चुनाव की घोषणा ही एक मात्र विकल्प

पुण्य गौतम ‘विश्वास’ एक राजनीतिज्ञ के साथ–साथ लेखक भी हैं । और एक प्रखर वक्ता के रूप में भी उन्हें जाने जाते हैं । गौतम का राजनीतिक जीवन आरोह–अवरोध रहा है । विद्यार्थी संगठन में आबद्ध होकर गौतम ने वि.सं. २०४५ साल में राजनीतिक जीवन की शुरुआत की । ०४६ साल के जनआन्दोलन के बाद डॉ. बाबुराम भट्टराई के संयोजकत्व में गठित संयुक्त जनमोर्चा में वह सदस्य थे । ०५४ साल में जब माओवादी ने सशस्त्र जनयुद्ध आरंभ किया, गौतम भी माओवादी में शामिल हो गये । लेकिन ०५७ साल में पार्टी पर सांस्कृतिक विचलन का आरोप लगाते हुए उन्होंने विद्रोह किया और माओवादी से अलग हो गये । बाद में वह मणि थापा के नेतृत्व के क्रान्तिकारी कम्युनिष्ट पार्टी में

Puny Gautam

पुण्य गौतम ‘विश्वास’

आबद्ध हो गए । सभी माओवादी घटकों के बीच पार्टी एकीकरण के पश्चात् गौतम पुनः हाल के माओवादी केन्द्र में शामिल हो गए । लेकिन माओवादी में वह ज्यादा नहीं टिक पाए । ‘माओवादी केन्द्र ने राष्ट्रीयता का अड़न छोड़ दिया है और पार्टी विदेशी दलालों के चंगुल में फँस गया है’ यह कहते हुए वह माओवादी से अलग हो गए । फिलहाल वे नेकपा (माले) के पोलिटव्युरो सदस्य हैं । और प्रगतिशील लेखक संघ के केन्द्रीय उप–महासचिव भी हैं । गौतम के साथ हिमालिनी के लिए लिलानाथ गौतम ने समसामयिक राजनीतिक विषयों में बातचीत की है । प्रस्तुत है, बातचीत का सम्पादित अंश –
० आपलोग पंजीकृत संविधान संशोधन विधेयक को विरोध क्यों कर रहे है ?
– हमारा कथन स्पष्ट है– आज की आवश्यकता संविधान संशोधन का नहीं है, चुनाव का है । फिलहाल सरकार ने संशोधन के लिए जो प्रस्ताव पंजीकृत किया है, उसके सम्बन्ध में संसद में बहस होना ठीक नहीं है । क्योंकि यह प्रस्ताव कालान्तर में नेपाल के सार्वभौमसत्ता और क्षेत्रीय अखण्डता में दखल–अन्दाजी कर सकता है ।
० लेकिन कहा जाता है कि संविधान अपूर्ण है, इसीलिए संशोधन की आवश्यकता महसूस हुई है ?
– जायज मांगों के सम्बोधन के लिए विधि सम्मत तरीके से किसी भी वक्त संविधान का संशोधन हो सकता है । लेकिन आज ऐसी अवस्था नहीं, जिसके चलते संविधान का संशोधन करना पड़े । असन्तुष्टि जतानेवाले सभी नेता इस सत्य को जानते हैं । हाँ, राजनीति में जातीय पहचान के लिए जो मांगें आगे आयी हैं, उनमें से मधेशवादी पार्टियों ने भी ऐसी मांगें रखी हैं । नेकपा (माले) ने शुरु से ही स्पष्ट कर दिया है कि हर समुदाय को अपनी पहचान मिलनी चाहिए । हमने यह भी कहा है कि हर प्रदेश की जनता को आर्थिक समृद्धि मिलना चाहिए । लेकिन सिर्फ जातीय पहचान के आधार में हमलोग संघीय राज्य का सीमांकन करते हैं, तो वहाँ आर्थिक समृद्धि नहीं मिल सकता । दूसरी बात, नेपाल जैसे बहुजातीय और बहुभाषिक देशों में सिर्फ जात और भाषा के आधार में संघीय राज्य नहीं बनाया जा सकता ।
वास्तव में तराई–मधेश की समस्या समाधान करना है, तो वहाँ की उत्पीड़ित जनता की मांगों को सम्बोधन करना होगा । लेकिन मधेश के नाम में राजनीति करनेवाले शोषक, सामन्त और भूमिहार वर्ग के लोगों ने अभीतक वास्तविक पीड़ित मधेशियों की मांगें अपने राजनीतिक मुद्दों में नहीं उठाया है । जनता की असन्तुष्टि को उन्होंने व्यक्तिगत तथा पार्टीगत हित में उपभोग किया है । इसीलिए आज सीमांकन सम्बन्धित विषयों को लेकर जो बखेड़ा हो रहा है, वह विल्कुल बेतुकी बात है ।
० ऐसा है तो, संविधान संशोधन करने की बात क्यों हो रही है ?
– संविधान जारी होने के बाद भारतीय पत्रिका ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ में नेपाल के संविधान में संशोधन करने के लिए सात सूत्री प्रस्ताव सार्वजनिक हुआ था । फिलहाल संविधान में संशोधन करने की बात वे कर रहे हैं, उनकी मांगें उक्त सात सूत्री प्रस्ताव के साथ मिलती–जुलती है । इसीलिए स्पष्ट होता है– संविधान में संशोधन करना कौन चाहता है ? हाँ, इसमें सिर्फ भारत को ही गाली देना और आरोप लगाना ठीक नहीं है । अन्य अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति केन्द्र की सक्रियता भी नेपाल में है । ऐसी शक्ति केन्द्रों का उद्देश्य सिर्फ नेपाल को अस्थिर बनाना ही नहीं है, उभरते विश्व शक्ति चीन को रोकना भी है । उसके लिए नेपाली भूमि का प्रयोग हो सकता है । ऐसे शक्ति केन्द्र समझते हैं कि अगर नेपाल को अस्थिर और अशान्त बनाया जाय तो यहाँ बहुराष्ट्रीय सेना लाया जा सकता है । वे लोग यह भी जानते हैं कि इसके लिए यहाँ सदियों से मिलकर रहे विभिन्न जात–जातियों के भीतर द्वन्द्व पैदा करना होता है, एक जाति के विरुद्ध दूसरी जाति को भड़कना लड़ाना है, एक धर्मावलम्बी के विरुद्ध दूसरे को उतारना पड़ता है । अभी वही हो रहा है । अर्थात् नेपाल को बहुजातीय बखेड़ो के रूप में चित्रित करने का प्रयास हो रहा है, ताकि दूसरा रुवाण्डा, इरिटिया तथा अफगानिस्तान बनाया जा सके । इस सत्य को हमलोग जितना जल्द समझ सकते हैं, उतना ही जल्द समस्या का समाधान हो सकता है ।
० बताया जाता है कि दो नंबर के प्रदेश में ८० प्रतिशत से ज्यादा मधेशी समुदाय के लोग रहते हैं । आपलोगों की बात से ऐसा लगता है कि दो नम्बर प्रदेश के भू–भाग नेपाल का है, लेकिन उन लोगों की मांग भारत से आयातित है ! ऐसा क्यों कहते हैं ?
– हमलोगों ने कभी भी ऐसा नहीं कहा है कि मधेश में रहनेवाली जनता की मांगें भारत की मांग है । जहाँ तक संघीय राज्य की सीमांकन की बात है, ‘हाल के दो नम्बर प्रदेश में सिन्धुली और मकवानपुर को जोड़ना चाहिए’ ऐसा कहनेवाले भी मधेशी ही है । क्या उन लोगों की मांगें मधेशियों की मांग नहीं है ? मधेश के नाम में राजनीति करनेवाले मधेशी, बाकी सब गैर–मधेशी, ऐसा भी होता है क्या ? याद रहे, आपने जो ८० प्रतिशत जनता की बात की है, उनमें सिर्फ मधेशी मोर्चा के कार्यकर्ता ही नहीं है, उनमें ‘मधेश में पहाड़ भी होना चाहिए’ ऐसा कहनेवाले भी हैं, वह भी मधेशी हैं । मुझे लगता है ८० प्रतिशत में से ७५ प्रतिशत से ज्यादा ऐसे ही मधेशी हैं । इसीलिए हिमाल, पहाड़ और तराई को अलग रख कर संघीय राज्य बनाना चाहिए, ऐसा कहनेवालों की नियत क्या है, उसमें आशंका हो रहा है ।
० आप भी स्वीकार करते हैं कि पहचान को स्वीकार करना चाहिए । तराई के अपनी ही भाषा और सांस्कृतिक पहचान है, उसको स्वीकार कर अलग प्रदेश क्यों नहीं बनाया जा सकता ?
– हाँ, संघीय राज्य निर्माण के लिए भू–बनोट, भाषा और सांस्कृतिक पक्ष को एक आधार बनाया जा सकता है । लेकिन नेपाल जैसे बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक देश में यह सम्भव नहीं है । खूद तराई–मधेश में भी आप इसकी विविधता देख सकते हैं । जहाँ भोजपुरी, मैथिली, थारु, मुसलमान जैसे अनेक सांस्कृतिक और भाषिक पक्षधर हैं । लेकिन बात की जाती है– एक मधेश प्रदेश अथवा दो मधेश प्रदेश का । संक्षिप्त में इतना ही है कि हमारे यहाँ भाषिक तथा सांस्कृतिक आधार में कोई भी संघीय राज्य सम्भव नहीं है । दूसरी बात, सिर्फ भाषिक और सांस्कृतिक पहचान मिलना ही संघीयता का मर्म नहीं है । उसके साथ स्थानीय स्वशासन तथा आर्थिक सम्पन्नता भी जुड़कर आता है । इसीलिए हिमाल, पहाड़ और तराई को खण्डित करने के बाद ही उपर्युक्त संघीय राज्य बन सकता है, ऐसी मानसिकता गलत है । हमारे यहाँ तो संघीय राज्य के नाम में ‘आत्मनिर्णय का अधिकार’ कहकर बहस करनेवाले भी हैं । स्पष्ट होना चाहिए कि हमारी आवश्यकता और उद्देश्य सोवियत मॉडल की संघीयता नहीं है, जिसके चलते देश खण्डित भी हो सकता है । लेकिन संघीयता के नाम में कुछ नेता लोग ऐसे भी बहस करते हैं कि उन लोगों की बहस कार्यान्वयन में आ जाएगा तो नेपाल का अस्तित्व ही नहीं रह जाएगा । ऐसे संघीय राज्य की ओर देश को अग्रसर करना उचित नहीं है ।
० संघीय राज्य मांगनेवाले देश को विखण्डन करते हैं, ऐसा आशंका रख कर क्या हमलोग संघीयता का सही कार्यान्वयन कर पाएंगे ?
– यह सिर्फ आशंका नहीं है । हमारे यहाँ जिस तरह संघीय राज्य की मांग हो रही है, उसमें आशंका होना स्वाभाविक है । उदाहरण के लिए आप युक्रेन को ले सकते हैं । इसीलिए संघीयता चाहिए या देश ? यह बहस शुरु हो चुकी है । अगर इसी तरह राजनीतिक अस्थिरता कायम रहेगी तो यह बहस भयंकर रूप ले सकती है । याद रहे– देश से बढ़कर कोई भी विचार, राजनीतिक पार्टी, धर्म, जाति, सम्प्रदाय नहीं हो सकता, संघीयता भी नहीं । अगर देश से ऊपर अपनी पार्टी और विचार को मानकर राजनीति करते हैं तो गणतन्त्र, धर्मनिरपेक्षता और संघीय व्यवस्था जैसी प्राप्त उपलब्धियां भी खोना पड़ सकता है । यहाँ तो अपनी मांगें पूरी न होने के कारण देश को अलग करने की बात होती है । ऐसे लोग ही विखण्डनकारी हैं ।
० एक निश्चित भू–भाग में रहनेवाले लोग की मांगों को हमलोग हरदम विखण्डनकारी मांगों कें रूप में व्याख्या करते हैं तो समस्या का समाधान कैसे होगा ?
– पहले ही बता चुका हूँ कि मधेशी जनता की असन्तुष्टि को सम्बोधन करना चाहिए । लेकिन याद रहे, मधेशी जनता की असन्तुष्टि सीमांकन से जुड़ा हुआ नहीं है । मधेश के नाम में राजनीति करनेवाले नेताओं ने जवर्दस्ती उनकी असन्तुष्टि को सीमांकन के साथ जोड़ दिया है । इसीलिए उनकी नियत क्या है ? इसमें सवाल उठ सकता है । जैसे की हमारे मधेशी मोर्चा के नेतागण क्यों सीके राउत जैसे विखण्डनकारी को खुलकर विरोध नहीं करते हैं ? ‘हमारी मांगें पूरी करो, नहीं तो देश विखण्डन हो जाता है’ कहकर क्यों उलटे ही धमकी दिया जाता है ? क्यों वे लोग खुलकर नहीं कहते हैं– ‘मधेश, नेपाल की भूमि है, हमलोग नेपाली जनता हैं । किसी को भी देश विखण्डन करना नहीं देंगे ?’ ‘हमारे लिए अधिकार से बढ़कर देश का संरक्षण और उसके प्रति कर्तव्य है ?’ यह बात वे लोग क्यों नहीं कहते हैं ? हमारे कुछ मधेशी नेता इतने संकीर्ण हैं कि सार्वजनिक कार्यक्रम वे लोग कहते हैं– ‘जय मधेश’ । लेकिन ‘जय नेपाल’ नहीं कहते हैं । ‘जय मातृभूमि’ कहते है । लेकिन ‘जय मातृभूमि नेपाल’ कहने के लिए वे लोग हिचकते हैं । वे लोग जिस तरह व्यवहार कर रहे हैं, उसे देखकर क्या कोई आशंका नहीं कर सकता है ? इसीलिए जो अंश मागते हैं, उन लोगों को अपनी वंश का भी घोषणा करनी चाहिए ।
यहाँ मार्टिन लुथर किंग का एक प्रसंग सान्दर्भिक होता है । वे काला जातियों में से एक महान् अमेरिकन नेता थे । उन्होंने ‘आई ह्याब अ ड्रिम (मेरे पास एक सपना है) कह कर एक घोषणा की थी । लुथर को अमेरिका के ‘गान्धी’ के रूप में भी जाना जाता है । उन्होंने स–गौरव कहा है– ‘हम काले हैं, अफ्रिका से आए हैं, लेकिन हम सब अमेरिकन हैं ।’ इसी तरह राजेन्द्र महतो, उपेन्द्र यादव और महन्थ ठाकुर को स–गौरव ‘हम मधेश में रहनेवाले नेपाली हैं,’ कहना चाहिए कि ‘मांग पूरी करो नहीं तो देश विखण्डन कर देंगे’ कहना चाहिए ? इसी तरह ‘हिमाल, पहाड और तराई सभी क्षेत्रों में रहनेवाले हम सब नेपाली हैं’ कहना चाहिए कि निश्चित समुदाय को भड़काकर उसी में सीमित रहना चाहिए ? जब इन सवालों का जवाफ मिल जाता है, तब समाधान की ओर हम जा सकते हैं ।
० ऐसे ही बहाने में एक पक्ष कहता है– संविधान में संशोधन नहीं हो सकता । दूसरे पक्ष कहते है– अगर संशोधन नहीं होगा, तो राजनीतिक एजेंडा आगे नहीं बढ़ सकता । अब क्या कर सकते है ?
– मान लीजिए, आज संविधान में संशोधन नहीं हो पाया, क्या आकाश गिर जाएगा ? धरती फट जाएगी ? फिलहाल कुछ इस तरह का हंगामा किया जा रहा है । इसका मकसद क्या है ? याद रहे, आवश्यकता होने पर संविधान तो किसी भी वक्त संशोधन हो सकता । संविधान कार्यान्वयन के क्रम में जटिलता आ जाती है, तो उसमें तुरुंत संशोधन हो जाता है । लेकिन आज की आवश्यकता चुनाव करवाना है । वि.सं. २०७४ माघ के भीतर स्थानीय, प्रदेश और संघ के चुनाव करना आज की मुख्य जिम्मेदारी है । निर्धारित तिथि में चुनाव सम्पन्न नहीं हो सका, तो देश में संवैधानिक और राजनीतिक संकट आ सकता है । आप ही बताइए कि चुनाव करवाने के लिए संविधान की कौन सी धारा बाधक हो रही है ? आशंकित रूप में हंगामा खड़ा करने से संविधान में संशोधन नहीं किया जा सकता ।
० ०७४ माघ के बाद देश में संवैधानिक और राजनीतिक संकट आ जाएगा, ऐसा कहकर आपलोग क्यों डरा रहे हैं ? आजतक के राजनीतिक परिदृश्य को देखने से स्पष्ट होता कि निर्धारित समय में चुनाव सम्भव नहीं है । इसके बाद तो आपलोग इसी संसद् को समयावधि बढ़ा देंगे, नहीं ?
– संविधानतः ऐसा करने की व्यवस्था नहीं है । यहाँ जर्ज बर्नाड शॉ नामक एक प्रसिद्ध लेखक का कथन संस्मरण कराना चाहूंगा । वे कहते हैं कि ‘ब्रिटीश संसद इतना शक्तिशाली है कि जो पुरुष को महिला और महिला को पुरुष नहीं बना सकता, बाकी सब कर सकता है ।’ इसी तरह हमारे राजनीतिक ‘मठाधीश’ ‘सहमति’ के नाम में अभीतक जो कुछ करते आ रहे हैं, उस प्रवृत्ति और अहंकार को त्यागना होगा । नहीं तो आपने जैसा कहा, सहमति और दो तिहाई के नाम में वह भी हो सकता है । इसे मत भूलिए कि पूर्वराजा की तरफ से एक वक्तव्य आने पर हंगामा करनेवाले लोग आप देख रहे हैं । इसीलिए असामान्य अवस्था आने से सावधान रहना होगा, निर्धारित तिथि में चुनाव सम्पन्न कराना होगा ।
० राजनीतिक सहमति के बिना चुनाव सम्भव हो सकता है ?
– चुनाव के विरोध करनेवालों के पीछ पड़ते हैं, तो हमलोग कभी भी चुनाव नहीं कर पाएंगे । संसद में प्रतिनिधित्व करनेवाले प्रमुख राजनीतिक शक्तियों के बीच इस मामलों में न्यूनतम सहमति होनी चाहिए । उसके बाद जितना जल्द हो सके चुनाव की घोषणा करनी चाहिए । तीनों तह की चुनाव निर्धारित तिथि में सम्पन्न हो जाता है, तो संक्रमणकाल के अंत की सुरुआत यहीं से हो जाती है । जहाँ तक मधेश की असन्तुष्टि सम्बन्धित सवाल हैं, जायज मांगों की सम्बोधन चुनाव के बाद भी हो सकता है । नेपाल के सार्वभौम सत्ता और क्षेत्रीय अखण्डता को अक्षुण्ण रखते हुए मधेशवादियों के साथ कोई भी समझौता किया जा सकता है । हाँ, समझौता करते वक्त हमारी मान्यता ‘जननी जन्मभूमिश्चः स्वर्गादपि गरियसी’ अर्थात् ‘माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है’ होना चाहिए । लेकिन अभी तो देश को कायम रखना है या संघीयता ? प्रजातन्त्र, गणतन्त्र और धर्मनिरपेक्षता कायम राखना है या नहीं ? इस तरह का सवाल उठने लगा है । हम सभी के लिए ऐसा सवाल खतरें का सूचक है ।
यहाँ अमेरिका के पूर्वराष्ट्रपति विलक्लिन्टन के आर्थिक सलाहकार जोसेफ स्टिगलिज का कथन सान्दर्भिक है । उन्होंने ‘थ्री ट्रिलियन डलर वार’ नामक पुस्तक लिखी हैं । संसार में जारी युद्ध, द्वन्द्व और देश के अर्थतन्त्र सम्बन्धित मुद्दों को मद्देनजर रखते हुए स्टिगलिज ने कहा है– ‘दुनिया के समृद्धि के पीछे एक मात्र कारण शान्ति है । और विनास, पतन, राष्ट्र–विखण्डन और भयावह कलह का स्रोत झगड़े और आपसी द्वन्द्व है । इसीलिए शान्ति में जाना चाहते हैं, तो आपसी झगड़ें और द्वन्द्व को खत्म करना होगा ।’ लियो टॉल्सटॉय और लेनिन भी यही मान्यता रखते थे । नेपाल के सन्दर्भ में यही बात लागू होती है । १७ हजार जनता की जान जाने के बाद संविधान सभा से संविधान जारी हुआ है । इसको कैसे संशोधन किया जा सकता है, यह बात संविधान में ही लिखा गया है । उन्हें समझना चाहिए कि अभी तो सिर्फ संविधान का पालन करना है, समय आने पर विधि सम्मत तरीके से इसमें संशोधन कर सकते हैैं । हर समय आन्दोलन और झगड़ते रहेंगे, तो हमारे यहाँ शान्ति सम्भव नहीं है । मधेशवादी नेताओं को भी समझना चाहिए कि अब देश के लिए अशान्ति और द्वन्द्व नहीं, शान्ति और समृद्धि के लिए काम करना है । देश में राजनीतिक क्रान्ति सम्पन्न हो चुका है, अब आर्थिक क्रान्ति की ओर चलना है । नहीं, अभी भी हम राजनीतिक क्रान्ति की ही बात करते हैं तो अभीतक हमने जो उपलब्धि हासिल की हैं, वह भी हाथ से निकल सकता है ।
० आशय यह है कि संविधान–संशोधन की सम्भावना नहीं है ?
– साधु–सन्त अपनी कुटी में रह कर जिस तरह अखंड़ बेदान्ती बहस करते हैं, संविधान–संशोधन के मामले में अभी जो बहस हो रही है, वह भी ऐसा ही है । जो कभी भी खत्म नहीं हो सकता । इसीलिए इसमें प्रवेश ही ना करें तो बेहत्तर होगा ।
० संविधान के प्रति अभी जो असन्तुष्टि दिख रही है, उसको सम्बोधन करना चाहिए या नहीं ?
– कैसी असन्तुष्टि ? प्राकृतिक असन्तुष्टि, जो हृदय से प्रस्फुटित होता है उसको सम्बोधन करना ही पड़ेगा, इसका विकल्प नहीं है । लेकिन जो कृत्रिम असन्तुष्टि व्यक्त करते हैं, अथवा दूसरे किसी के लिए असन्तुष्ट होने का नाटक करते हैं, ऐसी असन्तुष्टियाँ कभी भी खत्म नहीं होती हैं और उसको सम्बोधन भी नहीं किया जा सकता है । इसीलिए गलत मानसिकता से सभी को बाहर आना चाहिए, जनता में संविधान के बारे में जो भ्रम बिछाया गया है और भावुकता में बहकाया गया है, उसमें सुधार करना चाहिए । क्योंकि संविधान ने किसी को विभेद नहीं किया है । पहाड़ अथवा हिमाल में रहनेवाले व्यक्ति को संविधान ने जितना अधिकार दिया गया है, मधेश में रहनेवाले व्यक्ति को भी उतना ही अधिकार दिया गया है । मधेशी, पहाड़ी व हिमाली होने के कारण किसी को भी संवैधानिक रूप में विशेष अधिकार नहीं मिला है ।
० मधेश में किसी प्रकार का विभेद नहीं है, आप यही कहना चाहते हैं न ?
– नहीं । मधेश में विभेद और उत्पीड़न है, उसके जग में निर्मित असन्तुष्टियां भी हैं । लेकिन सब विभेद और उत्पीड़न संविधान अथवा राज्य निर्मित नहीं है । मधेश में जो गरीब है, वह अमीर से प्रताड़ित हैं । जो दलित हैं, वह ऊँचे जातियों से पीड़ित हैं । इसी तरह गलत सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्य–मान्यता के कारण पीड़ित होनेवाले हैं, उचित शिक्षा और रोजगारी के अवसर न मिलने पर पीड़ित बननेवाले भी हैं । ऐसा विभेद सिर्फ मधेश में ही हैं, यह गलत है । ऐसा विभेद तो पहाड़ और हिमाल में भी है । हाँ, जनसंख्या और उसके प्रतिशत के अनुसार तराई–मधेश में ऐसे पीड़ितों की संख्या कुछ ज्यादा हो सकती है । लेकिन इसको सम्पूर्ण कारक राज्य और पहाड़ी समुदाय को मान कर जो राजनीति वहाँ होती है, यह दुःख की बात है । इसके कारण ही आज संविधान के बारे में अनाप–सनाप बोलनेवालें दिखाई पड़ रहे है । जिसके चलते पहाड़ी और मधेशियों के बीच के सदियों का अच्छा सम्बन्ध भी बिगड़ता जा रहा है । ऐसी राजनीति को अन्त होनी चाहिए । हम पहाड़ी हो या मधेशी, समग्र नेपाल को दृष्टिगत करके काम करना चाहिए । सामाजिक–सांस्कृतिक विभेद और उत्पीड़न को खत्म करना चाहिए । सामाजिक–सांस्कृतिक विभेद को गलत व्याख्या कर कोई व्यक्ति सत्ता के लिए राजनीति करते हैं, तो उसको वहाँ से खदेड़ना चाहिए ।

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