चौदह प्रदेश समाधान नहीं
रामचन्द्र पौडेल

रामचन्द्र पौडेल
उपसभापति, नेपाली कांग्रेस

संविधान सभा की ‘राज्यपर्नर्संरचना तथा राज्यशक्ति विभाजन समिति’ ने मूलतः माओवादी की हठ धर्मिता एवं एमाले की सहायता से पारित चौदह प्रदेशवाले प्रतिवेदन ने संघीयता के निर्माण में और ज्यादा जटिलता पैदा कर दी है। जिन मान्यताओं को आधार बनाकर चौदह प्रदेश का कुनवा खड करने की कोशीश की गई है, वह मान्यता आज इक्कीसवीं शदी की प्रगतिशील, लोकतान्त्रिक सामाजिक, राजनीतिक, मूल्य मान्यताओं के आड आ रही है। ऐसे आधारों पर संघीयता का निर्माण विवादों को जन्म देगा, जिसका समाधान ढूंढने से नहीं मिलेगा और नेपाल और नेपाली उन्नति के लिए तरसते रह जाएंगे। क्यों कि नेपाल विविधताओं से भरा देश है, जहाँ वर्षों से अनेकों जात-जातियाँ आपस में घुलमिलकर रह रही हैं। अब उन्हें अलग-अलग प्रदेशों में बाँटकर राज्यसंरचना के नाम पर व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक जटिलताओं को हम बढÞावा देंगे तो कहना पडेÞगा- आ बैल मुझे मार ! अनेक कारणों से अपना बसेरा बदलते रहने की बाध्यता ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है।
पहली बात तो यह है कि जनआन्दोलन ०६२/०६३ के मर्म को ही समिति ठीक से समझ नहीं पाई है और अपने प्रतिवेदन में उसे अभिव्यक्त भी नही कर सकी है। संविधान की धारा १३८ राज्य की पर्ुनर्संरचना के बारे मे कहती है- वर्गीय, जातीय, भाषिक, लैङ्गकि, सांस्कृतिक धार्मिक तथा क्षेत्रीय भेदभाव अन्त्य करने के लिए राज्य की केन्द्रीकृत और एकात्मक संचरना को हटाकर समावेशी लोकतान्त्रिक संघीय शासन प्रणाली द्वारा अग्रगामी पुनर्संरचना की जाएगी।
इस धारा से राज्य में विद्यमान कितने भेदभाव अन्त्य होंगे – वर्गीय, जातीय, भाषिक, लैङ्गकि, धार्मिक, क्षेत्रीय भेदभाव दूर करने के लिए राज्य की केन्द्रीय-एकात्मक संरचना को बिगाडÞ कर हम लोग कैसा राज्य बनाएंगे – समावेशी लोकतान्त्रिक, अग्रगामी इन शब्दों को हम किन अर्थों में लेते हैं – समावेशी कहने पर विभिन्न वर्ग, जाति, भाषा, लिङ्ग, संस्कृति, धर्म के लोगों को समेटना है या अलगाव की ओर लेजाना है – लोकतान्त्रिक कहने पर किसी खास जात जाति का विशेषाधिकार, अग्राधिकार तो नहीं है – अग्रगामी का मतलब क्या है – आगे बढÞने के बजाय हम और पीछे चले जाएँ – पुराने जमाने में नेपाल कितने छोटे-छोटे बाइसी चौबीसी राज्यों में बँटा था। राज्य एक कबीला के रुप में था। क्या हम नेपाल को फिर उसी अवस्था में ले जाना चाहते है – चौदह प्रदेश के स्वप्नद्रष्टा लोग जबाव दे- वर्ग भेद, जातीय भेद, भाषिक, लैङ्गकि, सांस्कृतिक भेदाव कैसे समाप्त होंगे – देश के किसी भी कोने में जो भेदभाव, उत्पीडन, शोषण के शिकार बने हुए है, उन्हें हम भौगोलिक रुप से छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित कर दें तो क्या सारे समाधान के मार्ग खुल जाएंगे – अपना अपना छोटा सा राज्य बनालो और कमाओं, खाओ ! ऐसा कह देने मात्र से समस्याओं का समधान नहीं होगा।
ऐसे अनेक जटिल प्रश्न मुँह बाए खडÞे हैं। एकात्मक राज्य को पुनर्संरचना द्वारा संघात्मक बनाने पर जनता जनार्दन को और ज्यादा तकलीफ उठानी पडेÞ और प्रशासनिक दृष्टि से भी असुविधाजनक हो तो ऐसा प्रदेश बनाने से क्या फायदा होगा – जरा सोचने की बात है। जातिगत दृष्टिकोण से कल्पित चौदह प्रदेशों को नक्से में देखकर वहाँ की समस्याओं पर एक नजर डालें। थरुहट प्रदेश की राजधानी दाङ को माना गया। मगराती राजधानी पाल्पा को बना दिया गया। अब देखिए तमाशा- रुकुम-रोल्पावासी नजदीकी दाङ को छोडÞकर पाल्पा जाने के लिए बाध्य हों तो उन्हें कैसा महसूस होगा – यह तो हाथ घुमाकर नाक पकडÞने की तरह हुआ। मन कामना के मगर लोग पोखरा पार करके पाल्पा जाने के लिए कैसे राजी होंगे – अपने-अपने जिल्ले के सदरमुकाम को नजदीक और सुविधाजनक अवस्थिति में पाने के लिए लोगों ने क्या-क्या नहीं किया – जरा याद करें, पोखरा में जो सदियों से बैठते आए हैं, वे ब्राम्हण, क्षत्रीय, थकाली, मियाजी, दलित आदि को अब आप लोग यहाँ से बोरिया बिस्तार गोल करके भरतपुर अथवा मुस्ताङ की ओर कूच कीजिए ! ऐसा फरमान नेपाल सरकार जारी करे तो उन बेचारों का क्या होगा – उसी तरह नुवाकोट, धादिङ, मकवानपुर के तामाङ लोगों को काठमांडू को पार करते हुए अपनी राजधानी ढूढÞने चौतारा पहुँचना पडेÞ तो उन को छठी का दूध याद आ जाएगा ! उस क्षेत्र की अन्य जनता पास में अवस्थित पोखरा जाने के बदले भरतपुर और पाल्पा जाना कैसे पसन्द करेंगे – यह तो हुआ उल्टा बाँस बरेली को। पोखरा निवासी बहुसख्यक जनता को आप कैसे अन्यत्र खदेडÞ सकते है – सिर्फपहचान के आधार पर प्रदेश बनाने पर लिम्बुवान के अन्दर जो लेप्चा जाति के लोग है, उनकी पहचान का क्या होगा – ताम्सालिङ के अन्दर चेपाङ और खसान के राउटे तथा र्सवत्र बसे हुए दलितों की पहचान में आप क्या देंगे, क्या करेंगे –
पर्ूवांचल की बात करें तो पर्ूव के र्राई लिम्बू बडÞी संख्या में झापा-मोरंग, सुनसरी में आकर बसे हैं। उन लोगों की सहज चाहना है- राजमार्ग के उत्तरवर्ती भाग लिम्बुवान खुम्बुवान अथवा किराँत प्रदेश में पडेÞ। लिम्बुवान, खुम्बुवान आन्दोलन की माँग जोरों पर है। दूसरी ओर मधेशवादी दलों का कहना है- एक मधेश, एक प्रदेश। अब इन तीनों मांगों को आप कैसे, किस नीति से सम्बोधन कर पाएंगे – आखिरकार भौगोलिक बनावट का आधार लेने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नजर नहीं आता।
सुदूर पश्चिम के नौ जिल्लों मे जाकर आयोग के सदस्य महोदय जनमत को समझें, वहाँ के निवासी क्या सोचते है – क्या चाहते है – कर्ण्ााली की ओर जाएं। जडान और खसान कहकर विभेद कर देना तो बहुत आसान है मगर वे क्या अपना अलग राज्य चलाने में सक्षम होंगे – समस्या को पहले ही पहचानने में ही बुद्धिमान है।
कांग्रेस की धारणा है- आर्थिक रुप से जितना सम्भव हो सके, उतनी ही कम संख्या प्रदेशों की हो। प्रदेश अर्न्तर्गत बननेवाली सरकार या स्वायत्त क्षेत्र जैसी विशेष संरचना द्वारा प्रदेश बनाते समय जिन समस्याओं का समाधान न हो सका उन्हें न्याय और बुद्धिपर्ूवक समाधान किया जाए। शासन सत्ता में पहुँच, जनता मूल रुप से यही चाहती है। उसके लिए स्थानीय सरकार को ज्यादा सक्षम बनाना होगा। जनता की उन्नति सुख-समृद्धि और पहचान प्रदर्शित होना बहुत बडÞी र्सार्थकता होगी। संविधान सभा समिति ने अपना प्रतिवेदन तैयार करते वक्त विद्यमान ७५ जिल्ला और उन से प्राप्त जनसेवा को भी नजर अन्दाज कर दिया है। इस तरह से प्रदेश निर्माण सहज नहीं होगा। ऐतिहासिक कालचक्र में दूरदराज में रहनेवाले सुविधाविहीन, अविकसित, अशिक्षित, असुरक्षित लोग राज्य से सेवा, संरक्षण, सुविधा चाहते हैं। सत्ता में अपनी पहुँच भी वे इसीलिए चाहते है। उपेक्षित जनता को सत्ता में सहभागी करने के लिए केन्द्रित शक्ति को विकेन्द्रित करना होगा। इसलिए स्थानीय सरकार की जरुरत महसूस की जाती है। उस दिशा में अनेकों कदम चलाए गए हैं।
इन सब बातों की उपेक्षा कर के राज्यपुनर्संरचना करना अग्रगामी सोच कैसे हो सकता है – अभी हम केन्द्र, प्रदेश, गाँव, इस तरह गाँव तक पहुँच रहे हैं। अभी तक जिल्लों का जो अस्तित्व और कार्य है, उनका क्या होगा – अब बननेवाली पुनर्संरचना में उन्हें कैसे सहभागी करेंगे – अथवा उनका वैकल्पिक रुप क्या होगा – इस विषय में आयोग ने क्या सोचा है – कुछ महात्वांकाक्षी राजनेता और उनके छूटभैए आकर्ष नारा देकर सत्ता में काबिज हो जाते है। माओवादी ने यही किया। सभी समुदाय को अलग अलग राज्य का सपना दिखा दिया। वस्तुगत यथार्थ एक ओर है और भावुक नारा दूसरी ओर। आज हम भावुक होकर किसी निर्ण्र्ाामें पहुँचते है और कल को वह निर्ण्र्ाायथार्थता के विपरीत हो तो जनता और राज्य दोनों संकट में होंगे। तर्सथ समय में ही सचेत र्सतर्क हो कर काम करना चाहिए। देश की राजनीति अभी दलदल में फँसी हर्ुइ है। उससे उबरने का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। नेता लोग निरीह बने है, सब को सचेत होना है। ±±±

Loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz
%d bloggers like this: