किस दिशा में देश को ले जाना चाहती है – यह सवाल उठाया जा सकता है। यह सच है कि आज जो अन्तर्रर्ाा्रीय शक्तियाँ कूटनैतिक स्तर पर नेपाल में सक्रिय हैं, वे भी यहाँ चुनाव चाहती हैं। लेकिन नेपाल के राजनैतिक घटनाक्रम में भारत की भूमिका को हमेशा विवादास्पद बनाया जाता रहा है। आज नेपाल में भारत के पर्ूवराजदूत जयन्त प्रसाद का कार्यकाल समाप्त हो जाने के कारण, वापसी हो चुकी है। रंजित रे की नए राजदूत के रूप मे नियुक्ति हो चुकी है। यद्यपि आगामी चुनाव के मद्देनजर प्रसाद के कार्यकाल को बढÞाए जाने की बात भी चर्चा में थी। मगर उनका कार्यकाल नहीं बढÞाया गया। इससे नेपाल के सूचनातन्त्र में यह अटकल भी है कि भारत यह जानता है कि निर्धारित तिथि पर यहाँ चुनाव सम्भव नहीं। इसलिए प्रसाद की कार्यावधि समाप्त होने पर उन्हें वापस बुला लिया गया। इससे भी भारत की नीयत पर सन्देह किया जाता है कि शायद यहाँ संविधानसभा का चुनाव वह नहीं चाहता। जबकि भारत औपचारिक तौर पर और विभिन्न स्तरों पर यहाँ के चुनाव में अपना सहयोग देने की बात करता आया है। दूसरा यथार्थ यह है कि गोलमेच सम्मेलन की असफलता का ठीकरा भी उसी के सर पर फोडÞा जाता है। सवाल यह है कि दल टूटते-विखरते हैं यहाँ, सरकारें बनती गिरती हंै यहाँ और उसके लिए जिस तरह यहाँ सक्रिय दल जिम्मेवार हैं, उसी तरह चुनाव की सफलता या विफलता के जिम्मेवार भी हमारी राजनीति ही हैं।
आज हम लोकतन्त्र या प्रजातन्त्र की बात करते हैं और इस पथ पर देश चल भी पडÞा है। मगर यह बात हमारे राजनैतिक दलों और नेताओं को तो स्वीकार करना ही होगा कि लोकतान्त्रिक संस्कारों को उन्होंने अभी तक ग्रहण नहीं किया है। यही कारण है कि देश में सरकारें अस्थिर हर्ुइ हंै, अपने ही दल की सरकार को व्यक्तिगत महत्वांकाक्षा के कारण गिराया गया है। संविधानसभा असफल रही, संघीयता के सवाल पर दलों में मतैक्य का अभाव रहा, जनाकांक्षाओं को उपेक्षित करने की मनोवृत्ति रही और शब्दों की बाजीगरी दिखलाने की प्रवृत्ति अभी भी उन में बरकरार है। यही कारण है कि आम लोगों में उनकी विश्वसनीयता घटी है और प्रायः दल इस आरोप को झेल रहे हैं। यही कारण है कि किसी भी पार्टर्ीीौर किसी भी नेता के पक्ष में जन समूह
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के उमडÞने की स्थिति नहीं है। या तो वे कार्यकर्ताओं की सभा करते हैं या प्रायोजित भीडÞ इकठ्ठा करते हैं।
यह सच है कि संविधानसभा के आगामी चुनाव में सभी महत्त्वपर्ूण्ा पक्ष की सहभागिता राष्ट्र के लिए र्सवस्वीकार्य संविधान जारी करने के लक्ष्य के लिए आवश्यक है। यह अलग बात है कि हम वैद्य पक्ष की धारणा से सहमत हों या नहीं, मगर नेपाल के मौजूदा राजनीतिक परिवेश में वैद्य पक्ष की भूमिका को नजरअन्दाज कर अगर हम यह सोचते हैं कि चुनाव में उनकी सहभागिता न होने पर भी किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पडेÞगा तो यह गलत धारणा होगी। इस पक्ष की पूरी तरह उपेक्षा करने से शान्तिपर्ूण्ा और भयमुक्त वातावरण में चुनाव की सम्भावना पर असर पडेÞगा। कमजोर वैधानिकता के आधार पर चल रही यह सरकार वैद्य पक्ष के सक्रिय चुनाव बहिष्कार से उत्पन्न प्रतिक्रिया का सफल व्यवस्थापन कर सकेगी, यह कहना कठिन है। लेकिन उससे भी गम्भीर बात यह है कि सभी महत्त्वपर्ूण्ा पक्ष की सहभागिता से गठन हर्ुइ संविधानसभा और उसके द्वारा जारी किया गया संविधान स्वीकार्यता का वातावरण तैयार करेगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो चुनाव हो जाने, नई संविधानसभा द्वारा संविधान जारी कर दिए जाने के बावजूद उसका विरोध और उसकी स्वीकार्यता पर प्रश्नचिन्ह लगा रहेगा। अब सवाल उठता है कि रास्ता क्या है। बात यहीं आकर अटकती है कि लोकतन्त्र में र्सवसम्मति का अभ्यास ही उसकी मूल भावना के विपरीत है। इसे ढूँढÞा जाना चाहिए, मगर इसे अन्तिम विकल्प मानना भी एक तरह से लोकतान्त्रिक राजनैतिक चिन्तन के प्रतिकूल होता है। यह भी सच है कि नेपाल से अधिक अस्थिर देशों में भी चुनाव हुए हैं। महत्त्वपर्ूण्ा पक्ष यह है कि संवैधानिक निकायों में असहमत पक्ष की असहमति के व्यवस्थापन की क्षमता होनी चाहिए और इच्छाशक्ति भी।
एक बात तो निश्चित है कि आज देश जिस राजनैतिक और संवैधानिक संकट से गुजर रहा है, उससे निकलने का एक मात्र मार्ग संविधानसभा का चुनाव है। इसलिए इसकी सम्भावना को क्षीण करने वाली बातों से राष्ट्र को बचना होगा। जहाँ तक सरकार परिवर्तन की बात है तो यह और अधिक जटिलता पैदा कर सकती है। क्योंकि विगत का हमारा अनुभव रहा है कि एक सरकार बनाने में महीने और वर्षगुजर गए हैं और लम्बे अभ्यासों के बाद भी जो सरकार बनी, वह भी न तो र्सवमान्य हर्ुइ, न ही अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकी और न ही लम्बे समय तक चल सकी। दलों में आपसी अविश्वास इतना गहरा है कि उन्हें अराजनैतिक सरकार के विकल्प को सामने लाना पडÞा। आज की स्थिति की आवश्यकता अविश्वास और टकराव की नहीं, समन्वय और समाधान की है। गम्भीरतापर्ूवक राष्ट्र को अग्रगामी दिशा देना अनिवार्य है अन्यथा नव स्थापित लोकतन्त्र रूपी शिशु कुपोषण का शिकार होगा। इसके प्रति हमारी राजनीति को सावधान और संवेदनशील रहना चाहिए। िि
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