चुनाव : स्वीकार या बहिष्कार ?-नवीन मिश्रा

प्रधानमन्त्री प्रचंड सत्ता में रहते हुए ही चुनाव कराना चाहते हैं, जबकि इस कार्य में सबसे बड़ी बाधा राज्यों के पुनर्सीमांकन का है । यह कार्य किसी भी हालत में संसदीय चुनाव से पहले तक हो जाना चाहिए । लेकिन सवाल है कि इस बीच स्थानीय चुनाव का क्या होगा ?


नवीन मिश्रा, २३ अप्रैल , अप्रैल अंक | अभी देश की राजनीति ऐसे मोड़ पर खड़ी है कि कहा नहीं जा सकता है कि, आगामी बैसाख ३१ गते को होने वाला स्थानीय चुनाव शांतिपूर्ण ढंÞग से संपन्न हो सकेगा । कभी तो लगता है कि सरकार और मधेशी मोर्चा के बीच समझौता हो जाएगा और मधेशी मोर्चा भी चुनाव में भाग लेगा लेकिन फिर दूसरे ही क्षण मोर्चा के विरोधी तेवर मुखर हो जाते हैं और वह चुनाव बहिष्कार की बात करने लगता है । देश में माओवादियों के हिंसक आन्दोलन के कारण पिछले दो दशकों से स्थानीय चुनाव नहीं होने के कारण जनता में व्याकुलता है । जनता चुनाव के प्रति उत्साहित नजर आ रही है । चाहे वह चुनाव में टिकट पाने की बात हो या फिर म्यादी पुलिस में भर्ती होने की बात हो ।
जब मधेशी मोर्चा सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा करती है, तो ऐसे में यह शंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि क्या मधेशी दल स्थानीय चुनावों का बहिष्कार करेंगे ? मधेशी नेता कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल के इस फॉर्मुले पर सहमत थे कि प्रदेशों के सीमांकन, भाषा, राष्ट्रीय सभा के गठन जैसे संशोधन विधेयकों को स्थानीय चुनाव के बाद संसद से पारित कराया जाएगा और तब तक एक आयोग सीमांकन विवाद का हल ढूंढने के लिए काम करेगा । इस बात पर सभी सहमत हो गए थे कि गांवपालिका, नगरपालिका प्रमुख तथा उप–प्रमुख को राष्ट्रीय सभा के लिए मतदान का अधिकार नहीं दिया जाएगा । प्रधानमन्त्री निवास बालुवाटार में हुई बैठक से जब सद्भावना पार्टी के अध्यक्ष राजेन्द्र महतो बाहर निकले, तब उन्होंने बयान दिया कि सरकारात्मक परिस्थिति में प्रधानमन्त्री से बातचीत हुई है । तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के अध्यक्ष महंथ ठाकुर भी इस कथित सकारात्मक माहौल के पक्ष में दिखे । लेकिन कुछ ही समय बाद मधेशी मोर्चा ने सरकार के प्रति विरोध का रुख अपना लिया ।
विरोध के तेवर अपनाने वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा के ३१ सांसद प्रतिनिधि सभा में हंै, और जाहिर है– अब ऐसी परिस्थिति में प्रतिपक्षी की भूमिका निभाएंगे । ऐसा होने पर भी ६०१ सदस्यों वाले सदन में सत्ता पक्ष के साथ अब भी ३२० सभासद संसद में रह जाएंगे, जिससे की प्रचंड सरकार को कोई खतरा नहीं है कि संविधान में यह संख्या दो तिहाई नहीं है कि संविधान संशोधन किया जा सके । संसद में मतदान के लिए नेकपा–एमाले ने अजीबोगरीब शर्तें रखी हैं ।
पिछले दस वर्षों से नेपाली संसद में सिर्फ एक ही सदन है । नेपाली संसद के राष्ट्रीय सभा को १५ जनवरी २००७ के दिन भंग कर दिया गया था । ६० सदस्यीय राष्ट्रीय सभा में ३५ सदस्य संसद् के निचले सदन प्रतिनिधि सभा के सदस्यों द्वारा एकल हस्तांतरणीय मतदान के द्वारा चुने जाते थे । १० सदस्यों को राजा मनोनीत करते थे, जबकि १५ सदस्यों के चुनाव के लिए गांवपालिका, नगरपालिका प्रमुख तथा उपप्रमुख मतदान करते थे । नए संविधान में राष्ट्रीय सभा को संविधान संशोधन के द्वारा फिर से बहाल किए जाने का प्रावधान है ।
प्रधानमन्त्री के साथ हुई बातचीत में स्थानीय विकास मंत्री कमल थापा, माओवादी केन्द्र के नेता मातृका यादव, संघीय समाजवादी फोरम नेपाल के सह–अध्यक्ष राजेन्द्र श्रेष्ठ, तराई मधेश सद्भावना पार्टी के अध्यक्ष महेन्द्र यादव, राष्ट्रीय मधेश समाजवादी पार्टी के महासचिव केशव झा, नेपाल सद्भावना पार्टी के महासचिव कौशलेन्द्र मिश्र आदि नेता उपस्थित थे । बैठक के बाद इन सभी नेताओं ने कहा कि संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा का सामूहिक फैसला है कि सरकार से समर्थन वापस लिया जाए ।
जब सब कुछ ठीक चल रहा था, तो फिर ऐसा क्या हो गया कि मोर्चा को विरोधी तेवर अपनाने पडेÞ । इन नेताओं का कहना है कि इन्होंने सात मार्च को ही सरकार को सात दिन का अल्टीमेटम दिया था कि पहले वह प्रदेशों के सीमांकन और राष्ट्रीय सभा के गठन संबंधी संशोधन विधेयक संसद में पास कराए, फिर स्थानीय चुनाव कराए । लेकिन प्रधानमंत्री नहीं माने । ऐसे में मजबूर होकर हमें समर्थन वापस लेना पड़ा । २० सितंबर २०१५ को राज्यों का सीमांकन जिस जल्दबाजी में किया गया था, तब मधेशी मोर्चा ने बहिष्कार नहीं किया था । उस समय संविधान सभा में रखे प्रस्ताव पर उपस्थित ५९८ सांसदों में से ५०७ ने पक्ष में मतदान किया था ।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वैशाख ३१ गते को होने जा रहे स्थानीय चुनाव में अब लगभग एक महीने का समय रह गया है । उसके पश्चात् प्रान्तीय चुनाव और जनवरी २०१८ तक संसदीय चुनाव कराना चुनाव आयोग का सबसे कठिन कार्य है । प्रधानमन्त्री प्रचंड सत्ता में रहते हुए ही चुनाव कराना चाहते हैं, जबकि इस कार्य में सबसे बड़ी बाधा राज्यों के पुनर्सीमांकन का है । यह कार्य किसी भी हालत में संसदीय चुनाव से पहले तक हो जाना चाहिए । लेकिन सवाल है कि इस बीच स्थानीय चुनाव का क्या होगा ? नई शक्ति के नेता बाबुराम भट्टराई ने भी मधेशी मोर्चा को सीमांकन के बिना चुनाव में नहीं जाने की सलाह दी है क्योंकि ऐसा करने से मधेश बीस साल पीछे चला जाएगा ।
दूसरी ओर तराई के नेता अपना वोट बैंक बनाए रखने के लिए विरोध की राजनीति का सहारा लेकर बंद और हड़ताल को अपना ब्रह्मास्त्र मानते हैं । लेकिन क्या आज मधेशी इस बात से सहमत हैं ? क्योंकि आम हड़ताल से लोगों का जनजीवन कष्टकर हो जाता है । हड़ताल और आंदोलन के कारण नेपाल का व्यापार और विकास दस साल पीछे जा चुका है । तराई क्षेत्रों के आम नागरिकों के अनुसार मधेशी नेता अपनी राजनीति साधने के लिए यह सब कर रहे हैं । तराई की जनता को पहाड़ समर्थकों द्वारा की गई संवैधानिक बेईमानी को समझना भी एक कठिन कार्य है ।
संविधान सभा ने सितंबर २०१५ में स्थानीय निकाय पुनर्गठन आयोग को रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी थी । आयोग ने देश भर में ६,५५३ वार्ड बनाने की बात कही थी । इससे पहले देश के ७५ जिलों की ५८ म्युनिसिपैलिटी में ३,९१३ वार्ड बनाए गए थे । स्थानीय निकाय पुर्नगठन आयोग ने वार्डों की जो संख्या बढ़ाई है, वह पहले की तुलना में बहुत अधिक है । ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि नेपाल में आबादी तेजी से बढ़ी है । चुनाव आयोग को ढ़ाई लाख नए मतदाताओं के नाम शामिल करने हैं । अब तक नेपाल में १ करोड़ ३३ लाख १४ हजार ३१६ लोगों को मताधिकार प्राप्त था । अब चुनाव आयोग के द्वारा बंद और हड़ताल के माहौल में इतने सारे कार्यों का संपादन करना आसान नहीं होगा ।
इन सभी राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में अभी भारत सरकार की भूमिका एक मूकदर्शक की बनी हुई है । उसके लिए मुश्किल यह है कि वह वर्तमान सरकार का पक्ष ले या फिर मधेशी मोर्चा का । दूसरी ओर शेरबहादुर देउवा बेचैनी से अपने प्रधानमन्त्री बनने की घड़ी का इन्तजार कर रहे हैं जबकि प्रचण्ड प्रधानमन्त्री पद छोड़ने के मूड में नजर नहीं आ रहे है । नेपाली कांग्रेस से समर्थन वापसी की स्थिति में वे एमाले से भी हाथ मिला सकते हैं, जिससे की उनकी प्रधानमन्त्री की कुर्सी बनी रहे ।

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