चुनौतियों भरा समझौता:-

पंकज दास

देश की प्रमुख राजनीतिक दलों के लगातार प्रयास के बाद आखिरकार पांच वषर् से विवादों में रही शान्ति प्रक्रिया को पूरा करने को लेकर एक ऐतिहासिक समझौता हुआ। इस सम्झौते के तहत सबसे महत्वपर्ूण्ा और जटिल विषय सेना समायोजन पर दलों के बीच सहमति बन गई और इन सभी सहमतियों को सात विन्दुओं में सिलसिलेवार करते हुए एक समझौते का रूप दिया गया। तीन बडे दल के प्रमुखों ने तो इस पर हस्ताक्षर किया ही इस ऐतिहासिक दस्तावेज पर देश की चौथी शक्ति के रूप में रही मधेशी मोर्चा को भी उचित स्थान और सम्मान देते हुए उन्हें भी शामिल कराया गया। इससे एक बात तो तय है कि अब देश की बडी राजनीतिक पार्टियां खास कर माओवादी मधेशी शक्ति के महत्व को समझते हुए उसके अस्तित्व को स्वीकार कर लिया है।
यूं तो इस समझौते को ऐतिहासिक कहने में कोई भी अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन इसकी चुनौती भी कम नहीं है। जिस समय देश के सभी बडे नेता पत्रकारों के जरिये इस शुभ संदेश को देशवासियों को सुना रहे थे तो उसी बैठक में मौजूद माओवादी के बागी हो चले नेता मोहन वैद्य ने उनकी हंसी को थोडी देर के लिए ही सही शान्त कर दिया। इस महत्वपर्ूण्ा घोषणा के बीच ही मोहन वैद्य ने उठकर कहा कि यह समझौता देश और जनता के हित में नहीं है और उनकी पार्टर्ीीस समझौते को कभी नहीं मानेगी। वहीं पर मौजूद पार्टर्ीीध्यक्ष प्रचण्ड और प्रधानमंत्री भट्टर्राई पर मनमानी करने का आरोप लगाते हुए वैद्य ने उन्हें पार्टर्ीीी बैठक में देख लेने की चुनौती दी। हालांकि पार्टर्ीीें विभाजन से वो साफ मुकर गए। बाहर निकलने पर वैद्य ने कहा कि इस समझौते के कई विन्दुओं पर उन्हें सख्त आपत्ति है और यह उनकी ही पार्टर्ीीे दो प्रमुख नेताओं की बदौलत किया गया समझौता है जिसे पूरी पार्टर्ीीहीं मानेगी।
दर असल इस समझौते में वाकई में कई ऐसे मुद्दे हैं जिनके कार्यान्वयन पर काफी मुश्किलें आने वाली है। चाहे बात सेना समायोजन की हो या फिर पुनर्स्थापना के लिए सरकार की तरफ से दी जाने वाली रकम का। इसके अलावा कब्जा की गई संपत्ति को वापस करने वाईसीएल की अर्धसैनिक संरचना को भंग करने की जो डेडलाईन तय की गई है उस पर अमल करना व्यावाहारिक रूप से भी काफी कठिनाई आने वाली है। लडाकुओं के समायोजन की बात में कई ऐसी बात है जिनका स्पष्ट व्याख्या नहीं होने के कारण स्तर निर्धारण और पद निर्धारण के समय यह विवादों में घिर सकता है। इसी तरह पुनर्स्थापना में जाने वाले लडाकुओं के लिए भी तीन स्तर निर्धारण किये जाने की बात है जिस पर लडाकुओं के बीच ही विवाद हो सकता है। रकम बंटवारे को ५ लाख रूपये से ९ लाख रूपये तक किये जाने की बात पर भी विवाद हो सकता है।
सेना समायोजन के अलावा शक्ति बंटवारे,आयोग गठन और राष्ट्रीय सहमति की सरकार को लेकर दलों के बीच फिर से बखेडा खडा हो सकता है। हालांकि इस समझौते में राष्ट्रीय सरकार के विषय को उतना महत्व नहीं दिया गया है लेकिन कांग्रेस और एमाले सहित माओवादी का ही एक गुट भट्टर्राई की लोकप्रियता से घबराकर उन्हें हटाकर नई सरकार बनाने की वकालत कर रहा है। और ऐसा ना हो कि शान्ति प्रक्रिया पर किए गए ऐतिहासिक समझौते के कार्यान्वयन के समय एक बार फिर से राष्ट्रीय सहमति की सरकार का राग अलाप कर सब कुछ तहस नहस हो जाए।
हालांकि सभी बडे नेताओं ने इस समझौते पर काफी प्रसन्नता जाहिर की है और समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद उनमें उत्साह भी देखा गया लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फसमझौते पर हस्ताक्षर होना ही पर्याप्त है। इससे पहले भी इस देश में तमाम समझौते हुए हैं। दिल्ली में सात दल और माओवादी के बीच हुए ऐतिहासिक १२ सूत्रीय समझौते से लेकर अब तक एक दर्जन से अधिक बार दलों के बीच इसी तरह के कई समझौते हो चुके हैं। लेकिन आज तक उन सभी समझौते का हश्र क्या हुआ है इस कटु अनुभव के बारे में शायद अधिक विश्लेषण की आवश्यकता नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस बार हुए समझौते का कोई भी अर्थ नहीं है। दलों के बीच महत्वपर्ूण्ा और विवादित विषयों पर एक राय बनना ही अपने आप में एक बडी उपलब्धि मानी जाएगी। वाईसीएल का अर्धसैनिक संरचना को भंग करने की बात हो या फिर कब्जा की गई संपत्ति को वापस करने की बात इन सब बातों को तो पहले माओवादी सुनने के लिए भी तैयार नहीं था लेकिन  इस बार आखिरकार उन्होंने कम से कम अन्य दलों की बात मानते हुए वाईसीएल का अर्ध सैनिक संरचना भंग करने और कब्जा की गई संपत्ति को वापस करने के समझौते पर हस्ताक्षर कर लिया यह बहुत ही बडी उपलब्धि है।
इसी तरह नेपाली कांग्रेस और एमाले के द्वारा ६ हजार ५ सौ लडाकुओं का सुरक्षा बलों में समायोजन और पुनर्स्थापना पैकेज की बात मान लेना इस देश की राजनीति और शान्ति की दिशा में एक महत्वपर्ूण्ा उपलब्धि मानी जाएगी। हां सवाल फिर वही है कि आखिरकार इस पर अमल कैसे किया जाए। यदि हमारे राजनेता थोडा इमान्दार हो जाएं और वो ठान ले तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। प्रधानमंत्री डाँ बाबूराम भट्टर्राई की कार्यकुशलता और उनके काम करने के तरीके से शायद अन्य दल के नेताओं में उनके प्रति विश्वास हुआ है जिस कारण आज यह दिन देखने को मिल रहा है। यह बात सच है कि हमेशा ही सिर्फसत्ता के लिए लर्डाई झगडा और राजनीति करने वाले दलों के लिए बाबूराम भट्टर्राई ने एक नई सीख दी है। हर हाल में शान्ति प्रक्रिया को पूरा करने और संविधान का प्रारम्भिक मसौदा लाने के लिए प्रतिबद्ध प्रधानमंत्री भट्टर्राई ने मुख्य लक्ष्य से भटक रहे कांग्रेस और एमाले को मनाने के लिए अपने दो मंत्रियों की ना चाहते हुए भी बलि चढा दी। बिना कारण रक्षा मंत्री शरद सिंह भण्डारी को हटाने का मन ना होते हुए भी कांग्रेस और एमाले को विरोध करने की वजह ना देते हुए प्रधनमंत्री ने भण्डारी को हटाने का भारी मन से फैसला लिया।
इन सब में माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड की भी इस बार निर्वाह की गई भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। जिस तरह से मोहन वैद्य और रामबहादुर थापा सहित कई वरिष्ठ नेताओं के लाख विरोध के बाद भी उन्होंने भट्टर्राई का साथ दिया है वह भी काबिले तारीफ है। बस अब यही दुआ है छठी मैया की कृपा से नेपाल के नेताओं के मन में जो सद्बुद्धि आई है वह आगे भी बरकरार रहे और ताकि सेना समायोजन सहित शान्ति प्रक्रिया से जुडा हर विषय सुलझ जाए और देश को नयां संविधान मिले ताकि देश विकास के पथ पर द्रुत गति से आगे बढ सके।

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