चुनाव नहीं ये ताे “चूना लगाने का मौसम” है

व्यंग्य

बिम्मी शर्मा

 

 

दिवाली तो कब की खत्म हो गयी पर इस देश में ‘चूना’ लगाने का मौसम अभी शुरु हुआ है । चुनाव अर्थात देश के नागरिकों के आस और बिश्वास पर विभिन्न राजनीतिक दल, नेता और उम्मीदवार द्वारा चूना लगाने का मौसम अपने पूरे शबाब पर है । चुनाव में उम्मीदवार अपने घोषणापत्र से रिझा कर मतदाता को चूना लगाने में एडी, चोटी का बल लगा रहे हैं । अगर उम्मीदवार जीत गया तो उसकी चूने की सफेदी टिकाऊ हुई । अगर कहीं बेचारा उम्मीदवार हार गया तो उल्टे मतदाता ने ही उसको चूना लगा दिया वह भी खुब रगड़ कर ।
अब नेता और उम्मीदवार ही नहीं मतदाता भी होशियार हो गया है । जिस तरह चुनाव में खडा उम्मीदवार देश के अवाम को एक वोट से ज्यादा नहीं समझता । उसी तरह जनता भी अपने क्षेत्र के उम्मीदवार को एक शराब की बोतल, एक मुर्गा या बकरा और एक नोट की गड्डी से ज्यादा का भाव नहीं देता है । खाएगा, पीएगा और डकार मारेगा एक उम्मीदवार का और चुनाव में वोट देगा दूसरे उम्मीदवार को । जी, हजूरी कर के काम निकालेगा एक से, भजन कीर्तन करेगा दूसरे उम्मीदवार का, खाएगा पीएगा तीसरे का और वोट देगा चौथे उम्मीदवार को ।
यह राजनीति बडी कमीनी चीज है । शुरुआत तो घर से होती है और बढ़ते और पैर पसारते हुए पूरे समाज और देश में फैल जाती है । घर में राजनीति ज्यादातर महिलाएं करती है पर राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर छा जाते है पुरुष । चुनाव उसी राजनीति को व्यक्त करने और फैलाने का एक माध्यम है । सभी उम्मीदवार सभी को चूना लगा रहे हैं । और खुद को दूध का धुला साबित करने के लिए उसी चूने से अपना मुंह भी सफेद कर लेते हैं ।
अपने मतदाता को चूना लगाने में सब से आगे है नेकपा एमाले के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली । गत स्थानीय तह के चूनाव में केपी ओली ने मेट्रो रेल और मोनो रेल का सपना दिखा कर देश की जनता को चूना लगाया था । अब फिर से संसद के चुनाव में अगले पांच साल में चंद्रमा तक रकेट ले जाने का सपना दिखा रहे हैं । इसी के साथ वह अगले पांच साल में देश में कोई भी गरीब नहीं रहेगा । मतलब देश के सारे गरीब तो खाडी मुल्क में रोजगारी के चले जाएँगें और उन के भेजे रेमिट्ंयास के से केपी ओली एंड कंपनी मजे से रकेट में बैठ कर चंद्रमा में चले जाएगें ।
पर यह रकेट असली होगा कि नकली इसी में संशय है । कहीं दीवाली में बोतल में डाल कर उड़ाने वाले रकेट की तरह तो नहीं होगा यह रकेट जो दूर आसमान में जा कर धड़ाम से फट जाता हैं । ओलीदेश की जनता को फिर से चूना लगा कर उन का वोट हथियाना चाहते हैं । मोनो और मेट्रो रेल तो नाती, पनाती के समय में भी बनेगा कि नहीं ? चले हैं महाशय चंद्रमा तक रकेट पहुंचाने । पहले देश की खस्ता हाल सड़कों की तो मर्मत कीजिए जनाब तब चंद्रमा तक रकेट ले जाने का सब्जबाग दिखाइएगा । शायद रकेट को उड़ने या उड़ाने के लिए सड़क की जरुरत नहीं होती वह तो हवाई जहाज की तरह आसमान मे उडेÞगा । इसी लिए सड़क का हाल जैसा भी हो क्या फर्क पड़ता है । बिना हड्डी का बना जीभ कुछ ज्यादा ही चुलबुलाने लगता है बोलने के लिए । इसीलिए ओली जी मुहावरों का सहारा ले कर ऐसा कुछ बोल देते हैं । जिस से आम जनता उत्तेजित हो जाती है और मीडिया को मसाला मिल जाता है लिखने के लिए ।
नहीं तो देश की भेडि़या जैसी मीडिया जरुर पूछती की पांच साल में रकेट से चंद्रमा तक पहुंचाने के लिए आप के पास ठोस योजना और पूर्वाधार क्या है ? यह दुसरे देशों के भेजे सेटेलाईट पर अपना टीभी चैनल खोलने जैसा आसान है क्या ? पर हमारे देश की मीडिया तर्क करना तो जानती नहीं । सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह जो जो नेता बोल देते हैं उसी को लिख कर, छाप कर, एफएम रेडियो में बजा कर और टीवी में दिखा कर अपने कर्तव्य का निर्वाह कर लेते हैं । मीडिया जो खुद पूर्वाग्रहित है और किसी न किसी राजनीतिक दल और नेताओं का हनुमान है । वह भी नेता और चुनाव में खडे उम्मीदवार की तरह मतदाता और जनता को चूना लगा रही हैं । क्योंकि यह चुनाव का मौसम है अर्थात मतदाता को ठगने और चूना लगाने का मौसम भी । इसी लिए लगाते रहिए चूना और लगवाते रहिए अपने भविष्य पर भी चूना ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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