छः दिनों में खुद संविधान बनाने वालों ने संविधान की धज्जियाँ उड़ा दी : श्वेता दीप्ति

संविधान के मसौदे से लेकर संविधान लागु होने तक मधेश की छाती खून से रंगी जाती रही । किन्तु उन छः महीनों में भी संविधान की इतनी धज्जियाँ नहीं उड़ी जितनी इस एक सप्ताह में खुद संविधान बनाने वालों के हाथों उड़ी हैं । संविधान निर्माता स्वयं संविधान से संतुष्ट नहीं हैं । एक ऐसा संविधान जिसकी हर धारा अस्पष्ट है ।

श्वेता दीप्ति, काठमांडू, १९ जुलाई |

एक खूबसूरत देश का एक दुर्भाग्यपूर्ण कल दस्तक दे रहा है । अगर गौर किया जाय तो दुर्भाग्य ने दस्तक उस दिन ही दे दिया था जिस दिन से सत्ता ने, देश के एक महत्वपूर्ण हिस्से को स्पष्ट तौर पर नकारना शुरु कर दिया था । अपनी जिद, सत्ता भोग करने की ख्वाहिश और इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए किसी भी अलोकतांत्रिक कार्य को अंजाम देने की स्पष्ट घोषणा ने दुर्भाग्य की नींव पहले ही रख दी थी । वैसे भी इस देश का इतिहास रक्तरंजित ही है । यही वह देश है जहाँ खूनी नरसंहार रातोरात खेला गया और इसका प्रतिरोध जनता या नेता की ओर से न तो तब किया गया जब राजतंत्र था और न आज आवाज उठी जब लोकतंत्र है । अभी के सन्दर्भ में शायद यह प्रसंग अनपेक्षित लगे किन्तु इसे याद करने का मकसद सिर्फ इतना है कि, सती के शाप से ग्रसित इस देश की शायद यही तयशुदा नियति है कि देश को विकास की राह से अधिक विनाश की राह पर धकेला जा रहा है ।

oli-bachao

राजतंत्र के अन्त के साथ ही देश की अवस्था के साथ एक शब्द जुड़ा संक्रमणकालीन अवस्था । इस अवस्था के साथ ही देश ने राजतंत्र के चोले को उतार कर क्रमशः प्रजातंत्र और लोकतंत्र के आवरण को पहना । किन्तु इस लोकतंत्र शब्द की समय समय पर धज्जियाँ उड़ती रही हैं । हमारा नवजात संविधान, जिसे हमारे ही देश ने बड़े ही शान से विश्व का सर्वोत्कृष्ट संविधान का दर्जा दिया । जिस संविधान को तराई ने स्पष्ट तौर पर अस्वीकार किया । संविधान के मसौदे से लेकर संविधान लागु होने तक मधेश की छाती खून से रंगी जाती रही । किन्तु उन छः महीनों में भी संविधान की इतनी धज्जियाँ नहीं उड़ी जितनी इस एक सप्ताह में खुद संविधान बनाने वालों के हाथों उड़ी हैं । संविधान निर्माता स्वयं संविधान से संतुष्ट नहीं हैं । एक ऐसा संविधान जिसकी हर धारा अस्पष्ट है । जाहिर तौर पर यह संविधान सिर्फ इसलिए ताबड़तोड़ तरीके से लागु किया गया था क्योंकि सत्तानशीनों का अपनी जिद पूरी करनी थी ।

देश के प्रधानमंत्री अल्पमत में हैं, सहयोगियों ने अपने हाथ खींच लिए हैं । नैतिकता के आधार पर प्रधानमंत्री को इस्तीफा दे देना चाहिए था । किन्तु नैतिकता शब्द का औचित्य यहाँ की राजनीति में कहीं नजर नहीं आता । बजट पेश होने से पहले माओवादी अध्यक्ष के साथ भद्र सहमति की गई और फिर गुजरते वक्त के साथ उससे मुँह भी मोड़ लिया गया । परिणति हुई कि साथियों ने बीच धार में पतवार छोड़ दिया । उसके बाद शुरुआत हुई राजनीति का सबसे प्रिय खेल कुर्सी बचाने की । प्रधानमंत्री का अगर व्यक्तित्व आकलन किया जाय तो यह तो तय था कि ये इतनी आसानी से कुर्सी नहीं छोड़ने वाले । बालुवाटार में प्रचण्ड और देउवा के साथ हुई वार्तालाप में उन्होंने स्पष्ट तौर पर इस्तीफा देने से इन्कार कर दिया और कहा कि वो अविश्वास मत का सामना करेंगे । उनकी नीति स्पष्ट थी कि अविश्वास प्रस्ताव अगर पंजीकृत होता है तो उन्हें शतरंज की चाल को चलने के लिए समय मिल जाएगा । खेल जारी है । संविधान के धारा २९८ और २९६ का हवाला देते हुए सत्तापक्ष का मानना है कि प्रधानमंत्री का पद पर बने रहना बनता है । क्योंकि संविधान के अनुसार संक्रमणकालीन अवस्था में प्रधानमंत्री के पदमुक्त होने पर नई सरकार कैसे गठन होगी इसकी अवधारणा अस्पष्ट है और इसी के आधार पर वत्र्तमान प्रधानमंत्री माघ तक पद पर डटे रहने का मन बना चुके हैं । अर्थात् संविधान की कमजोरी उनकी मजबूती बन रही है । काठमान्डौ को उनके कार्यकत्र्ता गरमा चुके हैं, राष्ट्रवादिता का नारा देकर । इतिहास की पुनरावृत्ति होने वाली है । ज्ञायातव्य है कि मनमोहन अधिकारी को इसी दौर से गुजरना पड़ा था और उस वक्त भी देउवा पक्ष ही सामने था और एमाले के कार्यकत्र्ताओं ने जमकर राजधानी में दहशत फैलाई थी । आज भी हालात वही हैं क्योंकि प्रधानमंत्री ने इस सारी प्रक्रिया को मुठभेड़ की संज्ञा पहले ही दे डाली है । संसद में तोड़फोड़ और राजधानी की सड़कों पर लोकतंत्र का जनाजा निकलने की पूरी संभावना नजर आ रही है । देखना ये है कि संसद में जिस तरह मधेशी नेताओं के विरोध करने पर उन्हें सेना के जवानों को सुरक्षाकर्मियों का रूप देकर उनके द्वारा चुन चुन कर निकाला गया था क्या उसी तरह आज काँग्रेस और माओवादियों के साथ वर्ताव किया जाएगा ? मजे की बात तो यह है कि यह सब काँग्रेस, एमाले और माओवादी इन तीनों की नीति के तहत किया गया था । आज मधेशी नेता का सवाल नहीं है, आज यह दो राष्ट्रीय दल खुद सामने हैं ।

पद की मर्यादा का मखौल सत्तापक्ष की ओर से तो उड़ाया ही जा रहा है । जिसका ताजा तरीन उदाहरण हैं सभामुख ओनसरी धर्तीमगर । जिन पर यह आरोप लगाया गया है कि वो निष्पक्षता के साथ अपने कार्य को नहीं कर रही हैं क्योंकि उन्होंने अविश्वासमत पर चर्चा कराने का निर्णय लिया था । उन्हें प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा है कि वो वर्षमान पुन की सलाह पर नहीं बल्कि संसद के नियमों और मान्यताओं के साथ कानूनी रूप में प्रक्रिया को आगे बढ़ाएँ । अब यह हस्तक्षेप संविधान के किस धारा के तहत आता है वह तो संविधान विज्ञ ही बता सकते हैं । दिन प्रतिदिन संविधान की कमियाँ सामने आ ही रही हैं । संविधान निर्माणकत्र्ता फिलहाल स्वयं ही संविधान की अस्पष्ट धाराओं में उलझे हुए हैं ।

opendra-yadavरिपोर्टर्स क्लब में अन्तरवार्ता देते हुए संघीय समाजवादी फोरम के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव ने स्पष्ट किया है कि मोर्चा को सरकार में जाने की कोई हड़बड़ी नहीं है । उनका यही मानना है कि प्रधानमंत्री को राजीनामा दे देना चाहिए । क्योंकि जनता की इच्छा मायने रखती है । जनता जब अपनी जिद पर आई तो देश से राजतंत्र की जड़ उखड़ गई । आज की समस्या संवैधानिक नहीं बल्कि राजनीतिक है इसलिए इसका समाधान इसी रूप में किया जाना चाहिए । संविधान के सम्बन्ध में उनकी स्पष्ट धारणा थी कि यह लागू होने लायक ही नहीं है । वत्र्तमान अवस्था में मधेशी मोर्चा की नजरें वस्तु स्थिति पर जमी हुई हैं । इसी बीच अनशन के पश्चात आन्दोलन की अगली कड़ी के रुप में मधेश के विभिन्न स्थानों पर अन्तरक्रिया कार्यक्रम की घोषणा संगठन के द्वारा जारी की जा चुकी है । वैसे यह कार्य पहले ही किया जाना चाहिए था किन्तु देर आए दुरुस्त आए । फिलहाल तो यह देखना है कि ऊँट कब पहाड़ के नीचे आता है ।

loading...