चुरे दोहन और तराई–मधेश में विस्थापन का प्रभाव

संजय सिंह:आज मधेश आन्तरिक विस्थापन और बाह्य आप्रवासन की दोहरी समस्या से जूझ रहा है । जिसकी वजह से अनेकों आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक समस्याएं उत्पन्न हुई हैं । पहाड से आकर गरीब और भूमिहीन पहाडी मधेश के जंगलों को नष्ट कर के अपना वास स्थान बनाए हुए हैं । सड़क के किनारे और जंगल के आसपास इनकी झोपडि़यां हर जगह देखने को मिल जाती है । आज अवस्था यह हो गई है कि वर्षों से इस धरती पर रहने वाले मधेशी हिन्दू मुस्लिम की संस्कृति विलुप्त होने की अवस्था में है । ये अपनी ही धरती में अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं । मधेश में रहकर पहाडी मूल के लोग  राजनैतिक नियन्त्रण कायम कर के खुद शासक बन गए हैं और मधेशी, आदिवासी, जनजातियों पर शासन कर रहे हैं । जिसके कारण मधेशी, जनजाति अधिकार विहीन, पहचान विहीन और उपेक्षित बने हुए हैं । २००७ साल में सिर्फ एक प्रतिशत पहाडी मूल के लोग मधेश में थे और आज १९९१ तक का आंकड़ा बता रहा है कि २५ लाख से ज्यादा इनकी संख्या हो गई है जो अब तक और भी बढ़ चुकी होगी । इसकी वजह से समस्या और भी भयावह और संवेदनशील हो गई है । पंचायतकाल में मधेशियों को अल्पसंख्यक बनाने की साजिश के तहत बर्मा, बंगलादेश, आसाम, दार्जिलिंग, मेघालय, कलिम्पोंग, गढ़वाल, कुमायू, भुटान आदि जगहों से नेपाली भाषी लोगों को विशेष प्रोत्साहन और सुविधा देकर मधेश में बसाया गया और उन्हें नेपाली नागरिकता प्रदान की गई । तत्कालीन अवस्था में पहाड़ से तराई में विस्थापन का मुख्य उद्देश्य पहाड़ में जनसंख्या का दवाब, कृषि योग्य भूमि का अभाव, रोजगार का अभाव, सीमित कृषि उत्पादन, बाजार का अभाव, आर्थिक अभाव, प्राकृतिक प्रकोप आदि थे । जिसके कारण पहाडी मूल के लोग उपजाऊ भूमि की खोज में और रोजगार की खोज में मधेश में बसने लगे । तराई में औलों उन्मूलन पश्चात् समायोजित पुनर्वास, सरकारी प्रोत्साहन, रोजगार का अवसर, खाद्यान्न सम्पन्नता, उपजाऊ भूमि, विकसित उद्योग धन्दा, बाजार और व्यापार, सुगम यातायात का आकर्षण आदि ही मुख्य कारक थे ।
औलो उन्मूलन के समय से ही जंगल की कटाई शुरु हो गई थी । सन् १९६७ तक में तराई के कुल क्षेत्रफल का ४० प्रतिशत भूभाग जंगल था । हरियो वन नेपाल को धन कहावत उसी समय से प्रचलन में है । किन्तु व्यापक आप्रवासन ने मधेश के उस हरे वन को नजर लगा दिया । जंगल की कटाई ने प्राकृतिक असन्तुलन को जन्म दिया । दूसरी तरफ खुली सीमा की वजह से भारत की ओर से आतंकी गतिविधि, लूटपाट, चोरी, डकैती, आदि का भय दिखाकर और इसे रोकने के बहाने से नेपाल सरकार ने भू.पू. गोखार्ली सैनिक, ब्रिटिश सेना, भारतीय सेना और नेपाली सेना से अवकाश प्राप्त हुए लोगों को मधेश तराई के दक्षिणी सीमावर्ती क्षेत्रों में बसाया गया । नियोजित ढंग से पहाड़ी बस्ती बसाए हुए जगहों में से मोरंग, इटहरी, सिक्किमेटोल, बुघनगर का गुरुंग टोला, विराटनगर रानी का सैनिक टोला, बर्मेली टोला, बिराटनगर तीनटोलया का राची टोला आदि हैं । तराई मधेश की उपजनऊ भूमि उनके नाम से पुनर्वास कार्यक्रम के अन्तर्गत दर्ता कराया गया । इस तरह मधेशियों को सुनियोजित ढंग से अपनी ही धरती पर अल्पसंख्यक बनाने का षड्यंत्र किया गया ।  इसकी जगह अगर सरकार ने पहाड़ में ही कृषि उद्योग, पर्यटन, यातायात, स्वास्थ्य और रोजगार की स्थिति को विकास किया होता तो आज यह स्थिति नहीं होती । इससे मधेश और पहाड़ का संतुलित विकास भी सम्भव होता । इसी तरह बाहर से आए हुए आप्रवासी को रोकना चाहिए था । पहाडि़यों को पहाड़ में ही जगह उपलब्ध कराई गई होती तो मधेश में अनाधिकृत रूप में जंगल की कटाई नहीं होत? और प्राकृतिक सन्तुलन नहीं बिगड़ता । पुनर्वास के नाम पर जो जगह दी जा रही थी उसे रोक कर उसमें वृक्षारोपण करना चाहिए था । सन् १९६२÷६५ में ६००० परिवारों को तराई में बसा कर तराई का ५०००० एकड़ जमीन और उनके लिए पर्याप्त बजट तैयार किया गया था । सन् १९६३ में मध्य तराई में ८०० परिवारों को पुनर्वास कार्यक्रम के अन्तर्गत बसोबास सम्बन्धी समझौता इजाराइल के साथ किया गया । इसी कार्यक्रम के अन्तर्गत तराई के बाँके बर्दिया जिले में लोगों को बसाया गया । पुनः १९६७ में नेपाल सरकार, इजराइल सरकार और आष्ट्रेलिया सरकार के सहयोग में ३००० एकड़ जमीन में झापा जिला में भू.पू.स्निकों को बसाने का समझौता किया गया । सन् १९६४ में पुनर्वास कराने के लिए नेपाल पुनर्वास कराने के लिए नेपाल पुनर्वास कम्पनी की स्थापना की गई । इस कम्पनी के द्वारातराई मधेश के रूपन्देही, नवलपरासी आदि जिलों में प्रवासी नेपाली के नाम पर दार्जिलिंग, आसाम, भूटान और वर्मा से आए हुए शरणार्थियों को बसाया गया । इसी क्रम में ७७,७०० हेक्टर जंगल की भूमि का वितरण किया गया था । इसीतरह झापा पुनर्वास, सर्लाही पुनर्वास, नवलपरासी पुनर्वास, ताराताम पुनर्वास, कैलाली पुनर्वास, कंचनपुर पुनर्वास आयोजना अन्तर्गत तराई मधेश के जंगल को कटा कर आप्रवासियों को जमीन सौंपी गई । किन्तु लाखों गरीब भूमिहीन मधेशियों की व्यवस्था कहीं नहीं की गई । जिसके कारण झापा, नवलपरासी, चितवन आदि जगहों पर मधेशी गरीब और अल्पसंख्य कबनकर आज भी जीवनयापन कर रहे हैं ।
अपवाद के रूप में भारत से आप्रवासी नहीं आए हैं ऐसा नहीं है किन्तु ये  व्यापारी गांवों में नहीं आए हैं । सीमाक्षेत्र के भारतीय व्यापारियों को आकर्षित करने वाले अवसर नेपाल में नहीं हैं । इसबारे में समाजशास्त्री रिषिकेश शाह के अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों से काफी संख्या में लोग तराई आए हैं जिसके कारण तराई क्षेत्र में आबादी बहुत बढ़ गई है । जबकि भारत से तराई में आनेवालों की संख्या नगण्य है । वन क्षेत्र के विनाश के कारण प्राकृतिक सन्तुलन बिगड़ने के साथ ही तराई के मूल रैथानेवासी मधेशी अपनी ही भूमि में अल्पसंख्य कबन गए हैं । राजनैतिक रूप में मधेशी श ोषण का शिकार हैं हीं । सन् १९५४ से १९७२ के बीच की अवधि में पूर्वी तराई का झापा, मोरंग, सुनसरी, सप्तरी तथा सिरहा में मात्र ६० प्रतिशत से भी अधिक वन क्षेत्र विनाश हुआ है । सुदूर पश्चिम तराई के बांके, बर्दिया, कैलाली और कंचनपुर जिला के थारु दास, कमैया बनकर जीने को बाध्य हैं । सुनसरी, मोरंग, झापा जिला में युगों से रहने वाले सतार, झांगड़ था अन्य जनजाति अपनी मातृभूमि को छोड़कर भारत की ओर झारखण्ड पलायन करने को बाध्य हैं । भारत से प्रकाशित होने वाले एक बुलेटिन के अनुसार राजा महेन्द्र के समय में सरकारी कर्मचारियों के पाश्विक अत्याचार के शिकार मधेशी परिवार को मधेश की धरती ने ही बरवाद किया । आगलगी, डकैती, लूटपाट आदि का झूठा आरोप और अनागरिक मुद्दा आदि के कारण मधेशी अपनी धरती छोड़ने के लिए बाध्य हुए और उनकी जमीन पर उन अत्याचारियों ने कब्जा कर लिया । इस प्रकार तराई मधेश में हुए व्यापक आप्रवासन के कारण मधेशी मधेश में ही अल्पसंख्यक हो गए । बहुदलीय व्यवस्था के आगमन के बाद भी यह क्रम नहीं रुका है आज भी तराई की जमीन पहाड़ से आए हुए लोगों के नाम पर सरकार दर्ता कर रही है । वहीं आज भी नागरिकता विहीन मधेशी जनता सुविधाओं से वंचित हैं । यही अवस्था अगर रह ीऔर चुरे वनक्षेत्र यूँ ही विनाश होता रहा तो मधेशी घरबार विहीन हो जाएंगे और मधेश प्राकृतिक आपदा का शिकार होता रहेगा । यह समस्या सिर्फ मधेश के लिए नहीं होगा बल्कि सम्पूर्ण देश इसका शिकार होगा । इसलिए समय रहते इस पर ध्यान देना आवश्यक है । अब किसी भी बहाना से चुरे क्षेत्र के विनाश को रोकना होगा । वैसे तो कोई भी नेपाली नेपाल के किसी भी कोने में आ जा सकता है, व्यापार कर सकता है, जमीन खरीद बिक्री कर सकता है यह नेपाली का नागरिक हक है । इसमें कोई दो मत नहीं है । दुनिया के या पड़ोसी देश भारत से पृथक व्यवस्था और कानूनी व्यवस्था से हमारा देश संरक्षित है । फिर भी यह बात यहां उठाने की आवश्यकता इसलिए है कि अभी समय है कि हम अपने भूगोलीय पहचाने और संस्कृति को समझें और वातावरणीय विनाश, प्राकृतिक प्रकोप, अव्यवस्थित बसोवास, अवैज्ञानिक ढंग से चूरे क्षेत्र का दोहन, राज्यपुनर्संरचना के नाम पर मधेश को विनाश के कगार पर ना ले जाएं ।
जहां तक संस्कृति और पहचान की बात है पूर्वी मधेश में कल का झापा राजवंशी, ताजपुरिया, सतार, गणगाई, धिमाल, कोचे, मेचे, झांगर, उरावं, केवरत आदि जालि का मुख्य बासस्थल वहां का रैथाने बासिन्दा और उनकी संस्कृति माघी, होली, बैसाखी, सिरुवा, जिउतिया, छत्तामेला आदि प्रचलित संस्कृति के द्वारा पहचाने जाते थे । उसी तरह पश्चिम तराई के दांग, कैलाली, कंचनपुर आदि थारुओं के थाकथलो और संस्कृति से पहचाने जाते थे । काडमान्डौ उपत्यका नेवा संस्कृति से पहचाना जाता था । आप्रवासन की वजह से ये सभी अपनी मौलिक पहचान खोने की अवस्था में हैं । दूसरी तरफ पुननिर्माण के नाम पर चुरे से लकड़ी, पत्थर, गिट्टी और बालु निकालने वाले समूह सक्रिय हैं । चुरे के दोहन के कारण तराई मधेश मरुभूमि में परिणत होने की अवस्था में है अनाज का भण्डार के रूप में जाना जाने वाला मधेश आज खुद भुखमरी का शिकार है । आज सबको सचेत होने की आवश्यकता है । आज पुनर्वास की जो चर्चा चल रही है वो एक बार फिर चुरे के विनाश को ही आमंत्रित कर रहा है । बेहतर होता भूकम्प प्रभावित जिलों में ही जगहों को सुरक्षित कर के वैकल्पिक व्यवस्थापन किया जाय और पुनस्र्थापना की राष्ट्रीय नीति बनाई जाय । वहां के स्थानीय अधिकतम स्रोत साधन और काठ सामुदायिक वन द्वारा से ही उपलब्ध कराया जा सकता है । स्थानीय सामुदायिक वन मको ये जिम्मेदारी दी जा सकती है । पहाड़ के अधिकांहश जिले भूकम्प से प्रभावित हैं और सामुदायिक वन प्रदेश भी वहाँ हैं । अभी की अवस्था में तराई से अधिक हरे भरे जंगल पहाड़ में हैं । जिसका उपयोग किया जा सकता है ।
सीमापार फोरलेन और सिक्स लेन सड़क निर्माण होने के समय में  अवैज्ञानिक तरीके से चूरे का दोहन हो रहा है । राष्ट्रपति के द्वारा चुरे संरक्षण पर जोर दिया जाना सही कदम है । युवा फोरम नेपाल ने भी इस ओर ध्यान दिया है और अपने कार्यकर्ताओं को मेची से महाकाली के सीमावर्ती क्षेत्रों में भेजा है जहां उन्होंने पत्थर, गिट्टी, बालु आदि के निकासी पर रोक लगाया है । प्रायः यह काम सुरक्षा निकाय के मिली भगत के कारण होता है । इसलिए पिछले समय में नेपाल सरकार ने इन बातों को ध्यान में रखकर अर्थ सचिव रामेश्वर खनाल की अध्यक्षता में चुरे तराई मधेश संरक्षण सम्वद्र्धन तथा विकास समिति गठन किया गया है । चुरे का विनाश डेढ करोड़ जनता के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है और साथ ही एक और विपत्ति को आमंत्रित करना है । बढता हुआ शहरीकरण, अव्यवस्थित बसोवास, आप्रवासन को प्रभाव उपत्यका और तराई मधेश के भूगोल को झेलने वाली समस्या और अवैज्ञानिक ढंग से चुरे के दोहन से जो प्राकृतिक प्रकोप और पर्यावरण की समस्या दिख रही है उससे बचने के लिए नागरिकों को ही सजग और सचेत होना पड़ेगा ताकि भविष्य सुरक्षित हो सके ।
(लेखक संघीय समाजवादी फोरम के केन्द्रीय सदस्य है)

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