चौध गते का एक दिन:
राजेन्द्र थापा

कालिदास ने उज्जैन में लिखे थे, वर्षों पहले, ‘आषाढ का एक दिन’ और आषाढ मास भारतवर्षमें अमर हो गया और इसी भारतवर्षके हिमवतखण्ड के नेपालखण्ड, हमारे देश में कालिदास की जगह ले ली विन्दास ने, अर्थात विन्दास नेताओं के नई खोज की एक दिन वह दिन भाद्र १४ का है वह १४ गते हमारे जीवन के लिए निर्धारण किए थे, विन्दास नेताओं ने, प्रविधि विधान सायद कोई और था वहीं आशा की किरण प्रस्फुटित करनेवाली १४ गते अव हर बार अन्धकार और निराशा की तरफ लेजानेवाली एक पीडादायी दिन बन चुकी है
पर नेताओं के लिए बाँकी सब दिन मस्ती, वही एक दिन छिना झपटी का उधर नाम मात्र के विपक्षी दलों की हलचल शुरु हो जाती है १४ की सुबह उनको मालूम है नए १४ गते दिन में जन्म तो दिने हीं होंगे पर जितना हो सके क्यों न ले लें, या बटोर लें, सत्तावाले भाई से इसलिए सत्ता में रहनेवाले को ज्यादा से ज्यादा छोडने के लिए विवस बनाने की, मकडी के जाल में फंसाकर प्रधानमन्त्री और साझेदारियों को तडपाने की नाटक शुरु हो जाती है, १० बजे जव खुलती है सभा भवन
और इधर सत्तावालों के यहां भी वही हलचल होती है उन्हें पता होता है, आज दिन भर फिर दूसरी वार्ताएं, तीसरी वार्ताएं, चौथी वार्ताएं, दलों के बीच, हरेक दल के नेता विशेष के बीच, तीन दलों के बीच,  दो नेताओं के बीच, चार नेताओं के बीच, और बात मिलने की खवर वजार में पे+mका जाएगा फिर अचानक कहीं से मोवाइल सन्देश, फिर कोई शक्तिशाली मध्यस्थकर्ता से कभी इसकी कभी उसकी, गोप्य बातें, फिर अपनी हीं दल के बडे नेताओं के बीच टांग खीचने की वार्ता, लात मारने की वार्ता, पूंछ खींचने की वार्ता दूसरे दल की नेता विशेष को अपने नेता माननेवाले की पीछे की चाटुकारियों की बडी बडी बातें और अन्त में कुछ मन्त्री पदों के लेनदेन और कुछ निषेधात्मक अडÞान इत्यादि के बाद दूसरे दल से फिर नए शिरे से वार्ता करने की हुकुम प्रमाणगी
और फिर सुवह की तरह हरेक दल के बीच दुपहरी वार्ता, फिर मिलने की खवर फैल जाएगी आग की तरह दिवा भोजन और दिवा विश्राम के लिए निकलते हुए नेताओं की वकवास टिभी के सामने एक कहेगा, वात अब मिल गई है दूसरा कहेगा, मूख्य विवाद तो मिल गया, अव छोटी मोटी पावर सेरिंग की बात बंाकी है, वो भी अगले राउन्डÞ में अर्थात शाम के मदिरा राउन्डÞ पे अरे किस को पता नहीं है की आज कि लफडÞा सिर्फ पद है, आज तीन बडÞे दलों कि ध्यान प्रधानमन्त्री और गृह मन्त्रालय पे है मधेसी दल ीि ध्यान उप प्रधानमन्त्री और आपर्ूर्ति मन्त्रालय में ही होगा मधेसी दल के सांसद गया शाम तक देख रहे हांेगे, किधर वदलेगी हवा अपनी रुख और कौन सी दिशा से आएंगे मालदह आमों की खुशबू और इधर फिर मधेसी दल की पेडÞ की एक शाखा पर कोई चलाएगा अपनी गंडÞासा और फट जाएगा कोइ एक दल और खुश हो जाएंगे कोई एक बडÞा दल और फिर एक वार मधेसी सहादत जल की जगह ताडÞी के रस पर बह जाएगा, महूवा की मस्ती पे विखर जाएगा…. और फिर हवा शान्त… सत्ता और पैसों की तूफान वन्द…. खुली थैली में शुरु हर्ुइ तनाव और लफडÞा बन्द थैली में बन्द हो जाएगा, सब खुश, इधर भी उधर भी, हर १४ गते, मानों यह दशहरा है दिवाली है इन नेताओं के लिए
और इसी आंख मिचौली में रात्रिकालीन वार्ता शुरु होंगी, ठीक उसी तरह जैसे सुवह हर्ुइ थी नास्तापानीवाली वार्ता, जैसे दुपहर में हर्ुइ थी दिवा भोजनवाली वार्ता, और जैसे शाम में हर्ुइ थी मदिरावाली वार्ता दिन भर जव नेतागण अपनी अपनी पोटली में ज्यादा से ज्यादा माल भरने की कुरुक्षेत्र में शकुनी की तरह षडÞयन्त्र का पासा पे+mक रहे होते हैं, बंाकी के वेचारे ५८५ सांसद सदन की आरामदायी गद्दी में लुढक कर कभी चिर निंद्रा में खर्रर्ााें मारते हुए मिलेंगे, कभी क्यान्टिन पर चिकन चूरा और बफ ममचा और आलू कवाफ, और घट् घट् घट् पेप्सी के बाद ग्यांस त्याग इत्यादि बडÞी लुभावनी नजर से ये ५८५वाले मिडिÞयावालों के क्यामरा को देखते हैं, पर कोई इन ५८५ खर्रर्ााे वालों को देखते ही नहीं नेतालोग क्या कर रहें हैं इन को कुछ पता नहीं होता है छोटे कार्यकर्ताओं फोन में माननीय को कहते है, अभी हमने टिभी पर सुना कि ये हो रहा है, वो हो रहा है, क्या हो रहा है खास में ५८५ वाले वोलते हैं, हां हां… हं हं.. मिल रहा है, मिल रहा है…अब होने को है, इत्यादि और ये वेचारे जिनको कुछ भी तो पता नहीं होगा होगा.. होने को है..इत्यादि कार्यकर्ता उत्साहित होते हैं, और पूछना शुरु कर देतें हैं, ये और वो…। और पर्ूण्ारुप से बेखवर ये वेचारे, लज्जा छुपाने के लिए, फोन में ना सुनाई देने की नौटंकी करना शुरु कर देते हैं …. हलो…हलो… कुछ नहीं सुनाई देता… हलो..हलो.. इत्यादि
और रात के १२ वजे से कुछ पहले सहमति हो जाती हैं, सदा की तरह, अगले १४ गते तक संविधान सभा बनाने की पर अव विवाद शुरु होगी कितने महीने बाद की – सत्तावाले बोलेंगे एक साल, सत्ता में जाने के लिए पागल हुए प्रतिपक्षी कहेंगे.. नहीं नही…६ महीने और सत्ता वाले बोलेंगे ठीक है ६ महीने, फिर कथित प्रतिपक्षी वाले कहेंगे इस को हम दो भाग में करेंगे, तीन तीन महीने की और इस बार सिर्फ तीन महीने, वाद की १४ गते तक की म्याद बर्ढाई जाएगी इसी बीच फला होगा, ढिस्का होगा, और राष्ट्रीय सहमति की अर्थात प्रतिपक्षी के नेतृत्व में सरकार बनेगी और उस के बाद फिर जितना चाहिए उतने महीने की मियाद बढा देंगे, ६ महीने या एक साल के बाद की १४ गते हमे सत्ता में कोई लालसा नहीं है, हम तो शान्ति और संविधान के लिए हीं ये सब कर रहें हैं
इसी लफडÞा में ३ महीने के बाद की १४ गते को देश के भाग्य फैसला का दिन निश्चित की जाएगी जव की एजेन्डÞा में सव कुछ है, पावर सेरिंग वैगरह वैगरह, पर संविधान रचना के समाप्त करने की वात नहीं होगी, वो तो अगले वार मियाद बढाने के बाद इत्यादि
और नयें १४ गते की राष्ट्रीय सहमति के बाद सत्तावाले सभासद ताली देते हैं, प्रतिपक्षी वाले मधेसी दल उनसे सल्लाह किए विना निर्ण्र्ााकरनेवाले बडÞे दल को गाली देते हैं, क्योंकी अब कुछ महीने विना सत्ता के भूखे रहना है, प्यासे रहना है, सत्ता विना का अपमान सहना है आखिर जल विन मछली की तरह कर्ुर्सर्ीीवन मधेसी दल रहेंगे तो मधेसी जनता का अपमान ता होगा न – और मधेसी जनता का अपमान नेता लोग नहीं सह सकते हैं न –
और अगली सुवह से शुरु होगी इतने उतने बुंदेवाले सम्झौते की प्रधानमन्त्री की त्यागपत्र वाली बिन्दु को कार्यान्वयन करके राष्ट्रीय सहमति बनाकर संविधान बनाने में मद्दत करने का आग्रह, अन्यथा चेतावनी और प्रतिकार की चुनौती पर संविधान तो संविधानसभा बनाती है सरकार नही, फिर भी हर बार यही वात दुहर्राई जाएगी प्रतिपक्षीवाले यूं तो एमाले अपवाद है, सदा सत्तापक्ष होने पर भी वह हर बार कहता है, राष्ट्रिय सहमति की सरकार के विना संविधान नहीं बनेगा पर संविधान में किटान है संविधान सभा हीं संविधान बनाएगी सरकार नहीं इसीलिए तो हर वार संविधान सभा की मियाद बर्ढाई जाती है अन्यथा सभा को खत्म करें और सरकार बनाएं संविधान अगर यह संभव नहीं तो झूठ क्यों बारबार –
खैर पहले हमने ६५ के जेठ १४ गते देखे, फिर ६७ के जेठ १४, इसके बाद ६८ भाद्र को १४ गते के उस मध्य रात की प्रतीक्षा में हैं हम, जव कोई नयी अगली सात आठ बुंदो की सहमति बनेगी और नए १४ का उपहार जनता को दिया जाएगा हां अगर राष्ट्रीय सहमति के नाम पर सदन को प्रतिपक्षी बिहीन बनाकर सब को सरकार में जाने का अवसर मिला तो होगा ६९ साल के भाद्र १४ गते नहीं तो ६७ की मंसिर १४ जो भी हो जनता को १४ गते की राहत दिया जाएगा निश्चिन्त रहें जनता जनार्दन
[email protected]

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