चुनौतिपूर्ण +२ कालेज का चुनाव

लीलानाथ गौतम :एसएलसी परीक्षा परिणाम र्सार्वजनिक होने के साथ-साथ उत्तर्ीण्ा विद्यार्थी तथा उनके अभिभावक एक प्रकार के तनाव और अन्धेरें में भटक रहे हैं। इसी बीच कुछ विद्यार्थी ±२ काँलेजों में भर्ना भी हो चुके हैं। लेकिन अभी भी बहुतसारे विद्यार्थी काँलेज का चुनाव ही कर रहे हैं। सब के मन में एक ही सवाल है- अब किस काँलेज में कौन सा विषय लेकर पढें – इस सवाल का सहज उत्तर पाना ऐसे विद्यार्थी और अभिभावक के लिए चुनौतिपर्ूण्ा भी है। ऐसी ही अवस्था में विभिन्न सञ्चार माध्यम ने बहुत सारे काँलेजों का विज्ञापन प्रसारण कर रहे हैं। विज्ञापित काँलेजों की बातों पर ध्यान दिया जाए तो उन सब का दावा रहता है कि उनका ही काँलेज सर्वोत्कृष्ट है। इस तरह के विज्ञापन के कारण भी विद्यार्थी तथा अभिभावक और ज्यादा भ्रमित होते हैं। इसीलिए ऐसी अवस्था में उन लोग को सही काँलेज और विषय का चुनाव करने के लिए सही सलाह और मार्गदर्शन की आवश्यकता रहती है।images1
प्रथमतः हम सब को समझना चाहिए कि विज्ञापित काँलेज अथवा उनका दावा सब सही नहीं होता। हम देख रहे हैं कि विगत कुछ वषर्ाें से निजी शिक्षण संस्थाओं ने गुणस्तरीय शिक्षा का नारा देकर अपने प्रति विद्यार्थियों को आकषिर्त करने के लिए जो शैली अपनाई है, वैसी शिक्षण संस्थाएं गुणस्तरीय और व्यावसायिक शिक्षण पद्धति को आगे नहीं बढÞा पा रही हैं। इस तरह की शिक्षण संस्थाओं के कारण ही समाज में अनेकों विकृति भी बढÞ रही है। यौवनावस्था में प्रवेश कर रहे किशोर विद्यार्थीयों के मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए उत्तेजक और आकर्ष होर्डिङबोर्ड का बनाना और भडÞकाउ चित्रों के साथ मिडिया में विज्ञापन देना आज के स्कूल सञ्चालक अच्छी तरह जानते है और इससे गलत फायदा उठाते हैं। विद्यार्थी भी इस जाल में फंस जाते हैं। इस के चलते गुणस्तरीय शिक्षा से वञ्चित होना पडÞता है।
दूसरी ओर बडÞी-बडÞी बाते करनेवाली शिक्षण संस्थाएं व्यवहार में खरी नहीं उतर रही हंै। उन में ना कोई परिवर्तन है, और ना कोई प्रगति। व्यावसायिक शिक्षा का नारा भी खोखला ही है। एक कैसी विडम्बना है कि ऐसे माहौल में हमारी शिक्षा पद्धति से विद्यार्थी और अभिभावक दोनों सिर्फउच्च श्रेणी के प्रमाणपत्र हासिल करना चाहते हैं। ऐसे विद्यार्थी ज्ञान और दक्षता में शून्य रह जाते है। इसी का नतिजा है कि एसएलसी के कितने ही असफल छात्र आत्महत्या तक कर बैठते है। खैर, प्रचारमुखी और नकल्ची के रुप में विकासित हो रही शैक्षिक विकृति के कारण छात्रों में सिर्फउच्च अंक प्राप्त करने की होडÞ सी लगी रहती है। इस होडÞ को निजी शिक्षण संस्थाएँ खूब हवा देती हैं। उच्च अंक प्राप्त करने के लिए गलत तरिके भी अपनाया जा रहे है। इस का परिणाम गलत ही होगा। इस नकारात्मक पक्ष को रोकना ही होगा। यह काम शिक्षा मन्त्रालय, समाजसेवी, सचेत अभिभावक वर्ग और राजनीतिक दलों को आगे आकर करना चाहिए।
हमारे यहाँ तो हर विद्यार्थी तथा अभिभावक में ऐसी गलत मानसिकता विकसित हो रही है कि जिस शिक्षण संस्था में जितना ज्यादा शुल्क लिया जाता है, उस शिक्षण संस्था को उतना ही ज्यादा गुणस्तरीय माना जाता है। ऐसा वातावरण बनानेवाले भी धर््रर्ूत शिक्षण संस्था ही हैं। भडÞकिली प्रचारबाजी के द्वारा छात्रोें को आकषिर्त करनेवाली शिक्षण संस्थाओं के द्वारा गुणस्तरीय शिक्षा दिए जाने की कोई ग्यारेन्टी नहीं होती। फिर भी बच्चे और अभिभावक प्रचारबाजी में फंस ही जाते है। वैसे तो र्सवसाधारण जनता के बच्चे महंगी शिक्षा से स्वतः दूर होते जाते हैं। और सम्पन्न वर्ग के बच्चे नामी गिरामी स्कूल में आकर्ष प्रचारों के चलते प्रवेश तो ले लेते हैं मगर पढर्Þाई के बदले अन्टसन्ट क्रियाकलाप में फंस जाते हैं।
इस तरह उच्च शिक्षा के लिए अनावश्यक होडबाजी उच्च माध्यामिक शिक्षा परिषद् अर्न्तर्गत के प्लस टु से लेकर सीर्टर्ीइभीटी, ए लेभल, स्वास्थ्य क्षेत्र लगायतसभी क्षेत्र में विद्यमान है। जिन विषयों की पढर्Þाई विद्यालय में होती ही नहीं है, उन विषयों का उल्लेख करके शुल्क लेना निजी विद्यालयों की दादागिरी है। फिर भी वे सीना तान कर चलते है और सरकार तथा जनता चुपचाप बैठी है।
दूसरी तरफ उच्च शिक्षा में जानेवाले विद्यार्थियों को उनकी रूची के अनुसार विषयों का चुनाव करने की छूट मिलनी चाहिए और उनके ऊपर अनावश्यक दबाव देकर डाक्टर और इन्जिनियर बनाने का ख्वाब नहीं देखना चाहिए। अरुचिकर विषय पढने पर कोई भी छात्र उस विषय में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। अर्थोपाजर्न की दृष्टि से भी छात्रों को मजबूर किया जाता है, निश्चित विषयों में जाने के लिए। यह प्रवृत्ति भी गलत है। इसके कारण बाद में विद्यार्थी को अपना ट्रैक छोडÞकर जीविकोपार्जन के लिए दूसरा माध्यम ढूढÞना पडÞता है। इसी स्थिति के कारण अध्ययन और व्यवहार के बीच बहुत बडÞी खाई बन जाती है। व्यवहारपयोगी तथा व्यावसायिक शिक्षा के बदले मनोवैज्ञानिक शोषण करनेवाले लोग शिक्षा क्षेत्र में खुलकर आय आर्जन कर रहे हैं, यह भी एक प्रमुख कारण है। जिसे रोकना जरूरी है। तर्सथ आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में सैद्धान्तिक शिक्षा नहीं, व्यावहारिक शिक्षा पर जोडÞ देना चाहिए। ताकि भविष्य में हर विद्यार्थी अपने शिक्षा के सहयोग से ही अपना जीवन यापन कर सके।
अधिकाशं लोग एसएलसी का परिणाम देखकर ही आगे की पढर्Þाई के लिए निर्ण्र्ााकरते हैं। यह भी गलत मानसिकता है। गाँव से लेकर शहर तक प्रायः सभी अभिभावक ऐसा सोचते हैं कि एसएलसी में अच्छे अंक हों तो विज्ञान, मध्यम स्तर के अंक हो तो व्यवस्थापन और सिर्फपास हों तो कोई भी विषय लेकर पढÞे। प्रथम श्रेणी प्राप्त करनेवाले विद्यार्थी को साइन्स ही अध्ययन करने के लिए घोषित-अघोषित ‘स्कुलिङ्ग’ होता है। विद्यार्थी का झुकाव किस विषय की ओर है अथवा किस विषय में उसकी विशेष क्षमता है, इधर ध्यान ही नहीं दिया जाता। यह स्वयं में गलत बात है। विषयों का चुनाव करते समय इस बात का ख्याल रखना चाहिए।
ऐसी बहुत सी समस्याएं हैं, जिनके बारे में गम्भीरता से विचार करना जरूरी है। लेकिन सम्बन्धित कोई वर्ग इस विषय में गम्भीरता से सोचने के लिए तयार नहीं दिखता। सबसे बडे दुख की बात यही है।
ष्ििबलबतजन२gmष्ब।अिom

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz