छठ : आस्था का महापर्व ! छठ पर्व तराई वा मधेश कीआत्मा है : बिम्मीशर्मा

बिम्मीशर्मा , काठमांडू , १७ नोभेम्बर |

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मै बहुतजगह घुमी हुं । पहाड की, चोटी, सूर्योदय के मनमोहक दृश्य से ले कर तराई के हरे-भरे मैदानों को भी निहारा है । बडे, बडे मन्दिर और समुंद्री तट को भी घण्टों तक देखा है । सब ने मन को बार बार खिंचा है । पर जिस एक दृश्य के आगे ईस पृथ्वी का सारा दृश्य फिका नजर आता है वह दृश्य है छठ में अस्त होते और उगते सूर्यदेव को अर्ध्य दने के लिए उठते हजारों हाथों को एक ही बार देखना । धनी, गरिब विभिन्न आय स्त्रोतो के, उच्चऔर निची जाति के भेद बिना एक ही घाट पर जब छठी मैया का गीत गाते हुए एक ही बार अर्ध्य देने के लिए घाट पर खडे हो जाते हैं । तब वह दृश्य देख कर शरीर का रोंआ, रोंआ खडा हो जाता है । लगता है वक्त थम गया है । ईश्वरीय आस्था और प्रेम इतनी बलवती भी हो सकती है ? इस को मनना और देखना सचमूच अलौकिक और अदभूत है । इस से सुन्दर और कोई दृश्य समुच्चे ब्रम्हाण्ड मे नजर आता ही नहीं । मन गदगद हो जाता है । भाव बिभोर हो हर्ष से आंखे भर आती है ।
छठ पर्व तराई वा मधेश कीआत्मा है । मधेश को अगर जानना है तो छठ पर्व को गौर से देखना और समझना जरुरी है । षष्ठी तिथी मे पड्ने वाला यह पर्व नेपालऔर भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार में पूरी श्रद्धा और बिश्वास के साथ मनाया जाता है । हिन्दू धर्म में वर्णित सभी ब्रतों मे छठ को कठीन और मनोकामना सिद्ध करने वाला ब्रत माना जाता है । इस ब्रत मे शुद्धता का बहुत ही ज्यादा ध्यान रखाजाता है । सभी मधेशियों को एक ही सूत्र मे जोड्ने वाला यह पर्व नहीं महापर्व है ।
छठ पर्व की सब से बडी खासियत है ईस का स्थानियता से ईसका जुडाव । ईस ब्रत के दौरान प्रयोग में आने वाली सभी वस्तुएं गावं, कस्बे के छोटे, छोटे मेहनत कशलागो द्धारा बनायाजाता है । छठ में प्रयोग में आने वाली डगरी, सूपलीऔर ढक्की सभीको डोम जाति द्धारा महिनों पहले से बनायाजाता है । हालाकिं वर्ण व्यवस्था के मुताबिक सब से निचीजाति के माने जाने वाले डोम भी छठ करते हैं । वैसे ही हाथी, दियाऔर ढकना भी कुम्हार जाति के लोग बनाते है । सभी जाति के परिश्रम और योगदान से यह पर्व सम्प्न्न होता है । केला, संतरा, मूली, अदरक, बोडी, उख आदि जितने भी खेत में उगाई जाने वाली वस्तुएं है यह सब स्थानीय किसान उगाते है या नजदिक से खरिद कर बजार मे ले जा कर बेचते हैं । सभी छठी मैया को प्रसन्न करने और खुद को इस पर्व कीतयारी में व्यस्त कर खुश रहते हैं । छठ पर्व के समय बजार में जो रौनक दिखता है वह तनमन को प्रसन्न करने वाला होता है ।
छठ पर्व के समय हरेक व्यक्तिअपनी हैसियत के अनुसार नए कपडे और खरिदता ही है । चाहे वह चांदी की बिछीया और पाजेब हो या सोने का हार ही क्यों न हो । सभी नएं कपडों मे लकदक करते हुए इस पर्व को अपार खुशी से मनाते हैं । जिन कें घर में छठ पूजा नहीं होता वह भी पडोसी या सगे सम्बन्धि के घर में होने वाली छठ पूजा में सामिल हो कर सहयोग करना और प्रसाद खाने में अपना अहो भाग्य ठानते हैं । छठ पर्व के समय में नेपाल के तराई में छठ के सिवा कुछ नहीं दिखता । बजार में चारो तरफ बस छठ पर्व के प्रयोजन के लिए सामान बिकता है । सडक में भीड उतना ही । लगता है छठ मैंया सभी पर हर्षेल्लास, भाई चारा और एकता बांट रही हैं ।
हमारा देश व समाज वर्गिकृत है । यहां बडे पद और उंचे रुतवे वाले व्यक्ति को आंखो पर बिठाया जाता है । चाहे वह यक्ति उस सम्मान के योग्य हो न हो । सभी चढ्ते हुएऔर उपर पंहुचे प्रतिष्ठित लोगों की ही पूजा करते हैं । पर छठ पर्व संझिया घाट पर अस्ताचल गामी सूर्यको अर्ध्य दे कर यह बताने का प्रयास किया गया है की समाजऔर देश में सभी की महत्वपूर्ण भूमिका है । कोई किसी से कम तर नहीं है । किसी को कम मत आंको । आज सूरज पश्चिम की तरफ अस्त होगा तभी चन्द्रमा उगने के लिए मौका मिलेगा । आज सूरज भगयान अस्त हो कर कलभोर में नयीं उर्जा के साथ पूरब दीशा से उगेगें ।
अस्ताचल गामी सूर्य कोअर्ध्य दे कर पूजा करने का मतलब है समाज में गिरते हुए नैतिक मूल्यों को फिर से प्रतिष्ठापित करना । समाज के विवेक और आचरण में जो हस आ रहा उसे अस्त होते सूर्य की उपासना की तरह फिर से अपने जगह पर लाना है । गिरते हुए को उठाना ही सच्ची मानवता है । जो उपर है, अच्छे पद पर है उस की तो सभी जय, जयकार करते है । पर जो दबे हुएं है । समाज के निम्नकोटी के लाग हैं उन्हे उपर लाना ही किसी भी ब्रत और त्यौहार का पहला कार्य है । और छठ पर्व यह काम सदियों से करता आया है ।
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बाघ और बकरी के एक ही घाट पर पानी पिने कीजो लोक कथा हम पढ्ते आएं है । वह कथा छठ घाट पर सच होता हुआ दिखता है । जब सभी जाति और वर्ग के लोग अपने भितर के अहमऔर कलुषता को भूला कर छठी मैया का गीत गाते हुए सूर्य देव को नमन करते हैं । तराई में तो मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग भी ईस पर्व को उसी निष्ठा और पवित्रता से मानते और पूजते हैं जिस श्रद्धा से हिन्दू मनाते हैं । चाहे मिट्टी कादिया बनाने वाला कुम्हार हो या सुपली बनाने वाला डोम । या कोई बडे जातका पण्डित और पूजारी । सभी एक ही घाट में बैठ कर उसी श्रद्धा से अस्त होते और उगते सूर्य को अर्ध्य दे कर इस महापर्व को समपन्न करते हैं ।
जब आज अस्ताचल गामी सूर्य को अध्र्य देने लाखों हाथ एक ही बार पश्चिम दीशा की तरफ उठ्ते है । तब तन मन इक अलौकिक प्रकाश से भर जाता है । इस संसार के प्रत्यक्ष देव सूर्यदेव हीं है । जो हमारे सुख, दुख, जाडा, गर्मी, बर्षात, खेतिवाडी से अभिन्न रुप से जुडे हुए हैं । उसी प्रत्यक्ष सूर्य देव की आराधना करने का यह पर्व वास्तव में तराई के ग्रामीण जीवन से एकाकार हो जाती हैं । यह आस्था का वह महापर्व है जिस में मधेश सांस लेता हैं । यह मधेश की जनता की जीजीविषा से भी जुडा हुआ है । छठ पर्व और मधेश को अलग करना शरीर को ह्दय से अलग करने के समान ही है । आस्था का यह पर्व ही मधेश को पूरी तरह समेट कर उसी समाजको प्रधिनिधित्व करता हैं । जहां पर मधेश और मधेशी जीव के थपेडों से जुझ कर अपने जीवनको संवार रहे हैं ।

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