चुनौतियों में घिरी ओली सरकार

लिलानाथ गौतम:बहुदलीय–संसदीय राज्य व्यवस्था में सत्ता हासिल करने के लिए सिर्फ चुनाव जीत कर प्रथम पार्टी बनने से ही नहीं होता है । उसके लिए संसद में भी बहुमत हासिल करना पड़ता है । संख्यात्मक दृष्टि से संसद में अभी नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ा दल है । लेकिन उसको अभी बाध्य होकर प्रतिपक्ष में रहना पड़ रहा है । लेकिन जब सबसे बड़ा दल प्रतिपक्ष में रह जाएगा, सरकार गठन करने वाले कोई भी दूसरी पार्टी के लिए वह सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है । वर्तमान परिस्थिति ऐसी ही है– ओली सरकार के लिए सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, और भी ज्यादा चुनौती झेलनी पड़ेगी । kp-oli-591x330
नेकपा एमाले, संसद का दूसरा बड़ा दल है । उसी के नेतृत्व में अभी नयी सरकार बनी है । संसदीय राजनीति में यह स्वाभाविक भी है । लेकिन नयी सरकार गठन, राष्ट्रपति और सभामुख लगायत अन्य संवैधानिक प्रमुखों को चुनते समय जो राजनीतिक ध्रुवीकरण बन गया, उस में नेपाली कांग्रेस को सम्पूर्ण रूप से बाहर होना पड़ा । आलोचकों की माने तो नेपाली कांग्रेस अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति केन्द्र के दबाव में पड़ा है । इसी के कारण कांग्रेस पार्टी में रहे बहुसंख्यक सदस्य ने नेतृत्व को आलोचना भी किया है । जो भी कारण हो, इस बार नेपाली कांग्रेस सत्तासुख से पूर्णरूप में बाहर होने की पीड़ा भुगत रहा है । कांग्रेस की यह पीड़ा ओली सरकार के लिए चुनौती है । उस में मधेशवादी के नाम से जाने जानेवाले एक क्षेत्रीय राजनीतिक शक्ति भी इस प्रक्रिया से सम्पूर्ण रूप से बाहर है । वर्तमान सरकार के लिए यह और भी चुनौतीपूर्ण होनेवाला है, इस में शंका नहीं है ।
नेपाली कांग्रेस और मधेशवादी के सहमति के बिना नये संविधान का कार्यान्वयन सम्भव नहीं है । प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपति जैसे कुछ महत्वपूर्ण पदाधिकारी को चुनकर संविधान कार्यान्वयन की सामान्य प्रक्रिया तो आगे बढ़ी है, लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है । तराई में लम्बे समय से आन्दोलन जारी है । उस आन्दोलन को सम्बोधन करने के लिए पहली शर्त है– वर्तमान संविधान में संशोधन । लेकिन जब नेपाली कांग्रेस की स्वार्थसिद्ध नहीं होगी, तब तक यह सम्भव नहीं है । मधेशी मोर्चा–सरकार बीच जारी वार्ता प्रक्रिया में अपना प्रतिनिधि समावेश करने के लिए इन्कार कर नेपाली कांग्रेस ने उस का संकेत दे दिया है ।
जारी तराई आन्दोलन और नाकाबन्दी के कारण जनजीवन कष्टकर हो रहा है । जनजीवन को सहज बनाने के नाम में ओली सरकार ने दूसरे पड़ोसी मुल्क चीन के साथ नये सम्बन्ध के विस्तार के लिए प्रक्रिया आगे बढ़ाया है । एक स्रुवतन्त्र ररुाष्टरु, किसी भी दूसररुे ररुाष्टरु के साथ अपनी देश के हित में कोई भी सम्बन्ध विस्रुरुताररु कररु सकता हैरु, यह अस्रुरुवाभाविक नहीं हैरुरु। लेकिन चीन के साथ अभी जो सम्बन्ध विस्रुरुताररु हो ररुहा हैरु, उसको यहाँ रुभाररुत विररुोधी ररुाजनीतिरु के रुप में प्रचाररु किया जा ररुहा हैरुरु। ऐसी अवस्रुरुथा में चीन के साथ हो ररुहे सम्बन्ध में कोई शंकास्रुरुपद क्रियाकलाप दिखने लगा औरुररु अभी दुश्मन की तररुह प्रचाररु हो ररुहे दक्षिणी पडवतन्त्र राष्ट्र, किसी भी दूसरे राष्ट्र के साथ अपनी देश के हित में कोई भी सम्बन्ध विस्तार कर सकता है, यह अस्वाभाविक नहीं है । लेकिन चीन के साथ अभी जो सम्बन्ध विस्तार हो रहा है, उसको यहाँ ‘भारत विरोधी राजनीति’ के रूप में प्रचार किया जा रहा है । ऐसी अवस्था में चीन के साथ हो रहे सम्बन्ध में कोई शंकास्पद क्रियाकलाप दिखने लगा और अभी दुश्मन की तरह प्रचार हो रहे दक्षिणी पड़ोसी मुल्क भारत के साथ रहे पुराने सम्बन्ध में किसी भी प्रकार की जटिलता पैदा हो गयी तो चाहकर या न चाहकर भी वर्तमान सरकार के विरुद्ध सबसे बड़ा मुद्दा यही बनने वाला है । इतना होते हुए भी वर्तमान सरकार, इस मुद्दा में किसी भी तरह का अपना कदम उठाने के लिए बाध्य है । ऐसी अवस्था में जारी भारत विरुद्ध की राजनीतिक भावना को सही ढंग से निराकरण नहीं किया गया तो इस सरकार के लिए यह प्रत्युपादक बन सकता है ।
दूसरी बात, वर्तमान सत्ता गठबन्धन ने संकेत किया है कि नेपाल में कम्युनिष्ट और गैरकम्युनिष्ट के बीच ध्रुवीकरण हो रहा है । भारत लगायत अन्तर्राष्ट्रीय जगत में भी ऐसा ही सन्देश प्रवाह हो रहा है । नेपाल और नेपाली के लिए इस गठबन्धन को जितना भी हितकर माना जाए, अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए यह स्वीकार नहीं हो सकता । ऐसी अवस्था में नेपाल के प्रति अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति राष्ट्रों का विशेष ध्यान जाना अस्वाभाविक नहीं है । यहीं, संसद का सब से बड़ा दल और संसदीय राजनीति के खिलाड़ी नेपाली कांग्रेस, इसका भरपूर फायदा उठाएगा । इन सभी चुनौती का सामना करते हुए संविधान का सही कार्यान्वयन और जनता की तत्कालीन मनोभावना को सम्बोधन करना वर्तमान सरकार की चुनौती है ।
विगत लम्बे समय से पहचान के नाम में यहाँ विभिन्न राजनीति शक्ति सक्रिय हैं, वहीं राजनीतिक शक्ति ही अन्तिम क्षण में निर्णायक साबित हो रहा है । पहचान सम्बन्धी मुद्दा को लेकर राजनीति करनेवाले शक्ति को वर्तमान सत्ता गठबन्धन में उस तरह का पहचान नहीं दिख रहा है, जो इससे पहले तक था । पहचान की मुद्दा में सबसे ज्यादा वकालत करनेवाली राजनीतिक शक्ति मधेशवादी पार्टियाँ हैं । वर्तमान सत्ता गठबन्धन में राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री और सभामुख में से कोई भी ऐसे व्यक्ति नहीं है, जिस को असन्तुष्ट मधेशी समुदाय अपना कह सके । ऐसी अवस्था में आधी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करनेवाला भू–भाग (तराई) वर्तमान गठबन्धन के प्रति असन्तुष्ट रहना अस्वभाविक नहीं है । यह असन्तुष्टि पक्ष और संसद का सब से बड़ा राजनीतिक दल नेपाली कांग्रेस वर्तमान सरकार के विरुद्ध सशक्त होना आश्चर्य नहीं है । क्योंकि, हमारे यहाँ राजनीतिक संस्कार ही इस तरह से विकास हो रहा है, जहाँ प्रतिपक्ष में रहे दल, सरकार विरुद्ध खडा नहीं हो ।
नया संविधान सम्बन्धित विषय को लेकर जो मधेशवादी दल अभी सड़क संघर्ष में हैं, देर–सबेर वह सभी वार्ता के द्वारा वर्तमान समस्या समाधान की तरफ उन्मुख हो सकते हैं । लेकिन उसके बाद उनका दूसरा कदम और राजनीति, वर्तमान सत्ता गठबन्ध के विरुद्ध में ही चलने वाला है । नेपाली कांग्रेस भी यही चाहता है । ऐसी अवस्था में अगर यह दो शक्ति मिल कर जाए तो संसद के भीतर भी पासे पलट सकते हैं । इसीलिए ओली नेतृत्व की वर्तमान सरकार की पृष्ठभूमि इतनी कमजोर है कि जो किसी भी समय तास का महल बन सकता है । यह तो हुआ, वर्तमान सत्ता गठबन्धन को कायम रखने के लिए सम्भावित चुनौतियाँ ।
अगर कर्तव्यनिष्ठ और जिम्मेदार बने तो वर्तमान सरकार के आगे इससे भी ज्यादा जटिल चुनौतियाँ है । यह जनजीविका के साथ जुड़ा हुआ है । संविधान आने के बाद राजनीतिक स्थिरता कायम होगी और देश आर्थिक विकास की पथ में आगे बढ़ पाएगा, सर्वसाधारण जनता इस तरह की अपेक्षा कर बैठी है । लेकिन ०७२ वैशाख १२ का महाभूकम्प, तराई आन्दोलन और भारतीय नाकाबन्दी के कारण देश की आर्थिक अवस्था इतनी नाजुक हो रही है, उसको सामान्य करने के लिए भी सरकार कुछ नहीं कर पा रही है । ऐसी अवस्था में जनता की अपेक्षाओं को सरकार कैसे सम्बोधन कर सकेगी ? थोड़ी ही सही, जनअपेक्षा सम्बोधन नहीं की गयी तो कुछ ज्यादा ही ‘राष्ट्रवादी’ दिखाई देनेवाली वर्तमान सरकार और गठबन्धन के विरुद्ध जनता ही सड़क में आने वाली है । उसका नेतृत्व नेपाली कांग्रेस तथा मधेशवादी दलो के हाथ जाएगा । इस के प्रति ओली सरकार तथा सत्ता साझेदार राजनीतिक दलों का ध्यानाकृष्ट नहीं हो रहा है । लेकिन इसके विपरित सत्ता भागबण्डा में वे लोग झगड़ रहे हैं । भागबण्डा मिलाने के लिए ही एक मन्त्रालय को दो बनाना, अनावश्यक उप–प्रधानमन्त्री और राज्यमन्त्रियों की भीड़ इकठ्ठी कर राष्ट्रीय सम्पत्ति का दोहन करना, इसका उदाहरण है । ऐसी ही घटना के चलते वर्तमान सत्ता गठबन्धन अधिक कमजोर होती जाएगी । अगर इस पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तो ओली सरकार अपना हनिमून भी अच्छी तरह नहीं मना पाएगी और जनता विकल्प खोजना शुरु कर देगी ।

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